ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आहारचर्या कब और कैसे ?

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आहारचर्या कब और कैसे ?

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साधु मंदिर में जाकर मध्यान्ह देववन्दना और गुरु वन्दना करके आहार को निकलते हैं ऐसा मूलाचार टीका, अनगार धर्मामृत आदि में विधान है फिर भी आजकल ९ बजे से लेकर ११ बजे तक के काल में आहार को निकलते हैं। संघ के नायक आचार्य आदि गुरु पहले निकलते हैं, उनके पीछे-पीछे क्रम से मुनि, आर्यिकायें, ऐलक, क्षुल्लक और क्षुल्लिकायें निकलते हैं अतः मंदिर में सभी संघ पहुँच जाता है तब मात्र गुरुवंदना करके भगवान् की सामान्य स्तुति वंदना करके निकलते हैं। मुनिगण बायें हाथ में पिच्छी-कमंडलु लेकर दाहिने हाथ की मुद्रा को कंधे पर रखकर निकलते हैं। किसी संघ में मुनिगण दाहिने हाथ में पिच्छी और बायें हाथ में कमंडलु लेकर निकलते हैं पुनः दातार के द्वार पर पड़गाहन के बाद बायें हाथ में पिच्छी लेकर दाहिने हाथ की मुद्रा कंधे पर रख लेते हैं।

नवधा भक्ति १. पड़गाहन करना

२. उच्च आसन देना

३. पाद प्रक्षालन करना

४. अष्टद्रव्य से पूजन करना

५. पंचांग नमस्कार करना

६. मनशुद्धि

७. वचनशुद्धि

८. कायशुद्धि

९. भोजनशुद्धि कहना ये नवधा भक्ति हैं।

जब श्रावक नवधा भक्ति करके ‘‘हे स्वामिन् ! आहार ग्रहण कीजिये।’’ ऐसी प्रार्थना करके शुद्ध गरम जल से साधु के हाथ धुला देते हैं तब साधु वहीं चौके में पूर्व दिन के ग्रहण किये हुए आहार के त्यागरूप प्रत्याख्यान या उपवास की निष्ठापन क्रिया करते हैं। जैसा कि अनगार धर्मामृत और आचारसार आदि ग्रंथों में लिखा है-

‘‘हेयं-त्याज्यं साधुना निष्ठाप्यमित्यर्थ। किं तत्? प्रत्याख्यानादि प्रत्याख्यानमुपोषितं वा। क्व? अशनादौ-भोजनारंभे। कया? सिद्धभक्त्या। किं विशिष्टया? लघ्व्या।

अर्थ - साधु चौके में भोजन प्रारंभ करते समय लघु सिद्धभक्ति के द्वारा पूर्व दिन के ग्रहण किये गये प्रत्याख्यान या उपवास का निष्ठापन करें-त्याग कर देवें। कोई साधु मंदिर में या गुरु के पास ही सिद्धभक्तिपूर्वक प्रत्याख्यान की निष्ठापना करके आहार को जाते हैं। सो समझ में नहीं आया, ऐसा कहीं आगम में विधान नहीं है। पुनः वहीं आहार के अनंतर मुखशुद्धि करके तत्क्षण ही प्रत्याख्यान ग्रहण कर लेवें। सो ही देखिये-

'‘‘आदेयं च-लघ्व्या सिद्धभक्त्या प्रतिष्ठाप्यं साधुना। किं तत् ? प्रत्याख्यानादि। क्व? अंते प्रव्माद् भोजनस्यैव प्रांते। कथं? आशु शीघ्रं भोजनानंतरमेव। आचार्यासन्निधावेतद्विधेयं।’’

साधु शीघ्र ही-भोजन के अनंतर ही आचार्य की अनुपस्थिति में-वहीं चौके में ही लघु सिद्धभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान अथवा उपवास ग्रहण कर लेवें अर्थात् अगले दिन आहार ग्रहण के पूर्व तक चतुर्विध आहार का त्याग कर देवें या अगले दिन उपवास करना है तो उपवास ग्रहण कर लेवें। उसकी विधि निम्न प्रकार है- नवधाभक्ति के बाद आहार प्रारंभ करने के पहले की विधि-

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प्रत्याख्यान विसर्जन विधि

नमोऽस्तु प्रत्याख्याननिष्ठापनक्रियायां........सिद्धभक्ति-कायोत्सर्गं करोम्यहं।

(२५ उच्छ्वास में ९ बार जाप्य) यदि पहले दिन का उपवास था तो-

नमोऽस्तु उपवासनिष्ठापनक्रियायां......सिद्धभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहं।

(२५ उच्छ्वास में ९ बार महामंत्र का जाप्य) लघु सिद्धभक्ति

तवसिद्धे णयसिद्धे संजमसिद्धे चरितसिद्धे य।

णाणम्हि दंसणम्हि य सिद्धे सिरसा णमंसामि।।

इच्छामि भंत्ते! सिद्धभत्तिकाओसग्गो कओ तस्सालोचेउं, सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचारित्तजुत्ताणं, अठ्ठविहकम्मविप्प-मुक्काणं अट्ठगुणसंपण्णाणं, उड्ढलोयमत्थयम्मि पइट्ठियाणं, तवसिद्धाणं, णय-सिद्धाणं, संजमसिद्धाणं, चरित्तसिद्धाणं, अतीताणागदवट्टमाणकालत्तयसिद्धाणं, सव्वसिद्धाणं, णिच्चकालं, अंचेमि पूजेमि वंदामि णमंसामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं।

यहां ‘प्रत्याख्यान निष्ठापन’’ का अर्थ है कि जो चतुर्विध आहार का मैंने त्याग किया था उस त्याग-प्रत्याख्यान को मैं अब निष्ठापित करता हू-समाप्त करता हूँ। पुनः हाथ की अंजुलि जोड़कर आहार ग्रहण करें उसके बाद शीघ्र ही मुखशुद्धि करके वहीं पर निम्न विधि करें।

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प्रत्याख्यान ग्रहण विधि

नमोऽस्तु प्रत्याख्यानप्रतिष्ठापनक्रियायां......सिद्धभक्ति-कायोत्सर्गं करोम्यहं।

(२५ उच्छ्वास में ९ बार महामंत्र का जाप्य) यदि अगले दिन का उपवास लेना है तो-

नमोऽस्तु उपवासप्रतिष्ठापनक्रियायां......सिद्धभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहं।

(९ जाप्य) पृ. ४८ से तवसिद्धे णयसिद्धे इत्यादि लघु सिद्धभक्ति पढ़ें। (पुनः ‘‘अरहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय सर्वसाधु पंचगुरु साक्षी से मेरा अगले दिन आहार ग्रहण करने तक चतुर्विध आहार का त्याग है।’’ ऐसा संकल्प करें।) ‘‘प्रत्याख्यान प्रतिष्ठापन’’ का अर्थ है कि मैं अब चतुर्विध आहार के प्रत्याख्यान-त्याग को प्रतिष्ठापित-स्वीकार करता हूँ-ग्रहण करता हूँ। पुनः श्रावक के घर से निकलकर साधु अपनी वसतिका में आकर आचार्य के समीप गवासन से बैठकर प्रत्याख्यान ग्रहण करें। सो ही कहा है-

‘‘सूरौ-आचार्यसमीपे पुनग्र्राह्यं प्रतिष्ठाप्यं साधुना। किं तत् ? प्रत्याख्यानादि। कया? लघ्व्या सिद्धभक्त्या..........लघु योगिभक्त्यधिकया तथा वंद्यः साधुना? स सूरिः। कया? सूरिभक्त्या। किं विशिष्टया? लघ्व्या।’’

पुनः आचार्य के पास में बैठकर साधु लघु सिद्धभक्ति और लघु योगिभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान या उपवास ग्रहण करें अनंतर लघु आचार्यभक्ति पढ़कर आचार्य की वंदना करें। इसके प्रयोग की विधि निम्न प्रकार है-

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गुरू के पास प्रत्याख्यान ग्रहण विधि

नमोऽस्तु प्रत्याख्यानप्रतिष्ठापनक्रियायां.....सिद्धभक्ति-कायोत्सर्गं करोम्यहं।

(२५ उच्छ्वास में ९ जाप्य)
तवसिद्धे णयसिद्धे इत्यादि पृ. ४८ से लघु सिद्धभक्ति पढ़े।

नमोऽस्तु प्रत्याख्यानप्रतिष्ठापनक्रियायां.....योगिभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं।


(२५ उच्छ्वास में ९ जाप्य)

लघु योगिभक्ति



प्रावृट्काले सविद्युत्प्रपतितसलिले वृक्षमूलाधिवासाः।



हेमंते रात्रिमध्ये प्रतिविगतभयाः काष्ठवत्त्यक्तदेहाः।।



ग्रीष्मे सूर्यांशुतप्ताः गिरिशिखरगताः स्थानकूटटांतरस्थाः।



ते मे धर्मं प्रदद्युर्मुनिगणवृषभा मोक्षनिःश्रेणिभूता।।१।।



गिह्मे गिरिसिहरत्था वरिसायाले रुक्खमूलरयणीसु।



सिसिरे बाहिर-सयणा ते साहू वंदिमो णिच्चं।।२।।



गिरि - कंदर - दुर्गेषु ये वसंति दिगंबराः।



पाणिपात्रपुटाहारास्ते यांति परमां गतिम् ।।३।।

अंचलिका-इच्छामि भंत्ते! योगिभत्तिकाओसग्गो कओ तस्सालोचेउं अड्ढाइज्जदीवदोसमुद्देसु पण्णारसकम्मभूमिसु आदावणरुक्खमूल-अब्भोवास-ठाण-मोण-वीरासणेक्कपास-कुक्कुडासण-चउत्थ-पक्खखवणादिजोगजुत्ताणं णिच्चकालं अंचेमि पूजेमि वंदामि णमंसामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं।

यदि अगले दिन का उपवास ग्रहण करना है तो ऐसा बोलना चाहिए-

नमोऽस्तु उपवासप्रतिष्ठापनक्रियायां....सिद्धभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं।

(९ जाप्य, तवसिद्धे इत्यादि पृष्ठ ४८ से)

नमोऽस्तु उपवासप्रतिष्ठापनक्रियायां......योगिभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं।

(९ जाप्य, प्रावृट्काले इत्यादि योगिभक्ति ऊपर से) इसके बाद आचार्यदेव अगले दिन के लिए प्रत्याख्यान या उपवास दे देते हैं- (अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुसाक्षिपूर्वकं श्वः आहारग्रहणात् प्राक्पर्यंत चतुर्विधाहारत्यागं कारयामि तव-युष्माकं।) अनंतर सभी साधु आचार्य वंदना करते हैं-

नमोऽस्तु आचार्यवंदनायां......आचार्यभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहं।

(२७ उच्छ्वास में ९ जाप्य)

लघु आचार्यभक्ति

श्रुतजलधिपारगेभ्यः स्वपरमतविभावनापटुमतिभ्यः।
सुचरिततपोनिधिभ्यो नमो गुरुभ्यो गुणगुरुभ्यः।।१।

छत्तीसगुणसमग्गे पंचविहाचारकरणसंदरिसे।
सिस्साणुग्गहकुसले धम्माइरिये सदा वंदे।।२।।

गुरुभत्तिसंजमेण य तरंति संसारसायरं घोरं।
छिण्णंति अट्ठकम्मं, जम्मणमरणं ण पावेंति।।३।।

ये नित्यं व्रतमंत्रहोमनिरता, ध्यानाग्निहोत्राकुलाः।
षट्कर्माभिरतास्तपोधनधनाः साधुक्रियाः साधवः।।
शीलप्रावरणा गुणप्रहरणाश्चंद्रार्व-तेजोऽधिकाः।
मोक्षद्वारकपाटपाटनभटाः प्रीणंतु मां साधवः।।४।।

गुरवः पांतु नो नित्यं, ज्ञानदर्शननायकाः।
चारित्रार्णवगंभीरा, मोक्षमार्गोपदेशकाः।।५।।

अंचलिका-इच्छामि भंत्ते! आइरियभत्तिकाओसग्गो कओ तस्सालोचेउं सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचारित्तजुत्ताणं पंचविहाचाराणं आइरियाणं, आयारादि-सुदणाणोवदेसयाणं उवज्झायाणं, तिरयणगुणपालणरयाणं सव्वसाहूणं णिच्चकालं अंचेमि पूजेमि वंदामि णमंसामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं।

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गोचार प्रतिक्रमण कब और कैसे करें?

आचार्यदेव की वंदना के बाद साधुवर्ग गोचार प्रतिक्रमण करें। जिनके घर में आहार हुआ है उनका नाम आदि बताकर आहार में जो कुछ अतिचार आदि लगे हों उनको कहना चाहिए। किन्हीं-किन्हीं संघ में आहार में जो कुछ ग्रहण किया है उन सब वस्तुओं को भी बतलाते हैं यह भी अच्छी परम्परा है। इससे शिष्यों के स्वास्थ्य के अनुकूल-प्रतिकूल वस्तु की जानकारी हो जाने से गुरु उसे अनुकूल वस्तु लेने व प्रतिकूल वस्तु न लेने आदि की शिक्षा भी देते हैं। गोचार प्रतिक्रमण का अर्थ है-

‘‘पडिक्कमामि भंते! अणेसणाए पाणभोयणाए......’’

इत्यादि दण्डक का प़ढ़ना किन्तु अनगार धर्मामृत में इन लघु प्रतिक्रमणों को ‘दैवसिक प्रतिक्रमण’ में ही अन्तर्भूत माना गया है अतः इस समय पृथक् इस दण्डक को पढ़ने की आवश्यकता नहीं है।

यथा-‘‘तथा स प्रतिक्रमो निषिद्धिकेर्यालुंचाशनदोषार्थश्चांतर्भवति। क्व? अपरे आह्निकादौ प्रतिक्रमे।’’

निषिद्धिका, ईर्यापथ, लोच, गोचार और स्वप्नदोष ये लघु प्रतिक्रमण दैवसिक-रात्रिक प्रतिक्रमण में अंतर्भूत हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि लोच, रात्रिक, दैवसिक, गोचार, निषेधिकागमन, ईर्यापथ और दोष ये सात लघु प्रतिक्रमण होते हैं। इनमे से ईर्यापथशुद्धि प्रतिक्रमण जो कि त्रिकाल देववंदना में आता है उसमें निषेधिका गमन प्रतिक्रमण गर्भित हो जाता है। दोष प्रतिक्रमण-निद्रासंबंधि प्रतिक्रमण रात्रिक में एवं लोच और गोचार प्रतिक्रमण दैवसिक में अंतर्भूत हो जाते हैं।

अनगार धर्मामृत में एक प्रश्न हुआ है कि साधु गुरु के परोक्ष में ही चौके में ही प्रत्याख्यान क्यों ले लेते हैं? उसका समाधान दिया है कि ‘‘दैवयोग से यदि कदाचित् गुरु के पास आते समय मार्ग मे ही आयु समाप्त हो गई हो, प्रत्याख्यान के बिना मृत्यु हो जाने से वह साधु विराधक-असमाधि से मरण करने वाला हो जावेगा अतः शीघ्र ही प्रत्याख्यान स्वयं ले लेना चाहिए फिर आकर गुरु के पास भी लेना चाहिए।

विशेष ज्ञातव्य - आजकल किन्हीं संघों में साधु आहार के पहले ही गुरु के पास प्रत्याख्यान निष्ठापन की भक्ति पढ़ लेते हैं और गुरु के पास ही प्रत्याख्यान का त्याग करके आहार को जाते हैं। सो यह परम्परा कैसे चालू हुई कौन जाने? यह आगमोक्त नहीं है। आचारसार में भी लिखा है कि ‘‘साधु दातार द्वारा पड़गाहन आदि नवधाभक्ति के पूर्ण हो जाने के बाद ही सिद्धभक्ति करके प्रत्याख्यान का निष्ठापन करे पुनः आहार ग्रहण करे।’’ क्रियाकलाप में पंडित पन्नालाल जी सोनी ने भी यही विधि लिखी है। यथा-‘‘भोजन के पहले लघु सिद्धभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान अथवा उपवास का त्याग-निष्ठापन करें और भोजन के बाद शीघ्र ही लघु सिद्धभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान अथवा उपवास ग्रहण करें। यह तो आचार्य की असमक्षता में करें। आचार्य के समीप में लघु सिद्धभक्ति, लघु योगिभक्ति पढ़कर प्रत्याख्यान अथवाउपवास धारण करें। अनन्तर लघु आचार्यभक्ति पढ़कर आचार्य की वंदना करें।’’३