ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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आहारमार्गणा अधिकार

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आहारमार्गणा अधिकार

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अथ आहारमार्गणाधिकार:

अथ स्थलचतुष्टयेन चतुर्दशसूत्रै: आहारमार्गणानाम चतुर्दशोऽधिकार: कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले आहारमार्गणायां मिथ्यात्वादित्रिगुणस्थानवर्तिनां अन्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘आहाराणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले असंयताद्यप्रमत्तान्तानां अंतरकथनेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं तृतीयस्थले उपशामकानां क्षपकाणां सयोगिनां चान्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘चदुण्हं’’ इत्यादिपंचसूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले अनाहाराणां अन्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘अणाहारा’’ इत्यादिसूत्रद्वयं इति समुदायपातनिका।
संप्रति आहारमार्गणायां मिथ्यात्वादित्रिगुणस्थानवर्तिनां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-आहाराणुवादेण आहारएसु मिच्छादिट्ठीणमोघं।।३८४।।
सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च ओघं।।३८५।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो, अंतो-मुहुत्तं।।३८६।।
उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीओ।।३८७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका- त्रयाणां सूत्राणामर्थ: सुगम:। त्रिगुणस्थानवर्तिनामाद्यानां एकजीवापेक्षया उत्कर्षेण-एक: सासादनकाले द्वौ समयौ स्त: इति कालं गत:। एकविग्रहं कृत्वा द्वितीयसमये आहारको भूत्वा तृतीयसमये मिथ्यात्वं गत्वान्तरित:। असंख्यातासंख्यातावसर्पिणी-उत्सर्पिणीप्रमाणं कालं परिभ्रम्यान्तर्मुहूर्तावशेषे आहारकाले उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न:। एकसमयावशेषे आहारकाले सासादनं गत्वा विग्रहं गत:। द्वाभ्यां समयाभ्यामून: आहारोत्कृष्टकाल: सासादनोत्कृष्टान्तरं।
एक: मिथ्यादृष्टि आहारक: अष्टाविंशतिसत्कर्मी विग्रहं कृत्वा देवेषु उत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तिं गत: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न: (४)। मिथ्यात्वं गत्वान्तरित:। अंगुलस्यासंख्येयभागं परिभ्रम्य सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपन्न: (५)। लब्धमंतरं। तत: सम्यक्त्वेन वा मिथ्यात्वेन वा अन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा (६) विग्रहं गत:। षडन्तर्मुहूर्तै: ऊन: आहारकाल: सम्यग्मिथ्यादृष्टिजीवस्योत्कृष्टान्तरं भवति।
एवं प्रथमस्थले आहारिणां मिथ्यादृष्ट्यादीनां अन्तरनिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
संप्रति असंयताद्यप्रमत्तान्तानां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठिप्पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।३८८।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।३८९।।
उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जाओ ओसप्पिणि- उस्सप्पिणीओ।।३९०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका- एतेषां नास्त्यन्तरं नानाजीवापेक्षया। एकजीवापेक्षया गुणस्थानांतरं गत्वा सर्वजघन्यकालेन पुन: अर्पितगुणस्थानप्रतिपन्नस्य जघन्यमन्तरमन्तर्मुहूर्तं। उत्कर्षेण-असंयतसम्यग्दृष्टे: अन्तरं कथ्यते-एक: अष्टाविंशतिसत्ताक: विग्रहं कृत्वा देवेषूत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि:पर्याप्तो जात: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (४) मिथ्यात्वं गत्वान्तरित: अंगुलस्यासंख्येयभागं परिभ्रम्यान्ते उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (५)। लब्धमन्तरं। उपशमसम्यक्त्वकाले षडावलिकावशेषे सासादनं गत्वा विग्रहं गत:। पंचान्तर्मुहूर्तै: ऊन: आहारकाल: उत्कृष्टान्तरं।
संयतासंयतस्योच्यते-एक: अष्टाविंशतिसत्ताक: विग्रहं कृत्वा संज्ञिसम्मूच्र्छिमेषूत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्तिं गत: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) वेदकसम्यक्त्वं संयमासंयमं च समकं प्रतिपन्न: (४)। मिथ्यात्वं गत्वान्तरित: अंगुलस्यासंख्येयभागं परिभ्रम्यान्ते प्रथमसम्यक्त्वं संयमासंयमं च समवंâ प्रतिपन्न: (५)। लब्धमन्तरं। उपशमसम्यत्वकाले षडावलिकावशेषे सासादनं गत्वा विग्रहं गत:। पंचान्तर्मुहूर्तै: ऊन: आहारकाल: उत्कृष्टान्तरं।
प्रमत्तस्य कथ्यते-एक: अष्टाविंशतिसत्ताक: विग्रहं कृत्वा मनुष्येषूत्पन्न:। गर्भाद्यष्टवर्षै: अप्रमत्त: (१) प्रमत्तो भूत्वा (२) मिथ्यात्वं गत्वान्तरित:। अंगुलस्यासंख्येयभागं परिभ्रम्यान्ते प्रमत्तो जात:। लब्धमन्तरं (३)। कालं कृत्वा विग्रहं गत:। त्रिभिरन्तर्मुहूर्तै: अष्टवर्षैश्च ऊन: आहारकाल: उत्कृष्टान्तरं। अप्रमत्तस्यापि एवं चैव, केवलं तु-अप्रमत्त: (१) प्रमत्तो भूत्वान्तरित: स्वकस्थितिं परिभ्रम्य अप्रमत्तो भूत्वा (२) पुन: प्रमत्तो जात: (३)। कालं कृत्वा विग्रहं गत:। त्रिभिरन्तर्मुहूर्तै: ऊन: आहारकाल: उत्कृष्टान्तरं।
एवं द्वितीयस्थले असंयातद्यप्रमत्तपर्यन्तानां आहारिणां अन्तरकथनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।


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अथ आहारमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब चार स्थलों में चौदह सूत्रों के द्वारा आहारमार्गणा नामका चौदहवाँ अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में आहारमार्गणा में मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानवर्ती जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले ‘‘आहाराणुवादेण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। आगे द्वितीय स्थल में असंयत से लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थान तक के जीवों का अंतर कथन करने हेतु ‘‘असंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके पश्चात् तृतीय स्थल में उपशामक, क्षपक और सयोगिकेवली भगवन्तों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘चदुण्हं’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में अनाहारक जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले ‘‘अणाहारा’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब आहारमार्गणा में मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानवर्ती जीवों का नाना जीव की अपेक्षा एवं एक जीव की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर बतलाने हेतु चार सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

आहारमार्गणा के अनुवाद से आहारक जीवों में मिथ्यादृष्टियों का अन्तर गुणस्थान के समान है।।३८४।।

आहारक सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर गुणस्थान के समान है।।३८५।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमश: पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है।।३८६।।

उक्त जीवों का उत्कृष्ट अन्तर अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण असंख्याता-संख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीकाल है।।३८७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त तीन सूत्रों का अर्थ सुगम है। प्रारंभ के तीन गुणस्थानवर्ती जीवों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-

एक सासादनसम्यग्दृष्टि जीव सासादनगुणस्थान के काल में दो समय अवशिष्ट रहने पर मरण को प्राप्त हुआ। एक विग्रह (मोडा) करके द्वितीय समय में आहारक होकर और तीसरे समय में मिथ्यात्व गुणस्थान में जाकर अन्तर को प्राप्त हुआ। असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी काल प्रमाण और उत्सर्पिणी काल प्रमाण तक परिभ्रमणकर आहारककाल में अन्तर्मुहूर्त अवशिष्ट रह जाने पर उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। पुन: आहारककाल के एक समयमात्र अवशिष्ट रहने पर सासादन में जाकर विग्रह को प्राप्त हुआ। इस प्रकार दो समयों से कम आहारक का उत्कृष्ट काल ही आहारक सासादनसम्यग्दृष्टि जीव का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक मिथ्यादृष्टि आहारक जीव विग्रह करके देवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (४) और मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हो गया। पुन: अंगुल के असंख्यातवें भाग कालप्रमाण परिभ्रमण कर सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (५)। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हो गया। उसके बाद सम्यक्त्व अथवा मिथ्यात्व के साथ अन्तर्मुहूर्त रहकर (६) विग्रहगति को प्राप्त हुआ। इस प्रकार छह अन्तर्मुहूर्तों से कम आहारकाल ही आहारक सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में आहारक मिथ्यादृष्टि आदि जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

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अब असंयत से लेकर अप्रमत्त तक जीवों का नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा जघन्य एवं उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थान तक आहारक जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।३८८।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।३८९।।

उक्त असंयतादि चार गुणस्थानवर्ती आहारक जीवों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणीकाल है।।३९०।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'नाना जीव की अपेक्षा इनका कोई अन्तर नहीं है। एक जीव की अपेक्षा विवक्षित गुणस्थान से अन्य गुणस्थान में जाकर और सर्वजघन्य काल से लौटकर पुन: अपने विवक्षित गुणस्थान को प्राप्त होने वाले जीव के जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त काल पाया जाता है।

आहारक असंयतसम्यग्दृष्टि जीव का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक जीव विग्रह करके देवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) वेदकसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (४)। पीछे मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हुआ और अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाणकाल तक परिभ्रमण करके अन्त में उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हो गया (५)। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हो गया। पुन: उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवली प्रमाण काल अवशिष्ट रह जाने पर सासादन में जाकर विग्रह गति को प्राप्त हुआ। इस प्रकार पाँच अन्तर्मुहूर्तों से कम आहारककाल ही आहारक असंयतसम्यग्दृष्टि जीव का उत्कृष्ट अन्तर होता है।

आहारक संयतासंयत का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक मिथ्यादृष्टि जीव विग्रह गति को प्राप्त करके संज्ञी पंचेन्द्रिय संमूच्र्छिमों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) वेदकसम्यक्त्व और संयमासंयम को एक साथ प्राप्त हुआ (४) पश्चात् मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त होकर अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण काल तक परिभ्रमणकर अन्त में प्रथमोपशमसम्यक्त्व और संयमासंयम को एक साथ प्राप्त हुआ (५)। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ। पश्चात् उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवली प्रमाण काल अवशेष रहने पर सासादन में जाकर विग्रह गति को प्राप्त हुआ। इस प्रकार पाँच अन्तर्मुहूर्तों से कम आहारककाल ही आहारक संयतासंयत का उत्कृष्ट अन्तर है।

अब आहारक प्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक जीव विग्रह गति को प्राप्त करके मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। वहाँ गर्भ को आदि लेकर आठ वर्षों में अप्रमत्तसंयत (१) और प्रमत्तसंयत होकर (२) मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हुआ। अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक परिभ्रमण करके अन्त में प्रमत्तसंयत हो गया। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ (३)। पश्चात् मरण करके विग्रहगति को प्राप्त हुआ। इस प्रकार तीन अन्तर्मुहूर्त और आठ वर्षों से कम आहारककाल ही आहारक प्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अन्तर है।

आहारक अप्रमत्तसंयत का भी अन्तर इसी प्रकार है। विशेषता केवल यह है कि अप्रमत्तसंयत जीव (१) प्रमत्तसंयत होकर अन्तर को प्राप्त होकर अपनी स्थितिप्रमाण परिभ्रमणकर अप्रमत्तसंयत (२) हुआ, पुन: प्रमत्तसंयत हुआ (३)। पश्चात् मरण करके विग्रहगति को प्राप्त हो गया। इस प्रकार तीन अन्तर्मुहूर्तों से कम आहारककाल ही आहारक प्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अन्तर है।

इस प्रकार द्वतीय स्थल में असंयतादि से अप्रमत्तसंयत पर्यन्त आहारक जीवों का अंतर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।


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संप्रति उपशामक-क्षपक-सयोगिनां आहारकाणां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-चदुण्हमुवसामगाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च ओघभंगो।।३९१।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।३९२।।

उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीओ।।३९३।।
चदुण्हं खवाणमोघं।।३९४।।
सजोगिकेवली ओघं।।३९५।।
'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'चतुर्णामुपशामकानामेकजीवापेक्षया उत्कर्षेण-एक: अष्टाविंशतिसत्ताक: विग्रहं कृत्वा मनुष्येषु उत्पन्न:। अष्टवार्षिक: सम्यक्त्वं अप्रमत्तभावेन संयमं च समकं प्रतिपन्न: (१)। अनंतानुबंधिनं विसंयोज्य (२) दर्शनमोहनीयमुपशाम्य (३) प्रमत्ताप्रमत्तपरावर्तसहस्रं कृत्वा (४) ततोऽपूर्व: (५) अनिवृत्ति: (६) सूक्ष्म: (७) उपशान्त: (८) पुनरपि अध: प्रतिपतन् सूक्ष्म: (९) अनिवृत्ति: (१०) अपूर्वो जात: (११) अधोऽवतीर्यान्तरित: अंगुलस्य असंख्येयभागं परिभ्रम्यान्तेऽपूर्वो जात:। लब्धमन्तरं। ततो निद्राप्रचलयो: बन्धव्युच्छिन्ने मृत्वा विग्रहं गत:। अष्टवर्षै: द्वादशान्तर्मुहूर्तैश्च ऊन: आहारकाल: उत्कृष्टान्तरं। एवं चैव त्रयाणामुपशामकानां। केवलं तु दश-नव-अष्टान्तर्मुहूर्ता: समयाधिका ऊना ज्ञातव्या:।
चतुर्णां क्षपकाणां, अयोगिकेवलिनां च नानाजीवापेक्षया जघन्येन एकसमयं, उत्कर्षेण षण्मासं अन्तरं। एकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं। सयोगिकेवलिनामपि नानैकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम्।
एवं प्रथमस्थले आहारिणां गुणस्थानापेक्षयान्तरनिरूपणत्वेन पंच सूत्राणि गतानि।
संप्रति अनाहारकाणामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-अणाहारा कम्मइयकायजोगिभंगो।।३९६।।
णवरि विसेसो, अजोगिकेवली ओघं।।३९७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्टीनां कार्मणकाययोगिनां नानैकजीवानां नास्यन्तरं। सासादनानां नानाजीवापेक्षया जघन्येन एकसमय:, उत्कर्षेण पल्योपमस्यअसंख्येयभाग:। एकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं। असंयतसम्यग्दृष्टीनां जघन्येन एकसमय:, उत्कर्षेण मासपृथक्त्वमन्तरं। एकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं। सयोगिकेवलिनां नानाजीवं प्रतीत्य एकसमय: जघन्येन, वर्षपृथक्त्वमुत्कर्षेण अन्तरं, एकजीवं आश्रित्य नास्त्यन्तरम्।
विशेषेण अनाहारकाणां अयोगिकेवलिनां सामान्यवत्। तद्यथा-नानाजीवं प्रतीत्य जघन्येन एकसमय:, उत्कर्षेण षण्मासं अन्तरं। एकजीवं आश्रित्य नास्त्यन्तरं इति ज्ञातव्यं।
एवं द्वितीयस्थले अनाहाराणां अन्तरनिरूपणत्वेन द्वे सूत्रे गते।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे पंचमग्रंथे अन्तरानुगमे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्त-चिंतामणिटीकायां आहारमार्गणानाम चतुर्दशोऽधिकार: समाप्त:।
चतुरास्योऽस्ति यो ब्रह्मा, विष्णुज्र्ञानेन व्याप्यते।
देवदेवो महादेव:, तस्मै तीर्थकृते नम:।।१।।
अधुना मांगीतुंगीसिद्धक्षेत्रे कल्पद्रुममहामहो यज्ञो भवन् अस्ति। पूर्वं यत्र समवसरणे गंधकुट्यां अनन्तचतुष्टयरूपान्तरङ्गलक्ष्म्या अष्टभूमिगतातुल्यविभवरूपाबहिरङ्गलक्ष्म्या च सह शतेन्द्रवंदिततीर्थकरभगवन्तो विराजन्ते तेभ्योऽस्माकं नमो नम:। तदेव समवसरणं संप्रत्यत्र विरचितमस्ति। अत्र स्थापनानिक्षेपेण चक्रवर्तिनो मुकुटबद्धराजानश्च भूत्वा चतुर्दिक्षु स्थित्वोपविश्य च कल्पद्रुमविधानपूजां कुर्वन्त: सन्ति। अस्मिन् महामंगलकाले एषोऽन्तरानुगमो नामानियोगद्वारो मया परिपूर्यते।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे पंचमग्रंथे श्रीमद्भूतबलि-सूरिविरचितान्तरानुगमे श्रीवीरसेनाचार्यविरचितधवलाटीका-प्रमुखानेकग्रन्थाधारेण विरचितायां अस्मिन् विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्ति श्री शांतिसागरस्तस्य प्रथमपट्टाधीश: श्रीवीरसागरस्तस्य शिष्या जंबूद्वीपरचनाप्रेरिका गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंता-मणिटीकायां मार्गणान्तरप्ररूपको नाम द्वितीयो महाधिकार: समाप्त:।

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अब उपशामक-क्षपक और सयोगिकेवली आहारकों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारक चारों उपशामकों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर गुणस्थान के समान है।।३९१।।

उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है।।३९२।।

आहारक चारों उपशामकों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अन्तर अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी है।।३९३।।

आहारक चारों क्षपकों का अन्तर गुणस्थान के समान है।।३९४।।

आहारक सयोगिकेवली का अन्तर गुणस्थान के समान है।।३९५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चारों उपशामकों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट कथन करते हैं- मोहनीयकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला कोई एक जीव विग्रह करके मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। आठ वर्ष का होकर सम्यक्त्व को और अप्रमत्तभाव के साथ संयम को एक साथ प्राप्त हुआ (१) पुन: अनन्तानुबंधी का विसंयोजन करके (२) दर्शनमोहनीय का उपशमनकर (३) प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानसंबंधी सहस्रों परिवर्तनों को करके (४) पश्चात् अपूर्वकरण (५) अनिवृत्तिकरण (६) सूक्ष्मसाम्पराय (७) और उपशान्तकषाय होकर (८) फिर भी गिरता हुआ सूक्ष्मसाम्पराय (९) अनिवृत्तिकरण (१०) और अपूर्वकरण हुआ (११)। पुन: नीचे उतरकर अन्तर को प्राप्त होकर अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक परिभ्रमणकर अन्त में अपूर्वकरण उपशामक हुआ। इस प्रकार अन्तर प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् निद्रा और प्रचला इन दोनों प्रकृतियों के बंध से व्युच्छिन्न होने पर मरकर विग्रह को प्राप्त हुआ। इस प्रकार आठ वर्ष और बारह अन्तर्मुहूर्तों से कम आहारककाल ही अपूर्वकरण उपशामक का उत्कृष्ट अन्तर है। इसी प्रकार शेष तीनों उपशामकों का भी अन्तर कहना चाहिए। विशेषता यह है कि आहारककाल में अनिवृत्तिकरण उपशामक के दश, सूक्ष्मसाम्पराय उपशामक के नौ और उपशान्तकषाय उपशामक के आठ अन्तर्मुहूर्त और एक समय कम करना चाहिए।

चारों क्षपकों का और अयोगिकेवली भगवन्तों का नाना जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह माह का है। एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है। सयोगिकेवली भगवन्तों का भी नाना जीव एवं एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है। इस प्रकार प्रथम स्थल में आहारक जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा अन्तर निरूपण करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

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अब अनाहारक जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अनाहारक जीवों का अन्तर कार्मणकाययोगियों के समान है।।३९६।।

किन्तु विशेषता यह है कि अनाहारक अयोगिकेवली का अन्तर गुणस्थान के समान है।।३९७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्टियों का नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा अन्तर का अभाव होने से अंतर नहीं है। सासादनसम्यग्दृष्टियों का नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य एक समय और उत्कृष्ट पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है, एक जीव की अपेक्षा अंतर नहीं है। असंयतसम्यग्दृष्टियों का नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर मासपृथक्त्व है और एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है। सयोगिकेवलियों का नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट वर्षपृथक्त्व अन्तर है तथा एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है।

विशेषरूप से अनाहारक अयोगिकेवलियों का अन्तर सामान्य गुणस्थान के समान है। वह इस प्रकार है-नाना जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय है, उत्कृष्ट अन्तर छह माह है। एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में अनाहारकों का अंतर बतलाने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ के अन्तरानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धांत चिंतामणिटीका में आहार-मार्गणा नाम का चौदहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

श्लोकार्थ-जो चतुर्मुखी अतिशय से समन्वित होने के कारण ‘‘ब्रह्मा’’ कहलाते हैं, लोकालोक के ज्ञान से व्याप्त होने के कारण ‘‘विष्णु’’ संज्ञा को धारण करते हैं तथा समस्त देवों के भी देव होने से ‘‘महादेव’’ कहे जाते हैं उन तीर्थंकर भगवान को मेरा बारम्बार नमस्कार है।।१।।

इस समय मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में कल्पद्रुम महामण्डल विधान नामक यज्ञ-पूजन का कार्यक्रम चल रहा है। पूर्व में अधर आकाश में निर्मित किये गये जिस वास्तविक समवसरण में गंधकुटी के अन्दर अनंत चतुष्टयरूप अन्तरंग लक्ष्मी एवं आठ भूमियों से समन्वित अतुलनीय वैभवरूप बहिरंग लक्ष्मी के साथ सौ इन्द्रों से वंदित तीर्थंकर भगवान विराजमान होते थे, उन सभी तीर्थंकर भगवन्तों को हमारा बारम्बार नमस्कार होवे। उसी प्रकार का समवसरण आज यहाँ धरती पर मण्डल के रूप में बनाया गया है। यहाँ स्थापना निक्षेप से चक्रवर्ती सम्राट् और मुकुटबद्ध राजा बनकर समवसरण मण्डल की चारों दिशाओं में बैठकर महापूजा कर रहे हैं। इस महान मंगल घड़ियों में मैंने षट्खण्डागम ग्रंथ का यह अंतरानुगम नामक अनुयोगद्वार लिखकर पूर्ण किया है।

भावार्थ-ईसवी सन् १९९६ में पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने संघ सहित मंगल चातुर्मास महाराष्ट्र प्रान्त के मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर किया था। उसी के अन्तर्गत आश्विन मास में पूज्य माताजी के ६३वें जन्मजयंती के प्रसंग में आयोजित कल्पद्रुम मण्डल विधान के मध्य वीर निर्वाण संवत् २५२२, आश्विन शु. षष्ठी, १८ अक्टूबर १९९६ को प्रात: १० बजकर १० मिनट पर षट्खण्डागम ग्रंथ की पंचम पुस्तक का यह अन्तरानुगम प्रकरण लिखकर परिपूर्ण किया है, इसीलिए वहाँ का नाम उद्धृत किया है। वह मण्डल विधान अत्यंत प्रभावनापूर्वक चमत्कारिकरूप में हुआ था। उस समय बम्बई में एक वृहत् तूफान की घोषणा महाराष्ट्र सरकार द्वारा हुई थी, किन्तु इस कल्पद्रुम विधान में भक्तों द्वारा किये गये लाखों मंत्रों के प्रभाव से वह तूफान टल गया था। इसीलिए उस कल्पद्रुम विधान का नाम इस प्रकरण में प्रमुखता से लिया गया है। इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पुष्पदंत-भूतबली द्वारा प्रणीत षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ में श्रीमान भूतबली आचार्य द्वारा रचित अन्तरानुगम प्रकरण में श्री वीरसेनाचार्य द्वारा विरचित धवला टीका को प्रमुख करके अन्य अनेक ग्रंथों के आधार से इस बीसवीं शताब्दी के प्रथमाचार्य चारित्र-चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रथम पट्टाधीश आचार्यश्री वीरसागर महाराज की शिष्या जम्बूद्वीप रचना की प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि टीका में मार्गणाओं में अन्तर प्ररूपण करने वाला द्वितीय महाधिकार समाप्त हुआ।