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ॐ ह्रीं शनिग्रहारिष्टशांतिकराय श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय नम:।

आ जा रि चांदनी, हमारो पूनो चांद लेके आ जा-२

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आ जा रि चांदनी


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आ जा रि चांदनी, हमारो पूनो चांद लेके आ जा-२।
हम सब आश लगाए-आ जा, तेरे दर्शन पाएं-आ जा।।
जीवन सफल बनाएं-आ जा।। आ जा...।।टेक.।।
धरती पर इक चांद जो आया, नभ का चांद स्वयं शरमाया।
ज्ञानमती बन ज्ञान लुटाया, जग को जीवन सार बताया।।
आ जा रि चांदनी...।।१।।
अवध की धरती मांग रही थी, अपने चांद को चाह रही थी।
पाकर मानो सब कुछ पाया, ज्ञानमती माता की छाया।।
आ जा रि चांदनी...।।२।।
तुम सी अद्भुत कन्या पाकर, धन्य टिकैतनगर रत्नाकर।
ऐसे तुमने किये हैं काम, हुआ ग्राम का जग में नाम।।
आ जा रि चांदनी...।।३।।
तुमने कई इतिहास रचे हैं, तेरे गुणों के बाग सजे हैं।
ग्रंथों का भण्डार भरा, तुझमें श्रुत का सार भरा।।
आ जा रि चांदनी...।।४।।
श्वेत वसन में तेरी सूरत, लगती जिनवाणी सम मूरत।।
सबको दें ऐसा वरदान, लहे ‘‘चन्दना’’ तुम सम ज्ञान।
आ जा रि चांदनी...।।५।।

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