ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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इक कहानी कहूँ, प्रभु की वाणी कहूँ

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इक कहानी कहूँ

तर्ज—ऐसी लागी लगन......

इक कहानी कहूँ, प्रभु की वाणी कहूँ,

ऋषभ महावीर की जिनवाणी कहूँ।। टेक.।।
सुबह मंदिर में जा, प्रभु का दर्शन करो।
पाँचों अंगों से झुक, प्रभु का वन्दन करो।।
बन्द मुट्ठी से, अक्षत चढ़ाया करो।। इक......।।१।।
जैन शास्त्रों को करके, नमन भक्ति से।
कर लो स्वाध्याय कुछ, आत्मशक्ती मिले।।
चार पुंजों को धर, उसकी वाणी गहो।। इक......।।२।।
साधु साध्वी मिलें, तो नमोस्तु करो।
तीन रत्नों के धारक को, त्रय पुंज दो।।
उनकी साक्षात् उपदेश, वाणी सुनो।। इक......।।३।।
जैन मंदिर से तुम, वापसी जब चलो।
प्रभु के गंधोदक से, तन को पावन करो।।
पीठ प्रभु को न दे, सीधे-सीधे चलो।। इक......।।४।।
मूलगुण आठ को, पालो सब श्रावकों।
‘‘चंदनामति’’ तभी, सच्चे श्रावक बनो।।
देव गुरु शास्त्र, तीनों की भक्ती करो।। इक......।।५।।


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