ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

इन्द्रध्वज विधान का महत्त्व

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इन्द्रध्वज विधान का महत्त्व

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सुधा-जीजी! आपने तो इस चातुर्मास में आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के पास बहुत कुछ अध्ययन किया होगा, बताओ तो सही, क्या-क्या पढ़ा है?

मालती-हाँ सुधा! अध्ययन तो किया है किन्तु बहुत कुछ न करके मात्र एक संस्कृत व्याकरण का ही अध्ययन किया है। चूँकि माताजी की चातुर्मास में दैनिक दिनचर्या नियमित थी अत: हम विद्यार्थियों को प्रात:काल मात्र ६ से ७ बजे तक संस्कृत व्याकरण पढ़ाती थीं, पुन: ७ से ८ बजे तक समयसार ग्रंथ का स्वाध्याय चलता था। प्राय: ८ से ९ तक उपदेश होता था पुन: वे आहार के अनन्तर से लेकर सायंकाल ६ बजे तक अपने लेखनकार्य में व्यस्त रहती थीं। कदाचित् कोई विशेष कार्य के लिए अथवा बाहर से आये हुए श्रावकों के लिए ही समय दिया करती थीं।

सुधा-माताजी ने इस चातुर्मास में कौन सा ग्रंथ लिखा है? बताइये, माताजी के लिखे हुए ग्रंथ हमें भी बहुत अच्छे लगते हैं।

मालती-माताजी ने इस चातुर्मास में महान इन्द्रध्वज विधान हिन्दी काव्यरूप बनाया है, जो कि वीर प्रभु की निर्वाण बेला में २३ अक्टूबर १९७६ को पूर्ण हुआ है। पुन; हम लोगों ने उस महान ग्रंथ की बड़ी भक्ति से पूजा की है।

सुधा-यह ‘इन्द्रध्वज विधान’ क्या है? इसका तो मैंने आज तक नाम भी नहीं सुना?

मालती-यह अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है, इसकी हस्तलिािख्त प्रतियाँ कुछ ही हैं, जिससे कोई-कोई लोग कहीं-कहीं पर कभी-कभी ही कराते हैं। इसलिए तुमने उसका नाम नहीं सुना है। इस विधान में एक श्लोक आया है कि-

‘‘यत्र यत्र कृता पूजा तत्र तत्र विडोजसा।

ध्वजा प्रस्थापिता नित्यं तस्मादिन्द्र ध्वजं स्मृतं।।’’

इन्द्र ने जहाँ-जहाँ (जिनमंदिरों में) पूजाएँ की हैं, वहाँ-वहाँ पर ध्वजा स्थापित कर दीं, इसलिए इस विधान को ‘‘इन्द्रध्वज’’ विधान कहते हैं।

सुधा-तब तो इस विधान को इन्द्र लोग ही कर सकते हैं, मनुष्य कैसे कर सकते हैं?

मालती-नहीं सुधा, ऐसी बात नहीं। देखो! साक्षात् तीर्थंकरों के पंचकल्याणक महोत्सव को इन्द्रादि देवगण ही करते हैं, फिर भी आजकल पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं में श्रावक ही तो इन्द्र बनकर अनुष्ठान करते हैं तथा नन्दीश्वर द्वीप में भी मनुष्य नहीं जा सकते हैं, फिर भी यहाँ पर उनकी पूजा अवश्य करते हैं। सिद्धचक्र विधान आदि जितने भी विधान हैं, उनमें भी तो विधानाचार्य विद्वान् श्रावकों को यज्ञ दीक्षा देते हुए मंत्रों के द्वारा उन्हें इन्द्र बनाते हैं और तभी तो विधान के अनुष्ठान तक उन विधान करने वालों को घर का सूतक-पातक आदि भी नहीं लगता है। नित्य पूजन भी तो ‘‘इन्द्रोऽहं निजभूषणार्थमिदं यज्ञोपवीतं दधे’’ इत्यादि प्रकार से पूजक उपचार से इन्द्र बनकर पूजा करते हैं, दूसरी बात यह है कि यह विधान इन्द्रों के लिए तो बनाया नहीं गया है और देश के लगभग हर छोटे-बड़े स्थानों पर बड़े-बड़े प्रतिष्ठाचार्यों के द्वारा कराया भी जा चुका है इसलिए यह तुम्हारी शंका बिल्कुल व्यर्थ है। मैंने सुना है कि एक बार वर्षा नहीं हुई बिल्कुल अकाल पड़ रहा था, उस समय इस विधान के कराते ही मूसलाधार वर्षा हो गई और अकाल का संकट दूर हो गया इसलिए यह विधान अत्यन्त चमत्कारिक है।

सुधा-तब तो जीजी! इस विधान को अकाल पड़ने पर ही कराना चाहिए सुकाल में कैसे करा सकते हैं?

मालती-सुधा, तू तो बिल्कुल पागल जैसी बातें कर रही हैं। अरे, सिद्धचक्र विधान के प्रभाव से मैनासुन्दरी ने अपने पति श्रीपाल का कुष्ठ रोग दूर किया था तो क्या आज कोई पति के कुष्ठ रोग होने पर ही सिद्धचक्र विधान करे अन्यथा न करे। अरे! यह भी कोई बात है। देखो! जितने भी विधान हैं, वे सभी सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि के लिए माने गये हैं।

सभी विधि-विधानों का फल अनेक प्रकार के संकटों को दूर करके महान् पुण्य द्वारा इन्द्रादि के वैभव को प्राप्त कराना है और परम्परा से मोक्ष प्राप्त कराना भी है। मंत्रों का भी ऐसा ही माहात्म्य है। सिद्धचक्र, ऋषिमण्डल या णमोकार आदि मंत्रों में भावना, विधि, पल्लव आदि के अनुसार पृथक्-पृथक् फल देने की शक्ति हो जाया करती है। जैसे शान्ति के हेतु मंत्र में स्वाहा पल्लव माना है। पुष्टि के लिए स्वधा, आकर्षण के लिए संवौषट् इत्यादि। ऐसे ही विधान भी जिस उद्देश्य से किया जायेगा, वही मनोरथ सफल हो जायेगा और यदि केवल पुण्य सम्पादन या धर्म प्रभावना हेतु किया जायेगा, तो वैसा ही फल मिलेगा। चूँकि निरीहवृत्ति से किया गया विधि-विधान महान अभ्युदयों को प्रदान करते हुए परम्परा से मोक्ष का कारण माना गया है, इसमें कोई संंदेह नहीं है अत: इस महान् इन्द्रध्वज विधान को चाहे जब भी किया जा सकता है।

सुधा-अच्छा, तो अब आप यह बतलाइये कि अन्य विधानों की अपेक्षा इसमें क्या-क्या विशेषताएँ हैं?

मालती-हाँ सुनो! इस विधान में मुख्यरूप से मंडल पर स्थापित किये गये मंदिरों के शिखरों पर ध्वजाएँ चढ़ाई जाती हैं।

सुधा-ये ध्वजाएँ कैसी होती हैं?

मालती-इन ध्वजाओं के दस प्रकार के चिन्ह होते हैं, जो कि उसी ग्रंथ के श्लोक में बताये गये हैं। यथा-

मालामृगेन्द्रकमलाम्बर वैनेतेय मातंग गीपतिरथांगमयूरहंसा:।

माला, सिंह, कमल, अम्बर, गरुड़, हाथी, वृषभ, चकवा-चकवी, मयूर और हंस ये चिन्ह पृथक्-पृथक् ध्वजाओं में बनाये जाते हैं।

सुधा-अरे जीजी! तो क्या मंदिरों में पशुओं को इकट्ठा किया जाता है।

मालाती-नहीं सुधा, ऐसा नहीं कहना, देखो! भगवान तीर्थंकर की प्रतिमाओं में भी तो वृषभ, हाथी, घोड़ा, बंदर आदि के चिन्ह रहते हैं, तो क्या उन महान् तीर्थंकरों के चिन्ह के बारे में भी ऐसा तुम सोच सकती हो? देखो, बिना सोचे-समझे ही कुछ बोल देना तो महापाप का कारण है। ध्वजाओं के इन चिन्हों के बारे में तो महान् ग्रंथों में भी प्रमाण है। श्री यतिवृषभाचार्य ने तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ में लिखा है जो कि महान् प्राचीन ग्रंथ है, वैसे ही त्रिलोकसार, जम्बूद्वीपपण्णत्ति और हरिवंशपुराण में भी लिखा है। यह प्रकरण अकृत्रिम अनादिनिधन चैत्यालयों के वर्णन में है, जो कि चैत्यालय या उनकी व्यवस्था तथा वहाँ रचनाएँ आदि किसी के द्वारा निर्मित नहीं हैं। सारे प्रमाण तुम देखो, पढ़ो।

हरिकरिवसहखगाहि व सिहि ससि रविहंस कमल चक्कधया।

 अट्ठत्तर सयसंखापत्तेक्वं तेत्तिया खुल्ला।।१९२५।।

सिंह, हाथी, बैल, गरुड़, मोर, चन्द्र, सूर्य, हंस, कमल और चक्र इन चिन्हों से युक्त ध्वजाओं में से प्रत्येक एक सौ आठ और इतनी ही क्षुद्र ध्वजाएँ हैं।

सोहगय हंस गोवइ सयवत्त मऊरमय रघयणिवहा।

 चक्कायवत्त गरुड़ा दसविहसंखा मुणेयव्वा।।३२।।

सिंह, हंस, गज, वृषभ, कमल, मयूर, मकर, चक्र, आतपत्र और गरुड़ इन दस प्रकार की ध्वजाओं के समूह जानना चाहिए।

सिंहगयवसहगरुड़सिंहिंंदिण हंसारविंद चक्कधया।

पुह अट्ठसया च उदिसमेक्केक्के अट्ठसय खुल्ला।।१०१०।।

उपर्युक्त ही अर्थ है।

सिंह हंसगजांभोज दुकूलवृषभध्वजै:।

मयूरगरुड़ाकीर्णश्चक्रमाला महाध्वजै:।।३६९।।
दशार्धवर्णभासद्भिर्दशभेदैर्दिशो दश।

सिंह, हंस, गज, कमल, वस्त्र, वृषभ, मयूर, गरुड़, चक्र और माला के चिन्हों से सुशोभित दस प्रकार की पंचवर्णी महाध्वजाओं से उन चैत्यालयों की दसों दिशाएँ ऐसी जान पड़ती हैं मानो लहलहाते हुए नूतन पत्तों से ही युक्त हों। और भी अनेकों ग्रंथों में जहाँ सुमेरु आदि के अकृत्रिम चैत्यालयों का वर्णन है, वहाँ पर इन दस प्रकार के चिन्हों सहित ध्वजाओं का वर्णन आता है।

सुधा-जीजी, आपने इन चिन्हों का स्पष्टीकरण कर दिया, तो बहुत ही अच्छा किया, नहीं तो मैं मिथ्यादृष्टि बहुत पाप बंध करती रहती। अच्छा यह तो बताइये कि ये ध्वजाएँ क्या मंडल पर अघ्र्य के साथ चढ़ाई जाती हैं?

मालती-नहीं-नहीं, ये ध्वजाएँ तो मंडल पर स्थापित किये गये मंदिरों के शिखरों पर चढ़ाई जाती हैं। यह तो मैंने पहले भी बता दिया है अथवा स्टैंड में लगाकर मंदिरों के स्थान पर स्थापित कर दी जाती हैं। सुधा इन ध्वजाओं का अघ्र्य से संबंध नहीं है। देखो! यहाँ अपने मंदिरों पर जो ध्वजाएँ लहरा रही हैं, वे जब शिखरों पर आरोपित की जाती हैं, तब उन्हेें चढ़ाना भी कहते हैं। जैसे कि आज मंदिर पर ध्वजा चढ़ेगी इत्यादि। इससे कोई भगवान को ध्वजा चढ़ाने का मतलब नहीं है, भगवान की पूजा में तो अष्टद्रव्य की सामग्री ही चढ़ाई जाती है।

सुधा-जीजी! अब यह विधान हमें कब देखने को मिलेगा?

मालती-बहुत जल्दी ही विधान होगा, जब तुम्हें देखने को मिलेगा। सुधा मैं इस विधान का क्या वर्णन करूँ? माताजी की यह रचना बहुत ही सुन्दर बनी है। इसमें ४३ प्रकार के छंदों का प्रयोग किया गया है। यह बहुत ही सरल, सरस और मधुर है। तिलोयपण्णत्ति, त्रिलोकसार आदि तमाम ग्रंथों के आधार को लिए हुए बहुत से अकृत्रिम रचनाओं का दिग्दर्शन कराने वाली है। सुधा-जीजी! सचमुच में माताजी की सारी रचनाएँ अपने आप में बहुत ही सुन्दर हैं।