ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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इन्द्रिय—विषय :

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इन्द्रिय—विषय :

सुष्ठ्वपि माग्र्यमाण:, कुत्रापि कदल्यां नास्ति यथा सार:।

इन्द्रियविषयेषु तथा, नास्ति सुखं सुष्ठ्वपि गवेषितम्।।

—समणसुत्त : ४७

बहुत खोजने पर भी जैसे केले के पेड़ में कोई सार नहीं दिखाई देता, वैसे ही इन्द्रिय–विषयों में भी कोई सुख दिखाई नहीं देता।