ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावनायै नमः"

इन्द्रिय का लक्षण

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संसारी जीव की पहचान के चिन्ह को इन्द्रिय कहते हैं।

इन्द्रिय के पाँच भेद हैं-स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण।
जिससे छू जाने पर हल्का, भारी, ठंडा आदि का ज्ञान होता है, उसे स्पर्शन इन्द्रिय कहते हैं।
जिससे खट्टा, मीठा, कडुआ, चटपटा व कषायला रस जाना जाता है, उसे रसना इन्द्रिय कहते हैं।
जिससे सुगन्ध और दुर्गन्ध का ज्ञान होता है, उसे घ्राण इन्द्रिय कहते हैं।
जिससे काला, पीला, नीला, लाल, सपेâद रंग जाना जाता है, उसे चक्षु इन्द्रिय कहते हैं।
जिससे मनुष्य, पशु, पक्षी, बादल, बाजे आदि की आवाज जानी जाती है, उसे कर्ण इन्द्रिय कहते हैं।
शिष्य-हमारे कितनी इन्द्रियाँ हैं?
गुरूजी-हमारे और आपके पाँचों इन्द्रियाँ हैं क्योंकि हम लोग छूकर वस्तुओं को जानते हैं, चखकर रसों का, सूँघकर फलों का, देखकर चित्रों का और सुनकर शब्दों का ज्ञान कर लेते हैं।