ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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इन्द्रिय मार्गणा में एकेन्द्रिय से पंचेंद्रिय तक अन्तरानुगम वर्णन

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इन्द्रिय मार्गणा में एकेन्द्रिय से पंचेंद्रिय तक अन्तरानुगम वर्णन

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अथ इंद्रियमार्गणाधिकार:

अथ अष्टभि: स्थलै: एकोनत्रिंशत्सूत्रै: अन्तरानुगमे इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकार:। तत्र प्रथमस्थले एकेन्द्रियाणां अन्तरकथनत्वेन ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले बादरैकेन्द्रियाणां अन्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘बादरे’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत: परं तृतीयस्थले सूक्ष्मैकेन्द्रियाणां नानैकजीवयो: अंतरप्ररूपणत्वेन ‘‘सुहुमे’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले विकलत्रयाणां जघन्योत्कृष्टान्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘बीइंदिय’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनंतरं पंचमस्थले पंचेन्द्रियाणां मिथ्यात्वादित्रिगुणस्थानवर्तिनां नानैकजीवयोरन्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। पुन: षष्ठस्थले असंयताद्यप्रमत्तान्तानां अन्तरकथनत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। पुनरपि सप्तमस्थले उपशामक-क्षपक-अयोगि-सयोगिनां अन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘चदुण्हं’’ इत्यादि पंचसूत्राणि। तत: परं अष्टमस्थले पंचेन्द्रियापर्याप्तानां अन्तरकथनत्वेन ‘‘पंचिंदियं’’ इत्यादिसूत्रत्रयं इति पातनिका।
संप्रति इन्द्रियमार्गणायां एकेन्द्रियाणां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-इंदियाणुवादेण एइंदियाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१०१।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्धा भवग्गहणं।।१०२।।
उक्कस्सेण वे सागरोवमसहस्साणि पुव्कोडिपुधत्तेणब्भहियाणि।।१०३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकजीवापेक्षया-कश्चिदेकेन्द्रियजीव: त्रसकायिकलब्ध्यपर्याप्तेषु उत्पद्य सर्वलघुकालेन पुन: एकेन्द्रियमागत: तस्य क्षुद्रभवग्रहण मात्रान्तरोपलब्ध:। एतज्जघन्यान्तरं। उत्कर्षेण-एकेन्द्रिय: जीव: त्रसकायिकेषु उत्पद्य अंतरित: पूर्वकोटिपृथक्त्वेनाभ्यधिकद्विसागरोपमसहस्रमात्रां त्रसस्थितिं परिभ्रम्य एकेन्द्रियं गत:। लब्धमेकेन्द्रियाणामुत्कृष्टान्तरं त्रसस्थितिमात्रम्।
एवं प्रथमस्थले एकेन्द्रियान्तरकथनपरेण त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अधुना बादरैकेन्द्रियाणामन्तरप्ररूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-बादरेइंदियाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१०४।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१०५।।
उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा।।१०६।।
एवं बादरेइंदियपज्जत्त-अपज्जत्ताणं।।१०७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कश्चिद् बादरैकेन्द्रियजीव: अन्यलब्ध्यपर्याप्तकेषु उत्पद्य सर्वस्तोकेन कालेन पुन: बादरैकेन्द्रियं आगत:। लब्धक्षुद्रभवग्रहणमात्रमन्तरं। एकजीवापेक्षया। उत्कर्षेण-एको बादरैकेन्द्रिय: सूक्ष्मैकेन्द्रियादिषु उत्पद्य असंख्यातलोकमात्रकालं अंतरं व्यतीत्य पुन: बादरैकेन्द्रियेषु उत्पन्न:। लब्धमसंख्यातलोकमात्रं बादरैकेन्द्रियाणामन्तरं।
एवमेव बादरैकेन्द्रियपर्याप्तापर्याप्तयोरन्तरं वक्तव्यं।
एवं द्वितीयस्थले बादरैकेन्द्रियाणामन्तरकथनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
अधुना सूक्ष्मैकेन्द्रियाणामन्तरकथनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-सुहुमेइंदिय-सुहुमेइंदियपज्जत्त-अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१०८।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१०९।।
उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो, असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पिणिउस्सप्पिणीओ।।११०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-द्वयो:सूत्रयोरर्थ: सुगम:। उत्कर्षेणान्तरं कथ्यते-सूक्ष्मैकेन्द्रिय: पर्याप्त: अपर्याप्तो वा त्रिविधेषु सूक्ष्मेषु कश्चिदेको जीव: बादरैकेन्द्रियेषु उत्पन्न:। त्रसकायिकेषु बादरैकेन्द्रियेषु च असंख्यातासंख्यातावसर्पिणी-उत्सर्पिणीप्रमाणमंगुलस्य असंख्यातभागं परिभ्रम्य पुन: त्रिष्वपि सूक्ष्मैकेन्द्रियेषु आगत्योत्पन्न:। लब्धमन्तरं बादरैकेन्द्रियत्रसकायिकानामुत्कृष्टस्थितिप्रमाणं सूक्ष्मैकेन्द्रियस्योत्कृष्टमिति।
एवं तृतीयस्थले सूक्ष्मैकेन्द्रियाणामन्तरकथनत्वेन सूत्राणि त्रीणि गतानि।


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अथ इंद्रिय मार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब आठ स्थलोें में उनतीस सूत्रों के द्वारा अंतरानुगम में इंद्रियमार्गणा नामका द्वितीय अधिकार प्रारंभ होता है। उसमें से प्रथम स्थल में एकेन्द्रिय जीवों का अंतरकथन करने वाले ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में बादर एकेन्द्रिय जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु ‘‘बादरे’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। पुन: तृतीय स्थल में सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों में नाना जीव और एक जीव का अंतर प्ररूपण करने हेतु ‘‘सुहुमे’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में विकलत्रय जीवों का जघन्य और उत्कृष्ट अंतर कथन करने हेतु ‘‘बीइंदिय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। अनंतर पंचम स्थल में पंचेन्द्रिय जीवों का मिथ्यात्व आदि तीन गुणस्थानों में नाना जीव और एक जीव का अंतर कथन करने की मुख्यता वाले ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। पुन: छठे स्थल में असंयत से लेकर अप्रमत्त गुणस्थान तक के जीवों का अंतर कथन करने वाले ‘‘असंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद सातवें स्थल में उपशामक, क्षपक, अयोगिकेवली और सयोगिकेवलियों का अंतर निरूपण करने वाले ‘‘चदुण्हं’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। पुनश्च आठवें स्थल में पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का अंतर बतलाने वाले ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब इंद्रियमार्गणा में एकेन्द्रिय जीवों का नाना जीव और एक जीव की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अंतर कथन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

इंद्रियमार्गणा के अनुवाद से एकेन्द्रिय जीवों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर नहीं है, निरंतर है।।१०१।।

एक जीव की अपेक्षा एकेन्द्रियों का जघन्य अंतर क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।।१०२।।

एकेन्द्रियों का एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्ट अंतर पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक दो हजार सागरोपम है।।१०३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एक जीव की अपेक्षा कथन करते हैं-कोई एकेन्द्रिय जीव त्रसकायिक अपर्याप्तकों में उत्पन्न होकर सर्वलघु काल में पुन: एकेन्द्रिय पर्याय को प्राप्त हो गया, उस जीव के क्षुद्रभवग्रहण मात्र का अंतर पाया जाता है। यह जघन्य अंतर है।

उत्कृष्ट की अपेक्षा-कोई एक एकेन्द्रिय जीव त्रसकायिकों में उत्पन्न होकर अंतर को प्राप्त हुआ और पूर्वकोटिपृृथक्त्व से अधिक दो हजार सागरोपमप्रमाण त्रसकाय की स्थिति प्रमाण परिभ्रमण कर पुन: एकेन्द्रियों में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार एकेन्द्रियों का उत्कृष्ट अंतर त्रसस्थिति प्रमाण प्राप्त हुआ।

इस प्रकार प्रथम स्थल में एकेन्द्रिय जीवों का अंतर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का अंतर प्ररूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

बादर एकेन्द्रियों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर नहीं है, निरंतर है। ।।१०४।।

उक्त जीवों का अंतरकाल एक जीव की अपेक्षा क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण है।।१०५।।

उक्त जीवों का उत्कृष्ट अंतर असंख्यातलोकप्रमाण है।।१०६।।

इसी प्रकार से बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त और बादर एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकों का अंतर जानना चाहिए।।१०७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई एक बादर एकेन्द्रिय जीव अन्य अपर्याप्तक जीवों में उत्पन्न होकर सबसे कम काल से पुन: बादर एकेन्द्रियपर्याय को प्राप्त हुआ। यह एक जीव की अपेक्षा क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण अंतर पाया जाता है। उत्कृष्ट से-एक बादर एकेन्द्रिय जीव, सूक्ष्म एकेन्द्रियादिकों में उत्पन्न हो वहाँ पर असंख्यातलोकप्रमाण काल तक अंतर को प्राप्त होकर पुन: बादर एकेन्द्रियों में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार असंख्यातलोकप्रमाण बादर एकेन्द्रियों का अंतर प्राप्त हुआ।

इसी प्रकार बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का अंतर जानना चाहिए।

इस तरह से द्वितीय स्थल में बादर एकेन्द्रिय जीवों का अंतर बतलाने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों का अंतर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होेते हैं-

सूत्रार्थ-

सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रियपर्याप्त और सूक्ष्म एकेद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर नहीं, निरंतर है। उक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अंतर क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।।१०९।।

उक्त सूक्ष्मत्रिकों का उत्कृष्ट अंतर अंगुल के असंख्यातवें भाग असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल प्रमाण है।।११०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। उत्कृष्टरूप से अन्तर का कथन करते हैं-

कोई एक सूक्ष्म एकेन्द्रियपर्याप्तक अथवा लब्ध्यपर्याप्तक जीव बादर एकेद्रियों में उत्पन्न हुआ। वह त्रसकायिकों में और बादर एकेद्रियों में अंगुल के असंख्यातवें भाग असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी कालप्रमाण परिभ्रमण कर पुन: तीनों प्रकार के सूक्ष्म एकेद्रियों में से किसी में भी आकर उत्पन्न हुआ। इस प्रकार बादर एकेद्रियों और त्रसकायिकों की उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण सूक्ष्मत्रिक का उत्कृष्ट अंतर उपलब्ध हुआ।

इस प्रकार से तृतीय स्थल में सूक्ष्म एकेद्रिय जीवों का अंतर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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संप्रति विकलत्रयाणां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते

संप्रति विकलत्रयाणां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-बीइंदिय-तीइंदिय-चतुिंरदिय तस्सेव पज्जत्त अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१११।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।११२।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।११३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-द्वयो: सूत्रयोरर्थ: सुगमोऽस्ति। उत्कर्षेण-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिया: सामान्या: त्रिविधा:, इमे च पर्याप्ता: अपर्याप्ता अपि सर्वे नवधा भणिता:। एषु मध्ये कश्चिदपि जीव: एकेन्द्रियेषु अनेकेन्द्रियेषु-पंचेन्द्रियेषु च उत्पद्य आवलिकाया: असंख्यातभागपुद्गलपरिवत्र्तानि परिवत्त्र्य पुन: नवसु विकलेन्द्रियेषु मध्ये उत्पन्न:। लब्धमन्तरं असंख्यातपुद्गलपरिवत्र्तमात्रं।
एवं चतुर्थस्थले विकलत्रयाणामन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति पंचेन्द्रियाणां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रपञ्चकमवतार्यते-पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्तएसु मिच्छादिट्ठी ओघं।।११४।।
सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।११५।।
उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।११६।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो, अंतो-मुहुत्तं।।११७।।
उक्कस्सेण सागरोवमसहस्साणि पुव्वकोडिपुधत्तेणभहियाणि सागरोवम-सदपुधत्तं।।११८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचेन्द्रियाणां सामान्यानां पर्याप्तानां च नानाजीवापेक्षया मिथ्यात्वगुणस्थानस्य अन्तरं नास्ति। एकजीवापेक्षया जघन्येन अंतर्मुहूर्तं। उत्कर्षेण अन्तर्मुहूर्तोनद्विवारं षट्षष्टिसागरप्रमाणं अन्तरं अस्ति। सासादनमिश्रगुणस्थानयो: गुणस्थानान्तरापेक्षया जघन्येन एकसमयमन्तरं। उत्कर्षेण पल्योपमस्या-संख्यातभाग:। एकजीवापेक्षया जघन्येन सासादनस्य पल्योपमासंख्यातभाग: सम्यग्मिथ्यात्वस्य अंतर्मुहूर्तं। उत्कर्षेण तावदुच्यते-
एक: कश्चिद्जीव: अनंतकालमसंख्यातलोकमात्रं वा एकेन्द्रियेषु स्थित: असंज्ञिपंचेन्द्रियेषु आगत्य उत्पन्न:। पंचभि: पर्याप्तिभि: मनोन्तरेण पर्याप्तिं गत: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) भवनवासि-वानव्यन्तरयो: आयुर्बद्ध्वा (४) विश्रान्त: (५) क्रमेण कालं कृत्वा भवनवासि-वानव्यन्तरयोरूत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्त: (६) विश्रान्त: (७) विशुद्ध: (८) उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (९) सासादनं गत:। आदिर्दृष्ट:।
पुन:मिथ्यात्वं गत्वा अंतरं प्राप्य स्वकस्थितिं परिवत्त्र्यावसाने सासादनं गत:। लब्धमन्तरं। तत: स्थावरप्रायोग्यमावलिकाया: असंख्यातभागमात्रं स्थित्वा कालं कृत्वा स्थावरकायेषु उत्पन्न:, आवलिकाया: असंख्यातभागेन नवान्तर्मुहूर्तै: ऊना स्वकस्थिति: अन्तरम्।
एवमेव सम्यग्मिथ्यात्वस्य ज्ञातव्यं, विशेषेण तु द्वादशान्तर्मुहूर्तै: ऊनं स्वकस्थितिप्रमाणमुत्कृष्टान्तरं वक्तव्यं।
‘यथा उद्देशस्तथा निर्देश:’ इति न्यायात् पंचेन्द्रियस्थिति: पूर्वकोटिपृथक्त्वेनाभ्यधिकसागरोपमसहस्रमात्रा, पर्याप्तानां सागरोपमशतपृथक्त्वमात्रा इति वक्तव्यं।
एवं पंचेन्द्रिय-पंचेन्द्रियपर्याप्तानां त्रिगुणस्थानवर्तिनां अन्तरकथनमुख्यत्वेन पंच सूत्राणि गतानि।


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अब विकलत्रय जीवों का अंतर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुिंरद्रिय और उन्हीं के पर्याप्तक तथा लब्ध्यपर्याप्तक जीवों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरंतर है।।१११।।

उक्त द्वीद्रिंयादि जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अंतर क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण है।।११२।।

उन्हीं विकलेंद्रियों का उत्कृष्ट अन्तर अनंतकालात्मक असंख्यात पुद्गलपरिर्वतन है।।११३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। उत्कृष्टरूप से-दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय के भेद से सामान्यरूप से विकलेंद्रियों के तीन भेद हैं। ये सभी पर्याप्त और अपर्याप्त दोनों रूप होते हैं अत: नौ भेद हो जाते हैं। इन नवों प्रकार के जीवों के मध्य में कोई भी जीव एकेन्द्रियों में या अनेकेन्द्रिय अर्थात् पंचेन्द्रियों में उत्पन्न होकर आवली के असंख्यातवें भागमात्र पुद्गलपरिवर्तन काल तक परिभ्रमण करके पुन: नवों प्रकार के विकलेन्द्रियों में से किसी एक में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार से असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण उत्कृष्ट अंतर प्राप्त हुआ।

इस प्रकार से चतुर्थ स्थल में विकलत्रय जीवों का अंतर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब पंचेन्द्रियों में नाना जीव और एक जीव का अंतर प्रतिपादन करने वाले पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रियपर्याप्तकों में मिथ्यादृष्टि जीवों का अंतर गुणस्थान के समान होता है।।११४।।

उक्त दोनों प्रकार के पंचेन्द्रिय सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अंतर होता है।।११५।।

उपर्युक्त जीवों का उत्कृष्ट अंतर पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण है।।११६।।

उन जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अंतर क्रमश: पल्योपम का असंख्यातवां भाग और अंतर्मुहूर्त है।।११७।।

उन दोनों गुणस्थानवर्ती पंचेंद्रियों का उत्कृष्ट अंतर पूर्वकोटिपृथक्त्व से अधिक एक हजार सागरोपम काल है, तथा पंचेन्द्रिय पर्याप्तकों का उत्कृष्ट अंतर सागरोपमशतपृथक्त्व है।।११८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्य पंचेन्द्रिय एवं पर्याप्तक जीवों में नाना जीवों की अपेक्षा मिथ्यात्व गुणस्थान का कोई अंतर नहीं है। एक जीव की अपेक्षा जघन्य से अंतर्मुहूर्त काल है। उत्कृष्ट से अंतर्मुहूर्त कम दो छ्यासठ सागर प्रमाण काल का अंतर पाया जाता है। सासादन और मिश्रगुणस्थान में गुणस्थानों के अंतर की अपेक्षा जघन्य से एक समय का अंतर है और उत्कृष्टरूप से पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है। एक जीव की अपेक्षा जघन्य से सासादन गुणस्थान का अंतरकाल पल्योपम का असंख्यातवां भाग है और सम्यग्मिथ्यात्व का जघन्यकाल अंतर्मुहूर्त है।

अब उत्कृष्ट से इनका कथन करते हैं-

अनंतकाल या असंख्यातलोकप्रमाणकाल तक एकेन्द्रियों में रहा हुआ कोई एक जीव असंज्ञी पंचेन्द्रियों में आकर उत्पन्न हुआ। मन के बिना पांचों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (१)। विश्राम लेकर (२)। विशुद्ध होकर (३)। भवनवासी या वानव्यंतरों में आयु को बांधकर (४)। विश्राम लेकर (५)। क्रम से मरण करके भवनवासी या वानव्यंतरदेवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्ति होकर (६)। विश्राम लेकर (७)। विशुद्ध होकर (८)। उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (९)। पुन: सासादनगुणस्थान में चला गया। इस प्रकार इस गुणस्थान के अंतर का प्रारंभ देखा गया। पश्चात् मिथ्यात्व में जाकर अंतर को प्राप्त होकर अपनी स्थितिप्रमाण परिवर्तित होकर आयु के अंत में सासादन गुणस्थान में चला गया। इस प्रकार अंतर प्राप्त हुआ। उसके पश्चात् स्थावरकाय के योग्य आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण काल तक उनमें रहकर मरण करके स्थावरकायिकों में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार आवली के असंख्यातवें भाग और नौ अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी स्थिति ही इनका उत्कृष्ट अंतर माना जाता है।

इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान का अंतरकाल जानना चाहिए, विशेषता यह है कि बारह अंतर्मुहूर्तों से कम स्वस्थितिप्रमाण उनका उत्कृष्ट अंतर होता है।

‘‘जैसा उद्देश होता है, उसी के अनुसार निर्देश होता है’’, इस न्याय से पंचेन्द्रिय सामान्य की स्थिति पूर्वकोटीपृथक्त्व से अधिक एक हजार सागरोपमप्रमाण होती है और पंचेन्द्रिय पर्याप्तकों की स्थिति शतपृथक्त्वसागरोपमप्रमाण होती है, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार पंचेन्द्रिय सामान्य एवं पंचेन्द्रिय पर्याप्तक तीन गुणस्थानवर्ती जीवों का अंतर कथन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

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संप्रति पंचेन्द्रियाणां असंयतसम्यग्दृष्ट्यादि

संप्रति पंचेन्द्रियाणां असंयतसम्यग्दृष्ट्यादि-अप्रमत्तान्तानां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठिप्पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।११९।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१२०।।
उक्कस्सेण सागरोपमसहस्साणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि, सागरो-वमसदपुधत्तं।।१२१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-द्वयो: सूत्रयोरर्थ: सुगम:। उत्कर्षेण कथ्यते-एक: एकेन्द्रियस्थितिं स्थित: असंज्ञिपंचेन्द्रियसम्मूच्र्छिम-पर्याप्तेषु उत्पन्न:। पंचभि: पर्याप्तिभि: पर्याप्तिं गत: (१) विश्रान्त: (२) विशुद्ध: (३) भवनवासि-वानव्यन्तरदेवेषु आयुर्बद्ध्वा (४) विश्रम्य (५) मृतो देवेषु उत्पन्न:। षट्पर्याप्तिभि: पर्याप्त: (६) विश्रान्त: (७) विशुद्ध: (८) उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (९)। उपशमसम्यक्त्वकाले षडावलिकावशेषे आसादनं गतोऽन्तरित: मिथ्यात्वं गत्वा स्वकस्थितिं परिभ्रम्य अन्ते उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपन्न: (१०) पुन: सासादनं गत: आवलिकाया: असंख्यातभागं कालं स्थित्वा स्थावरकायेषु उत्पन्न:। दशभि: अन्तर्मुहूर्तै: ऊना स्वकस्थिति: लब्धमुत्कृष्टान्तरं। केचित् शुका: जलस्थिता: सर्पाश्च असंज्ञिन: श्रूयन्ते तेषामत्र ग्रहणं भवेत।
अत्र संज्ञिपंचेन्द्रियसम्मूचर््िछमेषु उत्पन्नो भूत्वा सम्यक्त्वं संप्राप्य मिथ्यात्वस्यान्तरं प्राप्तमिति किन्न कथितं ?
न, तत्र संज्ञिपंचेन्द्रियसम्मूच्र्छिमेषु प्रथमोपशमसम्यक्त्वग्रहणाभावात्।
वेदकसम्यक्त्वं किन्न ग्राहितं ?
एकेन्द्रियेषु दीर्घकालमवस्थितस्य उद्वेलितसम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वस्य तदुत्पादने संभवाभावात्।
संयतासंयतस्य कथ्यते-एक: एकेन्द्रियस्थितिं स्थित: संज्ञिपंचेन्द्रियपर्याप्तेषु उत्पन्न: त्रिपक्ष-त्रिदिवस-अंतर्मुहूर्तै: (१) प्रथमसम्यक्त्वं संयमासंयमं च युगपत् प्रतिपन्न: (२) षडावलिकावशेषे प्रथमसम्यक्त्वकाले आसादनं गत्वान्तरित:। मिथ्यात्वं गत्वा स्वकस्थितिं परिभ्रम्य अपश्चिमे पंचेन्द्रियभवे सम्यक्त्वं गृहीत्वा दर्शनमोहनीयं क्षपयित्वा अन्तर्मुहूर्तावशेषे संसारे संयमासंयमं प्रतिपन्न: (३) अप्रमत्तो (४)। प्रमत्त: (५) अप्रमत्त: (६)। उपरि षट्मुहूर्ता:। त्रिपक्षै: त्रिदिवसै: द्वादशान्तर्मुहूर्तैश्च ऊना स्वकस्थिति: लब्धं संयतासंयतानामुत्कृष्टान्तरं।
एकेन्द्रियेषु किन्नोत्पादित:?
लब्धमन्तरं कृत्वा उपरि सिद्ध्यत्कालपर्यंतकालात् मिथ्यात्वं गत्वा एकेन्द्रियेषु आयुर्बद्ध्वा तत्रोत्पद्यमानकाल: संख्यातगुण: इति एकेन्द्रियेषु नोत्पादित:। उपरिमानामपि एतदेव कारणं वक्तव्यं।
प्रमत्तस्योच्यते-एक: एकेन्द्रियस्थितिं स्थित: मनुष्येषु उत्पन्न:। गर्भाद्यष्टवर्षैै: उपशमसम्यक्त्व-प्रमत्तगुणस्थानं च युगपत् प्रतिपन्न: (१) प्रमत्तो जात: (२) अध: पतित्वाऽन्तरित:। स्वकस्थितिं परिभ्रम्य अपश्चिमे भवे मनुष्यो जात:। दर्शनमोहनीयं क्षपयित्वान्तर्मुहूर्तावशेषे संसारे अप्रमत्तो भूत्वा प्रमत्तो जात: (३)। लब्धमन्तरं। भूय: अप्रमत्त: (४) उपरितनस्य-अपूर्व: (५) अनिवृत्ति: (६) सूक्ष्म: (७) क्षीणकषाय: (८) सयोगी (९) अयोगी (१०) एभि: दशभि: अंतर्मुहूर्तै: अष्टवर्षैश्च ऊना स्वकस्थिति: प्रमत्तस्योत्कृष्टान्तरम्।
एवमेव अप्रमत्तस्योत्कृष्टान्तरं वक्तव्यं।
एवं षष्ठस्थले असंयताद्यप्रमत्तगुणस्थानवर्तिनां अन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतं।

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अब पंचेन्द्रिय जीवों में असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तगुणस्थान तक के नाना जीव एवं एक जीव का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों का अंतर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा अंतर नहीं है, निरंतर है।।११९।।

उपर्युक्त जीवों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अंतर अंतर्मुहूर्त है।।१२०।।

उन जीवों का उत्कृष्ट अंतर पूर्वकोटीपृथक्त्व से अधिक सहस्र सागरोपम तथा शतपृथक्त्व सागरोपम है।।१२१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इनमें से पूर्व के दो सूत्रों का अर्थ सुगम है। आगे उत्कृष्टरूप से कथन करते हैं-एकेन्द्रिय पर्याय की भवस्थिति को प्राप्त कोई एक जीव, असंज्ञी पंचेंद्रिय सम्मूचछम पर्याप्तकों में उत्पन्न हुआ। वहाँ पाँचों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (१) विश्राम लेकर (२) विशुद्ध होकर (३) भवनवासी या वानव्यंतर देवों में आयु को बांधकर (४) विश्राम लेकर (५) मरा और देवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त होकर (६) विश्राम लेकर (७) विशुद्ध होकर (८) उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हो गया (९)। उपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवली प्रमाण काल अवशेष रहने पर सासादन गुणस्थान में चला गया और अंतर को प्राप्त हुआ। पुन: मिथ्यात्व में जाकर अपनी स्थितिप्रमाण परिभ्रमणकर अंत में उपशम सम्यक्त्व को प्राप्त हो गया (१०)। पुन: सासादन गुणस्थान में चला गया और वहाँ पर आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण काल तक रहकर स्थावरकायिकोें में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार इन दश अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी स्थितिप्रमाण असंयत सम्यग्दृष्टि का उत्कृष्ट अंतर होता है। कोई तोता और जल में रहने वाले सर्प असंज्ञी सुने जाते हैं उनका ही यहां ग्रहण करना चाहिए।

शंका-यहाँ संज्ञी सम्मूचछम पंचेन्द्रियों में उत्पन्न होकर और सम्यक्त्व को ग्रहण करके मिथ्यात्व के अंतर को प्राप्त क्यों नहीं हुआ ?

समाधान-नहीं, क्योेंकि वहाँ संज्ञी सम्मूच्र्छन पंचेन्द्रियों में प्रथमोपशम सम्यक्त्व के ग्रहण करने का अभाव है।

शंका-वहाँ वेदकसम्यक्त्व को क्यों नहीं ग्रहण कराया ?

समाधान-नहीं, क्योंकि एकेन्द्रियों में दीर्घ काल तक रहने वाले और जिसने सम्यक्त्व प्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति की उद्वेलना की है, ऐसे जीव के वेदक सम्यक्त्व का उत्पन्न कराना संभव नहीं है।

अब संयतासंयत का अंतर कहते हैं—एकेन्द्रिय की स्थिति को प्राप्त करके कोई एक जीव, संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तकों में उत्पन्न हुआ। तीन पक्ष, तीन दिवस और अंतर्मुहूर्त में (१) वहाँ प्रथमोपशम सम्यक्त्व को तथा संयमासंयम को युगपत् प्राप्त हुआ (२)। प्रथमोपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवली प्रमाण काल के अवशेष रहने पर सासादन गुणस्थान को प्राप्त कर अंतर को प्राप्त हुआ। मिथ्यात्व में जाकर अपनी स्थितिप्रमाण परिभ्रमण करके अंतिम पंचेन्द्रिय भव में सम्यक्त्व को ग्रहण कर दर्शनमोहनीय का क्षय कर और संसार के अंतर्मुहूर्त प्रमाण अवशेष रहने पर संयमासंयम को प्राप्त हो गया (३)। उसके पश्चात् अप्रमत्तसंयत (४) प्रमत्तसंयत (५) अप्रमत्तसंयत (६) हुआ। इनमें अपूर्वकरणादिसम्बंधी ऊपर के छह र्मुहूर्तों को मिलाकर तीन पक्ष, तीन दिवस और बारह अंतर्मुहूर्तों से कम अपनी स्थितिप्रमाण संयतासंयतों का उत्कृष्ट अंतर होता है।

शंका-इन जीवों को एकेन्द्रियों में क्यों नहीं उत्पन्न कराया ?

समाधान-संयतासंयत का अंतर प्राप्त होने के पश्चात् ऊपर सिद्ध होने तक के काल से मिथ्यात्व गुणस्थान में जाकर एकेन्द्रियों में आयु को बांधकर उनमें उत्पन्न होने का काल संख्यातगुणा है, इसलिए एवेंâद्रियों में नहीं उत्पन्न कराया। इसी प्रकार प्रमत्तादि उपरितन गुणस्थानवर्ती जीवों के भी यही कारण जानना चाहिए।

अब प्रमत्तसंयत का अंतर कहते हैं—एकेन्द्रियस्थिति को प्राप्त कोई एक जीव मनुष्यों में उत्पन्न हुआ और गर्भ से लेकर आठ वर्षों में उपशमसम्यक्त्व और अप्रमत्तगुणस्थान को एक साथ प्राप्त हुआ (१)। पश्चात् प्रमत्तसंयत हुआ (२)। पुन: नीचे गिरकर अंतर को प्राप्त हो अपनी स्थितिप्रमाण परिभ्रमण कर अंतिम भव में मनुष्य हुआ। दर्शनमोहनीयकर्म का क्षयकर अंतर्मुहूर्तकाल संसार के अवशिष्ट रहने पर अप्रमत्तसंयत होकर पुन: प्रमत्तसंयत हुआ (३)। इस प्रकार अंतर प्राप्त हुआ। पुन: अप्रमत्तसंयत हुआ (४)। पुन: उपरितन गुणस्थान के—अपूर्वकरण (५), अनिवृत्तिकरण (६), सूक्ष्मसांपराय (७), क्षीणकषाय (८), सयोगिकेवली (९) और अयोगिकेवली (१०) इन दश अंतर्मुहूर्त और आठ वर्षों से कम अपनी स्थितिप्रमाण प्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अंतर होता है।

इसी प्रकार अप्रमत्तसंयत का उत्कृष्ट अंतर जानना चाहिए।

इस तरह से छठे स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्त गुणस्थानवर्ती तक के जीवों का अंतर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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संप्रति उपशामक-क्षपक-अयोगि-सयोगिनां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रपञ्चकमवतार्यते

संप्रति उपशामक-क्षपक-अयोगि-सयोगिनां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रपञ्चकमवतार्यते-


चदुण्हमुवसामगाणं णाणाजीवं पडि ओघं।।१२२।।

एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१२३।।
उक्कस्सेण सागरोवमसहस्साणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि, सागरो-वमसदपुधत्तं।।१२४।।
चदुण्हं खवा अजोगिकेवली ओघं।।१२५।।
सजोगिकेवली ओघं।।१२६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्णां उपशामकानां जघन्येन एकसमय:, उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वं। एकजीवापेक्षया त्रयाणामुपशामकानां आरोहणावरोहणयो: जघन्यान्तरमन्तर्मुहूर्तं। उपशान्तकषायस्योधोऽवतीर्य पुन: सर्वजघन्येन कालेन उपशान्तकषायत्वं प्रतिपन्नस्य जघन्यान्तरं भवति।
उत्कर्षेण-एक: एकेन्द्रियस्थितिं स्थित: मनुष्येषु उत्पन्न:। गर्भाद्यष्टवर्षै: विशुद्ध: उपशमसम्यक्त्वम-प्रमत्तगुणस्थानं च युगपत् प्रतिपन्न: अंतर्मुहूर्तेन (१) वेदकसम्यक्त्वं गत:। ततोऽन्तर्मुहूर्तेन (२) अनन्तानुबंधिनं विसंयोज्य (३) विश्रम्य (४) दर्शनमोहनीयं उपशाम्य (५) प्रमत्ताप्रमत्तपरावृत्तसहस्रं कृत्वा (६) उपशमश्रेणियोग्याप्रमत्तो जात: (७) अपूर्व: (८) अनिवृत्ति: (९) सूक्ष्म: (१०) उपशान्त: (११) पुन:सूक्ष्म: (१२) अनिवृत्ति: (१३) अपूर्व: (१४)। अधोऽवतीर्य पंचेन्द्रियस्थितिं परिभ्रम्य पश्चिमे भवे मनुष्येषु उत्पन्न:।
दर्शनमोहनीयं क्षपयित्वा अन्तर्मुहूर्तावशेषे संसारे विशुद्धोऽप्रमत्तो जात:। पुन: प्रमत्ताप्रमत्तपरावृत्तिसहस्रं कृत्वा उपशमश्रेणियोग्याप्रमत्तो भूत्वा अपूर्वोपशामको जात:। लब्धमन्तरं (१५)। तत: अनिवृत्ति: (१६) सूक्ष्म: (१७) उपशान्तकषाय: (१८) सूक्ष्म: (१९) अनिवृत्ति: (२०) अपूर्व: (२१) अप्रमत्त: (२२) प्रमत्त: (२३) अप्रमत्त: (२४)। उपरि षडन्तर्मुहूर्ता:। एवं अष्टभि: वर्षै: त्रिंशदन्तर्मुहूर्तै: ऊनायु:स्थिति: अपूर्वस्योत्कृष्टान्तरं। एवं त्रयाणामुपशामकानामपि वक्तव्यं। केवलं-अष्टाविंशति-षड्विंशति-चतुर्विंशति-अंतर्मुहूर्तै: अष्टवर्षैश्च हीना: स्वक-स्वकस्थितय: उत्कृष्टान्तरं भवति।
नानाजीवापेक्षया चतुर्णां क्षपकाणां अयोगिनां च जघन्येन एकसमयं अन्तरं। उत्कर्षेण षण्मासा:। एकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरं, निरन्तरं अस्ति इति ज्ञातव्यं। सयोगिकेवलिनामपि अन्तरं नास्ति इति।
एवं सप्तमस्थले क्षपकादीनामन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रपञ्चकं गतम्।
लब्ध्यपर्याप्तपंचेन्द्रियाणां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-पंचिंदियअपज्जत्ताणं वेइंदियअपज्जत्ताणं भंगो।।१२७।।
एवमिंदियं पडुच्च अंतरं।।१२८।।
गुणं पडुच्च उभयदो वि णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।१२९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-लब्ध्यपर्याप्तपंचेन्द्रियस्य एकजीवापेक्षया जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणमात्रमन्तरं। उत्कर्षेण अनंतकालं, असंख्यातपुद्गलपरिवत्र्तं इति। शेषं पूर्ववत् कथयितव्यं।
तात्पर्यमेतत्-पंचेंद्रियाणि संप्राप्य येन केनापि उपायेन मोक्षमार्ग: साधयितव्य:, अन्यथा यदि कदाचिदेकेन्द्रियविकलेन्द्रियेषु गमनं तर्हि मनोऽभावे कर्णाभावे च न केचिदपि गुरुव: संबोधयितुं क्षमा: भवन्ति। संप्रति गुरूपदेशं जिनवाणीस्वाध्यायं च लब्ध्वा प्रमादं अपसार्य रत्नत्रयं संरक्षणीयं प्रयत्नेति।
एवं अष्टमस्थले पंचेन्द्रियापर्याप्तानां अन्तरकथनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे पंचमग्रंथे अन्तरानुगमे गणिनीज्ञानमती-कृतसिद्धांतचिंतामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।

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अब उपशामक-क्षपक-अयोगिकेवली एवं सयोगिकेवलियों का अंतर प्रतिपादन करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

चारों उपशामकों का अंतर नाना जीवों की अपेक्षा गुणस्थान के समान होता है।।१२२।।

चारों उपशामकों का एक जीव की अपेक्षा जघन्य अंतर अंतर्मुहूर्त है।।१२३।।

चारों उपशामकों का उत्कृष्ट अंतर पूर्व कोटिपृथक्त्व से अधिक सागरोपमसहस्र और सागरोपमशतपृथक्त्व है।।१२४।।

चारों क्षपक और अयोगिकेवली का अंतर गुणस्थान के समान होता है।।१२५।।

सयोगिकेवली का अंतर गुणस्थान के समान जानना चाहिए।।१२६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चारों गुणस्थानवर्ती उपशामकों—उपशमश्रेणी आरोहण करने वाले महामुनियों का जघन्य अंतर एक समय है और उत्कृष्ट अंतर वर्ष पृथक्त्व (३ वर्ष से नौ वर्ष के मध्य का काल) है। एक जीव की अपेक्षा तीन गुणस्थानवर्ती (आठवें, नवमें, दशवें) उपशामकों के आरोहण और अवरोहण का जघन्य अंतर अंतर्मुहूर्त काल है। उपशान्तकषाय गुणस्थानवर्ती का नीचे उतर कर पुन: सर्व जघन्य काल से उपशांतकषाय गुणस्थान को प्राप्त करने वाले मुनिराज के जघन्य अंतर होता है।

उत्कृष्ट की अपेक्षा—एकेन्द्रिय स्थिति में स्थित कोई एक जीव मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। गर्भ से लेकर आठ वर्षों में विशुद्ध होकर उपशम सम्यक्त्व को और अप्रमत्तगुणस्थान को युगपत् प्राप्त होता हुआ अंतर्मुहूर्त में (१) वेदकसम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। पश्चात् अंतर्मुहूर्त में (२) अनंतानुबंधी कषायचतुष्क का विसंयोजन करके (३) विश्राम लेकर (४) दर्शनमोहनीय का उपशम कर (५) प्रमत्त-अप्रमत्त गुणस्थान संबंधी सहस्रों परावर्तन करके (६) उपशमश्रेणी के योग्य अप्रमत्तसंयत हुआ (७)। पश्चात् अपूर्वकरणसंयत (८) अनिवृत्तिकरणसंयत (९) सूक्ष्मसाम्पराय संयत (१०) उपशान्तकषाय (११) पुन: उतरकर सूक्ष्मसाम्पराय संयत हुआ (१२) अनिवृत्तिकरणसंयत (१३) अपूर्वकरणसंयत (१४) हो नीचे उतरकर पंचेन्द्रिय की स्थितिप्रमाण परिभ्रमणकर अंतिम भव में मनुष्यों में उत्पन्न हुआ पश्चात् दर्शनमोहनीय का क्षयकर संसार के अंतर्मुहूर्तमात्र अवशेष रहने पर विशुद्ध हो अप्रमत्तसंयत हुआ पुन: प्रमत्त-अप्रमत्त गुणस्थान में हजारों परिवर्तन करके उपशमश्रेणी के योग्य अप्रमत्त होकर अपूर्वकरण उपशामक हो गया। इस प्रकार अंतर प्राप्त हुआ (१५) पश्चात् अनिवृत्तिकरण संयत (१६) सूक्ष्मसाम्परायसंयत (१७) उपशान्तकषाय (१८) सूक्ष्मसाम्परायसंयत (१९) अनिवृत्तिकरण संयत (२०) अपूर्वकरण संयत (२१) अप्रमत्त संयत (२२) प्रमत्तसंयत (२३) और अप्रमत्तसंयत हुआ (२४)। इसके ऊपर क्षपक श्रेणी संबंधी छह अंतर्मुहूर्त होते हैं। इस प्रकार तीस अंतर्मुहूर्त और आठ वर्षों से कम पंचेन्द्रियस्थितिप्रमाण अपूर्वकरण का उत्कृष्ट अंतर होता है। इसी प्रकार से शेष तीनों उपशामकों का भी अंतर कहना चाहिए। केवल विशेष बात यह है कि उनके क्रमश: अट्ठाईस, छब्बीस और चौबीस अंतर्मुहूर्तों से अधिक आठ वर्ष कम अपनी-अपनी स्थिति प्रमाण उत्कृष्ट अंतर होता है।

नाना जीव की अपेक्षा चारों क्षपक गुणस्थानवर्ती और अयोगिकेवली भगवन्तों का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह माह का काल है। एक जीव की अपेक्षा कोई अन्तर नहीं है, निरन्तर है ऐसा जानना चाहिए। सयोगिकेवलियों का भी अन्तर नहीं है ऐसा समझना चाहिए।

इस प्रकार सातवें स्थल में क्षपक आदिकों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

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अब लब्ध्यपर्याप्तक पञ्चेन्द्रिय जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकों का अन्तर द्वीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकों के समान है।।१२७।।

यह इन्द्रिय की अपेक्षा अन्तर कहा गया है।।१२८।।

गुणस्थान की अपेक्षा दोनों ही प्रकार से अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।१२९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एक जीव की अपेक्षा लब्ध्यपर्याप्तक पञ्चेन्द्रिय जीव का जघन्य अन्तर क्षुद्रभवग्रहणमात्र है। उत्कृष्ट की अपेक्षा अनंतकाल वाला असंख्यातपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अन्तर है। शेष कथन पूर्ववत् जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि पाँचों इन्द्रियों की पूर्णता करके अब हम सभी को जिस किसी प्रकार से भी मोक्षमार्ग की सिद्धि करनी चाहिए, अन्यथा यदि कदाचित् एकेन्द्रिय अथवा विकलेन्द्रिय जीवों में जाना हो गया तो मन के अभाव में और कर्णेन्द्रिय के अभाव में कोई गुरु भी सम्बोधन प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं। अत: अब गुरु का उपदेश प्राप्त करके और जिनवाणी का स्वाध्याय करके प्रमाद छोड़कर प्रयत्नपूर्वक रत्नत्रय का संरक्षण करना चाहिए।

इस तरह से आठवें स्थल में पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों का अन्तर कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ के अन्तरानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में इन्द्रियमार्गणा नामका द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।