ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं शक्तितस्त्याग भावनायै नमः"

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नय के भेद

प्रतिदिन देव—दर्शन अथवा जिन मंदिर में दर्शन के लिये जाना जैनियों का प्रथम क है कर्तव्य। आइए जिनदर्शन के द्वारा नय के भेदों को जानें —

नय के सात भेद हैं —

१. नैगमनय — जिनमंदिर जाने का संकल्प करना

२. संग्रहनय — मंदिर जाने के लिये सामग्री एकत्र करना

३. व्यवहारनय — घर से मंदिर के लिये गमन करना

४. ऋजुसूत्रनय — मंदिर के सम्मुख पहुंचना

५. शब्द नय — मंदिर में जाकर घण्टा बजाना

६. एवंभूतनय — भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए एकाग्र हो जाना

नय के तीन भेद और भी हैं—

१. शब्द नय — ‘मंदिर’ शब्द को ग्रहण करना

२. अर्थ नय — मंदिर में जिन प्रतिमा के दर्शन करना

३. ज्ञान नय — ज्ञान में मंदिर की आकृति का आना । नैगम नय में ज्ञान की प्रधानता है। संग्रहनय, व्यवहारनय एवम् ऋजुसूत्रनय में अर्थ की प्रधानता है। शब्द, समभिरूढ़, एवं भूत नय में शब्द की प्रधानता है।