ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

इन्हें जाने

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
इन्हें जाने

Efsef.jpg
Efsef.jpg
नय के भेद

प्रतिदिन देव—दर्शन अथवा जिन मंदिर में दर्शन के लिये जाना जैनियों का प्रथम क है कर्तव्य। आइए जिनदर्शन के द्वारा नय के भेदों को जानें —

नय के सात भेद हैं —

१. नैगमनय — जिनमंदिर जाने का संकल्प करना

२. संग्रहनय — मंदिर जाने के लिये सामग्री एकत्र करना

३. व्यवहारनय — घर से मंदिर के लिये गमन करना

४. ऋजुसूत्रनय — मंदिर के सम्मुख पहुंचना

५. शब्द नय — मंदिर में जाकर घण्टा बजाना

६. एवंभूतनय — भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए एकाग्र हो जाना

[सम्पादन]
नय के तीन भेद और भी हैं—

१. शब्द नय — ‘मंदिर’ शब्द को ग्रहण करना

२. अर्थ नय — मंदिर में जिन प्रतिमा के दर्शन करना

३. ज्ञान नय — ज्ञान में मंदिर की आकृति का आना । नैगम नय में ज्ञान की प्रधानता है। संग्रहनय, व्यवहारनय एवम् ऋजुसूत्रनय में अर्थ की प्रधानता है। शब्द, समभिरूढ़, एवं भूत नय में शब्द की प्रधानता है।