ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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इलास्टिक डोरी द्वारा असाध्य रोगों का सरलतम उपचार

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इलास्टिक डोरी द्वारा असाध्य रोगों का सरलतम उपचार

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शारीरिक लक्षणों पर आधारित रोग का निदान अपूर्ण— हमारे शरीर में प्राय: सैकड़ों रोग होते हैं।जिनकी उपस्थिति का हमें आभास तक नहीं होता है। हम तब तक रोग को रोग नहीं मानते, जब तक उनके लक्षण स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं हो जाते या हमें परेशान करने नहीं लग जाते अथवा रोग हमारी सहनशक्ति से परे नहीं होने लगता है। रोग के जो लक्षण ब्रह्म रूप से प्रकट होते हैं, अथवा पेथालोजिकल टेस्टों एवं यंत्रों की पकड़ में आते हैं, वे लक्षण तो सामान्य ही होते हैं, जिनके आधार पर प्राय: रोगों का नामकरण किया जाता है। शरीर में जितने रोग अथवा उनके कारण होते हैं उतने हमारे ध्यान में नहीं आते। जितने ध्यान में आते हैं, उतने हम अभिव्यक्त नहीं कर सकते । जितने रोगों को अभिव्यक्त कर पाते हैं, वे सारे के सारे चिकित्सक अथवा अति आधुनिक समझी जाने वाली मशीनों की पकड़ में नहीं आते । जितने लक्षण स्पष्ट रूप से उनकी समझ में आते हैं, उन सभी का वे उपचार नहीं कर पाते। परिणाम स्वरूप जो लक्षण स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं, उनके अनुसार आज रोगों का नाम: करण किया जा रहा है, तथा अधिकांश प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों का ध्येय उन लक्षणों को दूर कर रोगों से राहत पहुँचाने का मात्र होता है। विभिन्न चिकित्सा पद्धतियां और उनमें कार्यरत चिकित्सक आज असाध्य एवं संक्रामक रोगों के उपचार के जोे बड़े— बड़े दावे और विज्ञापन करते हैं, वे कितने भ्रामक, अस्थायी होते हैं, जिस पर पूर्वाग्रह छोड़कर सम्यक् चिंतन करना आवश्यक है। जब निदान ही अधूरा हो, अपूर्ण हो तब प्रभावशाली उपचार के दावे छलावा नहीं तो क्या हैं ? जनतंत्र में सहयोगियों को अलग किये बिना जिस प्रकार नेता को नहीं हटाया जा सकता, सेना को जीते बिना सेनापति को कैद नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार सहयोगी रोगों की उपेक्षा कर शरीर को पूर्ण रूप से रोग मुक्त नहीं रखा जा सकता। यह सनातन सत्य है तथा उसको नकारने एवं उपेक्षा करने वाली चिकित्सा आंशिक, अधूरी एवं अस्थायी ही होती है।

इलास्टिक डोरी द्वारा पूर्ण शरीर का प्रभावशाली उपचार— उपचार हेतु इलास्टिक डोरी से हथेली और पगथली के अंगूठों एवं अंगुलियों को बारी—बारी में अपनी सहनशक्ति के अनुसार कसकर (टाईट) लपेटकर रखें और उसके बाद खोल दें। जैसे ही डोरी अंगुलियों/अंगूठे से हटाते हैं उस पर दबाव हटने से वहाँ पर प्राण ऊर्जा तीव्र गति से प्रवाहित होने लगती है। परिणामस्वरूप वहाँ पर जमे हुए विजातीय तत्त्व अपना स्थान छोड़ने लगते हैं। डोरी खोलने के पश्चात् उस भाग की हथेली से मसाज कर लें ताकि वहाँ रक्त का संचार भी बराबर होने लगता है। जैसे—जैसे विजातीय तत्त्व दूर होते हैं संबंधित अंग, उपांग एवं अंगों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होने से वे रोग मुक्त होने लगते हैं। अंगुलियों एवं अंगूठों की भांति हथेली और पगथली के शेष भाग में डोरी द्वारा उपचार करने से पूरे शरीर अर्थात् प्रत्यक्ष —अप्रत्यक्ष सभी रोगों का उपचार किया जा सकता है उपचार में ही निदान एवं रोकथाम शामिल होते हैं। उपचार का प्रभाव डोरी की इलास्टिक एवं व्यक्ति के दबाव की सहनशक्ति पर निर्भर करता है।

मानतुंग पुष्प
दिनांक १२ जनवरी १८ जनवरी २०१५