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इलाहाबाद परिक्षेत्र में अग्रोतकान्वय जैनियों की परम्परा

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इलाहाबाद परिक्षेत्र में अग्रोतकान्वय जैनियों की परम्परा

संवत् १८८१ मिते मार्गशीर्षशुक्लषष्टयां शुक्रवासरे काष्ठासंघे माथुरगच्छे पुष्करगणे लोहाचार्यान्वये भट्टारक श्रीजगत्र्कीितस्तत्पट्टे भट्टारकश्रीललितकीर्तिस्तदाम्नाये अग्रोतकान्वये गोयलगोत्रे प्रयागनगरवास्तव्यसाधुश्रीरायजीमल्ल-स्तदनुजफेरूमल्लस्तत्पुत्रसाधुश्रीमेहरचन्दस्तद्भ्रातासुमेरूचन्दस्तदनुजसाधुश्रीमाणिक्यचन्दस्तत्पुत्रसाधुश्रीहीरालालेन कौशांबीनगरबाह्यप्रभासपर्वतोपरिश्रीपद्मप्रभजिनदीक्षाज्ञनकल्याणक्षेत्रे श्रीजिनिंबबप्रतिष्ठा कारिता अंगरेजबहादुरराज्ये शुभम्।।

यह लेख पभोसा जैन धर्मशाला लेख के नाम से प्रसिद्ध है। ए. फूहरर ने एपिग्राफिआ इंडिका, खण्ड २ में इसे प्रकाशित किया है।१ अब इस लेख का कोई सुराग नहीं है। (चित्र ४)

संवत् १८८१ मागशीर्षशुक्लषष्ट्यां शुक्रवासरे काष्ठासंघे माथुरगच्छे पुष्करगणे लोहाचार्याम्नाये भट्टारक श्रीजगत्र्कीित-स्तदाम्नाये अग्रोतकान्वये पिपलगोत्रे प्रयागनगरवास्तव्य सा. श्रीहीरालालस्यपुत्रऋषभदास पुत्र सन्नूलाल............ अग्रवाल प्रभासा........श्रीपद्मप्रभ..............प्रतिष्ठा कारिता।२

यह लेख जैनलेखसंग्रह में संगृहीत है। इसमें भी प्रयागनगर निवासी साधु श्रीहीरालाल, अग्रोतकवंश और भट्टारक परम्परा का उल्लेख है। यह लेख चम्पापुरी (भागलपुर) में एक पाषाण बिम्ब के चरणपीठ पर उत्कीर्ण है। बेरूई नामक स्थान से लाकर इलाहाबाद में बेनीगंज के नवनिर्मित मंदिर में रखी गई तीन जैन र्मूितयों पर भी वही पंक्तियाँ उत्कीर्ण है (चित्र ५) जिसे जैन धर्मशाला लेख के नाम से फूहरर ने प्रकाशित किया था। इन मूर्तियों का अभिज्ञान तीर्थंकर लांछन—मृग, शंख और कमल के आधार पर क्रमश: शान्तिनाथ (चित्र १), नेमिनाथ (चित्र ३) और पद्मप्रभ (चित्र २) के रूप किया जाता है। इन मूर्तियों पर अंकित लेख की प्रथम दो पंक्तियों तक का विवरण सुस्पष्ट रूप से पाठ्य है, लेकिन मूर्तियों का निचला हिस्सा आसनवेदी पर जड़ दिये जाने से आगे की पंक्तियाँ सम्प्रति नहीं पढ़ी जा सकतीं। स्थानीय जैनियों के अनुसार पभोसा में पहाड़ी के टूटने पर जो मूर्तियाँ सराय आकिल में बेरूई के नवनिर्मित मंदिर में सुरक्षित रखी गई थी, ये वही मूर्तियाँ हैं।

इन लेखों में संवत् १८८१ मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि शुक्रवार को पद्मप्रभजिनदीक्षाकल्याणक क्षेत्र श्रीप्रभास पर्वत पर जिनबिम्ब की प्रतिष्ठा करवाए जाने का उल्लेख है। पभोसा धर्मशाला लेख से स्पष्ट है कि प्रभास पर्वत कौशाम्बी नगर की बाह्य सीमा पर स्थित था। आज भी कौशाम्बी में यमुना के किनारे मात्र यही पहाड़ी है तथा जैन तीर्थस्थली के रूप में ख्यात है। जैन परम्परा में यह तीर्थंकर पद्मप्रभ का दीक्षा कल्याणक क्षेत्र माना जाता है। यह लेख जैन धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण तो है ही, प्रयाग परिक्षेत्र में जैन धर्मावलम्बी अग्रोतक वंशी अग्रवालों, भट्टारकों की परम्परा और उनकी शाखा आदि के सन्दर्भ में विशिष्ट रूप से महत्वपूर्ण है।

पभोसा लेख की सूचना के अनुसार गोयल गोत्रीय साधु हीरालाल प्रयाग नगर के निवासी थे, उनके द्वारा कौशाम्बी नगर के बाहर प्रभास पर्वत पर जिन प्रतिमा स्थापित करवाई गयी थी। उस समय अंग्रेज बहादुर का राज्य था। प्रतिमा प्रतिष्ठापक हीरालाल के पूर्वजों के नाम भी दिए गए हैं यथा साधु मेहरचन्द, सुमेरुचन्द, साधु, श्रीमणिक्यचन्द आदि। इन्हें अग्रोतकवंशी कहा गया है, इनका गोत्र गोयल था। यह हीरालाल चम्पापुरी प्रतिमा लेख के हीरालाल से भिन्न प्रतीत होता है, जिनका पिपल गोत्र था।

लेख में काष्ठासंघ माथुरगच्छ पुष्करगण श्रीललितकीर्ति का उल्लेख है। कदाचित् इन प्रतिमाओं की धार्मिक प्रतिष्ठापना हीरालाल और सन्नूलाल ने भट्टारक श्री ललितर्कीित के द्वारा कराई हो। लेख में तीन भौगोलिक नाम—कौशाम्बीनगर, प्रभास पर्वत और प्रयाग नगर आए हैं। जाति सूचक नामों में अग्रोतकान्वय में गोयल गोत्र और पिपल गोत्र प्रमुख हैं।

अग्रोतकान्वय

लेख में हीरालाल और उनके पूर्वजों / पुत्र को अग्रोतकवंशी कहा गया है। यहाँ अग्रोतक शब्द महत्त्वपूर्ण है। अग्रोतकान्वय (अग्रोतक ± अन्वय · अग्रोतक वंश या शाखा से सम्बन्धित) अर्थात् अग्रोदक या अग्रोतक के वंश से सम्बन्धित। अग्रोतक नगरी से वहाँ के निवासियों की जो शाखाएँ अन्यत्र जाकर बसीं वे अग्रोतकवंशी—अग्रोतकान्वय कहलार्इं। अग्रोतक का उल्लेख चौदहवीं सदी के एक अभिलेख में वणिजों की पुरी के रूप में हुआ है।३ द्वितीय शताब्दी ई. पू. में अग्रोतक नगरी (आधुनिक अग्रोहा) आग्रेय गण की राजधानी थी। इसे ही महालक्ष्मीव्रतकथा में अग्रोकनगर कहा गया है। अग्रोदक नगरी का उल्लेख तीसरी शताब्दी ई की बौद्ध रचना महामयूरी में भी मिलता है। इसमें प्रत्येक स्थान में जिन यक्षों की पूजा होती थी, उनकी लम्बी सूची एकत्र की गई है। इसमें वाराणसी, श्रावस्ती आदि नगरों के साथ—साथ अग्रोदक नगरी का भी उल्लेख है।

इस ग्रंथ के अनुसार अग्रोदक के माल्यधर यक्ष की परम्परा चली आ रही थी। वासुदेव शरण अग्रवाल ने अग्रोदक को पूर्वी पंजाब (आधुनिक हरियाणा) में स्थित अग्रोहा कहा है।४ अग्रोहा से आग्रेय गण की मुद्राएं मिली हैं जिन पर ‘‘अग्रोदके अगाच्च जनपदस’’ अर्थात् अग्रोतक क्षेत्र में अग्रा जनपद की मुद्रा तथा पृष्ठ भाग पर वृषभ या वेदिका की आकृति बनी है।५ ये ईसा पूर्व दूसरी सदी की हैं। इन मुद्रा लेखों से सिद्ध है कि अग्रोहा का प्राचीन नाम अग्रोदक था। महाराज अग्रसेन अग्रोतक नगरी और अग्र वंश के प्रधान थे। अग्रवालों का सम्बन्ध इसी अग्र वंश से है। चौदहवीं सदी में भी अग्रोदक नगरी में रहने वाले वैश्यवृत्ति के पोषक थे। तेरहवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की जैन प्रशस्तियों६ में अग्रवालों के लिए अग्रोतकान्वय का ही उल्लेख मिलता है। १५७५ ई. में पंडित राजमल ने जम्बूस्वामीचरित नामक ग्रंथ में अपने संरक्षकों को अग्रोतकान्वय कहा है। कुछ अन्य प्रशस्तियों या लेखों में भी अग्रोतक वंश के गोत्र का उल्लेख है जिनके व्यक्तियों ने जिन प्रतिष्ठा करवाई, जैसे—

१. संवत् १५२९ वै. सुदी ७ बुधे श्री काष्ठासंघे भट्टारक श्री मलयर्कीित भट्टारक गुणभद्राम्नाये अग्रोत्कान्वये मित्तल गोत्र......७

२. संवत् १५३७ वै. सुदी १० बुधे श्री मलयकीर्ति भट्टारक गुणभद्राम्नाये अग्रोत्कान्वये गोयलगोत्रे कल्याणमल्लराज्ये......८

३. संवत १५०६ ....... श्री काष्ठासंघे माथुरान्वये पुष्करगणे भट्टारक हेमर्कीित भट्टारक कमलकीर्ति पं. रेधू तदाम्नाये अग्रोतवंश वंसिलगोत्रे........९

४. संवत् १४९७ वर्ष...... श्री काष्ठासंघे माथुरान्वये पुष्करगणे भट्टारक.......अग्रोतवंशे मोद्गलगोत्रे.....१०


५. संवत् १९१९ माघशुक्ल १४ शनौ काष्ठासंघे माथुरगच्छे पुष्करगणे लोहाचार्याम्नाये भ. देवेन्द्रकीर्तिदेव तत्पट्टे भ. जगतकीर्तिदेव तत्पट्टे भ. ललितकीर्तिदेव तत्पट्टे भ. राजेन्द्रकीर्तिदेव तदाम्नाये अग्रोतकान्वये वासिलगोत्र....११

६. सं. १८७६ वैशाख शुक्ल ६ मूलसंघे कुन्दाचार्यान्वये भट्टारक विश्वभूषणजी श्री जिनेंद्रभूषण जी भट्टारक महेन्द्रभूषणजी शाहजी दशनावर सिंघस्य पुत्र श्री बाबूशंकरलालजी तस्य पुत्रस्य पुत्राश्चत्वार: कजीतदाम्नाये अग्रोतकान्वये कासिलगोत्रे श्रीलजीतस्य पुत्राश्चत्वार: बाबू श्री रतनचंदजी श्री प्यारेलाल आरामनगरवासिभि: मसाढ्नागर अग्रेंजराज्ये वर्तमाने कारूषदेशे श्री।१२

स्पष्ट है कि विभिन्न क्षेत्रों में अग्रोतकवंशियों ने जैन प्रतिमाओं के निर्माण में रुचि दिखाई। प्रयाग नगर के जैनमतावलम्बी अग्रोतकवंशी अग्रवाल भी जैन धर्म के उन्नयन में अग्रसर रहे। पभोसा लेख प्रयाग नगरवासी अग्रवाल जैनियों के प्रतिमा प्रतिष्ठापना जैसे धार्मिक कार्यों में योगदान का स्पष्ट प्रमाण है।

गोत्र

लेखों में प्रतिमा स्थापना करवाने वाले व्यक्तियों के गोयल एवं पिपल गोत्रों का उल्लेख है। गोत्र मूल रूप में एक ब्राह्मण संस्था है, किन्तु अन्य वर्णों ने भी इसे अंगीकार किया। अग्रोहा जनपद में संघीय शासन व्यवस्था थी, अग्रवालों में १८ गोत्र प्रचलित हैं उनमें एक गोयल गोत्र है।१३

जैनमत और लोहाचार्य तथा काष्ठासंघ माथुरगच्छ शाखा

जहाँ तक किसी अग्रोतकवंशी द्वारा जैनमत के प्रति आस्था का प्रश्न है, भविष्यपुराण के केदारखण्ड में लक्ष्मीमाहात्म्य प्रसंग में अग्रवैश्यवंशानुकीर्तनम् नामक सोलहवें अध्याय में अग्रवंशी राजा दिवाकर के जैन हो जाने का वर्णन आया है। (दिवाकरो जैनमते शिखिनं पर्वतं गत:), यद्यपि उनके गुरू एवं आचार्य का कहीं कोई विवरण नहीं मिलता। पाश्र्वनाथ परम्परा की पट्टावली में श्रीनाथ के पुत्र दिवाकर द्वारा जैनधर्म में दीक्षा लेने का उल्लेख है। डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकार ने दिवाकर का सम्बन्ध जैन गुरू लोहाचार्य से जोड़ने का प्रयास किया है तथा दिवाकर को ईस्वी की दूसरी सदी के आस—पास का माना है। श्री बिहारी लाल जैन के अनुसार दिगम्बराचार्य भद्रबाहु के द्वितीय शिष्य श्री लोहाचार्य अग्रोहा नगर में गए थे और राजा दिवाकर ने लोहाचार्य से दीक्षा भी ली थी।१४ अग्रवालों में आज भी अनेक जैनमतावलम्बी हैं। लेकिन गोत्र अग्रवालों के है। वैदिकधर्मी और जैनधर्मी अग्रवालों में परस्पर व्यवहार में कोई भेद नहीं है। नेमिचन्द्र शास्त्री के अनुसार श्री लोहाचार्य ने काष्ठासंघ की स्थापना की थी। यह काष्ठासंघ विशेषकर अग्रोहा नगर के अग्रवालों द्वारा स्थापित किया गया था।१५ जैन अनुश्रुति में एक से अधिक लोहाचार्यों का वृत्तान्त संकलित है। अत: यह निर्धारित कर पाना कठिन है कि दिवाकर किस लोहाचार्य के समकालीन थे। परमानन्द शास्त्री का मत है कि बहुत सम्भव है कि लोहाचार्य से अग्र जनपद के निवासियों को प्रबोध मिला हो और उनके उपदेश से अग्रवालों ने जैनधर्म अपना लिया हो। अग्रोहा के जैन श्रावकों की संज्ञा काष्ठासंघ पडी। इस संघ के पट्ट पर अग्रवाल ही भट्टारक अभिशिक्त होते आए हैं।१८

जैन प्रशस्तियों / लेखों से काष्ठासंघ माथुरगच्छ पुष्करगण शाखा के जिन भट्टारकों के नाम क्रमानुसार ज्ञात होते हैं उनका उल्लेख इस प्रकार कर सकते हैं :

संवत् १५२०—भट्टारक श्री मलयकीर्ति तथा भट्टारक श्री गुणभद्र

संवत् १५३७—भट्टारक श्री मलयकीर्ति तथा भट्टारक श्री गुणभद्र

संवत् १५०६—भट्टारक श्री हेमकीर्ति तथा भट्टारक श्री कमलकीर्ति।

संवत् १६८१—भट्टारक श्री चन्द्रकीर्ति—जैनलेखसंग्रह का लेखांक ४५३

संवत् १७३२—दिगम्बरधर्म भट्टारक रुपचन्द्र—जैनलेखसंग्रह का लेखांक ३२६, भट्टारक देवेन्द्रकीर्तिदेव—जैनलेख संग्रह का लेखांक ३२७

संवत् १८८१—भट्टारक श्री जगकीर्ति—पभोसालेख, जैनलेखसंग्रह का लेखांक १४५,

संवत् १८८१—भट्टारक श्री ललितकीर्ति—पभोसालेख तथा जैनलेखसंग्रह का लेखांक ३२७

संवत् १९१९—भट्टारक श्री राजेन्द्रकीर्तिदेव—जैनलेखसंग्रह का लेखांक ३२७

तीर्थंकर नेमिनाथ के बिम्ब पर अंकित संवत् १९१० के लेख से इस शाखा के भट्टारकों का निम्न क्रम ज्ञात होता है—भट्टारक देवेन्द्रकीर्तिदेव तत्पट्टे भट्टारक जगत्कीर्तिदेव तत्पट्टे भट्टारक ललितकीर्तिदेव तत्पट्टे राजेन्द्रकीर्तिदेव.....१७ पद्मप्रभ कल्याणकक्षेत्र

प्रभासगिरि में जैन प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा धार्मिक कृत्य थी। यह स्थल पद्मप्रभ का कल्याणक क्षेत्र है। जैन परम्परा के अनुसार पद्मप्रभ का जन्म कौशाम्बी में कीर्तिक कृष्ण त्रयोदशी को हुआ था—कौशाम्ब्यां धर—सुसीमा सूनु: पद्मप्रभोऽरूण:।१८ उन्होंने कौशाम्बी के मनोहर उद्यान पभोसा में जाकर र्काितक कृष्ण त्रयोदशी के दिन दीक्षा ली थी। इसी दिन भगवान् का दीक्षा कल्याणक महोत्सव मनाया गया। पद्मप्रभ के दीक्षा और ज्ञान कल्याणक के कारण यह क्षेत्र कल्याणक तीर्थ माना गया। प्रभासगिरि जैन तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ पभोसा की पहाडी पर ईसा पूर्व द्वितीय शती में आषाढसेन द्वारा ०. काश्यपीय अर्हतों के लिए गुफा बनवाने के अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध हैं।१९ पभोसा की पहाड़ी पर आज भी अनेक गुफाएँ विद्यमान हैं। एक जैन मन्दिर भी है।

प्रयोग नगर के वणिजवृत्ति के पोषक अग्रोतक वंशी अग्रवाल जैनों ने वहाँ तत्कालीन भट्टारक द्वारा तीर्थंकरों की प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा करवाई, प्रतिमा प्रतिष्ठापक भट्टारक का सम्बन्ध काष्ठासंघ माथुरगच्छ पुष्करगण से था। संवत् १८८१ अर्थात् १८२४ ई. के आसपास ललितकीर्तिदेव भट्टारक पद पर प्रतिष्ठित थे। पभोसालेख के आधार पर वे भट्टारक जगत्कीर्ति के उत्तराधिकारी ज्ञात होते हैं। संवत् १९१९ अर्थात् १८६२ ई में राजेन्द्रकीर्तिदेव भट्टारक नियुक्त हो चुके थे।

सन्दर्भ


१. एपिग्राफिया इंडिका, खण्ड २ (१८९४), पृ. २४४. २. पूरन चन्द्र नाहर, जैन लेख संग्रह, लेखांक १४५, इंडियन बुक गैलरी, दिल्ली, १९१८.

३. जे. एग्गेिंलग, इंस्कृप्शन्स इन देहली म्यूजियम, ए. इं., खण्ड ८ (१८९२), श्लोक ७, पृ. ९३ इस पुरी को समीकरण हरियाणा प्रान्त के हिसार नगर से २३ किमी. की दूरी पर अग्रोहा नामक ग्राम से किया जाता है। अग्रोहा हिसार से फतेहाबाद जाने वाली सडक पर २२.५ किमी. की दूरी पर है। यहाँ पर १९३८-३९ में भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा उत्खनन का कार्य कराया गया। अग्रोहा के उत्खनन की विस्तृत रिपोर्ट के लिए दृष्टव्य—एच. एल. श्रीवास्तव, मेमॉयर्स ऑव आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इण्डिया, नं. ६१ तथा आग्रोहा की मृण्मूर्तियों के संकलन के लिए दृष्टव्य विरजानन्द देवकरिण, अगरोहा की मृण्मूर्तियाँ, हरियाणा प्रान्तीय पुरातत्व संग्राहलय, गुरूकुल झज्झर, हरियाणा २००८.

४. वासुदेवशरण अग्रवाल, प्राचीन भारतीय लोकधर्म, पृ. १२७.

५. स्वराजमणि अग्रवाल, अग्रसेन, अग्रोहा, अग्रवाल, अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन, नई दिल्ली, (१९७७) प्लेट १३, चित्र सं. ६,७,८,९,१० तथा विरजानन्द दैवकरिण, अगरोहा की मृण्मूर्तियाँ, हरियाणा, पृ. १४. साथ ही दृष्टव्य, एच. एल. श्रीवास्तव, मेमायर्स ऑफ आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑव इण्डिया, सं. ६१, पृ. ५.

६. स्वराजमणि अग्रवाल, अग्रसेन, अग्रोहा, अग्रवाल, मूल उद्धरण और अर्थ, पृ. ३२५ से ३४९.

७. ये लेख मैनपुरी, उ. प्र. के जैन मन्दिरों में कुछ मूर्तियों एवं यंत्रों पर उल्लिखित हैं। इनसे विदित होता है कि ये प्रतिष्ठाचार्य थे, इनका समय सोलहवीं सदी निश्चित रूप से रहा और इस आधार पर कहा जा सकता है कि पभोसा लेख और बेरूई के मूर्तिलेखों में उल्लिखित ‘श्री काष्ठासंघे माथुरगच्छे पुष्करगणे भट्टारक श्री ललितकीर्ति पभोसा में मूर्ति प्रतिष्ठाचार्य रहे होंगे, उनका समय संवत् १८८१ अर्थात् १८२४ ई. के आस पास रहा होगा।

८. प्रतिमालेखसंग्रह, पृ. ८ तथा १४, उद्धृत राजाराम जैन रइधू साहित्य का आलोचनात्मक परिशीलन, प्राकृत, जैन शास्त्र और अहिंसा शोध संस्थान,वैशाली (१९७४), पृ. ७९.

९. अनेकान्त, १८,६,२६४.

१०. उपरोक्त पृ. १३१, जर्नल ऑप एशियाटिक सोसाइटी ऑव बंगाल, भाग ३१, पृ. ४०४.

११. पूरण चन्द्र नाहर, जैन लेखसंग्रह लेखांक ३२७, पृ. ८२. संवत् १७३२ वर्षे मार्गशीर्षवदिपंचमीगुरौ ढाकामध्ये ........ काष्ठासंघे माथुरगच्छे पुष्करगणे लोहाचार्यन्वये दिगम्बरधर्म भट्टारक रूपचन्द प्रतिष्ठित अग्रवाल गांगुलगोत्रे ...... पादुका श्रीआदिनाथ—पूरणचन्द्र नाहर, जैनलेखसंग्रह, लेखांक ३२६, पृ. ८१ तथा सं० १६८१ व. फा. शु. गु. १० भ. चन्द्रर्कीित प्र. अग्रवाल ज्ञातौ गोयलगोत्रे सा. नीया भा. रूपादे—पूरनचन्द्र नाहर, जैनलेखसंग्रह, लेख सं. ४५३, पृ. १०९, यहाँ अग्रोतक वंश के स्थान पर अग्रवाल जाति का उल्लेख हुआ है।

१२. ए. किंनघम, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑव इडिया रिपोर्टस फॉर दि इयर १८७१-७२, खण्ड ३, पृ. ६६, प्लेर्र्ट ेंेंघ्न्न् लेख सं. ४१ लेख सं. ३ में काष्ठासंघ माथुरगच्छ पुष्करगण शाखा का उल्लेख संवत् १४४३ में मिलता है। यहाँ अग्रोतक वंश का उल्लेख नहीं है, लेकिन कमलकीर्तिदेव का नाम है जो भट्टारक रहे हों। इस प्रकार लेखों के आधार पर सं. ११४३ से सं. १९१९ तक अनवरत इस शाखा के भट्टारकों की परम्परा ज्ञात है।

१३. अन्य जैन प्रशस्तियों व लेखों में अग्रोतक वंश के मित्तल, कासिल, वंसल, मोद्गल गोत्रों का भी उल्लेख हुआ है।

१४. अग्रवाल इतिहास, पृ. १९-२० उद्धृत स्वराजमणि अग्रवाल, पूर्वोक्त, पृ. २३.

१५. तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, भाग ४, पृ. ३५.

१६. स्वराज्यमणि अग्रवाल, पूर्वोक्त, पृ. २६ की पाद तिप्पणी।

१७. पूरनचन्द्र नाहर, जैन लेखसंग्रह, भाग १, लेखांक ३२७, पृ.८२. यह भी ध्यातव्य है कि अन्य बहुत सी जैन प्रशस्तियों में पन्द्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य इसी शाखा के अन्य भट्टारकों के नाम भी उपलबध हैं, लेकिन यहाँ कुछ भट्टारकों के ही नामोल्लेख प्रसंग के सन्दर्भ में दिए गए हैं। काष्ठासंघ माथुरगच्छ पुष्करगण शाखा के गुरुओं को ही महाकवि रइधू ने अपना गुरू माना है। महाकवि रइधू ने अपने साहित्य में काष्ठासंघ माथुरगच्छ की पुष्करगण शाखा के मध्यकालीन लगभग १७ भट्टारकों के नाम दिए हैं। कवि के आश्रयदाताओं में प्राय: अग्रवाल ही रहे हैं। स्वयं महाकवि रइधू के आश्रयदाता मतलिंसह संघवी ग्वालियर के नगरश्रेष्ठि तथा अग्रवाल जाति के शिरोमणि थे। अधिक विस्तार के लिए देखिए—रइधू साहित्य का आलोचनात्मक परिशीलन।

१८. ए. इ., खण्ड २, (१८९४), पृ. २४२

१९. त्रिशष्टिशलाकापुरुषचरित्र, प्रथम पर्व षष्ठ सर्ग, श्लोक २८७, पृ. १४१; तिलोयपण्णत्ति, ४.५३१ में पद्मप्रभ की कल्याणभूमि कौशाम्बी आख्यात है—

‘‘अस्सजुद किण्ह तेरसिदिणम्मि पउमप्पहो अचित्तासु। धरणेण सुसीमाए कोसबिपुरवरे जादो।।

अर्थात् तीर्थंकर पद्मप्रभ ने कौशाम्बीपुरी में पिता धरण और माता सुसीमा से आषाढ कृष्ण त्रयोदशी के दिन चित्रा नक्षत्र में जन्म लिया था। इसका समर्थन रविषेण कृत पद्मपुराण, ९८. १४५ तथा गुणभद्र कृत उत्तरपुराण, ५२.१८ से भी होता है।

२०. ए. इ. खण्ड २, (१८९४), पृ. २४२-४३.

डॉ. मीनू अग्रवाल उत्तर प्रदेश में जैन पुरावशेष प्रथम संस्करण २०१२