ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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उत्तम क्षमा-एक रूपक

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उत्तम क्षमा-एक रूपक

लेखिका—आर्यिका चन्दनामती
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(क्रोध आत्मा की वैभाविक परिणति है और क्षमा आत्मा का स्वाभाविक गुण है। यह सभी जानते हैं कि क्रोध कषाय का त्याग करने से ही क्षमा गुण प्रकट होता है। क्रोध कषाय में प्राणी अधिक देर नहीं रह सकता, जबकि क्षमा के साथ दीर्घकाल तक शान्तिपूर्वक जीवन यापन कर सकता है।

अनुकूल परिस्थितियों में क्षमा धर्म का पालन सरल होता है किन्तु प्रतिकूल परिस्थितियों में क्षमा धारण करना बड़ा कठिन होता है। इन्हींं दोनों पर आधरित प्रस्तुत है—एक लघु रूपक)

(मंच पर पर्दा खुलते ही)

(क्रोध नामक एक व्यक्ति अपने घर में प्रवेश करता है, उसके बच्चे और पत्नी सभी भय से काँपते हुए अपने—अपने काम में लग जाते हैं)

क्रोध — (गुस्से में बड़बड़ाता हुआ) खाना वाना मिलेगा या नहीं ?

महिला — हाँ, हाँ, अभी लाई भोजन की थाली, सब तैयार है। आप हाथ—मुँह धोकर आसन ग्रहण करें, बस खाना हाजिर है।

क्रोध — (जोर से) क्या मेरे हाथों में मैला लगा है जो हाथ धोने की आज्ञा दे रही हो, मुझे नहीं धोना हाथ—पैर।

महिला — जैसी आपकी मर्जी, लीजिए भोजन शुरू करिये (थाली सामने रख देती है। दाल में नमक डालना भूल गई थी अत: भोजन का ग्रास मुँह में जाते ही शुरू हो गया कोहराम।)

क्रोध — (ग्रास मुँह में रखते ही थाली उठाकर जोर से फैकता है।) भाड़ में जाए ऐसा भोजन, तुझे तो भोजन बनाना भी नहीं आता है, जब देखो नमक ही गायब। निकल जा मेरे घर से, मुझे तेरी परवाह नहीं। दिन भर अपने लाड़लों को पकवान बनाकर खिलाएगी और मेरे सामने अलोना भोजन रखते तुझे शरम नहीं आती।

महिला — शान्ति रखें महाराज ! (हाथ जोड़ती हुई) मैं अभी नमक लाती हूँ। भूल से ऐसी गलती हो गई है, आप इतना नाराज मत हों।

क्रोध — (पैर से ठोकर मारते हुए) तेरी इतनी मजाल, मेरे सामने जबान खोल रही है। अच्छा! यदि तुम लोग इस घर से नहीं जाते हो तो मैं ही निकल जाता हूँ। (घर से बाहर निकलकर चला जाता है, बाहर आकर मैदान में जोर—जोर से हंसता और गीत गाता है)

क्रोध — ह: ह: ह:...... मैंने कैसा कमाल दिखाया। मेरी फटकारों से सबके होश गुम हो गए।

गीत—तीनों लोकों में हमारा बड़ा नाम है।

मैं हूँ बड़ा क्रोधी नाराजी मेरा काम है।
क्रोध यदि न करोगे तो कोई नहीं डरेगा।
झूठ को भी सच्चा साबित क्रोध ही तो करेगा।
जिसने मुझको पाला उससे सब परेशान हैं।। तीनो.।।

एक क्षमा नाम की महिला उधर मार्ग से निकलती है, आश्चर्य सहित क्रोध का गीत सुनकर मुस्कुराती हुई कहती है—

क्षमा — हूँ ...... तो आकाशवाणी से महानुभाव क्रोधजी का संगीत प्रसारित हो रहा है।

क्रोध — (अकड़कर) लेकिन तू कौन होती है मेरे गीत का मजाक उड़ाने वाली ? बोल तेरा नाम क्या है ?

क्षमा — जी साहब, मेरा नाम है क्षमा, मेरा काम है क्षमा। मैं इस गुण से सभी का दिल जीतने में समर्थ हूँ।

क्रोध — इतना घमंड मत करो देवी जी ! मेरे ऊपर तुम्हारा कोई असर पड़ने वाला नहीं, अभी तो अपने घर में सबको छट्ठी का दूध याद दिलाकर आया हूँ।

ह: ह: ह:..........‘‘जो मुझसे टकराएगा वह चूर—चूर हो जाएगा।’’

क्षमा — भाई साहब ! आप गलत सोच रहे हैं। मैं तो एक ऐसी गंगा हूँ जिसमें सारी क्रोध की गंदगी भी आकर ठंडी और पवित्र हो जाती है। मैं क्षमा नाम की ऐसी चाँदनी हूँ जिसमें समस्त क्रोध का अन्धकार विलीन होकर प्रकाश में परिर्वितत हो जाता है, मैं ऐसी पृथ्वी मैय्या हूँ जिस पर दुष्ट और सज्जन सभी आश्रय प्राप्त करते हैं।

क्रोध — बंद करो बकवास, मुझे प्रवचन देने लगीं महारानी जी, तेरे जैसी को तो मैं एक फूक में उड़ा दूँगा, चली जा यहाँ से, अब मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है। (सिर पकड़कर बैठ जाता है।)

ऊपर से आकाशवाणी होती है—अरे क्रोध के बच्चे! तूने ही संसार का सर्वनाश किया है, तेरे कारण ही आज सारे देश में हिंसा का तांडव नृत्य हो रहा है, तू महापापी है तुझे कभी प्रकृति माफ नहीं कर सकती, तूने न जाने कितने परिवार, समाज और संगठनों को बर्बाद किया है, धिक्कार है, तुझे धिक्कार है।

क्रोध — (चौंककर इधर—उधर देखता है, भय से पूछता है) यह कौन कह रहा है ?

क्षमा — घबराओ मत ! यह ईश्वरीय वाणी है। भारत माता अपने एक बिगड़े सपूत को मधुर सम्बोधन प्रदान कर रही है, जिसका अभिप्राय स्पष्ट है—

तर्ज—मेरे अंगने में ..........

तेरे परमातम में क्षमा का निवास है।
जिसे भूल क्रोध में तू करता विश्वास है।।टेक.।।
जैसे ठण्डी शीत से, जंगल भी जल जाते हैं।
वैसे ही उत्तम क्षमा से, कर्मवन जल जाते हैं।
आ जा तू भी स्व में, पर में न तेरा वास है।। तेरे परमातम.।।१।।
क्षमा के प्रभाव से, अग्नी भी शीतल होती है।
क्रोध के प्रभाव से, बुद्धि भी भ्रष्ट होती है।।
पारस प्रभु को देखो क्षमा ही जिनका वास है।। तेरे परमातम.।।२।।

(गीत के पश्चात् पुन: क्षमादेवी क्रोध को सम्बोधित करने लगती हैं)—

क्षमा — देखो मेरे भाई ! आप इस क्रोध के कारण कितने दु:खी हैं, यह भयंकर सिरदर्द आपके मस्तिष्क में ब्रेन हेमरेज, हाई ब्लडप्रेशर, हार्टअटैक जैसी अनेकों बीमारियाँ पैदा कर सकता है। आज आपके जैसे न जाने कितने मनुष्य अपने क्रोध के कारण स्वयं शारीरिक स्वास्थ्य से परेशान हैं और उनके परिवार तो संकट के गहरे गड्ढे में डूबे पड़े हैं।

ऐ धरती के सपूतों ! ‘‘जब जागो तभी सबेरा’’ इस सूक्ति को अपनाकर आज आप क्रोध का त्याग करें, अपनी अस्त—व्यस्त एवं डरी—सहमी गृहस्थी पुन: प्यार से सवारें, अपने आत्मधर्म को पहचानें, फिर देखेंगे कि आपकी जीवन बगिया में कैसी हरियाली आ गई है। वही पुष्प जो मुरझा गए थे क्षमा जल के सिंचन से खिल जाएंगे, वही क्यारी जो क्रोध की तपन से झुलस गई थी पुन: हरी हो जाएगी तथा आप अपने को, परिवार को, समाज को एवं सारे देश को खुशहाल पाएंगे।

सुनो ! मैं इसी सम्बन्ध में आपको एक र्मािमक पौराणिक कथानक सुनाती हूँ जिसमें स्वयं क्रोध के फल को भोगी हुई एक महिला की साक्षात् कहानी है—

(बीच में ही एक अप टू डेट डॉक्टर मंच पर प्रवेश करता है, जिसके एक हाथ में इंजेक्शन की सीरींज हैं और दूसरे हाथ में इंजेक्शन वाली एक छोटी शीशी में थोड़ा—सा लाल रंग है, वह जनता को सम्बोधित करता हुआ कहता है)—

डॉक्टर — अरे बन्धुओं ! सुनो, सुनो, एक क्रोधी मानव के खून की कहानी (चौंककर क्रोध और क्षमा दोनों उस डॉक्टर की ओर आश्चर्यचकित होकर देखने लगते हैं और उठकर डॉक्टर के समीप जाकर खड़े हो जाते हैं।)

डॉक्टर — (सबको दिखाते हुए) आप यह शीशी देख रहे हैं न, इसमें एस क्रोधी व्यक्ति का खून है। मैंने इसमें से आधे खून को इंजेक्शन में भरकर एक चूहे पर प्रयोग किया है। चूहे के शरीर में यह खून पहुँचते ही २२ मिनट में वह चूहा मनुष्य को काटने के लिए दौड़ पड़ा, ३५ वें मिनट में स्वयं को काटना शुरू कर दिया और अंतत: ५० मिनट के बाद उसने गुस्से में अपने पैर पटक—पटक कर खुद की जान गंवा दी। इस प्रयोग से यह निष्कर्ष निकलता है कि क्रोध के समय मनुष्य के खून में अत्यधिक विषैलापन आ जाता है जो उसके शरीर के स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद है, रक्त को विकृत करके बीमारियाँ उत्पन्न कराता है। जिस व्यक्ति में जितनी अधिक शांति और सहनशीलता होगी वह उतना अधिक स्वस्थ और पुण्यशाली बनेगा। क्षमा फिर अपनी कथा शुरू करती है—

क्षमा — क्यों भाई साहब ! सुनी आपने साक्षात् घटना। एक कहानी मेरी भी सुनो—

एक ब्राह्मण की कन्या बड़ी क्रोधी स्वभाव की थी। उसे कोई तू कहकर यदि बोल देता तो वह आपे से बाहर हो जाती थी तथा उसकी दस पीढ़ियों तक को गाली दे—देकर सारा मोहल्ला सिर पर उठा लेती थी। उसके इस स्वभाव से पहले तो कोई उससे शादी करने को तैयार नहीं था किन्तु भाग्य से एक भोला—भाला ब्राह्मण सोमशर्मा मिल ही गया, जिसने उसके पिता से कह दिया कि मैं इसे कभी ‘‘तू’’ कहकर नहीं बोलूंगा। कुछ दिन तक तो दोनों खूब अच्छी तरह रहे। एक दिन की बात है—

(मंच पर एक ओर दोनों बैठे हैं, दूसरी ओर अचानक दृश्य प्रारम्भ होता है। क्षमा कहानी सुना रही है)।

(बाहर से नाटक देखकर रात्रि में सोमशर्मा देर से घर आता है और दरवाजा खटखटाता है।)

सोमशर्मा — (जोर से आवाज देता हुआ) अरे ! दरवाजा खोलो, दरवाजा खोलो।

क्षमा — लेकिन गुस्से के कारण पत्नी दरवाजा नहीं खोलती है न ही कुछ बोलती है अत: सोमशर्मा को भी गुस्सा आ गया, वह बोल पड़ा।

सोमशर्मा — अरे मैं इतनी देर से आवाज दे रहा हूँ तू बोलती भी नहीं है, कितनी गहरी नींद है तेरी।

क्षमा — तू शब्द मुँह से निकलते ही उस तुंकारी ने न आव देखा न ताव, उसने आकर दरवाजा खोला और गुस्से में घर से बाहर निकल गई और भागती चली गई। सोमशर्मा ने उसे पकड़ने का प्रयास भी किया किन्तु वह तो जंगल की ओर भाग गई, अकस्मात् उसे जंगल में एक बदमाश मिल गया और उसने उसका शील भंग करना चाहा। तब वह घबड़ाकर भगवान् का नाम स्मरण करती है। किसी तरह दैवी शक्ति से अपने शील की रक्षा करती हुई पुन: आगे भागती है।

(मंच पर एक महिला भागती हुई, सामने से एक युवक आता हुआ जो उस लड़की को पकड़ने की कोशिश करता है।)

तुंकारी — (घबड़ाती हुई) हे भगवान् ! मैं कहाँ आ गई, यह मेरे साथ कैसा अन्याय हो रहा है। (पढ़ती है) ‘‘यह तन जाए तो जाए मेरा शील रतन ना जाए।’’

(आकाशवाणी होती है) अरे दुष्ट ! इस पवित्र नारी को यदि हाथ भी लगाया तो तेरे हाथ जल जाएंगे। चल दूर हट जा......... (युवक डरकर भाग जाता है, तुंकारी इधर—उधर देखती है पुन: वहाँ से डरकर भाग जाती है।)

क्षमा — तुंकारी जब आगे बढ़ी तो कुछ चोरों से उसका मुकाबला हो गया, उन लोगों ने उसके सारे गहने उतरवा लिए और एक भील को सौंप दिया। भील ने भी उसका शील भंग करना चाहा। उस समय भी दैवी शक्ति ने उसकी रक्षा की। तब भील ने डरकर एक सेठ को सौंप दिया, देखो ! संसार की लीला उस सेठ ने भी तुंकारी पर बुरी नजर डाली वहाँ भी उसके शील की रक्षा हुई। अन्ततोगत्वा सेठ ने उसे एक रंगरेज के हाथों बेच दिया। वह रंगरेज अपने कंबल रंगने के लिए रोज तुंकारी के शरीर से प्रतिदिन खून निकालता, जिससे उसे बहुत कष्ट होता था, शरीर से प्रतिदिन खून निकलने के कारण वह बेचारी सूखकर काँटा हो गई थी।

मंच पर घावों से युक्त दु:खी तुंकारी प्रवेश करती है और कहती है—

तुंकारी — हे भगवन् ! मैंने अपने हाथों यह क्या कर डाला ? अब मुझे इस दु:ख से मुक्ति कैसे मिलेगी ? मुझे तो अपना घर भी पता नहीं है। मैं किसी तरह यदि घर पहुँच जाऊँ तो पुन: कभी क्रोध नहीं करूंगी, पतिदेव से बारंबार क्षमा याचना करूँगी। हे स्वामी ! मैंने क्रोध का फल चख लिया है किसी तरह मेरा संकट दूर करो। (चली जाती है) क्षमा पुन: कथा प्रारम्भ करती है—

क्षमा — एक दिन अचानक उधर उसका भाई आ गया। तुंकारी ने अपने भाई को पुकारा, भाई तो उसे पहचान भी न पाया था। तुंकारी भाई से चिपक कर रो पड़ी और अपने किए पर पछताने लगी। पुन: भाई ने राजा से कह—सुनकर अपनी बहन को रंगरेज से मुक्त कराया। उसके बाद उसने क्रोध का त्याग कर दिया।

क्रोध — अच्छा, तो मेरे द्वारा ऐसे—ऐसे अनर्थ हो जाते हैं। मुझे अपनी अज्ञानता का भान अब हो गया है। मेरे प्यारे बन्धुओं ! आपने मेरा कमाल तो देख लिया है। यदि आपको इन हानियों से बचना है तो क्रोध कभी मत करना।

सभी पात्र मिलकर गीत गाते हैं—

—शेर छंद—

संसार में यदि क्रोध का विस्तार न होता।
तब तो सभी कषायों का उद्धार न होता।।
इस क्रोध से न जाने कितने घर बिगड़ गए।
इस क्रोध से ही देश और समाज ढह गए।।१।।
निंह क्रोध के बल पर हुआ है क्रोध का शमन।
उत्तम क्षमा ही क्रोध का कर सकती है प्रशमन।।
यदि संगठित समाज करना चाहते हो तुम।
धारो स्वयं क्षमा व सहनशील बनो तुम।।२।।
भारत के सपूतों ! यही अमोघ शस्त्र है।
हिंसा से अहिंसा का सूत्र ही सशक्त है।।
सबके प्रति समभाव का झरना जो झर पड़े।
तो ‘‘चंदनामती’’ जगत में वैर ना बढ़े।।३।।
‘‘बोलिए उत्तम क्षमा धर्म की जय’’