ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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उत्तम तप

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उत्तम तप

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उत्तम तप द्वादश विध माना, बाह्याभ्यंतर के भेदों से।

अनशन ऊनोदर वृत्तपरीसंख्या,१ रस त्याग प्रभेदों से।।
एकान्त शयन आसन करना, तनु क्लेश यथाशक्ति तप है।
तपने से स्वर्ण शुद्ध होता, आत्मा भी तप से शुद्धि लहे।।१।।

प्रायश्चित विनय सुवैयावृत, स्वाध्याय उपाधि का त्याग कहे।
शुचि ध्यान छहों अन्तर तप ये, इनसे ही कर्म कलंक दहे।।
आगम विधि से सम्यक् तप ये, आत्मा की पूर्ण शुद्धि करते।
जो तप से मन को कृश करते, वे आत्मबली सिद्धि वरते।।२।।

व्रत कर्म दहन चारित्र शुद्धि, जिनगुण संपति कहे उत्तम।
कनकावली रत्नावली आदिक, सर्वतोभद्र जग में उत्तम।।
व्रत श्रेष्ठ सिहनिष्क्रीड़ितादि, नन्दन मुनि ने भी व्रत पाला।
सोलहकारण भावित करके, महावीर बने सब अघ टाला।।३।।

‘मय’ मुनि को कर स्पर्श सती, सिहेंदु का स्पर्श किया।
पति भी र्नििवष हो खड़ा हुआ, मय मुनि की पूजा भक्ति किया।।
तप बल से ऋद्धि तभी प्रगटें, भविजन के बहुविध त्रास हरें।
ऋषि स्वयं तपोधन होकर भी, निस्पृह हो निज सुख चाह करें।।४।।

सब इच्छाओं का रोध करूँ, बस स्वात्म सुखामृत को चाहूँ।
निज आत्मा में ही लीन हुआ, निश्चय सम्यक्तप को पाऊँ।।
बहिरंतर तप तपते तपते, मैं स्वयं तपोधन बन जाऊँ।
अपने में ही रमते—रमते, मैं स्वयं स्वयंभू बन जाऊँ।।५।।