ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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उत्तम त्याग

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उत्तम त्याग

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उत्तम त्याग कहा जग में, जो त्यागे विषय कषायों को।

शुभ दान चार विध के देवें, उत्तम आदि त्रय पात्रों को।।
आहार सुऔषधि ज्ञान दान, और अभय दान उत्तम सबमें।
नृप वज्रजंघ और श्रीमती, आहार दान से पूज्य बने।।१।।

नृप वृषभ हुए श्रीमती तभी श्रेयांस हुए जग में वंदित।
श्रीकृष्ण मुनि को औषधि दे, तीर्थंकर होंगे पुण्य सहित।।
ग्वाला भी शास्त्र दान फल से, कौंडेस मुनि श्रुतपूर्ण हुआ।
मुनि को दे सूकर अभयदान, लड़कर मरकर सुर शीघ्र हुआ।।२।।

रत्नों की वर्षा पुष्प वृष्टि, अनहद बाजे वायु सुरभित।
जयजयकारा ये पाँच कहें, आश्चर्य वृष्टि सुरगण निर्मित।।
पंचाश्चर्यों की वर्षा बस, आहार दान में ही होती।
भद्रों को मिलती भोग भूमि, समकित को सुर शिव गति होती।।३।।

पात्रों का दान सुफल देता, कुपात्रों का कुत्सित फल है।
हो दान अपात्रों का निष्फल, ये चारों दान महा फल हैं।।।
थोड़े में भी थोड़ा दीजे, बहु धन की इच्छा मत करिये।
इच्छा की पूर्ति नहीं होगी, सागर में कितना जल भरिये।।४।।

यह सब व्यवहार त्याग माना, निश्चय से आत्मा सिद्ध सदृश।
सब त्याग ग्रहण से रहित सदा, टाँकी से उकेरी मूर्ति सदृश।।
सम्पूर्ण विभावों को तजकर, गुणपुँज अमल निज को ध्याऊँ।
बस ज्ञायक भाव हमारा है, उसमें ही तन्मय हो जाऊँ।।५।।