ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य क्या है?

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
Stoc.jpg
Stoc.jpg
Stoc.jpg
Stoc.jpg
उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य क्या है?

संतोष कुमार-गुरूजी! उत्पाद-व्यय ध्रौव्य क्या चीज है?

गुरूजी-द्रव्य का लक्षण है 'सत' अर्थात विद्यमान रहना | सत का लक्षण है "उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्" अर्थात जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त होता है वह "सत्" है | अब तीनों का लक्षण सुनो-
किसी वास्तु में नवीन पर्याय की उत्पत्ति होना उत्पाद है, उसी द्रव्य कि पूर्व पर्याय का विनाश होना व्यय है और दोनों अवस्थाओं में द्रव्य का बने रहना द्रौव्य है | जैसे-तुमने अंगूठी बनवाई है तो उसमे अंगूठी के पूर्व सुवर्ण कि डली पर्याय का नाश हुआ, अंगूठी पर्याय का उत्पाद हुआ और दोनों अवस्थाओं में सुवर्णपना द्रव्य मौजूद है, यह ध्रौव्य है| ऐसे ही मनुष्य पर्याय का विनाश हुआ, उसी छण में देवायु-देवगति आदि के उदय होने से देव्पर्याय का उत्पाद हुआ और दोनों अवस्ताओं में जीवत्व मौजूद है, वह ध्रौव्य हुआ |

संतोष कुमार-इसमें तो बहुत समय लगता है | मेरी माताजी कहती थी कि उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य तीनों एक ही समय में होते हैं |

गुरूजी-बात ठीक है | इन तीनों में समय भेद नहीं है | देखो, तुमने एक घड़े में डंडा मारा, घड़ा फूट गया | उसमे घट पर्याय का विनाश, कपाल-टुकड़े पर्याय का उत्पाद और मिट्टी द्रव्य दोनों अवस्थाओं में मौजूद है | ये तीनों अवस्थाएं एक ही समय में हुई हैं |

संतोष कुमार-ये उत्पाददि किन-किन वस्तुओं में होते हैं |

गुरूजी-सभी चेतन-अचेतन वस्तुओं में प्रतिक्षण होते रहते हैं | जो प्रतिक्षण होते रहते हैं | जो प्रतिक्षण होते है वे हमें दिखाई नहीं देते है किन्तु जो व्यंजन पर्याय में होते हैं वे हम लोगों को स्पष्ट होते हैं जिनका कि हमने ऊपर उदाहरण दिया है |

संतोष कुमार-तो क्या मेरी इस पुस्तक में प्रतिक्षण उत्पादव्यय-द्रौव्य होता रहता है?

गुरूजी-हाँ,अवश्य है | यदि नहीं मानोगे तो यह पुस्तक कभी पुरानी नहीं होनी चाहिये | और दूसरा उदाहरण देखो-जब तुम्हारी माँ ने चावल में पानी डालकर बर्तन में भरकर चूल्हे पर चढ़ा दिया, समझो यह दस मिनट में भात बन गया है | एक मिनट बाद यदि तुमने उस बर्तन को खोलकर देखा तो वह ज्यों का त्यों है, यहाँ तक कि 3 मिनट में भी कुछ फर्क नहीं दीखता है, तो तुमने क्या समझा? क्या एकदम भात बन गया?

संतोष कुमार-और तो कैसे बना ?

गुरूजी-प्रति मिनट वह कुछ न कुछ अंश में पका | यहाँ तक कि प्रति समय कुछ-न-कुछ अंश में पका है | इसलिए पक्व पर्याय का उत्पाद अपक्व पर्याय का व्यय और दोनों अवस्थाओं में चावल द्रव्य वर्तमान है | इसी का नाम प्रतिक्षण उत्पादव्यय-द्रौव्य है | और देखो, तुम्हारे छोटे भाई की कल वर्षगाँठ थी | वह एक वर्ष का हो गया | बताओ गत वर्ष से इस वर्ष में वह कुछ बड़ा हुआ या नहीं ?

संतोष कुमार-अवश्य हुआ है |

गुरूजी-वह एक-एक महीने में बढता गया है |ऐसी ही बात नहीं है, बल्कि एक-एक समय में बढता गया है | उसमे नवीन-नवीन पर्याय का उत्पाद पूर्व-पूर्व पर्याय का व्यय और जीवत्व अवस्था का दोनों अवस्थाओं में बने रहना, यही उउत्पादव्यय-ध्रौव्य है | भले ही यह अपने को दृष्टिगोचर न हो फिर भी अनुमान और आगम से इसका ज्ञान होता है |

संतोष कुमार-एक बार अपने कहा था कि बौद्ध लोग नाश को अहेतुक मानते हैं सो क्या है ?

गुरूजी-हाँ सुनो, उनकी बड़ी विचित्र मान्यता है | वे कहते हैं कि घट को तुमने मुद्गर से फोड़ दिया, तो मुद्गर के निमित से कपाल का उत्पादहुआ है, न कि घट का नाश | घट का नाश तो स्वयं हो गया है अर्थात वे लोग नाश को अहेतुक कहते हैं और निमित कारण को नए कार्य में हेतु मानते हैं |

संतोष कुमार-इस पर जैनाचार्य क्या कहते हैं ?

गुरूजी-जैनाचार्यों का कहना है कि एक मुद्गर के कारण से घट का नाश और कपालों का उत्पादहुआ है | नाश और उत्पादमें एक ही हेतु है |मुद्गर से घट फूटने में नाश अहेतुक नहीं है |

'संतोष कुमार'-ऐसा ही तो अनुभव आ रहा है |

गुरूजी-बस, अनुभव को न मानना और यद्वा-तद्वा कल्पना करते रहना, इसी का नाम मिथ्यात्व है, इसको छोड़ देना चाहिये |