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उपासक धर्म

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उपासक धर्म

आद्य जिन— श्री ऋषभदेव भगवान् तथा राजा श्रेयांस ये दोनों क्रम से व्रतविधि और दानविधि के आदि प्रवर्तक पुरुष हैं। अणुव्रत और महाव्रत आदि व्रतविधि का प्रचारक इस युग के आदि में सर्वप्रथम भगवान् ऋषभदेव ने किया है। और दानविधि का प्रचार भगवान को आहार दान देकर राजा श्रेयांस ने किया है। इसलिये ये दोनों महापुरुष व्रत और दान के आदि प्रवर्तक माने गये हैं। इनका परस्पर संबंध होने पर ही यहाँ भरतक्षेत्र में धर्म की स्थिति हुई है।

सम्यगदर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों को ‘धर्म’ कहते हैं । यह धर्म ही मुक्ति का मार्ग है जो कि प्रमाण से सिद्ध है। जो जीव रत्नत्रयस्वरूप इस मोक्षमार्ग में संचार नहीं करते हैं उनके लिये मोक्षस्थान तो दूर है ही, उनका संसार अतिशय लंबा—बहुत बड़ा हो जाता है। अर्थात् रत्नत्रय से रहित जीव अनंत काल तक इस चतुर्गतिरूप संसार में ही परिभ्रमण किया करते हैं।

यह धर्म संपूर्णधर्म— परिपूर्ण और देशधर्म — एकदेश के भेद से दो प्रकार का है। इनमें से प्रथम भेद में दिगंबर मुनि रहते हैं और द्वितीय भेद में गृहस्थ—श्रावक रहते हैं। वर्तमान में भी उस रत्नत्रयस्वरूप धर्म की प्रवृत्ति उसी मार्ग से— पूर्णधर्म और देशधर्मरूप से हो रही है। इसीलिये देशधर्म के अनुयायी गृहस्थ भी धर्म के कारण माने जाते हैं। तात्पर्य यही है कि गृहस्थधर्म भी मोक्षमार्ग है— मोक्ष का कारण है। सर्वथा निरर्थक, व्यर्थ अथवा हेय नहीं हैं। अन्यथा भगवान् आदिनाथ, भगवान, शांतिनाथ, सम्राट् भरत, मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र आदि महापुरुष गृहस्थाश्रम में प्रवेश क्यों करते ?

‘इस समय यहाँ इस कलिकाल—पंचमकाल में मुनियों का निवास जिनालय में हो रहा है और उन्हीं के निमित्त से धर्म एवं दान की प्रवृत्ति है। इस प्रकार मुनियों की स्थिति, धर्म और दान इन तीनों के मूल कारण गृहस्थ श्रावक हैं’।[१]

आज इस पंचमकाल में मुनियों का संघ जिनमंदिर में ही प्राय: रहता है क्योंकि उत्तम संहनन का अभाव होने से वन में, पर्वतों पर या श्मशान आदि स्थानों में मुनिसंघ नहीं रह पाता है। ये मुनिराज भव्यजीवों को मुनिधर्म और श्रावकधर्म का उपदेश देते हैं। मोक्ष के अभिलाषी अथवा सुख के इच्छुक भव्यों को महाव्रत और अणुव्रत आदि प्रदान करते हैं इसलिये धर्म की स्थिति और प्रवृत्ति इन मुनियों के द्वारा ही होती है तथा मुनियों को संघस्थ आर्यिका, क्षुल्लक— क्षुल्लिकाओं को, व्रतियों को आहारदान देने का अवसर श्रावकों को मिलता है। आहार, औषधि, ज्ञान और अभय ये चारदान की प्रवृत्ति भी मुनिसंघ के निमित्त से ही होती है। और मुनियों के निवासरूप वसतिका को बनवाने वाले श्रावक हैं । यही कारण है कि गृहस्थ श्रावक मुनियों की स्थिति, धर्म और दान की प्रवृत्ति के मूल कारण माने गये हैं। १. संप्रत्यत्र कलौ काले जिनगेहे मुनिस्थिति: । धर्मश्च दानमित्येषां श्रावका मूलकारणम् ।।६।।


षट्कर्म—

जिनपूजा, गुरु की उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान ये छह कर्म गृहस्थों के लिये प्रतिदिन करने योग्य हैं[२] । अर्थात् ये गृहस्थों के लिये छह आवश्यक क्रियायें हैं अत: अवश्य ही करने योग्य हैं। सब प्राणियों में समताभाव धारण करना, संयम के विषय में शुभ भावना रखना तथा आर्त एवं रौद्र ध्यानों का त्याग करना, इसे सामायिक व्रत माना जाता है। जिसका चित्त द्यूत—जुआ आदि व्यसनों के द्वारा मलिन हो रहा है उसके उपर्युक्त सामायिक की संभावना नहीं है। इसलिये श्रावक को इन सात व्यसनों का परित्याग अवश्य कर देना चाहिये।

सात व्यसन—

द्यूत—जुआ खेलना, मांस खाना, मद्य—मदिरा पीना, वेश्या सेवन करना, शिकार खेलना, चोरी करना और परस्त्री सेवन करना, ये सातों ही व्यसन महापाप स्वरूप हैं। विवेकी मनुष्यों को इनका त्याग अवश्य कर देना चाहिये। धर्माभिलाषी जन भी यदि इन व्यसनों का आश्रय लेता है। तो इससे उसके वह धर्म के खोजने की योग्यता भी नहीं उत्पन्न होती है। नरक सात ही हैं, उन्होंने मानों अपनी समृद्धि के लिये मनुष्यों को आकृषित करने वाले इन एक—एक व्यसन को नियुक्त किया है। सातों नरकों ने अपने—अपने स्थान में मनुष्यों को ले जाने के लिये ही मानों इन सात व्यसनों को नियुक्त कर रखा है। तात्पर्य यही है कि एक—एक व्यसन भी एक— एक नरक में ले जाने वाले हैं पुन: जो सातों व्यसनों में आसक्त रहते हैं उन्हें कितनी बार नरक जाना पड़ेगा कौन जाने ?

इन सात व्यसनों ने मानों धर्मरूपी शत्रु को नष्ट करने के लिये पाप नाम से प्रसिद्ध निकृष्ट राजा के सात राज्यांगों से युक्त अपने राज्य को बलवान् किया है। पाप नाम का महानीच एक राजा है उसने राज्य के सात अंगों द्वारा अपने राज्य को बलशाली बना लिया है। राजा, मंत्री, मित्र, खजाना, देश, दुर्ग और सैन्य ये राज्य के सात अंग हैं। इनके निमित्त से कोई भी राजा अपने राज्य को बलशाली बनाकर शत्रुराजा को नष्ट कर देता है उसी प्रकार से पापरूपी राजा के ये सातों व्यसन ही सात अंग हैं उनसे बलवान् होकर यह धर्मरूपी राजा को अपना शत्रु समझ कर उसे नष्ट कर रहा है। तात्पर्य यही है कि ये सात व्यसन धर्म को नष्ट करके , पाप को बढ़ाकर मनुष्यों को नरकों में ले जाते हैं।

जिनभक्ति—

जो भव्यजीव भक्ति से जिन भगवान् का दर्शन करते हैं, पूजन करते हैं और स्तुति करते हैं वे तीनों लोकों में स्वयं ही दर्शन, पूजन और स्तुति के योग्य बन जाते हैं। अभिप्राय यह है कि जिनेंद्र देव की भक्ति करने वाले भव्य मनुष्य स्वयं जिनेंद्र परमात्मा बन जाते हैं जगत् के प्राणियों के लिये वे स्वयं पूज्य—दर्शन, पूजन और स्तुति के योग्य बन जाते हैं। इससे अतिरिक्त जो मनुष्य भक्ति से जिनेंद्रदेव का न दर्शन करते हैं, न पूजन करते हैं और न स्तुति ही करते हैं उनका जीवन निष्फल है; तथा उनके गृहस्थाश्रम को धिक्कार है। श्रावकों को प्रात:काल में उठकर भक्ति से जिनेंद्रदेव तथा निग्र्रंथ—दिगम्बर मुनि का दर्शन और उनकी वंदना करके धर्म श्रवण करना चाहिये। तत्पश्चात् अन्य कार्यों को करना चाहिये, क्योंकि विद्वान् पुरुषों ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में धर्म को प्रथम बतलाया है। इसलिये सर्व पुरुषार्थों की सिद्धि के लिये धर्मपुरुषार्थ का ही आश्रय लेना चाहिये।

गुरुभक्ति और स्वाध्याय—

गुरु की प्रसन्नता से वह केवलज्ञान रूपी नेत्र प्राप्त हो जाता है कि जिसके द्वारा समस्त जगत् हाथ की रेखा के समान स्पष्ट देखा जाता है। ‘जो अज्ञानी जन न तो गुरु को मानते हैं और न उनकी उपासना ही करते हैं उनके लिये सूर्य का उदय होने पर भी अंधकार जैसा ही है’[३]। तात्पर्य यही है कि ज्ञान की प्राप्ति गुरु के प्रसाद से ही होती है। अतएव जो मनुष्य आदरपूर्वक गुरु की सेवा शुश्रूषा नहीं करते हैं वे अल्प—ज्ञानी ही रहते हैं। उनके अज्ञान को सूर्य का प्रकाश भी दूर नहीं कर सकता है। कारण कि वह सूर्य का प्रकाश तो केवल सीमित बाह्य पदार्थों के दिखाने में ही सहायक होता है न कि आत्मा को दिखाने में । आत्मावलोकन में तो केवल गुरु के द्वारा प्राप्त हुआ अध्यात्मज्ञान ही सहायक होता है। जो मनुष्य सच्चे गुरु के द्वारा प्ररूपित शास्त्र को नहीं पढ़ते हैं उन्हें बुद्धिमान लोग दोनों नेत्रों से युक्त होने पर भी अंधा ही समझते हैं। जिन्होंने गुरु के समीप में न शास्त्र को सुना है और न उसको हृदय में धारण ही किया है उनके प्राय: करके न तो कान हैं और न हृदय ही है, ऐसा मैं समझता हूँ । तात्पर्य यह है कि कानों का सदुपयोग तो शास्त्रों का सुनना ही है तथा मन का उपयोग भी यही है कि उससे शास्त्रों के अर्थ का चिन्तन किया जाये और उसके रहस्य को धारण किया जाये । किन्तु जो जीव कान और मन को पाकर भी यदि उन्हें शास्त्र श्रावण— मनन में नहीं लगाते हैं, तो उनके वे कान और मन निष्फल ही हैं। क्योंकि ये ही कान और मन सच्चे शास्त्र और सच्चे गुरु के उपदेश श्रावण मनन से आत्मा को स्वर्ग—मोक्ष प्राप्त कराने वाले हो जाते हैं। अन्यथा ये ही कान और मन खोटे कथा — कहानियों के श्रवण—मनन से आत्मा को दुर्गंति में डाल देते हैं। अत: अपने कान और मन को सदा गुरु के वचनों में लगाना चाहिये।

संयम

श्रावक यदि देशव्रत के अनुसार संयम का भी पालन करते हैं तो इससे उनका वह देशव्रत सफल हो जाता है। इन्द्रियों का निग्रह करना और प्राणियों की दया पालन यह संयम इंद्रियसयंम और प्राणीसंयम की अपेक्षा दो प्रकार का है। श्रावक जब अणुव्रती बन जाता है तब वह इन्द्रियों की अनर्गल प्रवृत्ति पर भी रोक लगा लेता है। अभक्ष्य भक्षण,अनुचित गीत श्रवण, अशोभन— अश्लील आदि दृश्य देखने का भी त्याग कर देता है। तथा त्रसजीवों की दया पालते हुये अकारण स्थावरजीवां की हिंसा भी नहीं करता है। तभी उसके अणुव्रत उत्तम फल देने वाले हो जाते हैं। क्योंकि देशव्रत के परिपालन की सफलता इसी में है कि तत्पश्चात् पूर्णसंयम को भी धारण किया जाये। १. ये गुरुं नैव मन्यन्ते तदुपास्तिं न कुर्वते। अन्धकारो भवेत्तेषामुदितेऽपि दिवाकरे।।१९।। (पद्मनंदिपच्चीसी)

आठ मूलगुण

मद्य, मांस, मधु और पांच उदुंबर फलों (ऊमर, कठूमर, पाकर, बड़, पीपल) का त्याग कर देना ही श्रावक के मूलगुण हैं। सम्यग्दर्शन के साथ इन आठों के त्यागरूप आठ मूल गुणों को धारण किये बिना कोई भी मनुष्य नहीं हो सकता है। ‘मूल’ शब्द का अर्थ जड़ है। जिस वृक्ष की जड़ें गहरी और बलिष्ठ होती हैं उसकी स्थिति बहुत समय तक रहती है। किंतु जिसकी जड़ें गहरी और बलिष्ठ नहीं होती हैं वह वृक्ष बहुत काल तक नहीं टिक पाता है। आँधी आदि के द्वारा उखड़ जाता है। ठीक इसी प्रकार से इन आठ मूलगुणों के बिना श्रावक के उत्तरगुणों (अणुव्रत आदि) की स्थिति भी दृढ़ नहीं रहती है। इसलिये इन्हें मूलगुण संज्ञा दी है। इनके भी प्रारम्भ में सम्यग्दर्शन अवश्य होना चाहिये, क्योंकि इसके बिना भी व्रत आदि मोक्षरूप उत्तम फल को देने में समर्थ नहीं होते हैं। इन मूलगुणों को अन्यत्र अन्य प्रकार से भी लिया है। यथा

१. ‘‘मद्य

२. मांस

३. मधु

४. रात्रिभोजन

५. पांच उदुंबर फल

६. पंचपरमेष्ठी को नमस्कार—देवदर्शन

७. जीवदया— पालन

८. जलगालन— जल छानकर पीना

ये आठ मूलगुण हैं।’’ [४] इन आठ मूलगुणों में देवदर्शन, जीवदया पालन, जल छानकर पीना और रात्रिभोजन का त्याग ये सभी आ जाने से ये श्रावक के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि इन चारों से ही श्रावक अथवा जैन की पहचान होती है।

बारह्व्रत

गृहिव्रत में पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत ये बारहव्रत होते है। हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांच पापों का स्थूल— एकदेश त्याग करना अणुव्रत है। अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत ब्रह्मचर्याणुव्रत और परिग्रहपरिमाण अणुव्रत इस तरह से ये अणुव्रत पाँच होते हैं। गुणव्रत के दिग्व्रत, अनर्थदण्डव्रत और भोगोपभोग परिमाणव्रत ये तीन भेद हैं। ऐसे ही शिक्षाव्रत के देशावकाशिक, सामायिक, प्रोषधोपवास और वैयावृत्य ये चार भेद हैं।

तप—

अष्टमी और चतुर्दशी को पर्व संज्ञा है। इन पर्व के दिनों में अपनी शक्ति के अनुसार भोजन के परित्याग आदिरूप अनशन आदि तपों को करना चाहिये। तथा रात्रिभोजन का त्याग करके वस्त्र से छना हुआ जल पीना चाहिये। ‘श्रावकों का कर्तव्य है कि जिस देश आदि के निमित्त से सम्यग्दर्शन मलिन होता हो तथा व्रतों का नाश होता हो ऐसे उस देश का, उस मनुष्य का, उस द्रव्य का तथा उन क्रियाओं का भी परित्याग[५] कर देवे।’ विद्वानों को नियमानुसार सदा भोग और उपभोगरूप वस्तुओं का प्रमाण कर लेना चाहिए। अपना थोड़ा सा समय भी व्रतों से रहित नहीं बिताना चाहिये। भव्य जीवों को आलस्य छोड़कर रत्नत्रय का आश्रय इस प्रकार से करना चाहिये कि जिस प्रकार से उनका इस रत्नत्रयविषयक श्रद्धान दूसरे जन्म में भी अतिशय वृद्धिंगत होता रहे। तात्पर्य यह है कि रत्नत्रय में अपने संस्कार और विश्वास को इतना अधिक मजबूत बना लेना चाहिये कि अगले तं देशं तं नरं तत्स्वं तत्कर्माणि च नाश्रयेत् । मलिनं दर्शनं येन च व्रतखण्डनम् ।।२६।। जन्म में भी रत्नत्रय की प्राप्ति हो और सम्यक्तव तो छूटने ही न पावे ऐसी भावना सदा भाते रहना चाहिये। क्योंकि मरण के बाद व्रत तो छूट ही जाते हैं सम्यग्दर्शन और ज्ञान बना रह सकता है।

विनय की महिमा—

श्रावकों को जिनागम के आश्रित होकर अर्हंत आदि पांच परमेष्ठियों की विनय तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की भी विनय करना चाहिये। उसी प्रकार इन रत्नत्रय के धारण करने वाले मुनि, आर्यिका एवं श्रावक, श्राविकाओं की भी यथायोग्य विनय— भक्ति करते रहना चाहिये। इस विनय के द्वारा ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और तप आदि की सिद्धि होती है। अतएव यह विनय मोक्ष का द्वार है। अर्थात् विनय के बिना आज तक न कोई मोक्ष प्राप्त कर सका है और न कर सकेगा यही कारण है कि ‘विनय’ को मोक्ष का द्वार कहा गया है।

दान का महत्व—

गृहस्थ श्रावक को शक्ति के अनुसार उत्तम पात्रों के लिये दान देना चाहिये। क्योंकि दान के बिना गृहस्थाश्रम निष्फल ही माना गया है। जो गृहस्थ दिगम्बर मुनियों के लिये चार प्रकार का दान नहीं देते हैं उनको बंधन में रखने के लिये वे घर मानों जाल ही बनाये गये हैं। अभिप्राय यह है कि श्रावक घर में रहकर नित्य ही असि, मषि आदि रूप षट् कर्मों के द्वारा धन संचय करते हुये उसके निमित्त से अनेक प्रकार के पाप कर्मों का भी संचय करता ही रहता है। उससे छुटकारा पाने का— उस पाप को क्षालन करने का उपाय केवल दान ही है। सो यदि गृहस्थ पात्रदान नहीं करता है तो फिर उस गृहस्थ के लिये वह घर बंधन का ही कारण है। वह उस गृहस्थाश्रम में रहकर आगे संसार में ही परिभ्रमण करेगा।

जिस गृहस्थ के द्वारा अभय, आहार, औषध और शास्त्र का दान करने पर मुनियों को सुख उत्पन्न होता है वह गृहस्थ प्रशंसा का पात्र क्यों नहीं होगा ? अर्थात् वही गृहस्थ प्रशंसनीय है कि जिसने आहार आदि देकर मुनियों को सुखी किया है— रत्नत्रय के साधन में योग्य बनाया है। जो मनुष्य दान देने योग्य होकर भी मुनियों को भक्तिपूर्वक दान नहीं देता है वह मूर्ख परलोक में अपने सुख को स्वयं नष्ट करता है। दान से रहित गृहस्थाश्रम पत्थर की नाव के समान है। उस गृहस्थाश्रमरूपी पत्थर की नाव पर बैठने वाला मनुष्य संसार—रूपी समुन्द्र में डूबता ही है, इसमें संदेह नहीं हैं । जो मनुष्य अपनी योग्यता के अनुसार साधर्मी जनों से प्रेम नहीं करते हैं वे धर्म से विमुख होकर अपनी आत्मा को बहुत पाप से आच्छादित कर लेते हैं। तात्पर्य यही है कि साधर्मी जनों को देखकर जिसके हृदय में निसर्गत: प्रेम—भाव उमड़ आता है वह वात्सल्य धर्म का प्रेमी है उसके सभी गुण वृद्धिंगत होते रहते हैं। तथा जिनके हृदय में वात्सल्य भाव—धर्म प्रेम नहीं है, धर्मात्मा को देखकर उपेक्षा भाव अथवा अरुचिभाव करते हैं उनके हृदय में अवगुणों का वास हो जाता है। अत: वात्सल्य भाव से आत्मा को गुणी बनाना चाहिये।

जीवदया—

जनेंद्रदेव के उपदेश से करुणारसरूपी अमृत से परिपूर्ण जिन मनुष्यों के हृदय में जीव—दया नहीं है उनके पास धर्म कहाँ से रह सकता है ? अर्थात् जीवदया के बिना धर्म का अंश भी नहीं है। ‘जीवादया’ यह धर्मरूपी वृक्ष की जड़ है, व्रतों में मुख्य है, संपत्तियों का स्थान है और गुणों का भण्डार है इसलिये विवेकीजनों को इस जीवदया को अवश्य ही करना चाहिये। मनुष्य में सर्व ही गुण जीवदया के आश्रय से इस प्रकार रहते हैं कि जिस प्रकार पुष्पों की लड़ियाँ सूत के आश्रय से रहती हैं। मतलब जिस प्रकार फूलों के हारों की लड़ियाँ धागे के आश्रय से ही रहती हैं। उसी प्रकार समस्त गुणों का समुद्र जीवों की दयारूपी अहिंसा धर्म अक्षय से ही रहती है। यदि माला के मध्य का धागा टूट जाता है तो जिस प्रकार से उसके सब फूल बिखर जाते हैं उसी प्रकार निर्दयी मनुष्य के सब गुण भी दया के अभाव में नष्ट हो जाते हैं। अतएव सम्यग्दर्शन आदि गुणों के अभिलाषी मनुष्य को सभी प्राणी में करुणाभाव रखना चाहिये। जिनेंद्रदेव ने मुनियों और श्रावकों के सभी व्रत एकमात्र अहिंसा धर्म की सिद्धि के लिये ही बतलाये हैं। जीवों को केवल अन्य प्राणियों को कष्ट देने से ही पाप नहीं होता है प्रत्युत प्राणी की हिंसा आदि के विचारमात्र से भी आत्मा के दूषित हो जाने पर पाप का बंध हो जाता है। मतलब, दूसरे जीवों का घात हो या न हो किंतु उनके मारने के भाव भी यदि मन में आ गये तो भी पाप का बंध हो जाता है।

अनुप्रेक्षा—

महापुरुषों को निरंतर बारह अनुप्रेक्षाओं का चिंतवन करते रहना चाहिये। क्योंकि, यह अनुप्रेक्षाओं की भावना कर्म के क्षय के लिये कारण होती है। अध्रुव — अनित्य, अशरण,संसार,एकत्व, अन्यत्व, अशुचित्व, आस्रव , संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म, श्री जिनेंद्र भगवान् के द्वारा ये बारह अनुप्रेक्षायें कही गई हैं। इन्हें बारह भावना भी कहते हैं चूँकि इन्हें बार—बार भाते रहने से संसार, शरीर और भोगों से वैराग्य उत्पन्न होता है तथा धर्म में प्रेम बढ़ता है।

अध्रुव भावना — प्राणियों के शरीर आदि सब नश्वर हैं। इसलिये इनके नष्ट हो जाने पर भी शोक नहीं करना चाहिये। क्योंकि, यह शोक पाप बंध का कारण है। इस प्रकार से बार—बार विचार करने का नाम अध्रुव भावना है।

अशरण भावना — जिस प्रकार निर्जन वन में मृग के बच्चे को यदि सिंह पकड़ लेवे तो उसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है, उसी प्रकार से आपत्ति या मरण के आने पर इस जीव की रक्षा करने वाला भी इस संसार में कोई नहीं है। इस प्रकार का विचार करना अशरण भावना है।

संसार भावना — संसार में जो सुख है वह सुख का आभासमात्र है— यथार्थ सुख नहीं है, परन्तु जो दु:ख है वह वास्तविक है सदा काल रहने वाला है। सच्चा सुख तो मोक्ष में ही है। इसलिये हे भव्यजीवों ! उसे ही सिद्ध करना चाहिये। इस प्रकार से संसार के स्वरूप का चिंतवन करना संसार भावना है।

एकत्व भावना — कोई भी प्राणी वास्तव में न तो स्वजन है और न पर ही है। जीव ने जो पूर्व में कर्म बाँधा है उसको ही वह केवल अकेला भोगने वाला है। इस प्रकार बार—बार विचार करना एकत्व भावना है।

अन्यत्व भावना — जब दूध और पानी के समान एकमेक होकर एक ही स्थान पर रहने वाले शरीर और जीव में भेद है तब प्रत्यक्ष में ही अपने से भिन्न दिखने वाले स्त्री, पुत्र आदि के विषय में भला क्या कहा जावे ? वे तो जीव से भिन्न हैं ही हैं। इस प्रकार विचार करना अन्यत्व भावना है।

अशुचित्व भावना — क्षुद्र कीड़ों से, रस— रुधिर आदि धातुओं से तथा मल से भरा हुआ यह शरीर ऐसा अपवित्र है कि उसके ही संबंध से दूसरी पुष्पमाला आदि वस्तुयें भी अपवित्र हो जाती हैं। इस प्रकार से शरीर के स्वरूप का विचार करना अशुचि भावना है।

आस्रव भावना — संसाररूपी समुद्र में मिथ्यात्वरूपी छिद्रों से संयुक्त जीवरूपी नाव भ्रम के कारण बहुत काल से आत्मविनाश के लिये कर्मरूपी जल को ग्रहण करती है। जिस प्रकार छेदसहित नाव घूमकर छेदों के द्वारा जल को ग्रहण करके अंत में समुद्र में डूबकर अपने को नष्ट कर देती है। उसी प्रकार यह जीव भी संसार में परिभ्रमण करता हुआ मिथ्यात्व आदि के द्वारा कर्मों का आस्रव करके इसी दु:खमय संसार में घूमता रहता है। अत: दु:ख का कारण कर्मों का आस्रव ही है ऐसा समझकर उसे छोड़ना चाहिये। ऐसा विचार बार—बार करना आस्रव भावना है।

संवर भावना — कर्मों के आस्रव को रोकना ही संवर है। इस संवर का साक्षात् अनुष्ठान मन वचन काय की अशुभ प्रवृत्ति को रोक देना ही है। अर्थात् जिन मिथ्यात्व, अविरति, कषाय आदि परिणामों के द्वारा कर्म आते हैं उन्हें आस्रव और उनके रोकने को संवर कहा जाता है। आस्रव जहाँ संसार का कारण है वहाँ संवर मोक्ष का कारण है। इसीलिये आस्रव हेय और संवर उपादेय है। इस प्रकार संवर के स्वरूप का विचार करना संवर भावना है।

निर्जरा भावना — पूर्वसंचित कर्मों को धीरे—धीरे नष्ट करना निर्जरा है। वह वैराग्य के आलंबन से किये गये बहुत से तपों के द्वारा होती है। इस प्रकार निर्जरा के स्वरूप का विचार करना, निर्जरा भावना है।

लोक भावना — यह लोक सर्वत्र विनाशशील, अनित्य और दु:खदायी है। इसीलिये विवेकी जनों को अपनी बुद्धि मोक्ष के विषय में लगानी चाहिये। अथवा यह लोक चौदह राजू ऊँचा है, अनादिनिधन है, इसका कोई कर्ता—धर्ता नहीं है, इसके ऊध्र्व, मध्य और अधोलोक की अपेक्षा तीन भेद हैं। तीनों लोकों का विचार करना—कहाँ स्वर्ग है ? कहाँ नरक है ? कहाँ—कहाँ तक मनुष्य हैं ? और कहाँ—कहाँ पर तिर्यंच हैं ? जंबूद्वीप, धातकीखण्ड आदि द्वीप समुद्रों का विचार करना तथा यह जीव इस लोक में अनाद्रिकाल से भ्रमण कर रहा है। आज तक भी सुखी नहीं हुआ है। सुख केवल मोक्ष स्थान को प्राप्त कर लेने में ही है। इत्यादि विचार करना लोक भावना है।

बोधिदुर्लभ भावना — सम्यग्दर्शन रत्नत्रय की प्राप्ति का नाम बोधि है। यह बहुत ही दुर्लभ है। यदि वह किसी प्रकार से प्राप्त हो जाती है तो फिर उसके विषय में महान् प्रयत्न करना चाहिये। इस प्रकार इस बोधि की दुर्लभता का बार—बार विचार करना बोधिदुर्लभ भावना है।

धर्म भावना — संसारी प्राणियों के लिये यह जैनधर्म अत्यंत दुर्लभ माना गया है। इस धर्म को इस तरह ग्रहण करना चाहिये कि जिससे वह साक्षात् मोक्ष के प्राप्त होने तक साथ में ही जावे। विद्वान् पुरुष दु:खरूपी हिंसक जलजंतुओं से भरे हुये इस संसाररूपी खारे समुद्र से पार होने के लिये धर्मरूपी नाव को ही उत्कृष्ट बतलाते हैं। इस प्रकार से धर्म के स्वरूप का विचार करना, धर्म भावना है।

सज्जनों के द्वारा सदा हृदय में धारण की गर्इं ये बारह अनुप्रेक्षायें उस उत्कृष्ट पुण्य को करती हैं जो कि स्वर्ग और मोक्ष का कारण होता है। जिस धर्म में उत्तम क्षमा सबसे पहले है तथा जो दश भेदों से संयुक्त है, श्रावकों को अपनी शक्ति और आगम के अनुसार उस धर्म का सेवन करना चाहिये। अभ्यंतर तत्त्व कर्मकलंक से रहित विशुद्ध आत्मा है तथा बाह्य तत्व प्राणियों के विषय में दयाभाव है। इन दोनों के मिलने पर मोक्ष होता है। इसलिये इन दोनों का आश्रय लेना चाहिये। जो चैतन्य स्वरूप आत्मा कर्मों तथा उनके कार्यभूत रागादि विभावों से भिन्न है और शरीर आदि से भी भिन्न है। उस आत्मा का सदा विचार करना चाहिये, क्योंकि वह आतमा ही शाश्वतिक आनंदस्वरूप जो मोक्षपद है उसे प्रदान करने वाली है। अर्थात इस आत्म तत्व के चिंतन से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रकार इस ‘उपासक संस्कार’ नाम के श्रावकाचार को श्रीपद्मनंदि मुनि[६] ने कहा है। जो मनुष्य इसका आचरण करते हैं उनको अत्यंत निर्मल धर्म होता है। क्योंकि श्रावक धर्म भी धर्म है, मुक्ति का मार्ग है। श्रावक मुनियों की उपासना करते हैं इसलिये उन्हें ‘उपासक’ कहा गया है। अतएव उन श्रावक के धर्म को यहाँ ‘उपासक संस्कार’ या ‘उपासक धर्म’ कहा है।

टिप्पणी

  1. . संप्रत्यत्र कलौ काले जिनगेहे मुनिस्थिति: । धर्मश्च दानमित्येषां श्रावका मूलकारणम् ।।६।।।
  2. देवपूजा गुरुपास्ति: स्वाध्याय: संयमस्तप: । दानं चेति गृहस्थानां षट् कर्माणि दिने दिने।।७।।
  3. ये गुरुं नैव मन्यन्ते तदुपास्तिं न कुर्वते। अन्धकारो भवेत्तेषामुदितेऽपि दिवाकरे।।१९।। (पद्मनंदिपच्चीसी)
  4. मद्यपलमधुनिशाशनपंचफलीविरतिपंचकाप्तनुति: । जीवदयाजलागालनमिति च क्वचिदष्टमूलगुणा:।। (सागारधर्मामृत)
  5. तं देशं तं नरं तत्स्वं तत्कर्माणि च नाश्रयेत् । मलिनं दर्शनं येन च व्रतखण्डनम् ।।२६।।
  6. पद्मनंदिपंवविशतिका, अध्याय ६ ।