ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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ऋषभदेव चालीसा

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ऋषभदेव चालीसा

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-दोहा-
सिद्धप्रभू को नमन कर, सिद्ध करूँ सब काम।
अरिहन्तों के नमन से, पाऊँ आतम धाम।।१।।
पंचकल्याणक से सहित, तीर्थंकर अरिहन्त।
अष्टकर्म को नष्ट कर, बने सिद्ध भगवन्त।।२।।
उनमें ही प्रभु ऋषभ का, चालीसा सुखकार।
पढ़ो सुनो सब भव्यजन, हो जाओ भव पार।।३।।
-चौपाई-
जय हो आदिनाथ परमेश्वर, जय हो ब्रह्मा विष्णु महेश्वर।।१।।
हो जयवंत अयोध्या तीरथ, जिनवर जन्मभूमि की कीरत।।२।।
सुषमादुषमा तृतिय काल था, भोगभूमि का भी प्रयाण था।।३।।
नाभिराय अंतिम कुलकर थे, कर्मभूमि के वे कुलधर थे।।४।।
सर्वप्रथम इन्द्रों ने आकर, नाभिराय का ब्याह रचाकर।।५।।
कर्मभूमि प्रारंभ किया था, नगरी में आनन्द किया था।।६।।
शुभ विवाह की परम्परा यह, चली तभी से इस धरती पर।।७।।
राजमहल सर्वतोभद्र था, इक्यासी खन का सुन्दर था।।८।।
नाभिराय के उसी महल में, मरुदेवी माँ के आंगन में।।९।।
रत्नवृष्टि की थी कुबेर ने, पन्द्रह महिने तक धनेश ने।।१०।।
थी आषाढ़ वदी दुतिया तिथि, मरुदेवी के गर्भ बसे प्रभु।।११।।
चैत्र कृष्ण नवमी शुभ तिथि में, आदिनाथ तीर्थंकर जन्मे।।१२।।
तीन लोक में शांति छा गई, अवध में नूतन क्रान्ति आ गई।।१३।।
देवों के संग खेल खेलकर, बड़े हो गये ऋषभ जिनेश्वर।।१४।।
स्वर्गों से ही भोजन आता, समझ नियोग दुखी नहिं माता।।१५।।
यौवन में प्रभु ब्याह रचाया, यशस्वती व सुनन्दा पाया।।१६।।
इक सौ एक पुत्र दो पुत्री, उनमें प्रथम भरत थे चक्री।।१७।।
जिनसे भारत देश कहाया, छह: खण्डों में ध्वज लहराया।।१८।।
इक दिन ऋषभदेव की सभा में, नृत्य दिखाया नीलांजना ने।।१९।।
जग वैभव असार बतलाया, प्रभु के मन वैराग्य समाया।।२०।।
वह भी चैत्र कृष्ण नवमी थी, जब जिनवर ने दीक्षा ली थी।।२१।।
वह नगरी प्रयाग कहलाई, वटतरुतल प्रभु दीक्षा पाई।।२२।।
एक वर्ष उनतालिस दिन में, प्रथम आहार हस्तिनापुर में।।२३।।
सोमप्रभ श्रेयांस महल में, पंचाश्चर्य रतन बरसे थे।।२४।।
अक्षय तृतिया पर्व तभी से, मना रहे सब लोग खुशी से।।२५।।
एक हजार वर्ष तक तप कर, आत्मा में कैवल्य प्रगट कर।।२६।।
समवसरण लक्ष्मी को पाया, जग को मोक्षमार्ग बतलाया।।२७।।
वह थी फाल्गुन वदि ग्यारस तिथि, केवलज्ञान कल्याणक शुभ तिथि।।२८।।
पुरिमतालपुर के उद्यान में, समवसरण में मुनि प्रधान थे।।२९।।
अष्टापद गिरि पर जा करके, योग निरोध किया जिनवर ने।।३०।।
माघ कृष्ण चौदस शुभ तिथि में, कर्म अघाती नष्ट किए थे।।३१।।
मोक्षधाम को प्राप्त कर लिया, शिवलक्ष्मी का वरण कर लिया।।३२।।
सब पुत्रों ने दीक्षा लेकर, प्राप्त किया शिवधाम हितंकर।।३३।।
ब्राह्मी-सुंदरी बनीं आर्यिका, गणिनी पद की प्रथम धारिका।।३४।।
यह सब है इतिहास पुराना, वर्तमान को है बतलाना।।३५।।
गणिनी माता ज्ञानमती की, प्रबल प्रेरणा प्राप्त हो गई।।३६।।
ऋषभदेव प्रभु का जन्मोत्सव, खूब मनाओ महामहोत्सव।।३७।।
जैनधर्म प्राकृतिक बताओ, सार्वभौम सिद्धांत सुनाओ।।३८।।
और नहीं मैं कुछ भी चाहूँ, जनम जनम प्रभु दर्शन पाऊँ।।३९।।
मेरी आतम निधि मिल जावे, निज गुण कीर्ति ध्वजा फहराए।।४०।।
-दोहा-
दुतिया कृष्ण अषाढ़ की, कृति चालीसा ख्यात।
वीर संवत पच्चीस सौ, तेइस तिथि विख्यात।।१।।
अज्ञ आर्यिका चन्दना- मती रचित गुणगान।
मुझमें गुण विकसित करें, दे त्रयरत्न महान।।२।।
चालीस दिन तक जो करे, यह चालीसा पाठ।
तन मन पावन वो करे, लहे जगत का ठाठ।।३।।