ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं साधुसमाधि भावनायै नमः"

ऋषभदेव प्रभु को है मेरा

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ऋषभदेव प्रभु को है, मेरा नमन

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तर्ज-बहुत प्यार.......

ऋषभदेव प्रभु को है, मेरा नमन।

चरण में समर्पित-२, हैं भक्ती सुमन।।ऋषभेदव.।।टेक.।।

मरुदेवी माता के घर, रत्न खूब बरसे।

अयोध्यापुरी में पिता, नाभिराय हरषे।।

चैत्र वदी नवमी को-२, हुआ प्रभु जनम।।ऋषभेदव.।।१।।

इस युग के आदिब्रह्मा, ऋषभदेव स्वामी हैं।

पुरुदेव तीर्थंकर की, पदवी से नामी हैं।।

अवध की प्रजा व धरती-२, हुई धन्य धन।।ऋषभेदव.।।२।।

राजसुख को भोग उसको, त्याग दिया क्षण में।

बनकर के जिनवर राजे, समवसरण में।।

‘‘चंदनामती’’ वे अपने, आप मे मगन।।ऋषभेदव.।।३।।

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