ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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प्रथामाचार्य श्री शांतिसागर महाराज की 62 वीं पुण्यतिथि (श्रावण शुक्ला दुतिया) 23 अगस्त को मुंबई के जैनम हाल में पूज्य गणिनी ज्ञानमती माता जी के सानिध्य में मनायी जाएगी जैन धर्मावलंबी अपने-अपने नगरों में विशेष रूप से इस पुण्यतिथि को मनाकर सातिशय पुण्य का बंध करें|
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इस मंत्र की जाप्य दो दिन 22 और 23 तारीख को करे |

सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं साधुसमाधि भावनायै नमः"

ऋषभशासन जयंती व्रत

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ऋषभशासन जयंती व्रत

युगादि ब्रह्मा भगवान ऋषभदेव को प्रयाग में वटवृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्णा एकादशी को केवलज्ञान प्रगट हुआ था। उसी क्षण सौधर्मेन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने आकाश में दिव्य समवसरण की रचना की थी। पुरिमतालपुर के राजा-भगवान ऋषभदेव के तृतीय पुत्र ‘‘ऋषभसेन’’ ने उसी क्षण भगवान ऋषभदेव के समवसरण में आकर जैनेश्वरी दीक्षा लेकर प्रथम गणधर पद को प्राप्त किया था। उसी दिन प्रभु ऋषभदेव की पुत्री ब्राह्मी-सुन्दरी ने आर्यिका दीक्षा लेकर प्रथम पुत्री ब्राह्मी ने आर्यिकाओं में गणिनी पद को प्राप्त किया था।

उसी दिन प्रभु ऋषभदेव की दिव्यध्वनि खिरी थी तथा उसी दिन दिव्यध्वनि से मुनिधर्म और श्रावकधर्मरूप मोक्षमार्ग का उद्भव हुआ था अत: यह ‘फाल्गुन कृ. एकादशी’ ऋषभ शासन जयंती पर्व तो है ही, मोक्षमार्ग उद्भव’ दिवस भी है क्योंकि प्रभु ने दीक्षा से पूर्व गृहस्थाश्रम में असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन षट्क्रियाओं का उपदेश देकर प्रजा को जीने की कला सिखाई थी, राजनीति का भी उपदेश दिया था एवं संपूर्ण विद्याओं को अपनी पुत्री ब्राह्मी-सुन्दरी को पढ़ाकर सभी एक सौ एक पुत्रों को भी सर्व विद्या और कलाएँ सिखाई थीं किन्तु मोक्षमार्ग का उपदेश दिव्य केवली अवस्था में ही दिया था अत: यह विशेष ही महत्वपूर्ण तिथि है।

व्रत की विधि-फाल्गुन कृष्णा एकादशी को व्रत करके मंदिर में भगवान ऋषभदेव का अभिषेक करके प्रभु की पूजा करें और समवसरण विधान या ऋषभदेव विधान का अनुष्ठान करें पुन: निम्न मंत्र का जाप्य करें-

जाप्य-ॐ ह्रीं अर्हं गोमुखयक्ष चक्रेश्वरी यक्षी सहिताय श्री ऋषभदेव तीर्थंकराय नम:।

(सुगंधित पुष्पों से १०८ बार मंत्र जपें)

पुन: चौरासी गणधर देवों को अर्घ्य चढ़ावें, पूजा करें, सरस्वती की पूजा और गुरुपूजा करके यक्ष-यक्षी की आराधना सम्पन्न करें। इस प्रकार ११ वर्ष तक यह व्रत करके उद्यापन करें। उद्यापन में प्रयाग तीर्थ पर पहुँचकर ऋषभदेव विधान या समवसरण विधान करके ‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली’ पर समवसरण में विराजमान भगवन्तों का महाभिषेक करें।११-११ उपकरण मंदिरों में भेंट करें, चतुर्विध संघ को आहार, औषधि आदि चार प्रकार का दान देवें तथा कोई धार्मिक ग्रंथ प्रकाशित करवाकर वितरित करें। उद्यापन पूर्ण करें। यह व्रत करने वाले नियम से मोक्षमार्ग को प्राप्त कर परम्परा से मोक्ष को अवश्य ही प्राप्त करेंगे। इससे पूर्व संसार में रहते हुए पुत्र, पौत्र, धन, धान्य आदि सुखों का अनुभव करते हुए अनंत सौख्य पद को प्राप्त करने में समर्थ हो जावेंगे।