ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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एकांत :

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एकांत :

णाणं किरियारहियं, किरियामेत्तं च दोवि एगंता।
—सन्मतिप्रकरण : ३-६८

क्रियाशून्य ज्ञान और ज्ञानशून्य क्रिया, दोनों ही एकांत हैं। अर्थात् जैन दर्शन सम्मत नहीं है।