ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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एक चिट्ठी अपनी बहनों के लिए

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एक चिट्ठी अपनी बहनों के लिए

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मेरी प्यारी बहनो,

बहुत सारा आत्मीय प्रेम

कुछ कहना चाहता हूँ इसलिए नहीं कि मुझे कहना है, बल्कि इसलिए क्योंकि तुम्हें जरूरत है और दुर्भाग्य तो यह है कि तुम जानती भी नहीं कि तुम्हें इन बातों की जरूरत है। कई बार सोचा कहूँ तुमसे ? पर सच कहूँ तो तुम्हारे अंदर की योग्यता मुझे तुम्हें यह सब बताने के लिए प्रेरित करती है। शायद जिन्दगी में ऐसी बातें फिर कोई नहीं कहेगा। हाँ गिराने वाले तो बहुत मिलेंगे, पर उठाने वाले बहुत कम इसलिए इन बातों को बहुत ध्यान से पढ़ना।

तुम स्त्री हो, कन्या हो, सबला नारी हो, माँ—बहन हो पुरुष के संसार को पूर्ण कर देने वाली अद्र्धांगिनी हो सकती हो। तुम्हें सौभाग्य मिला है इस सृष्टि की व्यवस्था में मानवों को अपनी कोख का आधार देने का। अत: जननी हो तुम, तुम्हारी ममता बंजर भूमि को भी हरा—भरा करने का सामथ्र्य रखती है। परन्तु ये क्या हो गया है तुम्हें ? माँ जननी का यह आदर्श स्वरूप किस रूप में दुनिया के सामने आ रहा है ?

पता है ? तुम तो अब रोज आत्महत्या कर रही हो। पर रेल पटरी के नीचे आत्महत्या करने वालों की और सल्फास खाकर या मिट्टी के तेल से जलकर आत्महत्या करने वालों की यहाँ पर बात नहीं। यहाँ उन लोगों की बात है जो खाते–पीते खेलते हुए हजारों—लाखों की संख्या में कतार लगाकर खड़ी हैं आत्महत्या करने और कमाल की बात तो यह है कि इस आत्महत्या में तुम मर नहीं रही हो तुम्हारे जीवन में जैसा कुछ नहीं बच रहा है। क्या तरीका है आत्महत्या करने का क्योंकि तुम शील की हत्या कर रही हो। माँ—बाप की जीवनभर की कमाई इज्जत की हत्या कर रही हो। सेना है—

``If wealth is lost, nothing is lost,

If health is lost, something is lost,

but if charactor is lost, everything is lost.

मैंने सुना है युगों—युगों पहले एक सती हुई है सीता और उनके पति हुए मर्यादा पुरुषोत्तम राम। रावण की दृष्टि सीता पर पड़ी, पर वह जानता था सती है, मैं इस छू नहीं सकता वरना भस्म हो जाऊँगा। इसके शील के प्रताप से। उसने तिलिस्म रचा। राम—लक्ष्मण चेतावनी देकर चले गए, वासना के हिरण पर मोहित होकर और हरण हो गया सीता का। पर मैं पूछना चाहता हूँ कि ‘क्या यह रावण का साहस था अपहरण का या था ‘सीता कहा दुस्साहस ? हाँ ! यह सीता का दुस्साहस था। यदि वह मर्यादा की लक्ष्मण रेखा नहीं लांघती तो किसी रावण का साहस नहीं कि वह सीता की ओर नजर उठाकर भी देख सके। अपहरण होने के बाद भी रावण सीता के साथ जबरदस्ती न कर सका। पता है तुम्हें एक घास का टुकड़ा उसकी रक्षा के लिए शस्त्र बन गया था। मात्र शील व्रत के कारण।

तुम भी अपनी मर्यादा पार कर रही हो। कहाँ तो शील, संकोच, शालीनता तुम्हारा आभूषण कहा जाता था, कहाँ तुमने पुरुषों के कंधों से कंधा मिलाकर चलने की चाह में अपने शील रूपी गहने को गिरवी रख दिया। तुम्हारा पहनावा, तुम्हारा व्यवहार सब कुछ पतन की ओर जा रहा है। ध्यान रखना जिस दिये के चारों ओर काँच का अवरण नहीं होता वह बहुत शीघ्र ही बुझ जाता है। तुम्हारे साथ भी यही हो रहा है। स्त्री समानता को आधार बनाकर तुम अपनी मर्यादा, वर्जनाओं को तोड़ रही हो। पहनावा जींस—टी शर्ट, हाथ में मोबाइल, उन्मुक्त व्यवहार, स्वच्छंद विचरण, इंटरनेट का दुरुपयोग अजीब सा दृश्य दिख रहा है।

शायद इसीलिए तो आजकल सुनाई दे रहा है—‘आने वाली पीढ़ियाँ माँ के आँचल का सुख नहीं देख पाएँगी, भला, जींस, टी—शर्ट पहनने वाली लड़कियाँ माँ का आँचल कहाँ से लाएँगी।’

क्या तुमने कभी अपने भाई या पिता को पूछा कि तुम्हें ऐसे कपड़ों में देखकर उनके भाव वैâसे होते हैं ? सच—सच ! दिल पर हाथ रखवाकर पूछना। हाँ बहन ! वासना रिश्ते नहीं देखती, वासना अपनी र्पूित का साधन देखती है और सावधान रहना इन पुरुषों से क्योंकि ये पुरुष दोहरी मानसिकता वाले होते हैं। इन्हें गर्ल प्रेंड तो चााहए फैशनेबल, आधुनिक और बोल्ड लेकिन पत्नी चाहिए सती—सावित्री सीता जैसी। वो ऐसी ही लड़कियों का दुरुपयोग करते हैं जिन्हें आधुनिकता ने अंधा कर दिया है किन्तु जीवन साथी के रूप में मर्यादित शीलवती कन्या चाहता है। सोचो तुम ऐसे दोगले इंसान के लिए अपने शील—रूपी धन से समझौता कर रही हो। सोचना जरा कि जिन माता—पिता ने अपनी सारी खुशियाँ तुम्हें सौंप दी, तुम उन माता—पिता के वर्षों के नि:स्वार्थ प्रेम को छोड़कर, धोखा देकर रात में भी पुरुष मित्रों से बात कर रही हो। उन्होंने विश्वास करके दुनिया की परवाह किए बिना तुम्हें एक बेटे जैसी सुविधा दी, पर तुमने उन्हें क्या दिया, सिर्फ जिल्लत, बेइज्जती, धोखा। बेटी भूलना नहीं—

To every action there is equal and opposite reaction.

तुम अपने माता—पिता को धोखा नहीं दे रही बल्कि तुम अपने आपको धोखा दे रही हो। क्या मतलब अगर तुम सारी दुनिया को पा लो, मगर अपनी नैतिकता, पवित्रता, शील को खो दो ? क्योंकि

If character is light and then love / friendship / entertainment is like its shadow. If you'll follow the shadow, you will miss the light.

जिस वातावरण में तुम शिक्षा प्राप्त कर रही हो वह वातावरण खराब है, मैं तुम्हें खराब नहीं कह रहा, पर कहते हैं—‘आग के समीप मोम का पिघल जाना निश्चित है। ढलान में पानी का बहना निश्चित है। हवा से दीपक का बुझना सुनिश्चित है। गर्मी की धूप में पानी की बूँद का सूख जाना भी निश्चित है ऐसे ही गलत साथ। गलत निमित्त मिलने पर मन में भरी वासनाओं का भड़क जाना निश्चित है।

एक गाँव में मन्दिर—मरघट दोनों होते, बगीचा भी और कूड़ा—करकट का ढेर भी होता है, पर चुनना तो तुम्हें ही है ना। हाँ अच्छे लोगों का साथ पाकर आत्मा पवित्र बन जाती है। जबकि बुरे लोगों का साथ पाकर आत्मा पतित—पापी बन जाती है। मैंने देखा है देश की शीर्ष महिला प्रतिभा पाटिल को, कभी साड़ी का पल्लू सिर से नहीं फिसला। देखा है उन्हें, सोनिया गाँधी जो विदेशी हैं मगर भारतीय परिधान ही पहचान है उनकी। मैंने सुना है झांसी की रानी के बारे में, जिन्होंने युद्ध के दौरान भी कभी अपनी स्त्रीयोचित मर्यादा को नहीं छोड़ा। सोचना।

सुख—शांति सफलता क्या पहनावे की मोहताज है ? नहीं। किन्तु जिसने अपने संस्कारों को संभाला, मर्यादाओं को समझा वे ही संतुष्ट हैं, सफल हैं, सुखी हैं।

बहन ! याद रखना पानी कभी पत्थर नहीं बन सकता, लोहा सोना नहीं बन सकता, कागज कभी रत्न नहीं बन सकता परन्तु तुम ! तुम जो चाहो वो बन सकती हो ?

‘बंदर चंचल होता है, उस पर बिच्छू काट ले तो वह पागल ही हो जाए और शराब पिला दो तो तूफान ला दे, बिल्कुल ऐसा ही तुम्हारे साथ हो रहा है। एक तो जवानी, दूसरा स्वतंत्रता, तीसरा उन्मुक्त व्यवहार और साथ में बर्बादी के सामान मोबाइल, इंटरनेट, टी. वी. अब तो डूबना निश्चित है। कहते र्हैं Beauty lies in the eyes of beholder. सुन्दरता देखने वालों की आँखों में होती है, कपड़ों, सौंदर्य—प्रसाधनों में नहीं। सुन्दरता शील में है, मर्यादा में है। ध्यान रखना दूध में नींबू डालकर फाड़ना बहादुरी नहीं किन्तु जामन डालकर जमाने में है।

दीपक को फूक मारकर बुझाने में बहादुरी नहीं, बहादुरी तो बुझते दीपक को जला देने में है। गिराने के लिए नहीं किन्तु बनाने के लिए इंजीनियर की जरूरत होती है। बहन तुमने कौआ, हंस और बगुला देखा होगा न, कौआ अंदर बाहर दोनों तरफ से काला होता है। किन्तु बगुला बाहर सपेâद और अंदर काला। मगर मुझे पता है न तुम कौआ हो, न बगुला, तुम तो हंस हो, अंदर बाहर दोनों तरफ से सुन्दर।

‘अपनी मर्यादा में रहकर इस दुनिया को स्वर्ग बनाना तुम्हारे हाथ में है, क्योंकि तुम स्त्री हो, माँ हो, कन्या हो, सबला हो, बहन हो, प्रेम की प्रतिर्मूित हो, सृष्टि की जननी हो वेश्या नहीं। हाँ, जो बिना विवाह, पर पुरुष से संपर्क रखती है, माता—पिता को धोखा देकर रात—रात मोबाइल पर पर पुरुषों से बात करती है। गलत भाव रखती है। वह वेश्या के अलावा कुछ नहीं। क्योंकि शास्त्रों में स्त्री को थाली के समान कहा है। एक बार का भोजन उसे झूठा कर देता है और तुम ही कहो। भला झूठी थाली में भोजन कौन करना चाहेगा ? ये बातें हीरे से भी ज्यादा कीमती है। पर अंधे के लिए क्या हीरा और क्या पत्थर ? अब यह तुम्हारे ऊपर है तुम आदर की पात्र बनना चाहती हो या घृणा की।

बस अंत में एक प्रश्न का जवाब देना कि लोग चरण छूते हैं चेहरा क्यों नहीं ? चेहरा बाहरी सौंदर्य का और आचरण शील का प्रतीक है। सुन्दरता कभी श्री दुराचरण को ढंक नहीं सकती। पर अच्छा आचरण दुरुपता की र्पूित कर देता है । समाज, परिवार, धर्म को तुम अपने ऊपर नाज करने का मौका दो—न—दो। परन्तु तुम्हारे कारण इनका सिर न झुकने पाए।

‘तुम खुद के प्रति ईमानदार बनो’

बहन तुमने मुझे राखी बाँधी है, मैंने तुम्हें सच्ची बहन माना है, भाई–बहन का प्यार कभी कच्चा हो नहीं सकता। बॉयप्रेंड कभी सच्चा, तुम्हारा हो नहीं सकता। बहन जब मैं दुराचरण की ओर फिसलूँ तो तुम मुझे संभालना। फिर मैंने भी तो तुम्हें वचन दिया है तुम्हारी सुरक्षा का, अपने कर्तव्य को अच्छे से कर सकू तुम्हारा स्नेह पात्र बना रहूँ।


तुम्हारा अपना खास हितैषी एक भाई
पोरवाड जैन उद्घोष फरवरी २०१५