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एक दुकानदार ऐसा भी सामान लो, पैसा दो या न दो

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एक दुकानदार ऐसा भी सामान लो, पैसा दो या न दो

आजकल की दुकानदारी बहुत कोरी करारी हो चुकी है। खाने-पीने की दुकान से लेकर शोरूम और मॉल मेें खरीददारी का सीधा-सा नियम है, पहले बिल बनवाओ और फिर सामान लो।

खरीददारी अब बहुत ही सपाट-सी हो चुकी है। दुकानदार और ग्राहक के बीच कोई संंवाद या अपनापन नहीं बचा है। पुरानी दिल्ली और छोटे शहरों में खरीददारी करने का अब भी बहुत आनन्द है। दुकानदार प्रेम से बिठाते हैं, फिर पूछते हैंं क्या लोगे, पहले कुछ खाना-पीना फिर खरीददारी करना, मान-मनुहार और प्रेम के साथ खरीददारी अच्छी भी लगती है।

हम बच्चे थे तो हमारे कस्बे में कपड़ा बेचने वाले, महिलाओं को साज-श्रृँगार का सामान बेचने वाले, यहाँ तक कि सोना-चाँदी बेचने वाले भी आते थे। सभी महिलाएँ उनकी परमानेंट ग्राहक होती थी। पैसा जब चाहे दे दो। एक साथ दे दो, किस्तों में दे दो, कोई चिन्ता नहीं। उनके साथ एक अपनत्व का नाता रहता था।

अब वो जमाना बीत चुका है, लेकिन नोएडा की सुनहरी मार्केट के दुकानदार धर्मेन्द्र सिंह जी ने बचपन के वो दिन याद दिला दिए। धर्मेन्द्र सिंह हमारे बचपन के उन मोबाइल दुकानदारों से भी दस कदम आगे हैं। मेरा उनकी दुकान पर पहली बार तब जाना हुआ, जब हमने १९९९ में दिल्ली से नोएडा शिफ्ट किया। गृह प्रवेश के लिए पूजा के सामान की लिस्ट पंडितजी ने थमाई और दुकान का पता भी दिया। धर्मेन्द्र सिंह की दुकान पर पूजा का सारा सामान और धार्मिक पुस्तके मिलती हैं। उसके बाद तो जितनी पूजा हुई या जो भी पूजा का सामान चाहिए उन्हीं से लेते।

एक बार मेरी एक मित्र ने क्रिस्टल बॉल मँगवाई, वो लगभग दो हजार की थी। मैं इतने पैसे लेकर नहीं गयी थी। मैंने कहा कि बाद में दे दूँगी। उन्होंने बहुत निर्विकार भाव से कहा, अच्छा। थोड़ी हैरानी हुई कि एक बार भी नहीं पूछा कि कब दोगी। ज्यादा परिचय भी नहीं। जब मैं उनके दो हजार रूपये देने गयी तो दुकान पर उनका भाई था, मैंने उनके भाई को पैसे दे दिए।

अगली बार धर्मेन्द्र सिंह दुकान पर मिले, मैंने उनसे कहा- ‘‘भाई साहब वो दो हजार रूपया मैंने आपके भाई को दे दिया था।’’ धर्मेन्द्र जी के शांत चेहरे का भाव एकदम बदल गया। उन्होंने थोड़ी कड़ी आवाज में कहा- ‘‘मैंने आपसे पूछा कि आपने पैसे दिये या नहीं दिये, मैंने तोे माँगे भी नहीं।’’ मुझे बहुत हैरानी हुई, कैसा दुकानदार है। खैर मैं चुप रही।

धीरे-धीरे उनसे परिचय बढ़ता गया वो साधारण दुकानदार नहीं हैं। बहुत ज्ञान और ध्यान की बात करते हैं। धार्मिक विषयों पर चर्चा करते हैंं उनका चेहरा उनकी बातचीत और जीवनशैली राजपूतों जैसा भी नहीं है। स्वयं भी बहुत साधना करते हैं और साधना का तेज उनके चेहरे पर साफ दिखता है। आप उनकी दुकान से कितना भी सामान ले सकते हो, आपके पास पैसे हैं तो दे दो, नहीं है तो न दो। कब दोगे, वो आपसे नहीं पूछेंगे।

एक बार कुछ महिलाएं आर्इं। उन्होंने कहा कि अपने मुहल्ले के मंदिर के लिए उन्हें भगवान कृष्ण के लिए पोशाक चाहिए लेकिन अभी ये तय नहीं कि क्या और कितना लेना है, क्योंकि पूरी कमेटी देखकर पास करेगी। जन्माष्टमी का मौका था। उन्होंने दस-बारह पोशाके उठा लीं और चली गई। उनके जाने के बाद मैंने पूछा, त्यौहार के मौके पर आपने इतनी पोशाके ले जाने दीं, कोई एडवांस भी नहीं लिया, सिक्योरिटी भी नहीं ली। वो धीरे से मुस्करा कर बोले- भगवान के ही तो वस्त्र हैं। यदि कमेटी चुन कर अपने मनपसंद वस्त्र उन्हें पहना देगी तो मेरा क्या जाएगा। पैसे का क्या है, कभी भी आ जाएँगे। और वो महिलाएँ पहली बार धर्मेन्द्र जी की दुकार पर आई थीं।

नवरात्रों के अवसर पर एक बार मैं उनकी दुकान पर गयी। नवरात्र शुरू होने से पहले ही उनकी दुकान पर भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। कई बार लंबा इंतजार भी करना पड़ता है। उन्हें लिस्ट थमा कर हम इंतजार कर रहे थे। इसी बीच एक व्यक्ति आया, उसने धर्मेन्द्र जी को २१ हजार रूपये दिये और कहा- ‘‘माफ करना भाई सहाब, पिछले नवरात्र में दुर्गा पूजन के लिए आपसे २१ हजार रूपये का सामान ले गया था, लेकिन आने का समय ही नहीं मिला, अब लाया हूँ।’’ धर्मेन्द्र जी ने एक भी सवाल नहीं पूछा, उल्टा कहा, ‘‘अच्छा, मुझे याद नहीं’’ रूपये लिए और रख लिए। ये मेरे लिए एक और झटका था, मुझसे रहा नहीं गया। भीड़ छँटने के बाद मैंने पूछा, लोग हजारों का सामान ले जाते हैं और आप न याद रखते हैं और न तकादा करते हैं। उन्होंने उस दिन मुझे जो उत्तर दिया, वो बहुत ही दार्शनिक था- ‘देखिए, ये भगवान के सामान की दुकान है, जो सामान लेकर पैसे दे जाता है, उसका पुण्य, जो नहीं देता, मेरा पुण्य।’ इसके आगे मैं उनसे क्या सवाल करती। उन्होंने इतनी बड़ी बात कह दी। सही मायने में वो धार्मिक सामान की दुकान चलाते हैं। पूर्ण भाव से भगवान को समर्पित। आज सुनहरी मार्केट में उनकी पाँच दुकानें हैं। अब तो उन्होंने पूजा के सामान के अलग-अलग स्टोर बना दिए हैं। हमें नोएडा से दिल्ली शिफ्ट किए हुए सात साल हो गए हैं। आज भी पूजा का सामान धर्मेन्द्र जी की दुकान से ही आता है। कई बार तो मैं फोन करके सामान लिखवा देती हूँ तो वो मेरे फिल्मसिटी स्थित १६ सेक्टर (जी-न्यूज) के ऑफिस भिजवा देते हैं। पैसे माँगने का तो सवाल ही नहीं, कभी भी दूँ या ना दूँ। आजकल ऐसे लोग बहुत कम हैं।

जनभावना संदेश १५-२१ दिसम्बर २०१४