ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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एक राज

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एक राज

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धर्मपत्नियाँ अगर घर के सभी सदस्यों को अपनी मुट्ठी में बंद रखना चाहती हैं तो परिवार के सदस्यों को भोजन से पहले भजन करने की प्रेरणा जरूर दें, जिससे उनके जीवन में भजन और भोजन दोनों की अहमियत रह सके।

महाभारत में वर्णन आता है कि श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नि सत्यभामा को द्रोपदी के पास भेजा कि ‘जाओ और जाकर द्रोपदी से पूछो कि उसने अपने परिवार को अपनी मुट्ठी में कैसे बंद किया हुआ है? सब उसकी बात कैसे मानते हैं? ’ नारायण श्री कृष्ण के हुक्म से सत्यभामा द्रोपदी के पास गई और उससे पूछा ‘ आपने अपने परिवार को मुट्ठी में कैसे बंद किया ? कैसे आपका हुक्म सबके ऊपर चलता है ?’ द्रोपदी ने समझाया कि — ‘ मैं कुछ खास नहीं करती हूँ। बस, हर कार्य को पूजा समझकर करती हूँ । मेरा काम यह है कि घर के सारे काम समेटने के बाद, फिर सोने की तैयारी करती हूँ और घर में सबके उठने से पहले ही जाग जाती हूँ।

दूसरी बात मुझे सबकी कमजोरी पता है। सबके अच्छे —बुरे गुणों का पता है । इसलिए मैं सबके साथ आसानी से तालमेल बना लेती हूँ । कभी परस्पर तुलना नहीं करती।

तीसरी बात भोजन स्वादिष्ट तो हो लेकिन पौष्टिक तथा शरीर के लिए हानिकारक ना हो, इस बात का हमेशा ख्याल रखती हूँ । जाने से पहले पूजन और हवन की तैयारी कर देती हूँ। जिसे जब भी घर से बाहर जाना हो, पहले भक्ति करे उसके बाद घर से बाहर जाए क्योंकि पुरुष धर्म के प्रति लापरवाह होते हैं।

चौथी बात, घर से निकलने से पहले सबको भोजन करवाकर बाहर जाने देती हूँ । अगर घर से भोजन करके जायेंगे तो बाहर भी भोजन मिलेगा और जाते समय प्रसन्नता के साथ विदा करती हूँ । आते समय मुस्कुराकर अभिवादन करती हूँ। इसलिए सभी मेरी मुट्ठी में बंद हैं।’

यह सच भी है कि जो घर से निकलने के पहले भजन और भोजन करके निकलता है, उसे हर जगह मान—सम्मान और भोज्य सामग्री प्राप्त होती है। जो लड़—झगड़कर घर से बाहर जाता है, उसका बाहर भी दिनभर किसी ना किसी से झगड़ा होता रहता है। इसलिए हम पति से कटु शब्द ना बोलें । हमारा थोड़ा समझदारीपूर्ण व्यवहार हमारे जीवन में अमृत घोल देगा।

मगर आजकल घरों के हालात अलग हैं। कहने को पति—पत्नि दोनों एक साथ रहते हैं, एक छत के नीचे रहते हैं मगर दोनों के दिल कभी नहीं मिलते । हिन्दुस्तान, पाकिस्तान जैसे हालात आज घरों में बन रहे हैं। स्थिति तनावपूर्ण है, पर नियन्त्रण में है। यह नियन्त्रण कब खत्म हो जाए, किसी को नहीं मालूम। नियन्त्रण खत्म हो उससे पहले स्वयं को नियन्त्रित कर लेना चाहिए, जिससे खुशहाल गृहस्थी तबाह होने से बच जाए। पति—पत्नी ही अगर एक—दूसरे की भावनाओं की कद्र नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा ? क्योंकि कब क्या हो जाए, किसी को खबर नहीं। इसलिए हमेशा सावधान होकर जीने की आवश्यकता है। वर्तमान भौतिकवादी युग में पंच सितारा संस्कृति के इस मकड़जाल से बचने के लिए आपसी सामंजस्य और आपसी विश्वास होना बहुत जरूरी है।

(दि. जैन महासमिति पत्रिका )
जुलाई २०१४