ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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ऐसी मीठी कुछ नहीं जैसी मीठी चुप

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ऐसी मीठी कुछ नहीं जैसी मीठी चुप

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उषा पाटनी
बालू जैसी करकरी, ऊजल जैसी धूप ।

ऐसी मीठी कछु नहीं, जैसी मीठी चुप ।।

उपदेशात्मक रूप में लिखी गई उक्त पंक्तियाँ सिर्पक पढ़ने या गाने की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं अपितु हमारे जीवन को सुखमय, शांतिमय बनाने का अद्भूत नुस्खा भी है। इंग्लैण्ड के एक उत्तम विचारक एच.जी. वेल्से ने अपनी आत्मकथा में लिखा है— ‘‘जो लोग चुप रहना सीख जाते हैं और जरूरत पड़ने पर उतना ही बोलतें हैं जितना आवश्यक है तो उनका जीवन उन व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक सुखी होता है जो बिना बात के भी उचित—अनुचित का विचार किये बोलने की आदत से लाचार हैं। ’’ जैसा कि पहले हुआ करता था कि जब लोग तार ऑफिस में टेलीग्राम करने जाते थे तो एक भी शब्द ज्यादा ना लिखने का ध्यान रखते थे क्योंकि तब शब्द/अक्षर की संख्यानुसार ही पेमेण्ट करना होता था। इसी तरह हमें भी अपनी जिंदगी में शब्दों का प्रयोग करते समय मितव्ययी और सजग रहना चाहिए। एक आध्यात्मिक सर्वे में भी पाया गया है कि व्यक्ति दिन भर में ८०ज्ञ् ऐसी बातें बोलता है या करता है जिसका करना जरूरी नहीं होता। मात्र औपचारिकता अथवा शांत ना रह पाने की असमर्थता के कारण ही वाणी—ाqवलास चलता रहता है। प्राय: देखने में आता है कि घर में पति—पत्नि, सास—बहू, देरानी—जेठानी, ननद—भौजाई, अड़ौस—पडौस या समाज, समुदाय में छोटी—छोटी बातों को लेकर आवश्यक रूप से टिप्पणी करने या बात की गहराई में गये बिना ही बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देने के कारण ही झगड़े हो जाते हैं, आपसी तनाव पैदा हो जाता है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत के उस प्रसंग में देखने में आता है जब द्रोपदी ने दुर्योधन से कहा— ‘‘अंधे की संतान भी अंधी’’ और इसी कड़वे वचन पूर्ण वाक्य ने महाभारत के युद्ध जैसी घटना को जन्म दिया।

वर्तमान परिदृश्य में जब हम समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़कर अथवा टी.वी.चैनलों पर राजनेताओं अथवा धर्माधिकारियों अथवा सामाजिक संगठनों के प्रमुखों के मध्य विकासोन्मुख योजना के बारे में सुनने की अपेक्षा एक दूसरे पर आरोप—प्रत्यारोप, तू—तू, मैं—मैं के शोर के मध्य अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करते देखते हैं तो सिर शर्म से झुक जाता है। क्योंकि इसी कारण देश का, समाज का, सामान्य जनता का तथा पूरे विश्व का कितना नुकसान हुआ और हो रहा है शब्दों में नहीं बताया जा सकता है । संत कवि कबीरदास जी ने भी स्वीकारा है कि हमारी बोली अनमोल है, और हमें उसका उपयोग अपने हृदय रूपी तराजू में तौलने के पश्चात् ही करना चाहिए। जैसा कि उन्होंने लिखा है—

‘‘बोली तो अनमोल है, जो कोई जाने बोलि।

दिये तराजू तोलिके, तब मुख बाहर खोलि।।’’

जीवन के अनेक अनुभवों से उपजी एक कहावत जग प्रसिद्ध है— ‘‘ना बोलने के नौ गुण’’, जब हम किसी वक्ता के वत्तृत्व को सुनते हैं , उसकी ओजभरी , उपदेशात्मक, प्रेरक व प्रभावक वाणी से प्रभावित होते हैं तब उसके दो चार गुणों से ही प्रभावित होते हैं परन्तु बोलने की अपेक्षा चुप रहने के गुण अधिक है अब यहां देखेंगे कि मौन में कौन से नौ गुण समाहित हैं—

(१) अनावश्यक संघर्ष टल जाता है — जब आप किसी बात को सुनकर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं करते तो आंतरिक और बाह्य उथल—पुथल से बच जाते हैं और उससे उत्पन्न होने वाला अनावश्यक संघर्ष भी टल जाता है।

(२) कम समय में क्रोध का आवेश मिट जाता है— यदि हम किसी ऐसी बात को सुन रहे हैं जो हमारे विचारों को प्रतिवूâल लगती है तो उस समय उत्पन्न होने वाले क्रोध को जीतने के लिये मौन रहना सबसे श्रेष्ठ उपाय है । क्योंकि प्राय: देखा गया है कि जहां मारामारी होने तक की नौबत आ जाती है वहां यदि हमने कुछ समय के लिए मौन साध लिया तो समयोपरांत समन्वयात्मक वातावरण की निर्मिति हो जाती है । ऐसा भी संभव है कि जिस व्यक्ति के शब्द सुनकर आप उसे मारने को उद्धत हो गये थे २४ घण्टे बाद आपके विचारों में परिवर्तन आ जाये और आपका क्रोध क्षमा में परिवर्तित हो सकता है।

(३) सत्य की खोज संभव— मौन रहने का तीसरा फायदा यह है कि घटना के वक्त चुप रहते हुए थोड़ा समय मौन रहकर जब हम उस विषय या घटना की राह में जाते हैं तो सत्य बात का पता लग सकता है और इस तरह अनावश्यक विवाद से बचकर सत्य को स्वीकारने से एक सुखद वातावरण निर्मित होता है।

(४) शक्ति का संचय होता है— वक्त—बेवक्त बिना बात के आवश्यकता से अधिक बोलने से हमारी शक्ति का ह्रास होता है जबकि शांत रहने से स्वयं में नई शक्तियों का संचय होता है।

(५) स्वामित्व भाव का विकास— चुप या मौन रहने से हममें संयम और सहिष्णुता के गुण का विकास होता है और हम किसी के हाथों का खिलौना बनने से बच जाते हैं अर्थात् अपने मालिक स्वयं आप ही होते हैं यह विचार आत्मविश्वास भी पैदा करता है।

(६) वाणी का अपव्यय रूकता है— प्राय: हमारे बुजुर्ग लोग हमें शिक्षा देते हैंं कि बीच में मत बोलो, दो बड़े व्यक्ति बातें कर रहे हों तो चुप रहो, जहां जरूरी हो वहीं बोलो इसका तात्पर्य यह कि वे हमें वाणी का अपव्यय करने से रोकते हैं। प्राय: अधिक बोलने वाला व्यक्ति सोचता है कि वह दूसरों पर अपना प्रभाव डाल सकेगा जबकि यह निर्विवाद सिद्ध है कि अपनी शाब्दिक शक्ति का अपव्यय किये बिना भी आप दूसरों की नजरों में सम्मान पा सकते हैं।

(७) जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है तथा द्रव्य हिंसा ही नहीं भाव हिंसा पर भी काबू पाया जा सकता है।

(८) मौन का उदय सत्य का उद्घोष— जीवन में मौन का उदय होते ही जिस सत्य की अभिव्यक्ति होती है वह जग हितकारी, आत्म—ाqहतकारी होती है , क्योंकि जहां सत्य है वहाँ विजय है।

(९) अतुलनीय अंतर्दशा का उद्भव — ‘‘मौनम् सिद्धि दायकम् ’’ अर्थात् मौन सिद्धत्व दशा का प्रदायक है। जब साधक साधना करते—करते मौन हो जाता है तो फिर वह सांसारिक आकर्षणों से मुक्त हो , ब्रह्मलीन हो जाता है और उसकी आत्मा—परमात्मा बनने की योग्यता पा लेती है। उपरोक्त नौ गुणों से परिपूर्ण मौन की महिमा के दर्शन हमें तीर्थंकरों के जीवन—चरित्र में होते हैं जैसा कि हम भगवान महावीर के चरित्र को देखें तो हमें ज्ञात होता है कि केवलज्ञान होने के पश्चात् भी योग्य पात्र के अभाव में वे मौन रहे। अत: मौन की महिमा में यही कहा जा सकता है —

‘‘जीवन को सुख — शांति दिलाये और दिलाये मान,

जरूरत जितना बोलिये, या जितना हो ज्ञान।
मौन की महिमा अगम है, शब्द से ना हो बखान,
मौन धारकर ही बने जीव स्वयं भगवान। ’’