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जिनधर्म के प्यारे भक्तों

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जिनधर्म के प्यारे भक्तों! सुनो समवसरण की कहानी।

तर्ज-ऐ मेरे वतन
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जिनधर्म के प्यारे भक्तों! सुनो समवसरण की कहानी।
इस समवसरण में विराजे, तीर्थंकर केवलज्ञानी।
तीर्थंकर जब तप करके, केवलज्ञानी बनते हैं।
तब इन्द्राज्ञा से धनपति, ये समवसरण रचते हैं।।
रत्नों की राशि लुटाकर, देते वे दिव्य निशानी।
इस समवसरण में विराजे, तीर्थंकर केवलज्ञानी।।१।।
श्री ऋषभदेव का पहला, बना समवसरण वसुधा पर।
महावीर प्रभू का अंतिम, बना विपुलाचल पर्वत पर।।
संदेश विश्व को देकर, वरने को चले शिवरानी।
इस समवसरण में विराजे, तीर्थंकर केवलज्ञानी।।२।।
वही रूप दिखाने हेतू, बनी समवसरण की रचना।
आगमयुत शुभ रचना यह, धरती पर बनी अनुपमा।।
गणिनी माँ ज्ञानमती की, यह कृति ‘‘चंदना’’ सुहानी।

इस समवसरण में विराजे, तीर्थंकर केवलज्ञानी।।३।।