ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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औघिक के दश भेद

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औघिक के दश भेद

इच्छाकार, मिथ्याकार, तथाकार, आसिका, निषेधिका, आपृच्छा, प्रतिपृच्छा, छंदन, सनिमंत्रण और उपसपंत्।

इच्छाकार-सम्यग्दर्शन आदि इष्ट को हर्ष से स्वीकार करना। इसमें स्वेच्छा से प्रवृत्ति करना।

मिथ्याकार-अतिचारों के होने पर ‘यह अपराध मिथ्या हो’ ऐसा मैं फिर नहीं करूँगा। ऐसा कहना।

तथाकार-गुरु आदि से सूत्र का अर्थ सुनकर ‘यह सत्य है’ ऐसा कहना।

आसिका-रहने के स्थान, मंदिर-गुफा आदि से निकलते समय वहाँ के व्यंतर आदि देवों से पूछकर जाना।

निषेधिका-जिन मंदिर, निवास स्थान में प्रवेश करते समय नि:सही बोलते हुए वहाँ के व्यंतर आदि से पूछकर प्रवेश करना।

आपृच्छा-गुरु आदिकों से वंदनापूर्वक प्रश्न करना। आहार आदि के लिए जाते समय पूछना।

प्रतिपृच्छा-किसी बड़े कार्य के समय गुरु आदि से बार-बार पूछना।

छन्दन-उपकरण आदि के ग्रहण करने में या वन्दना आदि क्रिया में आचार्य के अनुकूल प्रवृत्ति करना।

सनिमंत्रण-गुर्वादि से विनयपूर्वक पुस्तकादि की याचना करना।

उपसंपत्-गुरुजनों के लिए ‘‘मैं आपका ही हूँ’’ ऐसा आत्मसमर्पण करना।