ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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औचित्य का उल्लंघन न करे

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औचित्य का उल्लंघन न करे

-आचार्य विद्यानन्द मुनि
सारांश

औचित्य से चले आ रहे शब्दों में परिवर्तन आत्मघात जैसा ही है।आचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने ‘सन्मति सूत्र’ में कहा है-‘‘धर्म में भक्ति होने मात्र से कोई सिद्धान्त का विशेषज्ञ नहीं हो जाता। आगम जैसा है उसे वैसा ही रखो, उसमें अपने विचार मिलाकर प्रस्तुत करना गलत है। जिस दृष्टि से कथन किया गया है उसके सन्दर्भ आदि का विचार न करना अज्ञानता है। ग्रन्थ साधन है,साध्य तो आत्मानुभव है। तत्त्वज्ञान विशाल है, इसका अन्त नहीं, इसलिए भगवान् आदिनाथ ने किसी तत्त्व को एकान्त रूप से सर्वथा पूर्ण सत्य नहीं माना। शास्त्रीय प्रमाणों सहित विषय का प्रतिपादन प्रस्तुत लेख में किया गया है एवं स्वाहा शब्द के प्रयोग को आत्मशांति कारक बताया गया है।

‘स्वाहा’ इस महापद का अबबोधन स्वीकार करे—

‘गुण कोटया तुलाकोटी, यदेकमपि टीकते।

तकप्यौचित्यमेकान्तलुब्घस्य गरलायते।।’
—(आशाधरसूरि, अनगार घर्मामृत, ६-२५)

अर्थात् यदि करोड़ों गुणों को एक तरफ और ‘‘औचित्य’’ को दूसरी तरफ रखकर देखा जाए तो एक ‘औचित्य’ का ही प्रमाण अधिक मिलेगा किन्तु जो नितान्त लुब्धक से आक्रान्त है उसे वह भी विष के समान जान पड़ता है। औचित्य चर्चा मीमांसा गंरथ पढ़ कर देखें फिर पता चलेगा औचित्य पद का महत्व क्या है? सम्यग्ज्ञान का स्रोत अक्षर नहीं अनुभव है—

अक्षरस्यापि चैकस्य पदार्थस्य पदस्य वा।
दातारं विस्मरन् पापी किं पुनर्धर्म देशनम्।।’
—(आचार्य जिनसेन, हरिवंशपुराण २१-१५६)

अर्थात् एक अक्षर का अथवा एक पद का उसके अर्थ के दाता को विस्मरण करने वाला पापी है तब धर्म उपदेश को विस्मरण करने वाला महापापी क्यों न होगा?

स्वाहा आगम सम्मत व उत्तर—

बृहद्दीक्षा विघि—

ओ ह्रीं अर्हं अ सि आ उ सा ह्रीं स्वाहा।’‘

वड्ढमाणविञ्जा—

‘....अपराजिदो भवदु रक्ख-रक्ख स्वाहा।’
—(आचार्य मल्लिसेन, सरस्वती कल्प,९)

वाग्देवी जप—

‘औं ह्रीं श्री वदवदवाग्वादिनी स्वाहा।’

गणघरवल में—

‘ॐ ह्रीं ह्रुं अ सि आ उ सा झौं झौं स्वाहा।’

ऋग्वेद में—

‘ॐ रक्ष—रक्ष अरिष्टनेमि स्वाहा।
—(ऋग्वेद,२-४-२४)

साह—आराघना करना। ' (अर्घमागघी कोष भाग ४, पृष्ठ ७३२)

स्वाहा एक विद्या—

‘विज्जोसाहमंतबलं।’
‘‘विद्या स्वाहाकारान्ता तंद्रहिता मंत्रस्य।’’
-(भगवती आराधना, विजयोदय टीका, २/१७३४)

-अर्थात् जिसके अन्त में ‘स्वाहा’ कार होता है उसे विद्या कहते हैं और जिसके अन्त में स्वाहा कार नही उसे मन्त्र कहते हैं। स्वाहा ‘पदस्थ ध्यान के निमित्त और पुण्य बंध, पाप क्षय का कारण भी है। ‘स्वाहा’ आर्ष पद है अनघड नहीं।’ -बुद्धिमान् साधु परमागम से विचार किए हुए विषय को ही स्वाीकार करते हैं क्योंकि वे सत्य महाव्रत, भाषा समिति एवं वचन गुप्ति का ध्यान रखते हैं।

‘‘स्वाहा शान्तिकम‘
—(जैन सिद्धान्त भास्कर, आरा, वर्ष २०,दूसरा किरण)
स्वाहा और पूजा का फल—

‘यस्यार्थं क्रियते पूजा,
तस्य शांतिर्भवेत् सदा।
शांतिके पौष्टिके चैव,

सर्वकार्येषु सिद्धिदा।।’

साहा-(स्वाहा) अव्यय

’देवतायै द्रव्यत्यागार्थं प्रयुज्यमाने शब्दे।’
-(अभिधान राजेन्द्र कोश, ७/८००)

‘स्वाहा’ महापद परमागम संमत है। ‘साहा’ (स्त्री) प्रशंसा। ‘साहा’ अव्यय (स्वाहा) देवता के उद्देश्य से द्रव्य-त्याग का सूचक। ‘साहा’ स्त्री (शाखा) एक ही आचार्य की संतति में उत्पन्न अमुक मुनि की सन्तान परम्परा। -(पाइअसद्दमहण्णवो, पृष्ठ ८९६) ....‘गुरूणापि प्रतिपन्नगुरूभावस्य रत्नत्रयपुर:सरस्य भगवत: सिद्धपरमेष्ठिनाऽष्टयती-मिष्टिंकरोमीति स्वाहा’ -(सोमदेवसूरि, यश्स्तिलक, ८ पृष्ठ ३८२) ‘णमों अरिहंताणं ह्रीं अवतर-अवतर स्वाहा।’ -(भद्रबाहु संहिता, पृष्ठ ४८८) ‘साहा’ अव्यय स्वाहा-समर्पण। -(अर्धमागधी कोष, भाग ४, पृष्ठ ७३४) ‘स्वाहापति’ स्वाहापति हवा अर्थ है। -(धनञ्ञय-नाममाला, पृष्ठ ३२-३३) वैयाकरणों का एक प्रसिद्ध श्लोक है कि-शब्द का अर्थ करते समय व्याकरण, निरुक्ति, उपमान, कोश आप्तवाक्य, व्यवहार वाक्यशेष, विवृति और सिद्धपद का सामीप्य-इतने अनुबन्धों का ध्यान रखना चाहिए। अन्यथा अर्थ विपरीतार्थक भी हो सकता है।

[सम्पादन] स्वाहा और ध्वजारोहण विधि—

'‘श्रीमज्जिनस्य जगदीश्वरताध्वजस्य।

मीनध्वजादिरिपुजाल जयध्वजस्य।।
तन्यासदर्शनजनागमन ध्वजस्य।

चारोपणंविधिवदाविदधे ध्वजस्य।।’
-(प्रतिष्ठातिलक ५-१,पृष्ठ ८५)

यानि-जो ध्वजा’ वीतराग जिनेश्वर देव की जगदीश्वरता, कामदेव शत्रु समूह पर विजय तथा जिनबिम्ब -मूर्ति के दर्शनार्थियों के आवाहन आदि की प्रतीक चिन्ह है, मैं ऐसी (पंचवर्ण के तन्, प्रतिष्ठातिलक, पृष्ठ ८४) महाध्वजा का विधिवत्! ओं ह्रीं श्रीं क्षीं भू: स्वाहा पूर्वक आरोहण करता हूँ। इति ध्वजारोहण विधिं स-भेरीसंताडनं यो विदधाति भव्य:। जो भव्य श्रावक, श्राविका इस प्रकार भेरी (शंख-वादित्र) के जयघोषपूर्वक महाध्वजारोहण विधि को सम्पन्न करता-करता है, वह मोक्षरूपी लक्ष्मी को प्राप्त करता है। ‘जय’-का अर्थ है-सावधान हो, संकल्प करो और सम्यक श्रद्धा रखो। इति ध्वजस्थनम्।।

पंच रंग ध्वज—गीत

आदि ऋषभ के पुत्र भरत का,
भारत देश महान।
ऋषभदेव से महावीर तक,
करें सुमंगल गान।।
पंच रंग पाँचों परमेष्ठी
युग को दें आशीष।
विश्व शान्ति के लिए झुकाएँ,
पावन ध्वज को शीष।
‘जिन’ की ध्वनि जैन की संस्कृति

अग-जग को वरदान।
गंधोदक देने का मन्त्र—

‘यत्प्रसादाद्धि चारित्ररत्नमासाध्यमुच्यते।

भूता भवंतो भव्याश्च प्रणम्य गुरूपादयो:।।१।।
-(जिनेन्द्र पूजापाठ, पृष्ठ ३२)
गंधोदक लेते समय व्रती पढ़ते है-
‘ आँनमोऽर्हत्वपरमेष्ठिभ्यो मम सर्वशांतिर्भवतु स्वाहा-गंधोदकेन आत्मपत्रीकरणम्।’
(जिनेन्द्र पूजापाठ,पृष्ठ ३२)
‘स्वाहा’ अमलालीढ और पूज्य पद है।

शास्त्राभ्यास करने वाला जिज्ञासु को इस बड़े प्रसिद्ध वाक्य को स्मरण करना चाहिये-

‘दुर्मेधेव सुशास्त्रे वा वरणी न चलत्यत्।’
-(आचार्य शुभचन्द्र, पाण्डवपुराण १२-२५४)

यानी-मनुष्य की दुष्ट बुद्धि हितकर शास्त्रों में चलाने पर भी नहीं चलती है। सारांश-‘नम:’ शब्द से अहंकार नष्ट होता है। ‘स्वाहा’ शब्द आत्म-शांतिकारक है। </div>