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कंलिङ्ग चक्रवर्ती खारवेल

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कंलिङ्ग चक्रवर्ती खारवेल

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शुङ्ग राजवंश ने ११२ वर्ष तक राज्य किया । इसके बाद इसका अन्त हो गया । इसके बाद कलिक् में. एक शक्तिशाली राज्य का उदय हुआ, जिसके प्रधान नायक खारवेल माने जाते हैं । प्राचीन भारत के इतिहास और सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रख्यात चेदि राजवंश की प्रतिष्ठा कलिक् में महामेघवाहन वंश के नाम से ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी तक हो चुकी थी । बहुधा जैनधर्म के प्रधान पृष्ठ पोषक होने के कारण इस वंश के राजाओं का यश जैन साहित्य में विशेष रूप से कीर्तित हुआ है । महाभारत, बौद्ध चेतीय जातक तथा अन्य पुराणों में भी इस वंश का विवरण पाया जाता है । कलिइन् में खारवेल इस राजवंश के सर्वश्रेष्ठ शासक माने जाते हैं । यह भी तात्पर्य पूर्ण है कि भारतवर्ष में वे ही महाराजा पद विभूषित सर्वप्रथम सम्राट हैं और उनकी प्रथम नहिषी के मडचपुरी गुफा अभिलेख में उन्हें चक्रवर्ती के रूप में अभिहित किया गया है । दस वर्ष के शासनकाल में खारवेल ने जो सामरिक सफलता पाई थी, उसके समकक्ष दृष्टान्त भारत के .इतिहास में दृष्टिगोचर नहीं होता । उनके शासन काल में कलिक् समस्त भारतवर्ष में अद्वितीय और अजेय शक्ति के रूप में विवेचित हुआ तथा अपने राजनैतिक प्रभाव को हिमालय से कुमारिका पूर्वसागर से पश्चिम पयोधि तक व्याप्त कर सका था । शासक के रूप में उनकी मानवीयता, कला और संस्कृति के प्रति प्रगाढ अनुराग, उदार धर्मनीति और आध्यात्मिकता के कारण इतिहास में उन्हें विशिष्ट स्थान प्राप्त हुआ है।'[१]

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चेदि राजवंश

चेदि राजवंश भारत में अति प्राचीन काल से ही प्रतिष्ठित था । जिनसेन कृत हरिवंश के उल्लेख से यह स्पष्ट प्रतिपादित होता है कि विन्ध्याचल के समीपवर्ती क्षेत्र में अभिचन्द्र ने चेदि राष्ट्र की स्थापना की थी और शुक्तिमती नदी के तट पर उनकी राजधानी थी, जिसकी शुक्तिमतीपुर के नाम से ख्याति थी-

विन्ध्यपृष्ठेऽभिचन्द्रेण चेदिराष्टूमधिष्ठितम् ।

शुक्तिमत्यास्तटेऽ ध्यायि नाम्ना शुक्तिमती पुरी । ।

शुक्तिमती आधुनिक उड़ीसा के बलांगीर जिले में प्रवाहित शुकतेत्न नदी है ।[२] महामेघवाहन कलिंग में चेदि राजवंश के प्रतिष्ठाता थे । फलस्वरूप कलिंग मगध से स्वतंत्र हुआ और उसके गौरवमय इतिहास में नये-नये अध्याय जुड़ते गए । खारवेल कलिंग में अपने वंश के तृतीय राजा थे । द्वितीय राजा अनुमानत: हाथी गुम्फा शिलालेख की आद्यपंक्ति में उल्लिखित चेतराज खारवेल के (छता हैं । पार्जिटर ने मध्यप्रदेश में बहने वाली केन नदी को शक्तिमती कहा है । राजा शिशुपाल चेदिवश का शासक था । उसकी राजधानी चन्देरी थी । खारवेल के पूर्वज भी मूलत: चन्देरी के आसपास स्थित चेदिदेश के ही वासी रहे होंगे ।

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जीवन परिचय

खारवेल पिंगलवर्ण वपुवान् रूपवंत पुरुष थे । जन्म कै समय से उनके शरीर पर महामानव के लक्षणों का होना ज्ञात था । विविध क्रीडाओं के माध्यम से शिक्षारम्भ होकर पन्द्रह वर्ष की आयु तक वे लेखन (राजकीय पत्रालाप) रूप (मुद्रा विज्ञान), गणना (गणित ज्ञान) व्यवहार (न्याय), विधि (प्रशासनिक) .और सभी विद्या-रों में निपुण हो गए थे । हाथी गुच्छा आभेलेख सै यह स्पष्ट हो जाता है कि खारवेल पन्द्रह वर्ष की अवस्था में युवराज पाद पर अधिष्ठित हुए थे । परन्तु उन्हें किसने अधिष्ठित किया था, यह इस अभिलेख से ज्ञात नहों होता है । अनुमानत: उस -समय. खारवेल के पिता की .अकाल मृत्यु के कारण उन्हें नाबालिग अवस्था मै युवराज का पद मिलाक्ष था, और उन्हे दूसरों की प्रशासनिक सहायता से साल शासन किया था । उनकी दो .रानियाँ थी, प्रथम रानी ललार्क (हस्तीसिंह के प्रपौत्र) की दुहिता थी, यह वजिरघर रानी के नाम से प्रख्यात थी । वजिरघर को आधुनिक मध्यप्रदेश स्थित बेरागढ के रूप में चिंन्ह्ति किया गया है । द्वितीय महिषी सिंहुपथ रानी के नाम से अभिहित थी । 'सिंहपथ को आधुनिक श्री काकुलम् जिला .के सिंगपुरम के रूप मैं चिन्हित किया गया है । ई. चौथी सदी मैं माठर राजवंश के राजत्वकाल में सिंहपुरम ही कलिंग की राजधानी थीं । दोनों रानियां भिन्न भिन्न अवसरों पर जनसाधारण के सम्मुख उपस्थित हुआ करती' थी।

अभिषेकोत्सव के (एक वर्ष बाद कलिंग का उप्कुलवर्ती क्षेत्र वातावध्वंस के कारण कलिंग नगरी के ऊँचे ऊँचे प्रासाद, गोपुर औंर दुर्गो के प्राचीर ढह गए थे, जिससे कलिंग की प्रर्याप्त हानि हुई, थी । अभिषेक के तुरन्त बाद प्रथम् वर्ष में ही उन्होंने राजधानी कलिंग नगरी के भग्न प्रासाद और प्राचीरो को पुन निर्माण कराया रवि राजधानी को सदृढं तथा सुशोभित किया। दुर्ग, प्राचीर और अटटालिकाओं के संस्कार साधन के साथ साथ उन्होंने प्राचीन जलाशयों का जीर्णोधार कराया और उन्हें सुंदर सोपान श्रेणी से सजाकर उधानो को नवीन रूप प्रदान किया इस विकास कार्य के लिए पैंतीस लाख मुद्राओ का व्यय हुआ था तीन सों वर्ष पूर्व कलिंग में महापद्मनन्द ने जो नहर खुदवाई थी खारवेल ने अपने ‘शासन ने पांचवे वर्च में उसकी राजेश्वय का प्रदर्शन करते हुए पोर और जनपदों को कर रहित घोषित किया उस समय वैदेशिक धनसंपदाओ से राजकोष परिपूर्ण था अत उन्नयन कार्यो पर उसका कोई प्रभाव न पड़ा राजत्व के नोवें वर्ष खारवेल ने जैनतीर्थ मथुरा को यवनों की अधीनता से मुक्त किया तत्पश्चात अड़तीस लाख मुद्राओ के व्यय से विजयस्मरिका के रूप में एक महाविजय प्रासाद के निर्माण किया उसका क्रीडा संगीत और नाट्य के प्रति विशेष आकर्षण था |[३]

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हाथी गुम्फा शिलालेख

उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर के समीप उदयगिरी पर हाथी गुम्फा नामक प्राकृतिक गुम्फा की आभ्यनतरीण छत पर खोदी हुई महाराज खारवेल की एक सुदीर्घ प्रस्तर लिपि हे यही सुप्रसिद्ध हाथी गुम्फा शिलालेख हे सर्वप्रथम इसकी खोज १८२० में सटलींग सा ने की थी तथा इसे ``An account of Geographical statifdeical and historical of Orissa or Cuttack’’ ग्रन्थ में स्न्दभ्रित किया था बाद में माखर्ण किटो (M. Kitteol) प्रिसेप अलेक्जेण्डर कनिंघम राजेन्द्रलाल मित्र लाक (locke) पंडित भगवानलाल इंद्र ब्युलर (Buhler) जे बी ब्लाक (J. B. Block) किलहार्न जे एच फ्लीट लब्ल्यू थामस (F. W. Thomas) खालदास बनर्जी काशी प्रसाद जायसवाल, वेणीमाधव बरुआ, दिनेशचन्द्र सरकार, तथा नवीन कुमार साहू आदि ने इसके पाठोद्धार का प्रयास किया । शिलालेख का भावानुवाद इस प्रकार है -

(१) अरहन्तों को नमस्कार । सर्व सिद्धों को नमस्कार । ऐल महाराज महामेधवाहन चेतराजवशवर्द्धन प्रशस्त शुभलक्षणसम्पन्न अखिल देशस्तम्भ, कलिंकधिपति श्री खारवेल ने ।

(२) पन्द्रह वर्ष तक श्री सम्पन्न और कडार (गन्दुमी) रंग वाले शरीर से कुमार क्रीडायें कीं । बाद में लेख, रूपगणना, व्यवहार विधि में उत्तम योग्यता प्राप्त कर और समस्त विद्याओं में प्रवीम होकर उसने नौ वर्ष तक युवराज की भांति शासन किया । जब वह पूरा चौबीस वर्ष का हो चुका, तब उसने जिसका शेष यौवन विजयों से उत्तरोत्तर वृद्धिगत हुआ -

(3) कलिंकराजवश में एक पुरुष युग के लिए महाराज्याभिषेक पाया । अपने अभिषेक के पहले ही वर्ष में उसने वातविहत (तूफान से बिगाड़े हुए गोपुर (फाटक), प्राकार (चहारदीवारी) और भवनों का जीर्णोद्धार कराया, कलिक् नगरी के फव्वारे के कुण्ड, दूषितल्ल (?) और तड़ागों के बांधों को बंधवाया समस्त उद्यानों का प्रतिसंस्थापन कराया और पैंतीस लक्ष प्रजा को संतुष्ट किया ।

(4) दूसरे वर्ष में सातकीर्ण की चिन्ता न करके उसने पश्चिम देश में बहुत से हाथी, घोड़ों, मनुष्यों और रथों की एक बड़ी सेना भेजी । कृष्णवेण नदी पर सेना पहुंचते ही उसने उसके द्वारा भूषिक नगर को सन्तापित किया । तीसरे वर्ष में फिर

(५) उस ग्ल्धर्ववेद में निपुणमति ने दन्त, नृत्य, गीत, वाद्य, सान्दर्शन, उत्सव और समाज के द्वारा नगरी का मनोरंजन किया । और चौथे वर्ष में विद्याधर निवासों को जो पहले कभी नष्ट नहीं हुए थे और जो कलिक् के पूर्व राजाओं के निर्माण किये हुए थे........ उनके मुकुटों को व्यर्थ करके और उनके लोहे के टोपों के दो खण्ड करके और उनके छत्र (6) और भृंगारे को (सुवर्णकलशों को) नष्टकर तथा गिराकर और उनके समस्त बहुमूल्य पदार्थो तथा रत्नों का हरण कर समस्त राष्ट्रिकों और भोजको से 'अपने चरणों की वन्दना कराई । इसके बाद पांचवे वर्ष में उसने तनसुलिय मार्ग में नगरी में उस प्रणाली (नहर) का प्रवेश किया, जिसको नन्दराज ने तीन सौ वर्ष पहले खुदवाया था । छठे वर्ष में उसने राजसूय यज्ञ कर सब करों को क्षमाकर दिया ।

( ७) पौर और जानपद (संस्थाओं) पर अनेक शतसहस्र अनुग्रह वितरण किये । सातवें वर्ष राज्य करते हुए वज्र घराने की धृष्टि नामक गृहणी ने मातृक पद को पूर्ण करके सुकुमार............... आठवें वर्ष में उसने (खारवेल) ने बडी दीवार वाले गोरथगिरि पर एक बडी सेना के द्वारा

(८) आक्रमण कर राजगृह को घेर लिया । पराक्रम के कार्यो के इस समाचार के कारण नरेन्द्र (नाम)................. अपनी घिरी हुई सेना को छुड़ाने के लिए मथुरा चला गया। (नवें वर्ष में) उसने दिये.............. पल्लव युक्त ।

( १) कल्पवृक्ष, सारथी सहित हय-गज-रथ और सबको अग्निवेदिका सहित राह, -आवास और परिवसन सब दान को ग्रहण कराए जाने के लिए उसने ब्राह्मणों की जातिपक्ति जातीय संस्थाओं को भूमि प्रदान की । अर्हत्...

( १०) उसने महाविजय प्रासाद नामक राजसन्निवास, अड़तीस सहस्र की लागत का बनवाया । दसवें वर्ष में उसने पवित्र विधानों द्वारा युद्ध की तैयारी कर देश जीतने की इच्छा से भारतवर्ष (उत्तर भारत) को प्रस्थान किया ।

( ११) (ग्यारहवें वर्ष में) पूर्व राजाओं के बनवाए हुए मण्डप में, जिसके पहिए और जिसकी लकड़ी मोटी, ऊँची और विशाल थी, जनपद से प्रतिष्ठित तेरहवें वर्ष पूर्व में विद्यमान केतुभद्र की तिक्त (नीम), काष्ठ की अमर मूर्ति को उसने उत्सव से निकाला । बारहवें वर्ष में...... उसने उत्तरापथ (उत्तरी पंजाब और सीमांत प्रदेश) के राजाओं में त्रास उत्पन्न किया ।

( १२) और मगध के निवासियों में विपुल भय उत्पन्न करते हुए उसने अपने हाथियों को गंगा पार कराया और मगध के राजा बृहस्पतिमित्र से अपने चरणों की वन्दना कराई ।.... (वह) कलिंग जिन की मूर्ति को जिसे नन्दराज ले गया था घर लौटा लाया और अंग और मगध की अमूल्य वस्तुओं को भी ले आया ।

( १३) उसने............ जठरोल्लिखित (जिनके भीतर लेख खुदे हैं) उत्तम शिखर, सौ कारीगरों को भूमि प्रदान करके बनवाए और यह बडे आश्चर्य की बात है कि वह पाण्डवराज से हस्तिनावों में भराकर श्रेष्ठहय हस्ति, मणिक और बहुत से मुक्ता और रत्न नजराने में लाया ।

( १४ )फिर तेरहवें वर्ष मेँ व्रत पूरा होने पर (खारवेल ने) उन याप ज्ञापकों को जो पूज्य कुमारी पर्वत पर, जहाँ जिन का चक्र पूर्ण रूप से स्थापित है, समाधियों पर याप और क्षेम की क्रियाओं में प्रवृत्त थे, राजभूतियोँ को वितरण किया । पूजा और अन्य उपासक कृत्यों कै क्रम को श्री जीवदेव की भाति खारवेल ने प्रचलित रखा ।

( १५) सुविहित श्रमणों के निमित्त शास्त्र- नेत्र के धारकों, ज्ञानियों और तपोबल से पूर्ण ऋषियों के लिए (उसके द्वारा), एक संघायन ( एकत्र होने का भवन) बनाया गया । अर्हत् की समाधि (निषद्या) के निकट पहाड़ की ढाल पर, बहुत योजनों से लाए हुए और सुन्दर खानों स्पे निकाले हुए पत्थरों से अपनी सिंहप्रस्थी रानी धृष्टी के निमित्त विश्रामागार बनवाया ।

( १६) और उसने पाटालिकाओं मेँ रत्नजटित स्थम्भो को ७५ लाख पर्णों (मुद्राओं के व्यय से प्रतिष्ठापित किया । वह (इस समय) मुरिय काल के १६४ वें वर्ष को पूर्ण करता है । वह क्षेमराज, वर्द्धराज, भिक्षुराज, धर्मराज और कल्याण को देखता रहा है, सुनता रहा है और अनुभव करता रहा है ।

(१७)गुणविशेष कुशल, सर्वमतों की पूजा (सन्मान) करने वाला, सर्व देवालयों का संस्कार कराने वाला, जिसके रथ और जिसकी सेना को कभी कोई रोक न सका, जिसका चक्र चक्रधुर (सेनापति) द्वारा सुरक्षित रहता हैँ, जिसका चक्र प्रवृत्त है और जो राजर्षि कुल में उत्पन्न हुआ है, ऐसा महाविजयी राजा श्री खारवेल हैं।

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इस शिलालेख की प्रसिद्ध घटनाओं का तिथिपत्र

ईसा पूर्व १४६० (लगभग) केतुभद्र

ईसा पूर्व ४६० (लगभग) कलिंग में नन्दशासन

ईसा पूर्व २३० अशोक की मृत्यु

ईसा पूर्व २२० (लगभग) कलिंग के तृतीय राजवश का स्थापन

ईसा पूर्व १९७ खारवेल का जन्म

ईसा पूर्व १८८ मौर्यवंश का अन्त और पुष्यमित्र का राज्य प्राप्त करना ।

ईसा पूर्व १८२ खारवेल का युवराज होना

ईसा पूर्व १८० (लगभग) सातकर्णि प्रथम का राज्य प्रारम्भ

ईसा पूर्व १७३ खारवेल का राज्याभिषेक

ईसा पूर्व १७२ मूषिक नगर पर .आक्रमण

ईसा पूर्व १६९ राष्ट्रिकों और भोजको की पराजय

ईसा पूर्व १६७ राजसूय यज्ञ

ईसा पूर्व १६, मगध पर प्रथम आक्रमण

ईसा पूर्व १६१ उत्तरापथ और मगध पर आक्रमण, पाण्डवराज से अदेय (नजराने) की प्राप्ति ईसा पूर्व १६० शिलालेख की तिथि ।[४]

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विजय यात्रा

अपने राजत्वकाल के दूसरे ही वर्ष में खारवेल ने राजा सातकर्ण का कोई भय न मानकर पश्चिम दिशा की ओर सैन्यदल भेजा था । यह सातकर्ण अवश्य ही अन्ध सातवाहन वंश के राजा होंगे [५]

हाथी गुफा के शिलालेख से ज्ञात होता है कि खारवेल ने अपने राजत्व के १ २वें वर्ष में मगधाधिपति वृहस्पतिमित्र को युद्ध में परास्त किया था । कुछ लोगों कै अनुसार पुष्यमित्र सुंग का ही दूसरा नाम वृहस्पति मित्र था ।

खारवेल २४ वर्ष की उम्र में कलिंग के सिंहासन पर बैठा । उसके राज्य कै तेरह वर्षो का वर्णन शिलालेख में है । इस अल्प समय में कलिंग के उत्तर और दक्षिण में जितने राज्य थे, सभी को उसने जीत लिया था । [६]सातकर्णी राजा अन्ध के सातवाहन वंश का तृतीय राजा था ।[७]

सातकर्णी राजा को हराने के बाद खारवेल की सेना कलिंग न लौटकर दक्षिण में कृष्णा नदी के तट पर बसे हुए अशिक नगर पर जा पहुँची । पुराण के अनुसार उस समय कृष्णा नदी के जो राजा थे, वे बड़े ही पराक्रमी और शूरवीर थे, फिर भी उनकी शक्ति खारवेल का मुकाबला करने से हार गई । अशिक राज्य पर आधिपत्य जमा खारवेल सैन्य सहित एक वर्ष तक वहीं रहा बाद में लौटा |[८]

खारवेल तीसरे वर्ष कहीं नहीं गया । इस वर्ष उसने राजधानी में आनन्दोत्सव मनाए । चौथे वर्ष अरकडपुर में जो विद्याधरों के वास थे, उन पर अधिकार कर रथिक और भोजक लोगों पर आक्रमण शुरू किया । इन सभी को परास्त कर उसने अपने आधीन कूर लिए । पांचवें वर्ष में उसने तनसुलिय - वाट - नहर को बढाया । इसे नन्दराज ने बनवाया था । छठे वर्ष पौर और जानपदों को उसने विशेष अधिकार प्रदान किए । सातवें वर्ष उसका विवाह धूमधाम से हुआ । आठवें वर्ष उसने मगध पर .आक्रमण किए और ससैन्य गोरथगिरि (बराबर की पहाड़ियाँ) तक पहुंच गए । उसके शौर्य की गाथा सुन यवनराज देमित्रियस मथुरा छोड़कर भाग गया ।

राजधानी को लौटकर खारवेल ने अपने' राजत्वकाल के ९वें वर्ष में महान् उत्सव व दान- पुण्य किया । उन्होंने सभी को किमिच्छिक दान दिया । योद्धाओं को घोड़े, हाथी, रथ भेंट किए और प्राची नदी के दोनों तटों पर विजयप्रासाद बनवाकर अपनी दिग्विजय को स्थायी बना दिया । दसवें वर्ष में अपनी सेना को उसने पुन: उत्तर की ओर भेजा एवं ग्यारहवें वर्ष उसने मगध पर आक्रमण किया । यह आक्रमण अशोक के कलिंग आक्रमण के प्रतिशोध में था । मगधनरेश वृहस्पतिमित्र खारवेल के पैरों में नतमस्तक हुए । उन्होंने अंग और मगध की मूल्यवान भेंट लेकर राजधानी को प्रयाण किया । इस भेंट में कलिंग के राजचिन्ह और कलिंग जिन (भगवान् ऋषभदेव) की प्राचीन मूर्ति भी थी, जिसे नन्दराज मगध ले गया था । खारवेल ने उस अतिशय पूर्ण मूर्ति को कलिंग वापस लाकर बड़े उत्सव से विराजमान किया । उस घटना की स्मृति में उन्होंने विजयस्तम्भ भी बनावाया । इसी वर्ष दक्षिण के पाण्ड्यनरेश ने खारवेल का सत्कार किया और बहुमूल्य भेंट दी । बारहवें वर्ष उत्तर और दक्षिण के बड़े-बड़े नरेशों को परास्त कर वे कलिग चक्रवर्ती सिद्ध होते हैं । १३वें वर्ष में खारवेल राज्यलिप्सा -से विरक्त हो धर्मसाधना की ओर झुकते हैं । कुमारी पर्वत पर जहां भगवान् महावीर ने धर्मोपदेश दिया था, वहां जिनमन्दिर बनवाते हैं और अर्हन्त निषधिका का उद्धार करते हैं । वे एक' श्रावक के व्रतों का पालन कर आत्मोन्नति में लग जाते हैं ।

खारवेल के समय का राष्ट्र जैनधर्म था । जैन साधुओं के लिए खारवेल ने अनेक गुफा बनवाई थीं । उन्होंने णमोकार मंत्र के दो पद - नमो अरहंतानं, नमो सव्वसिधानं अपने[९] शिलालेख के प्रारंभ में लिखाए थे । उसने लेख के साथ स्वस्तिक आदि जैन मांगलिक चिन्ह भी खुदवाए थे । उसके शिलालेखों में बौद्ध और आजीविकों का उल्लेख नहीं है । इससे यह द्योतित होता है कि कलिंग में ब्राहम और जैन दो ही प्रधान धर्म थे । उनके शासन में जैनधर्म कलिंग में उन्नति के शिखर पर पहुंचा । वे कर्मशूर होने के साथ साथ धर्मशूर थे । खारवेल जन्म से जैन थे । उन्होंने अशोक की तरह अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया था । उनकी उपाधि खेमराजा (क्षमाशील राजा), भिक्षुराजा, धर्मराजा, वर्द्धमानराजा आदि थे । भिक्षु राजा उपाधि से यह द्योतित होता है कि उन्होंने मुनिवत भी धारण किए थे । खण्डगिरि की बारह गुफा में चौबीस तीर्थकरों की मूर्तियों के अतिरिक्त पश्चिमी दीवाल के कोनें में उनकी मूर्ति दिगम्बर वेष में विद्यमान है, कमण्डलु नीचें रखा है, हाथ में पिच्छि लिए ध्यानमुद्रा में खड़े हैं। इससे द्योतित होता है कि जैनधर्म के संरक्षण और सम्प्रसारण में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया था । [१०]

जैनधर्म ने कलिंग के निवासियों को बहुतप्रभावित किया है । यहाँ एकमहिमा धर्मका उदय हुआ था। महिमा धर्म के अनुयायी साधु खण्डगिरि के आसपास आश्रम बनाकर रहते हैं ६।! वे जैन क्षुल्लकों की तह गेरुआ रंग की एक कौपीन और एक उतरीय धारणा करते हैं । वे रात्रि भोजन नहीं करते हैं और पूर्णतया शाकाहारी हैं और दयाधर्म को पालते हैं ।[११] आर. पी महापात्र ने Jain Monuments प्र. ४० में कहा हे ``No parking of food after sunset and their practice of burning the deadbody shows the influence of Digambar Jains.’’

उड़ीसा में प्रारम्भ से ही जैनों का निवास था । समक जाति प्राचीन जैनों का ही अवशेष है । संभवत: शुक्काल में ये शहर छोड्कर गांव और जंगल में रहने को विवश हुए हों ।

जगन्नाथ जी की रथयात्रा जैनों की रथयात्रा का अनुकराग है । नाथ सम्प्रदाय का अस्तित्व भी तीर्थकरों की विचारधारा के प्रभाव से उदय में आया। चनो मोहन गांगुली ने कहा है कि उड़ीसा में जैनधर्म की जड़ें इतनी गहरी थीं कि हम उसके चिन्ह १६वी सदी ई. तक पाते हैं । उड़ीसा का सूर्यवंशी राजा प्रतापरुद्रदेव जैनधर्म की ओर बहुत झुका हुआ था|[१२]

[सम्पादन] टिप्पणी

  1. श्री सदानन्द अग्रवाल : खारवेल पृ. १ (भूमिका) प्रकाशक- श्री दि. जैन समाज,कटक महताब रोड, कटक, जनवरी १९९३
  2. वही पृष्ठ ३
  3. खारवेल पृ. २३-२४
  4. जैन शिलालेख संग्रह - भाग- २, पृ.४ -११
  5. डॉ. लक्ष्मीनारायण साहू : उड़ीसा में जैनधर्म पृ. ४२
  6. M. N. Das : Glimpses of Kalinga History P. 60.
  7. .N. K. Sahu-History of Orissa, vol. II, P. 327
  8. उड़ीसा में जैन धर्म पृ. ५७
  9. उड़ीसा में जैनधर्म पृ.५५-५७
  10. प्रो. लालचन्द जैन : उड़ीसा में जैनधर्म पृ. ३१-३२
  11. वही, पृष्ठ-१३१
  12. उड़ीसा एंड हर रिमेन्स : एन्शिएण्ट एण्ड मेडिएवल, कलकत्ता १९१२


डॉ रमशेचन्द जैन
1. - द्वारा, मनोज खन्ना मु. जाटान, बिजनौर (उ प्र.)
अनेकान्त जनवरी मार्च २०१३ पेज न ४७ से 53 तक