ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

कच्ची मिट्टी को सही आकार दें

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
कच्ची मिट्टी को सही आकार दें

Ctp10.jpg
Ctp10.jpg
Ctp10.jpg
Ctp10.jpg

बच्चों के स्कूलों में ग्रीष्मकालीन अवकाश होने वाले हैं। स्कूलों में छुट्टियां होते ही बच्चों की धमाल—चौकड़ी शुरु हो जाती हैं और माँ—बाप, विशेषकर माँ होती है परेशान। फिर शुरू होती है कोर्सेस, क्लासों की जानकारी एकत्रित करने का काम ताकि बच्चों को उनमें प्रवेश दिलाकर व्यस्त रखा जा सके ताकि वह नियमित शिक्षण के अतिरिक्त ज्ञान भी अर्जित कर सकेगा। अन्यथा ‘खाली दिमाग शैतान का घर’ वाली कहावत चरितार्थ होती है और यही समय होता है जब बच्चा स्कूली शिक्षण के अलावा अन्य गतिविधियों में भाग लेकर कुछ सीख सकता है।

हम सभी कोर्सेस, कोचिंग की ओर तो ध्यान देते हैं किन्तु धार्मिक शिक्षण की ओर विचार भी नहीं करते हैं। आज की युवा पीढ़ी में अधिकांशत: धार्मिक ज्ञान से विमुख हैं और जिसके परिणाम समाचारों के माध्यम से मिलते रहते हैं। आजकल युवा पीढ़ी में उत्तेजना, तनाव, सहनशीलता का अभाव आदि अनेकों दुर्भावनाओं ने स्थान बना लिया है, जिनके कारण वह जिंदगी को भी दाँव पर लगा देता है। बच्चों को बाल्यकाल से ही धर्म की ओर रूचि पैदा करना चाहिए।

ग्रीष्मावकाश में बच्चों को पाठशाला में भेजना, प्रात: श्रीजी की प्रक्षाल करना आदि के प्रति भी विचार माता—पिता को करना चाहिए। लौकिक ज्ञान के साथ ही धार्मिक ज्ञान भी देने का प्रयास करें। सामान्य दिनों में तो माँ भी कहती हैं कि बच्चे को समय ही नहीं मिलता है, हो सकता है , किन्तु असंभव कुछ भी नहीं हैं। सबसे पहले आपको संकल्पित होना पड़ेगा तब आप बच्चे को उस राह में ले जा सकेगें और यह ही वह कच्ची मिट्टी हैं, जिसे आप मन चाहा आकार दे सकते हैं, पक्की मिट्टी से आकार नहीं दिया जा सकता। बच्चे में अभी और धर्म के बीज रोपण कर दिये तो बड़े होने पर वह धर्मरक्षा तो करेगा ही, स्वयं के जीवन में भी अपने आचरण से उच्च पदों को प्राप्त कर सकेगा।

आजकल अधिकांश स्थानों पर पाठशालाओं का संचालन बंद हो गया हैं। जहां पाठशाला का संचालन नहीं हो रहा है। तो हमारी माता—बहिनों को जवाबदारी लेकर इनकों संचालित करना चाहिए। अधिकांश महिलाएं किटी, ग्रुप या अन्य संगठनों से जुड़ी हुई हैं, उनके माध्यम से संचालित करें, जो महिलाएं समय दे सकती हैं वे शिक्षण कार्यों में सहयोग करे और ये ही माता—बहिनें अपने बच्चों को पाठशाला में लाने का कार्य भी करेगी। कहते भी हैं कि बच्चे की पहली गुरू माँ होती हैं तो माँ अपने गुरू होने का फर्ज अदा कर संस्कारों से समाज का भविष्य सँवार दें। इस कार्य के लिए हो सकता हैं आपको कुछ त्याग करना पड़े पर आपका यह त्याग पीढ़ियां सँवार जायेगी। बच्चे ने आपकी अंगुली पकड़ी हैं उसे ले जाने का काम आपका हैं कि कहां ले जाना है।

हमारे साधु परमेष्ठी भी कहते हैं कि जिसने एक बार श्रीजी के अभिषेक के लिए कलश व पूजा के लिए अष्टद्रव्य की थाली उठा ली वो कभी व्यसनों को हाथ नहीं लगाएगा।

प्रवीण जैन पाटनी
प्रधान सम्पादक
परिणय प्रतीक
मार्च— २०१५