ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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कटिशूल (कमर दर्द) — कारण, निदान व चिकित्सा

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कटिशूल (कमर दर्द) — कारण, निदान व चिकित्सा

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आधुनिक परिवेश में प्रकृति विरूद्ध आहार—विहार, उछल—कूद और अधिक भारी वजन को अनुचित ढंग से उठाने पर कटिशूल की उत्पत्ति होती है। पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियां कटिशूल की अधिक शिकार होती हैं। स्त्रियों को घर में रहकर वस्त्र धोने, फर्श साफ करने और एक स्थान से दूसरे स्थान पर कुर्सी, मेज, सोफा, वाशिंग मशीन, फ्रिज व दूसरी भारी वस्तुएं ले जानी होती है। ऐसी स्थिति में अनुचित ढंग से किन्ही भारी वस्तुओं को उठाने, या झुककर ज्यादा समय तक काम करने पर कटिशूल हो जाता है। स्त्रियों के कटिशूल का संबंध गर्भावस्था व प्रसव में विकृति, ठंड लग जाने व शीतल चित्रों का सेवन करने से भी है। शरीर के विभिन्न अंगों में सूजन, गर्भावस्था में गर्भाशय व योनि रोग,सूतिका रोग व वात , पित्त , कफ की विकृति से कटिशूल की उत्पत्ति होती है। आयुर्वेदाचार्यों ने मानसिक विकृतियों, चिंता, शोक, क्रोध, काम, भय और तनाव को भी कटिशूल की उत्पत्ति का कारण माना है। रूक्ष, मिथ्या आहार, शीतल खाद्य पदार्थों और पेयों का अधिक सम्पर्क में रहने सेवन, जल के अधिक सम्पर्क में रहने, नंगे पावों घर में अधिक काम करने पावों के गीले रहने कटिशूल होता है।

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लक्ष्य:—

अचानक कटि में विद्युत की चमक की तरह की शूल की उत्पत्ति होती है। कटिशूल में रोगी उठने—बैठने में बहुत कठिनाई और पीड़ा अनुभव करता है। रात्रि के समय शीतल वातावरण से रोगी को अधिक पीड़ा होती है। रोगी ठीक से सो नहीं सकता। कुछ रोगियों में मूत्र विकृति और निर्बलता के लक्ष्य भी दिखाई देते हैं। इस विकृति में कटि में किसी तरह की शोध के लक्षण नहीं मिलते हैं लेकिन थोड़ा सा हिलने पर तीव्रशूल के कारण घरेलू कार्य पूरा करने में असमर्थ हो जाती हैं। शारीरिक रूप से निर्बल, अधिक स्थूल शरीर और वात प्रकृति वाले स्त्री—पुरूष कटिशूल के अधिक शिकार होते हैं।

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चिकित्सा:—

कटिशूल की चिकित्सा के लिए शूल के कारण का निदान करना आवश्यक है क्योंकि अन्य किसी शारीरिक विकृति के कारण कटिशूल होता है। आयुर्वेद में कटिशूल चिकित्सा में स्नेहन, स्वेदन, मृदु विरेचन तथा बस्ति को बहुत गुणकारी माना जाता है। और स्नेहक बस्ति (एनीमा) से अधिक लाभ होता है। महर्षि चरक के अनुसार एरण्ड मूल की बस्ति देने से कोष्ठ पूरी तरह शुद्ध हो जाता है। वात विकृति से उत्पन्न कटिशूल नष्ट हो जाता है। काला नमक, अजवायन, भुनी हींग, सेंधा नमक, सोंठ, मिर्च, पिपरी, जीरा समान मात्रा में प्रात: एरण्डमूल के क्लाथ से सेवन करने पर कटिशूल के क्लाथ से सेवन करने पर कटिशूल नष्ट होता है। कटिशूल में महानारायण तेल या महाविषगर्भ तेल की मालिश करने से बहुत लाभ होता है। शूलवार्णिणी वटी (वैद्यनाथ) की एक गोली सुबह एक गोली शाम को हल्के उष्ण जल से लेने पर सभी तरफ के शूल नष्ट हो जाते हैं।

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बचाव:—

कटिशूल से बचाव के लिए हल्के व्यायाम बहुत जरूरी है। जहां तक संभव हो, जल में कम समय तक रहें। काम समाप्त हो जाने पर शरीर को साफ सूती कपड़े से पोंछ दें। पैरों को पौंछ कर, जाड़े के दिनों में सरसों का तेल लगा दें या आलिव आयल लगायें। ज्यादा समय तक झुककर काम न करें। क्षमता से अधिक वजन अकेले न उठायें। किसी अन्य का सहयोग अवश्य ले लें। पेट हमेशा कब्जरहित रखें क्योंकि कब्ज अनेक बीमारियों की उत्पत्ति का कारण होता है। सोने से तंग वस्त्र धारण न करें तथा सख्त बिस्तरे का उपयोग सोने में न करें लेकिन विस्तरा सीधा होना अति आवश्यक है। इन सब बातों पर ध्यान देते हुए कटिशूल से बचाव किया जा सकता है।



जिनेन्दु अहमदाबाद,१८ जनवरी, २०१५