ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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कथनी करनी एक

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कथनी करनी एक

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घटना सदाकत आश्रम की है, जिसकी स्थापना स्वयं डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने देश सेवा की भावना से की थी। इस आश्रम में बालकों की पढ़ाई लिखाई का भी काम होता था। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी प्राय: इन बच्चों की कक्षा लेते और उन्हें नैतिकता के कुछ उपदेश देते। इसी प्रकार एक बार वे अपने छात्रों को बतला रहे थे—जो व्यक्ति परिश्रम करता है, उसका कमाई में पहला अधिकार होना चाहिये। वृक्ष लगाने वाले को अपनी पसन्द के अनुसार फल चुनकर खाने का सर्वप्रथम अधिकार है। इसमें जो व्यक्ति विपरीत आचरण करता है तथा श्रम करने वाले व्यक्ति को उसका अधिकार नहीं देता, वह ढोंगी, अन्यायी और शोषक है।

प्राय: सभी बालक दत्तचित्त होकर बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ उपदेश सुन रहे थे। एक बालक आश्रम में नया ही आया था। उसे राजेन्द्र प्रसाद का उपदेश दिखावे का लगा। उनको भी उसने अन्य साधारण व्यक्तियों के समान समझा, जो कहते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं। उसने मन ही मन राजेन्द्र बाबू की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद प्रात:काल जब स्नान की तैयारी कर रहे थे, तो उनका कोई छात्र उनके लिये नीम की दातून तोडकर ला देता। यह एक सामान्य परम्परा सी हो गई थी। उक्त घटना से अगले दिन उस बालक ने ही दातून लेकर राजेन्द्र बाबू के पास पहुँचा—एक टेढा मेढा और एक साफ सुथरा।

दो दातून देखकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने बालक की ओर बड़ी उत्सुकता से देखा तो उसने उत्तर दिया—यह साफ सुथरा दातून आप ले लीजिये, दूसरे से मैं काम चला लूंगा।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने मुस्कराकर टेढा—मेढा दातून उठा लिया और बोले—परिश्रम तुमने किया है, इसलिये इच्छे दातून पर अधिकार तुम्हारा है, मेरा नहीं।

बालक ने अच्छा दातून देने की पुन: कोशिश की, मगर राजेन्द्र बाबू नहीं माने। वे प्रसन्नचित्त होकर टेढ़े—मेढे दातून को ही काम में लेने लग गये। इस पर वह बालक फफक कर रो उठा।

परिस्थिति से अनजान राजेन्द्र बाबू आश्चर्यचकित से रह गये। उन्होंने प्रेम से बालक को पुचकारा और उसके रोने का कारण पूछा, किन्तु बालक से कुछ बोला ही नहीं जा रहा था। राजेन्द्र बाबू उसे जितना अधिक पुचकारते और शांत करने की कोशिश करते, वह उतना ही अधिक हिचकिंया से लेकर रोता। आश्रम के कुछ और लोग भी उधर आ जुटे। उन्होंने भी उस बालक को शांत करने की।

काफी देर बाद बालक का रोना कम हुआ तो वह डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी के पैरों में गिर गया और बोला मुझे क्षमा कर दीजिये। मैंने आज बहुत बड़ा अपराध किया है, जो अपने देवता समान गुरू की परीक्षा ली है।

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद अब भी कुछ नहीं समझ पाये। उन्होंने बड़े प्रेम से बालक को उठाया और स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूरी बात करने के लिये कहा।

बालक ने सारी बात कह सुनाई। सुनकर राजेन्द्र प्रसाद जी खुलकर हंस पड़े और बोले—इतनी सी बात में रोने धोने की क्या आवश्यकता थी ? परीक्षा ले ली तो इसमें क्या हुआ ? तुम्हें मेरी बात पर विश्वास तो हुआ। तुम तो सचमुच ही प्रतिभाशाली हो, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ।


सम्पादक ब्र. संदीप ‘सरल’
घर घर चर्चा रहें ज्ञान की ११-२० जनवरी २०१५