ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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प्रथामाचार्य श्री शांतिसागर महाराज की 62 वीं पुण्यतिथि (श्रावण शुक्ला दुतिया) 23 अगस्त को मुंबई के जैनम हाल में पूज्य गणिनी ज्ञानमती माता जी के सानिध्य में मनायी जाएगी जैन धर्मावलंबी अपने-अपने नगरों में विशेष रूप से इस पुण्यतिथि को मनाकर सातिशय पुण्य का बंध करें|
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इस मंत्र की जाप्य दो दिन 22 और 23 तारीख को करे |

सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं साधुसमाधि भावनायै नमः"

कथा मोक्षमार्ग सम्प्रेरिका माता की

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कथा मोक्षमार्ग सम्प्रेरिका माता की

रचियित्री—ब्र. कु. इन्दु जैन (संघस्थ)
है धन्य धरा इस भारत की अरु गौरव है इस भूमी का,

जहाँ की माटी के कण-कण में है एक अलौकिक रत्न छुपा।
चेतन व अचेतन दोनों ही रत्नों का यहाँ भण्डार भरा,
अब चेतन रत्न की बात सुनो, जिससे इस देश का गर्व बढ़ा।।१।।

है विश्वपटल पर नहीं कहीं, सुनने में ऐसी बात कहीं,
जहाँ की भू महापुरुष तीर्थंकर, आदिक से कभी पूज्य रही।
इस भारत वसुन्धरा पर, काल अनन्तों से सत्पुरुष हुए,
जिनको आगम में नारायण, तीर्थंकर अरु बलभद्र कहें।।२।।

ये तो सब शास्त्रों की बातें, पर यह युग भी गौरवशाली,
जहाँ राम, कृष्ण से महापुरुष, सीता सम शीलवती नारी।
भौतिक वादी इस युग में भी आध्यात्मिक संस्कृति से जीवित है।।३।।

उन महामानवों के जीवन से, आज भी धरती प्रमुदित है,
जिनके शुभ कार्यकलापों से, हर जीवन को नव राह मिली।
जिनकी आदर्शयुक्त छवि से, हर मन के अन्दर आश जगी।
मैं आज उन्हीं आदर्श छवी में, एक की बात बताती हूँ।
है नहीं लेखनी सक्षम पर, संक्षेप में कथा सुनाती हूँ।।४।।

जैसे दक्षिण भारत के सूर्यरूप, चारित्र चक्रवर्ती गुरूवर,
मुनि परम्परा जीवन्त किया, कलियुग में परम श्रेष्ठ मुनिवर।
जगती उनके उपकारों का, कभी बदला चुका न पाएगी,
जब तक नभ में सूरज चन्दा, गुणगाथा उनकी गाएगी।।५।।

वैसे ही उत्तर भारत के अंचल में तीर्थ अयोध्या है,
है जन्मभूमि तीर्थंकर की, शाश्वत है रत्नप्रसूता है।
इस तीर्थ अयोध्या निकट एक, शुभ ग्राम टिकैतनगर आता,
मैं बतलाउँ बन्धू तुमको! उस नगरी की गौरवगाथा।।६।।

बीसवीं सदी की प्रथम बाल ब्रह्मचारिणि माता हुर्इं वहाँ,
क्वारीं कन्याओं हेतु जिन्होंने, त्याग का मार्ग प्रशस्त किया।
इस कलियुग में जो हमें आर्यिका, माताजी का दर्श मिला,
वह उस बाला का ही प्रताप, हम पर उनका उपकार महा।।७।।

जिनके कृतित्व ने स्वर्णिम इक, इतिहास स्वयं रच डाला है,
गणिनी माता श्री ज्ञानमती, जिनका व्यक्तित्व निराला है।
शुभ जम्बूद्वीप की रचना हो, या तीर्थ अयोध्या का विकास,
महावीर जन्मभूमी कुण्डलपुर, या फिर हो तीरथ प्रयाग।।८।।

चौबीसों तीर्थंकर जिनवर की, जन्मभूमि को विश्वख्यात,
उनकी नित है प्रेरणा यही, जिनधर्म कीर्ति हो जगविख्यात।
उनकी गुणगाथा गाकर हम, अपने नर जन्म को सफल करें,
उनके पदचिन्हों पर चलकर, अपने जीवन को धन्य करें।।९।।

स्याही समुद्र की लेकर के, धरती को कागज करूँ यदी,
फिर भी गुणगान न हो सकता, ऐसी हैं ये आदर्श छवी।
हे बन्धु! सरोवर के भीतर, रत्नों की राशि अपार भरी,
उन रत्नों का हो लाभ उन्हें, तल तक जो लगाते हैं डुबकी।।१०।।

बस उसी भाँति संसार सरोवर में चिंतामणि रत्न एक,
रत्नत्रय जिसको कहते हैं, मुक्ती हेतू जो बना सेतु।
जिस मानव का हो पुण्य प्रबल, इस दुर्लभ मणि को पाता है,
जीवन को रत्न बना लेता, संसार जलधि तिर जाता है।।११।।

है आर्यखण्ड गौरवशाली, उन महामनीषी को लखकर,
यह धरा करे अनुसरण युगों तक, ज्ञानमती सम संत प्रवर।
इतिहास करेगा याद कभी, सिद्धान्त ग्रन्थ के कर्ता को,
तब नमन करेगा परम पूज्य, उपकारी उनके गुरूवर को।।१२।।

अकलंक देव आचार्य की जब-जब, धरा को स्मृति आएगी,
उन बलिदानी अरु धीर-वीर, निकलंक की याद आ जाएगी।
जब सृष्टि जपेगी गणिनी ब्राह्मी, माताजी का मंत्र जाप्य,
आर्यिका सुन्दरी माताजी के, उच्च आदर्श आएंगे याद।।१३।।

इनके समान ही भारत वसुधा, जब-जब दोहराए गाथा,
मां ज्ञानमती चारित्रमूर्ति है स्वर्णमयी जिनकी आभा।
उस समय स्मरण आएगा, छोटे की छोटी कन्या का,
है नाम माधुरी मिला जिन्हें, व्यक्तित्व भी है मधुरिम जिनका।।१४।।

माता मोहिनि की कुक्षी से, बारहवीं कन्या जन्मीं थी,
अट्ठारह मई सन् अट्ठावन की, ज्येष्ठ कृष्ण मावस तिथि थी।
वह मात-पिता की राजदुलारी, नाजों में थी पली-बढ़ी,
जब माता मोहिाqन मंदिर जातीं, दर्शन को वह जाएं चली।।१५।।

सारे बच्चों के जाने से, जब घर सूना हो जाता था,
तब एकाकीपन लालाजी के, मन में गुस्सा लाता था।
देवी के पीछे फौज चली, कहकर मजाक भी थे करते,
पर मोहिनि के मंदिर जाने पर सदा माधुरी संग चले।।१६।।

माता जब मंदिर से आतीं, संग-संग मंदिर से आती थीं,
उनकी यह आदत पितु छोटे के, मन को बहुत लुभाती थी।
कहते मोहिनि ऐसा लगता, तुम साथ यही रह जाएगी,
जीवन भर सेवा करके तेरी, यह कत्र्तव्य निभाएगी।।१७।।

आशीर्वाद शायद पितु का, प्रत्यक्ष फलित हो आया था,
कर अन्त समय तक माँ की सेवा, निज कर्तव्य निभाया था।
बचपन से थीं कमजोर मगर, दृढ़ता से इनका हृदय भरा,
सन् उनहत्तर में भाई-भाभी, संग मातु का दर्शन करा।।१८।।

पितु ने समझाया सुन बिटिया, वह ज्ञानमती निर्मोही है,
कर देगी केशलोंच तेरा, उनके मन दया न रहती है।
इत्यादिक मोह भरी बातों से, बार-बार था समझाया,
पर हठ पर आए बालकमन को, कोई नहीं समझा पाया।१९।।

श्री धर्मसिन्धु के वृहत् संघ के, बीच पहँुचकर हरषार्इं,
पर प्रथम दर्श जब किया मात का, मन में बड़ी हँसी आई।
बोली भैय्या! यह मुंडे केश, वाली क्या मेरी बहना हैं?
तब भैय्या ने समझाया था, बेटी! ऐसा निंह कहना है।।२०।।

यह महान पदवी की धारक हैं, परम पूज्य आर्यिका मात,
श्री ज्ञानमती माताजी ये, ज्ञानी हैं और हैं जगविख्यात।
माताजी ने कुछ दिनों बाद, माधुरि को पास बुलाया था,
धार्मिक अध्ययन कराने को, श्लोक एक पढ़वाया था।।२१।।

बाल्यावस्था, गुरूमुख से नि:सृत, गाथाएँ थीं नीव बनीं,
जीवनमंदिर पर कलशारोहण करने ही मानो उदित हुर्इं।
आ गया पत्र घर से जाने के हेतु हो गई तैयारी,
माताजी के आंशिक सम्बोधन, से आई मन उजियारी।।२२।।

भैय्या से जब बोली बहना, मुझको भी यह व्रत लेना है,
रह गए अवाक और बोले, तुमको मेरे संग चलना है।
उमड़ा फिर मोह भाई संग आ, पितु की खुशियों को बढ़ा दिया,
उस समय सुबलसागर गुरु का, नगरी में चातुर्मास हुआ।।२३।।

जब पूछा क्या पढ़कर आई, सारा वृतान्त कह डाला है,
गाथाएं सुनकर मुनिवर बोले! क्या प्रज्ञायुत बाला है।
सन् इकहत्तर में मैट्रिक शिक्षा, प्रथम श्रेणि उत्तीर्ण किया,
अजमेर नगर में मोहिनी माँ ने, भाई संग प्रयाण किया।।२४।।

तेरह वर्षीय माधुरी ने, फिर से इक अवसर पाया था,
उन्नत भविष्य का निर्माता, बनकर वह शुभ दिन आया था।
जब उदासीनता शादी के प्रति, माताजी से व्यक्त किया,
त्रैलोक्य पूज्य व्रत ब्रह्मचर्य, देने को श्रीफल मंगा लिया।।२५।।

दशलक्षण जैसे महापर्व की, भादों सुदि दशमी आई,
पाकर असिधारा व्रत निज जीवन, की बगिया है महकाई।
उस बाल्यावस्था में जिनेन्द्र, चरणों में बस भावना यही,
निर्विघ्नतया यह व्रत पालूँ, प्रभुवर दे दो ऐसी शक्ती।।२६।।

जब मोहिनि माँ ने दीक्षा ली, सोचा अब स्वारथ सिद्ध करूँ,
माँ की छत्रच्छाया में रहकर, अपना जीवन सफल करूँ।
बालक हठ के आगे अच्छे-अच्छे परास्त हो जाते हैं,

लौकिक शिक्षा में शिक्षक-सहपाठी सबका मन जीत लिया,
जब धार्मिक क्षेत्र मिला तब भी, प्रज्ञागुण इनका अद्भुत था।
माताजी के आशीर्वाद से, पुन: संघ में जब आर्इं,
त्रय वर्षों की शास्त्री की परीक्षा, तीन माह में की भाई।।२८।।

भाई-भाभी के आग्रह से घर, आना-जाना लगा रहा,
जब आई शादी की चर्चा, दृढ़ता से उसे ठुकराय दिया।
हर दृढ़प्रतिज्ञ प्राणी को निज, जीवन में सफलता मिलती है,
उज्जवल चाँदनी सदा उसके, जीवन में छाई रहती है।।२९।।

जैसे हो एक नाव पर पग, प्राणी समुद्र तिर जाता है,
वैसे ही एक गुरू जीवन की, नैय्या पार लगाता है।
निश्छल सेवा, अनुपम गुरूभक्ती, सेवा-वैय्यावृत्ति की,
कर पूर्ण समर्पण गुरु के प्रति, फिर कई परीक्षाएँ भी दीं।।३०।।

शास्त्री, विद्यावाचस्पति आदिक कर्इं उपाधियों से भूषित,
पीएच. डी. की उपाधि दे टी. एम. यू. भी होता पुलकित।
कई सेमिनार और शिविरों में, अपना अमूल्य सहयोग दिया,
कई एक विधान भी करवाए, जन-जन था भाव-विभोर हुआ।।३१।।

इक बार जन्मभूमी से श्रेष्ठी, छोटीशाह जी आए थे,
माताजी से प्रार्थना किया, इक इच्छा मन में लाए थे।
माधुरी विधान कराएं चलें, तब माताजी ने स्वीकृति दी,
वह प्रथम विधान हुआ नगरी की, सारी जनता पुलकित थी।।३२।।

उस गाँव की बिटिया माधुरि को, बहुमान दिया था नगरी ने,
उसकी स्मृतियाँ आज तलक, अंकित हैं उनके मानस मे।
यह गुरू अनुकम्पा का प्रसाद, जो इस छोटी-सी उम्र में ही,
विद्वान् व्रतिक की दृष्टी से, मूल्यांकन सब करते नित ही।।३३।।

लौकिक अध्ययन करते-करते, कई एक भजन की रचना की,
माँ मोहिनि के जीवन पर भी, कुछ लिखूँ ये मन में इच्छा थी।
लिखकर इक्यावन पद्य दिखाया, ज्ञानमती माताजी को,
लेखन का प्रथम प्रयास देख, माताजी मन में पुलकित हों।।३४।।

अनवरत शृंखला चली और, कई शतक भजन रचनाएँ कीं,
पूजन, विधान, आदिक इस सौ पचहत्तर कृतियाँ भू को दीं।
ओजस्वी वाणी, सेवाभावी, यह तो आशुकवित्री हैं,
जीवन निर्माण हेतु इनकी, वाणी सचमुच परमौषधि है।।३५।।

वस्तुत: चरित के आराधक, किसी सीमा में निंह बंधते हैं,
वृद्धिंगत करते उसे पुन:, दीक्षा की याञ्चा रखते हैं।
उस ही अभिलाषा को माधुरि ने, निज जीवन का ध्येय चुना,
संस्थान के मंत्री पद पर रहकर, संयम पथ को सदा गुना।।३६।।

माताजी की प्रेरणा से अब तक, जितने भी हैं कार्य हुए,
नर्माणात्मक या सृजनात्मक, सबमें अपना सहयोग करें।
आर्यिका की दीक्षा प्राप्ति हेतु, माँ ज्ञानमती से विनय किया,
चारित्र चक्रि की बगिया में, फिर देखो सुरभित पुष्प खिला।।३७।।

तेरह अगस्त उन्निस सौ, नवासी, की वह सुखद घड़ी आई,
श्रावण शुक्ला ग्यारस तिथि में, हस्तिनापुरी भी हरषाई।
माँ ज्ञानमती से दीक्षा ले, संयम पथ पर आरोहण कर,
‘चंदनामती’ संज्ञा को पा, इस नाम को भी करतीं सार्थक।।३८।।

है चुम्बकीय व्यक्तित्व अनोखा, इनके ढिग जो आता है,
संस्कारित हो जाता बन्धू!, अन्तर का अलख जगाता है।
दीक्षा की सूचना गई जहाँ, सबने स्वागत की इच्छा की,
आग्रह करके ले गए और, स्वागत करके हरषाए भी।।३९।।

उस समय की एक बिनौरी, मेरे अन्तर्मन पर छाई है,
लेखनी के द्वारा वही भावना, मैंने भी प्रगटाई है।
माधुरी बहन की जन्मभूमि में, जब स्वागत जनता करती,
लाडली सुपुत्री बिछुड़ेगी, इस गम में सब आँखें नम थीं।।४०।।

आशीष दे रहे बार-बार, संयम पथ की अनुगामिनि को,
बेटी! फिर जल्दी तुम आना, अबकी देने आशिष हमको।
ऐसा ही था माहौल हस्तिनापुर में जब दीक्षा ली थी,
लम्बे केशों का लोंच किया तब अश्रूपूरित जनता थी।।४१।।

है यथा नाम गुण भी वैसे, वात्सल्यमूर्ति हैं ये भाई,
समयोचित, मिष्ट, सरस रचना का, गुण विशेष दे दिखलाई।
वत्तृत्व कला की धनी और, मितभाषी सम्मोहित वाणी,
करते हैं रसास्वादन जो भी, छवि लगती माता जिनवाणी।।४२।।

आगम चर्या, चारित्रिक दृढ़ता, अद्भुत प्रतिभाधारक हैं,
अभिमानरहित, मोहक छवियुत, शिष्यों के लिए उदाहरण हैं।
थोड़ी-सी योग्यता आते ही, समझे जो गुरू से खुद को बड़ा,
पड़ता जो ख्याति, लाभ, पूजा में, ले ले वह आदर्श इनका।।४३।।

साहित्यिक क्षेत्र में अनुपमेय, साहित्य की सेवा इनने की,
साहित्य विधाओं में ऐसी, गरिमामय माता वन्दनीय।
इनके विराट व्यक्तित्व को शब्दों, में निंह बांधा जा सकता,
अतुलित हर दृष्टि से योगदान, गाउँ कैसे मैं वह गाथा।।४४।।

जिनशासन में षट्खण्डागम, सबसे महान सिद्धान्त ग्रन्थ,
उस पर स्वतन्त्र संस्कृत टीका, सिद्धान्तसुचिन्तामणि उत्तम।
गणिनी माता श्री ज्ञानमती ने, दिया धरोहर अनुपम है,
उसकी हिन्दी टीका करने में, मात चन्दना सक्षम हैं।।४५।।

विद्या, विवेक, निर्मल यश, बुद्धी गुरूभक्ती से सहज मिले,
जो शिष्य समर्पित नि:स्वार्थी, इक दिवस स्वयं भी पूज्य बने।
इन सब गुण की भण्डार श्री, चन्दनामती जी माता हैं,
इसलिए गुरू के द्वारा, ‘प्रज्ञाश्रमणी’ पद मिल जाता है।।४६।।

गुरू संग चौबिस चौमास किए, लोगों को नवचेतना मिली,
हर बाल, वृद्ध अरु युवा दिलों में, धर्म की नूतन ज्योति जगी।
हैं आर्षमार्ग के हेतु समर्पित, उसकी हैं कट्टर पोषक,
शिष्यों को प्रेम और मैत्री का, पाठ पढ़ाने में तत्पर।।४७।।

सिद्धों की श्रेणी में इक दिन, आएंगी यह विश्वास अटल,
ऐसी जगजननी माता के, पग में भू अम्बर करे नमन।
उन्नत भविष्य की निर्मात्री, हम जैसों की प्रेरणास्रोत,
हैं सन्त काव्य की परम्परा में, उद्योतित आलोकपुंज।।४८।।

बचपन में जब पितु के मुख से उन माता का वर्णन सुनती,
जिज्ञासा होती त्याग मार्ग के प्रति, क्या गुरूचर्या होती?
दर्शन का जब सौभाग्य मिले, मन आल्हादित हो जाता था,
मुझ सदृश अज्ञानी को भी, यह मार्ग मिलेगा पता न था।।४९।।

हे मोक्षमार्ग की संप्रेरक!, चन्दनामती माँ तुम्हें नमन,
उपकार किए जो भी मुझ पर, जन्मों तक भी निंह होउँ उऋण।
शब्दों के मोती कितने भी, तव चरणों में अर्पण कर दूँ,
मुट्ठी भर रेत लिए कैसे, पर्वत की गरिमा मैं कह दूँ।।५०।।

सम्पूर्ण चरित्र पर दृष्टिपात कर, बात यही समझे बन्धू,
संस्कारों का प्रभाव जीवन पर, सदा अमिट पड़ता ही है।
अपनी भावी पीढ़ी को भी, संस्कार धर्म के देना तुम,
निश्चित होगा भविष्य उन्नत, यह बात समझ लेना अब तुम।।५१।।

वंशावलि पावन हो जाती, गर ऐसी आत्माएँ जन्में,
अपने जीवन को महकाकर, यशवृद्धि सदा कुल की करते।
उस वंशावलि को प्रणमन कर, मैंने यह कथा समाप्त किया,
निंह कर पाई मैं लोभ संवरण, अरु उनका गुणगान किया।।५२।।

ब्राह्मी चन्दनबाला सम जोड़ी, ज्ञानमती चन्दनामती,
इन महाआत्माओं के चरणों, में हो जाए शुद्धमती।
नारी जीवन की उच्च श्रेणि पर, मैं भी आरोहण कर लूँ,
कर अन्त समाधी जीवनमंदिर पर कलशारोहरण कर लूँ।।५३।।

गुरु रूप में ज्ञानमती माता का, वरदहस्त मैंने पाया,
चन्दनामती माताजी के, वात्सल्य से यह पथ अपनाया।
कामना ‘इन्दु’ की जीवन में, इन सबका रोशन नाम करूँ,
कुल का यश फैलाउँ जग में, ऐसा अद्भुत कुछ काम करूँ।।५४।।

जब तक निंह मुक्ति मिले मुझको, इन गुरूवर का हो वरदहस्त,
कर जन्म सफल अपना मैं भी, पा जाउँ उज्जवल पथ प्रशस्त।
दीक्षण की पावन रजत जयंती, भावना एक प्रभु से मेरी,
हों स्वस्थ चिरायू, युग युग तक इन मां से न हो धरती सूनी।।५५।।