ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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कनकगिरी के विजयी पार्श्वनाथ

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कनकगिरी के विजयी पार्श्वनाथ

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—सुरेश जैन (आई.ए.एस.), भोपाल

कनकगिरि कर्नाटक राज्य में कर्नाटक, केरला और तमिलनाडु राज्यों की सीमा पर स्थित है। मैसूर से नजनगढ़ एवं गुण्डलूपेठ होते हुए ऊँटी मार्ग जाता है। ऊँटी से लौटते समय गुण्डलूपेठ से दाहिनी ओर जाकर कनकगिरि २५ कि.मी. दूर पर स्थित है। मैसूर एवं नजनगढ़ से मलेयूर तक नियमित रूप से बसें आती जाती हैं। रेलवे स्टेशन से मैसूर की दूरी ५२ कि.मी. एवं कलवन्दे से १० कि.मी. है।

विशाल मनोहर शिलाखंडों से सुशोभित यह पर्वत कनकाद्रि के नाम से भी जाना जाता है। क्षेत्र पर तीन मंदिर हैं, २४ तीर्थंकरों के २४ चरणों की २४ नसियाएं हैं। मुख्य मंदिर से पहाड़ी पर पहुँचने के लिए ३५० सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। कनकगिरि कर्नाटक राज्य का एकमात्र सिद्धक्षेत्र है। आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी की तपोभूमि एवं समाधिक्षेत्र कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु राज्यों की सीमा पर स्थित मलेयूर गाँव में स्थित है। भगवान महावीर का यहाँ विहार हुआ था। यह कर्नाटक राज्य के मैसूर नगर से ५० कि.मी. की दूरी पर स्थित मनोरम शिलाखंडों का पर्वत है, जहाँ से सूर्यपुर के महान तपोनिधि सुप्रतिष्ठ महामुनि ने घोर तप साधना के फलस्वरूप केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त किया। अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी से सम्बद्ध शिलालेख एवं गुफाएं यहाँ उपलब्ध हैं। श्री अनंतबल मुनि ने भी यहाँ से केवलज्ञान प्राप्त किया है तथा ज्ञानचंद मुुनि ने मोक्ष प्राप्त किया है। जैन मुनि तपस्वियों के साधकों की सल्लेखनाविधिपूर्वक समाधि के बारे में २७ से अधिक शिलालेख हैं। आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी ईसा की पाँचवीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर विराजमान रहे। उन्होंने यहाँ सर्वार्थसिद्धि, जैनेन्द्र व्याकरण, कल्याणकारक एवं समाधिशतक आदि अमूल्य ग्रंथों की रचना की। साथ ही संपूर्ण विश्वोदय एवं विश्वशांति की उदात्त भावना से रचित मूल संस्कृत शांति पाठ की रचना की। कनकगिरि में १००८ श्री पार्श्वनाथ भगवान, पद्मावती देवी, कूष्मांडिनीदेवी, ज्वालामालिनी देवी एवं क्षेत्रपाल ब्रह्मयक्ष की मनोज्ञ एवं सातिशय प्रतिमाएं विराजमान हैंं। इतिहासकारों के अनुसार ये प्रतिमाएं १५०० वर्ष प्राचीन हैं। अनेक मुनि, आर्यिकाओं ने इस पवित्र क्षेत्र की वंदना की है। कनकगिरि में पूजन-भक्ति करने से नवग्रहों की पीड़ा और कालसर्पदोष का निवारण होता है। इसी उद्देश्य से यहाँ भगवान नेमिनाथ की यक्षी कूष्माण्डिनी देवी और भगवान पार्श्वनाथ की यक्षी पद्मावती देवी आमने-सामने स्थित हैं। कालसर्पयोग निवारण के लिए दक्षिण भारत में यही एकमात्र स्थान है। विजयी पार्श्वनाथ के दर्शन-पूजन से असाधारण आत्मिक शक्ति एवं तात्कालिक भौतिक प्रगति प्राप्त होती है।

क्षेत्र पर उपलब्ध सुविधायें— क्षेत्र पर यात्रियों के ठहरने के लिए नि:शुल्क कमरे उपलब्ध हैैं। भोजनशाला भी नि:शुल्क है। औषधालय, पुस्तकालय एवं विद्यालय भी है।