ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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कन्यारत्न ही सर्वोत्कृष्ट रत्न है

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कन्यारत्न ही सर्वोत्कृष्ट रत्न है

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महाराज अकंपन रत्नजटित सिंहासन पर आरूढ़ हैं। वीरांगनाएँ चमर ढोर रही हैं। सभा का चारों तरफ का वातावरण अपनी शोभा से सौधर्म इन्द्र की सुधर्मा सभा की भी मानों हँसी उड़ा रहा है। इसी बीच में सुपुत्री सुलोचना कृश शरीर को धारण करती हुई हाथ में पूजा के शेषाक्षत को लेकर सन्मुख आती है। महाराज अकंपन आसन से उठकर हाथ जोड़कर उसके द्वारा दिये हुए अक्षत को लेकर स्वयं अपने मस्तक पर रख लेते हैं और कहते हैं- ‘‘पुत्री! तू उपवास से अतिशय खिन्न हो गई है, अब घर जा, यह तेरे पारणा का समय है। पुत्री पिता को प्रणाम कर चली जाती है। राजा कुछ क्षण विचार में निमग्न हो जाते हैं। अहो! इस कन्या की जिनभक्ति और सम्यग्दर्शन की विशुद्धि कितनी विशेष है! इसने विशाल जिनमंदिर में बहुत ही रत्नमयी जिनप्रतिमाएँ विराजमान कराई हैं, उनके सुवर्णमयी उपकरण बनवाये हैं, जिनबिम्बों की प्रतिष्ठा विधि कराई है और नित्य उनकी पूजा किया करती है। अभी फाल्गुन की अष्टान्हिका पर्व में इसने विधिवत् पूजन-विधान व उपवास का अनुष्ठान किया है। यह सतत जिनपूजा व पात्रदान आदि उत्तम कार्यों में ही तत्पर रहती है। अब यह पूर्ण यौवन अवस्था को प्राप्त हो चुकी है, अब इसका इसी के अनुरूप वर के साथ विवाह संबंध कर देना चाहिए कि जिससे गृहस्थ धर्म की परम्परा अक्षुण्णरूप से चलती रहे। अपने मंत्रियों को बुलाकर कहते हैं- मंत्रियों! हमारे कुल के प्राणस्वरूप इस कन्या के लिए सभी राजा लोग प्रार्थना कर रहे हैं अत: यह कन्या किसको दी जावे।’’ ‘‘महाराज! कुल, वय, विद्या, बुद्धि आदि से विशिष्ट चक्रवर्ती के पुत्र अर्वकीर्ति को आप अपनी कन्या देते हैं तो बड़े जनों के साथ संबंध हो जाने से आप भी महान् पूज्यता को प्राप्त होंगे।

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सिद्धार्थ मंत्री ने कहा-

व्यवहार में कुशल लोग यही कहते हैं कि छोटे लोगों का बड़ोें लोगों के साथ संबंध होना अच्छा नहीं रहता, अत: अपने बराबर वालों के साथ ही संबंध करना चाहिए। देखिए! मेघेश्वर, प्रभंजन आदि अनेक राजपुत्र हैं, जो एक से एक वैभवशाली हैं।’’ इसी बीच में सर्वार्थ मंत्री बोल उठते हैं- ‘‘राजन्! भूमिगोचरी राजाओं के साथ तो हम लोगों का संंबंध पहले से ही विद्यमान है, अत: इस कन्या को विद्याधर राजाओं में से किसी को देनी चाहिए.........अनेक ऊहापोह के अनन्तर सुमति मंत्री कहने लगे........ ‘‘महाराज! ये सब बातें शत्रुता उत्पन्न करने वाली हैं। यदि आप विद्याधर को कन्या देंगे, तो चक्रवर्ती क्या कहेंगे? क्या भूमिगोचरियों में इसके योग्य कोई वर नहीं था? अनेक राजाओं द्वारा याचना हो रही है, उनमें से आप किसी एक को ही तो कन्या देंगे, तो अन्य राजा अवश्य आपके विरोधी हो जावेंगे। मेरी समक्ष में तो प्राचीन पुराणों में स्वयंवर की उत्तम विधि सुनी जाती है। यदि सर्वप्रथम आप पूज्यश्री द्वारा यह विधि प्रारंभ कर दी जाये, तो भगवान ऋषभदेव और सम्राट् भरत के समान आपकी भी प्रसिद्धि युग के अंत तक हो जाये। उस स्वयंवर में यह कन्या जिसका वरण करे, वही ठीक है। तब पुन: आपका किसी के साथ विरोध होने का प्रसंग नहीं उठेगा........। महाराज को यह बात ठीक जँच गई। मंत्रियों को विदा कर वे राजमहल में पहुँचते हैं, महारानी सुप्रभा पुत्र हेमांगद व वृद्ध पुरुषों से विचार-विमर्श करके स्वयंवर के लिए निर्णय कर लेते हैं पुन: सर्वत्र देशों में राजाओं के पास दूतों द्वारा आमंत्रण पत्रिका भेज देते हैं। इसी बीच में एक देव आकर कहता है- ‘‘महाराज! मैं पूर्वभव में आपका भाई था, इस समय सौधर्म स्वर्ग से आ रहा हूँ, मेरा नाम विचित्रांगद है। इस पुण्यवती सुलोचना के स्वयंवर को देखने के लिए आया हूँ।’’ पुन: महाराज की आज्ञा के अनुसार उसने उत्तर दिशा की ओर एक अत्यन्त विशाल सर्वतोभद्र नाम का राजभवन बनाया। वह कई खण्डों का था और सर्वत्र मंगलद्रव्यों से भरा हुआ था। उस राजभवन के चारों तरफ ‘‘स्वयंवर भवन’’ का निर्माण किया। उसके चारों तरफ गोपुर द्वार, रत्नों के तोरण, पताकाओं की पंक्तियाँ, शिखरों पर चमकते हुए सुवर्ण कलश अपनी अद्वितीय शोभा से उस वाराणसी नगरी को स्वर्गपुरी ही बना रहे थे। वहाँ का धरातल नीलमणियों से जड़ा हुआ था और छतों में अनेक वर्ण के रत्नों से जटित चन्दोवे चारों तरफ अपनी शोभा बिखेर रहे थे।

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जिस स्वयंवर मण्डप

जिस स्वयंवर मण्डप को निर्माण करने वाला विचित्रांगद देव स्वयं शिल्पी है, उसकी शोभा का कौन वर्णन कर सकता है? चारों तरफ से बजने वाले वाद्यों ने ही मानों कुछ ही दिनों में चारों तरफ के बड़े-बड़े राजपुत्रों को वहीं बुला लिया था। महाराजा भरत के सुपुत्र अर्वकीर्ति भी स्वयं अनेक बंधुवर्गों के साथ असीम वैभव को लेकर वहाँ पधारे थे। महाराज अवंâपन किन्हीं को स्वयं आगे होकर स्वागत करके लाये थे, किन्हीं को लाने के लिए पुत्रों को, किन्हीं को लाने के लिए मंत्री आदि को भेजा था। यथोचित प्रकार से सभी राजाओं का स्वागत करके उन्हें यथोचित भवनों में ठहराया गया। उस समय समुद्र अपने रत्नाकरपने का खोटा अहंकार व्यर्थ ही धारण करता है। वास्तव में राजा अकंपन और रानी सुप्रभा ही सच्चे रत्नाकर हैं, क्योंकि कन्यारत्न के सिवाय और कोई भी उत्तम रत्न नहीं है, ऐसा ही सभी लोग कह रहे थे। पुन: श्रेष्ठ मुहूर्त में राजा अकम्पन ने जिनेन्द्रदेव की महापूजा कराई। महारानी सुप्रभा ने कन्या को सुवर्ण के पाटे पर बिठाकर मंगल स्नान कराया। माङ्गलिक वस्त्रालंकार से सुसज्जित करके नित्य मनोहर चैत्यालयों में ले जाकर उससे विधिवत् देव की पूजा कराई। राजा अकम्पन स्वयं ही आकर स्वयंवर मण्डप में योग्य आसन पर विराजमान हो गये। उसी समय महेन्द्रदत्त नाम का कंचुकी चित्रांगद देव के द्वारा दिये हुए अतिशायी अलंकारों से अलंकृत रथ पर सुलोचना को बिठाकर स्वयंवर मण्डप की ओर चल पड़ता है। साथ में हेमांगद कुमार आदि राजपुत्र अपने छोटे भाइयों व सेना के साथ बहन सुलोचना के रथ के चारों तरफ चल रहे हैं।

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कुछ ही क्षणों में रथ स्वयंवरशाला

कुछ ही क्षणों में रथ स्वयंवरशाला में प्रवेश करता है। रथ पर बैठी हुई सुलोचना के ऊपर छत्र लगा हुआ है, जो सूर्य के प्रताप को रोकने में समर्थ है। आजू-बाजू में खड़ी हुई सखियॉँ चमर ढोल रही हैं। उसके शरीर की कान्ति से अनेक प्रकार के रत्नों के आभूषण भी लज्जा को प्राप्त हो रहे हैं। रत्नों की माला को हाथ में लिए हुए कंचुकी रथ की धुरी पर बैठा हुआ है। धीरे-धीरे रथ स्वयंवर मण्डप में चल रहा है और कंचुकी निम्न प्रकार से राजाओं का परिचय देता जा रहा है- ‘‘कुमारिके! देखिए, ये विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी के राजा नमि के पुत्र सुनमि हैं और ये उत्तर श्रेणी के राजा विनमि के पुत्र सुविनमि हैं। इनमें से तू किन्हीं एक को अपने पतिरूप से वरण कर.........।’’ सुलोचना कन्या जिन राजपुत्रों के सन्मुख से निकल जाती है, वे अपने भाग्य को कोसकर रह जाते हैं। आगे बढ़ते-बढ़ते वह रथ विद्याधरों की ऊँची भूमि से उतरकर नीचे भूमिगोचरियों की ओर बढ़ रहा है पुन: कंचुकी क्रम-क्रम से राजाओं का परिचय देते हुए कह रहा है। ‘‘सम्राट भरत के सबसे बड़े पुत्र कुलतिलक ये युवराज अर्वकीर्ति हैं।...ये हस्तिनापुर के राजा सोमप्रभ के सुपुत्र जयकुमार हैं........। इतना कहते ही सुलोचना की दृष्टि जयकुमार पर पड़ रही है, ऐसा देखते ही कंचुकी घोड़ों की रास थाम लेता है और कहता ही चला जाता है...। ‘‘इन्होंने चक्रवर्ती भरत महाराज के दिग्विजय के प्रसंग में उत्तर भारत में मेघकुमार नाम के देवों को जीतकर उन देवों के कृत्रिम बादलों की गर्जना को जीतने वाला सिंहनाद किया था। उस समय निधियोें के स्वामी राजा भरत ने हर्षित होकर अपनी भुजाओं द्वारा धारण किया जाने वाला ‘‘वीरपट्ट’’ इन्हें बांधा था और मेघेश्वर इनका नाम रखा था। यह भी एक आश्चर्य की बात है कि इन जयकुमार के गुण तीनों लोकों को प्रसन्न कर अब तेरे अन्त:करण को अनुरक्त करने के लिए पूर्णरूप से वापस लौटे हैं। इन्होंने दिग्विजय में अनेक देवों व राजाओं को जीतकर जयकुमार अपना नाम सार्थक कर दिया है और अब तुझे जीतने के लिए धैर्य रहित से हो रहे हैं........।’’

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उस समय जन्मान्तर का स्नेह

उस समय जन्मान्तर का स्नेह जिसे प्रेरित कर रहा है ऐसी सुलोचना जयकुमार के सुन्दर आकार को देखती हुई, कुन्दपुष्प के समान उसके गुणों को सुनती हुई, रथ से नीचे उतरती है और कंचुकी के हाथ से रत्नमाला लेकर अतिशय प्रेम में निमग्न होकर उस मनोहर माला को जयकुमार के गले में डाल देती है। उसी समय अकस्मात् सर्वबाजों की बड़ी भारी ध्वनि हो उठती है, जिससे ऐसा मालूम होता है कि दशों दिशाएँ भी बाजों की प्रतिध्वनि के बहाने सुलोचना के वर चयन के असाधारण उत्सव को ही मना रही हैं। नाथवंश के अधिपति राजा अकंपन हर्ष से रोमांचित हो उठते हैं।.....कल्पलता से युक्त कल्पवृक्ष के समान पुत्री से युक्त जयकुमार को आगे कर अतीव वैभव के साथ नगर में प्रवेश करते हैं। इधर कुछ असहिष्णु लोग कुमार अर्वकीर्ति को युद्ध के लिए व्यर्थ ही भड़का देते हैं, तब मेघेश्वर जयकुमार महाराज अकंपन की आज्ञा लेकर निकल पड़ते हैं। दोनोें पक्षों में घोर युद्ध होता है। कर्मभूमि की आदि में स्त्रीरत्न के लिए परस्पर में भयंकर युद्ध में करोड़ों प्राणियों का संहार होने का यह पहला ही प्रसंग था....... अन्त में न्याय की विजय होती है, जयश्री सुलोचना के समान ही जयकुमार के गले में जयमाला पहना देती है। अपनी विजय के अनन्तर महाराज अकंपन मंदिर में ध्यान मुद्रा में स्थित सुलोचना को बेटी! उपसर्ग दूर हो चुका है, अब तू ध्यान को संकुचित कर और घर चल, ऐसा कहकर उसे घर लाते हैं।

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महाशांतिविधान-पूजन करके

महाशांतिविधान-पूजन करके शुभ मुहूर्त में सुलोचना का विवाह जयकुमार के साथ कर देते हैं और दहेज में अमूल्य सम्पत्ति आदि देकर उनका सम्मान करते हैं। युग की आदि में होने वाले इस सुलोचना के स्वयंवर से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वयंवर प्रथा अनादि निधन है, इससे यह बात भी समझ में आ जाती है कि हमेशा ही कन्याओं के जन्म से उनके माता-पिता अपने को हीन-दीन न समझकर महान् पुण्यशाली रत्नों की खानस्वरूप समझते थे। एक कन्या की याचना के लिए हजारों राजा लालायित रहते थे। यही बात सीता के स्वयंवर में भी देखी जाती है किन्तु इस कलिकाल का माहात्म्य तो देखो कि आज जिनके कन्याएँ हैं, वे उन्हें पाप कर्मफल समझ रहे हैं। क्यों? क्योंकि एक कन्या को कई लड़के देखते हैं। यदि उसमें पाश्चात्य संस्कृति, फैशनपरस्ती, लौकिक शिक्षा या रूप विशेष नहीं है, तो पास नहीं करते हैं, उसके शील व्रत, पातिव्रत नारी धर्म आदि गुणों की कोई कीमत नहीं है। यहीं तक ही नहीं....यदि कन्या के माता-पिता लाख-दो लाख नहीं दे सकते, तो विवाह नहीं हो सकता है, चूँकि वर के माता-पिता ने अपने लाडले को पढ़ाने में बहुत ही खर्च किया है, वह लड़की वालों से ही वसूल करना है..............। अथवा लड़के का विवाह भी एक कमाई का साधन है।.....धर्म बंधुओं व बहनों! क्या पर के धन से तुम्हारा जीवन निर्वाह होगा? तुम सभी लोग इस महानिंद्य दहेज प्रथा का त्याग करो। कन्या दो कुल की भूषण है, उसका स्वयं में मूल्य क्या है! सोचो, वह अमूल्यरत्न है! शील आदि गुणों से युक्त दोनों कुलों को समुन्नत कर देती है, आगे वही उत्तम-उत्तम पुरुषरूपी रत्नों की खान होने वाली है। उसके जीवन को अपमानित मत करो। उनके माता-पिता को भी त्रसित मत करो।