कन्या भ्रूण हत्या: एक जघन्य अपराध है

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कन्या भ्रूण हत्या: एक जघन्य अपराध है

पं. शिखरचंद्र जैन ‘साहित्याचार्य’, सागर

कन्या भ्रूण हत्या एक घिनौना दुष्कृत्य है, जिसका आगामी फल भवभवान्तर तक भोगना पड़ता है। आज विश्व में भ्रूण हत्या विशेषकर कन्या भ्रूण हत्या अत्यधिक तेजी से बढ़ रही है, यह एक गंभीर स्थिति है। अत्याधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों का दुरुपयोग कर गर्भ में स्थित कन्या की हत्या कर दी जाती है। अमेरिका में बनी फिल्म जिसका नाम है ‘सायलेंट क्रीज’ ने गर्भस्थित शिशु की हत्या में उसका चीखना, चिल्लाना, असहनीय वेदना के दृश्य को देखकर अमेरिका सरकार ने भ्रूण हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया। विनाश करना मानव का स्वभाव नहीं है फिर भी अपने सांसारिक स्वार्थ के वशीभूत होकर कन्या भ्रूण हत्या के लिए विवश हो जाता है। जिसके हृदय में दया जीवरक्षा का भाव नहीं है वही विश्वशांति का पाठ पढ़ाने वाला भारत देश कभी भी हिंसा करने की अनुमति नहीं देता। भारत धर्म गुरू रहा है। कहा भी है—

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‘‘एतत् देश प्रसूतस्य, सकाशादग्र जन्मन:।

स्वंस्वं चरित्रं शिक्षेरन् , पृथिव्यां सर्वमानवा:।।’’

कन्या भ्रूण हत्या क्यों ?—

पहले लोग अपना वंश बढ़ाने के लिए पुत्र की आशा में एक के बाद एक बच्चे पैदा करते जाते थे।आज लोग पुत्र रत्न की प्राप्ति की चाह में एक के बाद एक कन्या भ्रूण हत्या करवाते जाते हैं। यह सर्वविदित है कि फूल, पत्तियाँ तोड़ना भी पाप की श्रेणी में आता है क्योंकि जैन मतानुसार उनमें भी जान है। तब पंचेन्द्रिय जीव अर्थात् कन्या भ्रूण की हत्या कितना अक्षम्य अपराध है। अपराध के लिए जिम्मेदार कौन हैं ? वे जो भू्रण हत्या करवा रहे हैं अथवा जो भ्रूणहत्या कर रहे हैं। शायद दोनों जिम्मेदार हैं। पर इन दोनों से बड़ी दोषी है मनुष्य की संकीर्ण मानसिकता । वंश बढ़ाना, बुढापे का सहारा, दहेज प्रथा, बिना भाई के बहिन की शादी में होने वाली परेशानियाँ आदि कन्या भ्रूण हत्या के लिए दोषी हैं।

आज के नवयुवकों को अपने दादा तथा परदादाओं के नाम तक तो मालूम नहीं होते हैं और हम आशा लगाते हैं कि वंश चलाने में लड़कों का योगदान है, लडकियों का नहीं। आज लड़कियों ने न केवल अध्यात्मिक क्षेत्र में ब्राह्मी सुन्दरी, सीता, सावित्री, मन्दोदरी, मैना सुन्दरी बनकर नाम रोशन किया है, बल्कि विज्ञान के क्षेत्र में अन्तरिक्ष में उड़ान भरके कल्पना चावला ने तथा धाविका बनकर पी.टी.उषा ने यशस्वी इतिहास बनाया है। गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी, सुपाश्र्वमती माताजी आदि ने तथा भारत की संविधान की प्रतीक राष्ट्रपति के रूप में श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने नारी जगत की प्रतिभा को सुशोभित किया है। अत: यदि धीरे—धीरे लोगों की मानसिकता में लड़के—लड़की का फर्फ करने की बात समाप्त हो जाती है तभी कन्या भ्रूण हत्या बंद हो सकती है।

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चिन्तनीय—

गर्भधारण के बाद अल्ट्रासाउण्ड, एग्नियोसेंटेसिस आदि तकनीकों के माध्यम से गर्भस्थ शिशु का लिंग पता किया जाता है। इन तकनीकों का मुख्य उपयोग गर्भस्थ शिशु में आनुवांशिक बीमारियों को समय से पता कर उसका निदान कर स्वस्थ शिशु पैदा करना है। किन्तु इनका दुरुपयोग हो रहा है। परिणामस्वरूप १९९१ में १००० लड़कों के अनुपात में ८७५ लड़कियाँ थीं। आज पंजाब जैसे राज्य में यह अनुपात घटकर ७९३ रह गया है।

प्रासंगिक विश्लेषण—

हमारे देश की पावन धरती पर जहाँ ‘नारी सर्वत्र पूज्यते’ तथा ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ तथा’ एक नहीं दो—दो मात्राएँ नर से बढ़कर नारी की’ शाश्वत सूक्तियाँ घटित होती हैं वहीं गर्भस्थ शिशु की विशेषकर कन्या भू्रण की हत्या करना तथा कराना एक जघन्य अपराध है। नारी उत्पीड़न की तो दूर की बात है आज तो नारी को दुनिया में आने की सहमति स्वयं माँ भी नहीं देती जो कि नारी है।’’ अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ‘‘आँचल में दूध और आँखों में पानी’’ यह नारी जीवन की यथार्थ फलश्रुति है। चिन्तनीय यह है कि भगवान महावीर, बौद्ध एवं महात्मा गांधी के महान् अहिंसा सिद्धान्त को भूलकर अपने जीवन को अधोगति में ले जा रहे हैं। जो एक बार जीव का घात करता है वह स्वयं अनेक जन्मों में मारा जाता है जो एक जीव पर दया करता है वह स्वयं अनेक जन्मों में दूसरे जीवों के द्वारा रक्षित किया जाता है। अत: दु:ख से डरने वाले मनुष्य को कांटे की तरह हिंसा से बचना चाहिए। युद्ध और हिंसा में विश्वास रखने वाले देश भी तलवार से अधिक अहिंसा की शक्ति को स्वीकार करने लगे हैं। भगवान महावीर की अहिंसा की नीति फैलाने के कारण प्रत्येक देश भारत से विश्वशांति की आशा करता है।

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अत: समय रहते कन्या भ्रूण हत्या पर काबू नहीं पाया गया तो न सामाजिक मूल्य रहेंगे, न समाज , न आपसी संबंध। विचारणीय है कि जब जन्म देने वाली ही नहीं रहेगी तो इस पृथ्वी पर कौन रहेगा? केवल परम्पराओं को मात्र निभाते हुए तुच्छ मानसिकता के दौर में लोग मशीनों की सहायता से मात्र तीन—माह में ही कन्या भ्रूण को आँख खोलने से पहले ही मार डालते हैं।ऐसा लगता है इंसान की करुणा को लकवा मार गया है।मानव का मरना उतना दु:ख नहीं होता जितना कि मानवता का मरना। भ्रूण हत्या के खिलाफ केवल कागज पर कानून बनाने से कोई लाभ नहीं । आज भी चोरी छिपे यह काम जोर—शोर से चल रहा है। सरकारी मशीनरी आज तक किसी डॉक्टर, अल्ट्रासोनोलाजिस्ट या लेबोरेटरी वालों को बेनकाब नहीं कर सकी। अपनी मानसिकता बदलने से ही इस समस्या का समाधान हो सकता है।

आज भी कई नवयुवक अविवाहित हैं। उन्हें कन्या के अभाव में अविवाहित ही रहना पड़ रहा है। बलात्कार, अपहरण,महिलाओं के प्रति अत्याचार बहुपति प्रथा, वैश्यावृत्ति बढ़ रही है। मनोवैज्ञानिक तौर पर सामाजिक तथा आत्मीय संबंध टूट रहे हैं। अत: सभी को मिलजुल कर इस समस्या को रोकना चाहिए। बदले परिवेश में करुणा के लिए कोई स्थान नहीं है। यहाँ वात्सल्य भाव का अभाव सा दिखने लगा है।पुत्री को समाज में समादर के अभाव में समाज पंगु हो जावेगा। नारी पुत्री अब अबला नहीं है। सबला है। आज जो भी समीचीन संस्कारों का स्थायित्व शेष बचा है, वह नारी की महिमा है। नर से नारायण बनने की कल्पना नारी के बिना संभव नहीं है।

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हम सब यह संकल्प करें कि समसामयिक प्रयास करें ताकि अहिंसा करुणा की भावना भीतर से जागृत करावें तथा कन्या भ्रूण हत्या रोकने में सक्रिय सहयोगी बनें। हम प्रतिज्ञा करें कि—

फल खाये अहिंसा वृक्ष के, टूटन लागे पात।

कन्या जीव न मर सके, कभी न हो उत्पात।।

यह भी अमर संदेश दें कि —

नव देवताओं की जो नित आराधना करें।

वह मृत्युराज की भी तो विराधना करें।।

कन्या भ्रूण हत्या जघन्य अपराध है। इसे रोकने का प्रयास करना ही अहिंसा धर्म की सार्थकता है। पूज्य माताजी के पावन चरणों में वँदामि कर यही भावना भाता हूँ।

मैत्री भाव जगत में मेरे, सब जीवों से नित्य रहे।

दीन दुखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा स्रोत बहे।।

ऋषभ देशना, पत्रिका