ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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कम्पिलपुरी तीर्थ की आरती

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कम्पिलपुरी तीर्थ की आरती

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कम्पिलपुरी तीरथ मेरा, पावन परमधाम है,
आरती का थाल ले, तीर्थधाम को जजूँ, जिनधर्म की शान है।।टेक.।।
तेरहवें तीर्थंकर श्री विमल हैं, जन्म कम्पिलापुर में लिया।
धनद ने माता पिता के महल में, पन्द्रह मास रत्नवृष्टि किया।।
देव वहाँ आए, कल्याणक मनाए, उत्सव मनावें नगरी में-२
कृतवर्मा पितु, जयश्यामा माँ का, देखो खिला भाग्य है।।
आरती का थाल ले.............।।१।।
आगम में वर्णित है एक गाथा, सती द्रौपदी का कथानक जुड़ा।
राजा द्रुपद की कन्या द्रौपदी, जन्मस्थान यहीं का कहा।।
पांचाल नगरी की, राजधानी है ये, द्रौपदी तभी पाञ्चाली हुई-२
यह भूमी है ऐतिहासिक, जग भर में विख्यात हैै।।
आरती का थाल ले.............।।२।।
प्राचीन इक जिनमंदिर यहाँ है, गंगा किनारे नगरी बसी।
जन जन की श्रद्धा का केंद्र है यह, हरिषेण चक्री की भूमी यही।।
मैं भी करूँ दर्शन, शीश झुका वंदन, ‘‘चंदनामती’’ मुझे शक्ती मिले।
आत्मा मेरी निर्मल बने, पावे परम धाम है।।
आरती का थाल ले.............।।३।।