ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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करो जाप, हरो पाप

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करो जाप, हरो पाप

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परम पूज्य राष्ट्रसंत सूरि गच्छाचार्य गणाचार्य श्री १०८ विरागसागर जी महाराज

हम इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं कि जिन क्या हैं ? जैन व जैन धर्म किसे कहते हैं ? अब हम अपने अगले विषय पर चलेंगे कि माला क्यों फैरना चाहिए ?

कहा गया है— करो जाप, हरो पाप। दिन भर में हमसे न जाने कितने प्रकार के पाप हो जाते हैं। उनकी निर्वृत्ति के लिए माला अवश्य फैरना चाहिए।

दिगम्बर जैन परंपरा में माला के अंत में तीन दाने होते हैं। आप जानते हैं क्या है इसका प्रयोजन? हम पाप नष्ट करना चाहते हैं औ पाप नष्ट वैकैसे होंगे ? रत्नत्रय से, और तब कहीं हम मुक्ति पा सकते हैं । पूरी माला फैरने के उपरान्त इन तीन मोतियों पर क्रमश: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्राय नम: तथा कितने ही, ऊँ हृी अष्टांग सम्यग्दर्शनाय नम:, ऊँ हृीं अष्टांग सम्यग्ज्ञानाय नम:, ऊँ हृीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय नम: बोलते हैं।

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माला में १०८ दाने क्यों ?

मूलत: १०८ प्रकार के पाप होते हैं । जैसा कि आलोचना पाठ में पढ़ते हैं।

समरम्भ समारम्भ आरम्भ, मन वच तन कीने प्रारम्भ । कृत कारित मोदन करिकै, क्रोधादि चतुष्टय धरिकै ।।

समरम्भ — पाप कार्य के पहले मन मे योजना बना लेना समरम्भ है।

समारम्भ — पापों की साधनभूत सामग्रियाँ एकत्रित करना समारम्भ है।

आरम्भ — पाप कार्य शुरु करना।

दृष्टांत — मान लीजिए किसी को बीड़ी पीने की इच्छा हुई, यह इच्छा, योजना समरम्भ है। अब वह बीड़ी माचिस जुटाता है यह समारम्भ है, तथा बीड़ी सिलगाता है यह आरम्भ है।इस प्रकार ये प्रावृत्तियाँ दो या तीन रूप से भी हो सकती हैं , मन, वचन, काय से।

मन समरंभ — मन में पाप करने का विचार करना।

मन समांरभ — मन से पापों की सामग्री जुटाने की कल्पना करना।

मन आरम्भ — मन से पाप कर लेना।

दृष्टांत — व्यक्ति सोच रहा है — ‘ मुझे बीड़ी पीना है।’ यह मन — समरंभ है। अब आगे सोचता है कि वहाँ माचिस मिलेगी, वहाँ बीड़ी, वहाँ जाकर पी लूँगा— यह मन समारंभ तथा मन में ही सोचे—सिलगा लिया है, पीना शुरु हो गया, यह मन आरंभ है।

वचन समरंभ — वचनों से पाप का संकल्प करना।

वचन समारंभ — वचनों से पाप की सामग्री जुटाना।

वचन आरम्भ — वचनों से पाप कर लेना।

दृष्टांत — व्यक्ति कहता है— मुझे बीड़ी पीना है— यह वचन समारंभ, बीड़ी पीने की सामग्री लाने कहता है— यह वचन समारंभ तथा अब मैं बीड़ी पियूँगा , ऐसा कहना—वचन आरंभ का दृष्टांत है।

काय समरंभ — काय से पाप का संकल्प।

काय समारंभ — काय से पाप की सामग्री जुटाना।

काय आरंभ — काय से पाप करना।

दृष्टांत </fon>— व्यक्ति शरीर से पाप का संकल्प करता है अर्थात् मुँह में बीड़ी ले जाता है यह काय समरंभ, फिर माचिस या लाईटर से जलाता है यह काय समांरभ तथा पीने लगता है यह काय आरंभ हुआ।

कृत — (स्वयं करना), कारित (दूसरों से करवाना), व अनुमोदना (प्रशंसा करना या संतुष्ट होना) ये ३ भंग हो गए।

इस प्रकार (समरंभ) ३² (समारंभ) ३²३ (कृत, कारित, अनुमोदना)·२७ भंग हुए। ये सारी चेष्टायें कभी क्रोधवश होती हैं, कभी शेष तीन मानादि कषायवश। संसार में कोई प्राणी (अरिहंत के सिवाय) कषाय— रहित नहीं है। सिद्धांत बोलता है कि २४ घण्टे कषाय का उदय रहता है। सारे कार्य कषायान्तर्गत है। अंतर इतना है कि किसी को तीव्र , तो किसी को मंद कषाय पाई जाती है। कषाय दसवें गुणस्थान तक रहती है। इसलिए उपर्युक्त २७ भेदों में ४ का गुणा करने पर पाप के १०८ भेद बन जाते हैं। इसलिए माला फेरने का प्रयोजन भी ध्यान में रखना चाहिए । साधु सन्त बोलते हैं कि दिन भर में जितने पाप कमाते हैं, उसके लिए कम से कम एक माला तो अवश्य फैरना चाहिए। कुछ न कुछ प्रतिशत तो पाप धुलेंगे। हमने एक बीड़ी को हेतु लेकर एक विभाग बनाया लेकिन और कितने पाप हैं। प्रत्येक के १०८—१०८ विभाग बनते हैं? इसलिए अधिक से अधिक जाप करना चाहिए। पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री १०८ विमल सागर जी महाराज कहा करते थे कि प्रतिदिन ५ माला अनिवार्य रूप से फैरनी चाहिए। लेकिन आज के समय व्यक्ति इतना व्यस्त है कि १ माला भी फैरना कठिन लगता है । कम से कम ९ बार तो पढ़ना ही चाहिए । क्योंकि ९ का अंक शाश्वत है। आप ९ का पहाड़ा पढ़ते जाइए और जो प्राप्त हो उन अकों को परस्पर जोड़कर देखिए तो ९ का ही अंक आएगा। जैसे — ९²१·९, ९²२·१८, १±८·९ इसलिए संक्षेप में बताते हैं कि पाप नव कोटि से समरम्भ, समारम्भ, आरम्भ, मन, वचन, काय, कृत, कारित, अनुमोदना से होते हैं। इसलिए हम ९ बार णमोकार मंत्र पढ़ते हैं, यही हमारे कायोत्सर्ग की पद्धति है।