ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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कर्तव्य :

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कर्तव्य :

मा होह कोवणा भो खलेसु मित्त च मा कुणह।।
—कुवलयमाला : ८५

हे मानव ! जीवों को मत मारो, उन पर दया करो, सज्जनों को अपमानित मत करो, क्रोधी मत होओ और दुष्टों से मित्रता न करो।

धम्मम्मि कुणह वसणं राओ सत्थेसु णिउणभणिएसु।

पुणरुत्तं च कलासु ता गणणिज्जो सुयणमज्झे।।

—कुवलयमाला : ८५


शास्त्रों में, विद्वानों के वचनों में अनुराग करो एवं धर्म का अभ्यास करो एवं कलाओं का बार—बार पुनरावर्तन करो, तब सज्जनों के बीच में गिनने योग्य होवोगे।

थोवं थोवं धम्मं जइ ता बहुं न सक्केह।

पेच्छह महानईयो बिन्दूहिं समुद्दभूयाओ।।

—अर्हत्प्रवचन : १९-१४

यदि अधिक न कर सको तो थोड़ा—थोड़ा ही धर्म करो। बूँद—बूँद से समुद्र बन जाने वाली महानदियों को देखो।