ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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कर्मदहन स्तोत्र

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कर्मदहन स्तोत्र

शंभुछंद- तर्ज - यह नंदनवन...........

जय जय जिनमणि, जग चूड़ामणि, तुम कर्मरहित सिद्धीपति हो।
मन वच तन से, सब सिद्धों के, चरणों में मेरी प्रणती हो।।जय.।।
प्रभु चार अनंतानूबंधी, त्रय दर्शन मोह विनाश किया।
क्षायिक सम्यक्त्वी मुनी बने, फिर क्षपक श्रेणि को मांड लिया।।
गुणस्थान नवम में छत्तिस प्रकृती, नाश आप मुनिगणपति हो।।जय.।।१।।

दशवें में सूक्ष्म लोभ नाशा, नर आयु बिना त्रय आयु नहीं।
बारहवें में सोलह प्रकृती, कर नाश केवली हुये यहीं।।
इन त्रेसठ प्रकृती के क्षय से, परमात्मा नव लब्धीपति हो।।जय.।।२।।

ज्ञानावरणी दर्शनावरण मोहनीय व अंतराय घाती।
पण नव अट्ठाइस पाँच कही, त्रय आयु नाम की तेरह ही।।
इन कर्म रहित धनपति विरचित, प्रभु समवसरण लक्ष्मीपति हो।।जय.।।३।।

गुणथान चौदवें में द्विचरम, के समय बहत्तर प्रकृति हनी।
फिर अंत समय तेरह प्रकृती, नाशा शिवतिय से प्रीति घनी।।
प्रभु गुणस्थान से रहित हुये, शिवधाम गये त्रिभुवनपति हो।।जय.।।४।।

इन इक सौ अड़तालिस प्रकृती, के भेद असंख्य अनंत कहे।
प्रभु द्रव्य भाव नोकर्म नाश, यमराज शत्रु का अंत किये।।
सुख ज्ञान दर्श वीरज आदिक, निज के अनंत गुण निधिपति हो।।जय.।।५।।

प्रभु मोह नाश क्षायिक समकित, ज्ञानावरणी हन पूर्णज्ञान।
दर्शनरज नाश पूर्ण दर्शन, हन अंतराय वीरज अमान।।
हन नामकर्म सूक्ष्मत्व लिया, हन गोत्र अगुरुलघु गुणयुत हो।।जय.।।६।।

हन आयू अवगाहन गुणधृत, हन वेदनीय अव्याबाधी।
सुख लिया अनंत अतीन्द्रिय प्रभु, नाशी सब जन्म मरण व्याधी।।
प्रभु आठकर्म से रहित आठगुण सहित मोक्षनगराधिप हो।।जय.।।७।।

जो भव्य आपकी भक्ति करें, द्वयविध रत्नत्रय युक्ति धरें।
निज शक्ति प्रगट कर मुक्ति वरें, गुणरत्नों का भंडार भरें।।
तुम भक्तों को निज सम करते, इससे अद्भुत पारसमणि हो।।जय.।।८।।

इस ढाईद्वीप में कर्मभूमि, इक सौ सत्तर बतलाई हैं।
उनसे तीर्थंकर आदि नरों, ने मुक्तिवल्लभा पाई हैं।।
तीर्थंकर होकर शिव पाते, उन सबको मेरी शिरनति हो।।जय.।।९।।

बिन तीर्थंकर भी चक्रवर्ति, बलभद्र कामदेवादि पुरुष।
बिन पदवी के सामान्य मनुष, शिवपद पा लेते कर्मवियुत।।
उपसर्ग बिना उपसर्ग सहित, अगणित नरपुंगव शिवपति हों।।जय.।।१०।।

जल से थल से नभ से भी तो, शिव गये अनंतानंत मनुज।
सुर या खेचर उपसर्ग किया, जल या नभ में छोड़ा दुखप्रद।।
धर शुक्लध्यान तत्क्षण कर्मों, को नाश अंतकृत केवलि हों।।जय.।।११।।

जो द्रव्यपुरुष वेदी भावों, से हुये नपुंसक वेदी भी।
या भावों से स्त्रीवेदी, मुक्ती पा जाते हैं ये भी।।
ये भाव भेद त्रयविध मुनिगण, शिव गये उन्हें नित शिरनति हो।।जय.।।१२।।

जो सिद्ध हुये हैं, होते हैंं, होवेंगे ये त्रय कालों के।
इनको शत शत वंदन मेरा, ये मेरे अघ को नाशेंगे।।
वैवल्य ‘ज्ञानमति’ हेतु आज, सिद्धों को नमते शिवगति हो।।जय.।।१३।।

-शेरछंद-

जो भव्य कर्मदहन का स्तोत्र पढ़ेंगे।
वे भाव कर्म द्रव्यकर्म दहन करेंगे।।
निज का परम अतीन्द्रिय सुख प्राप्त करेंगे।
रवि ‘ज्ञानमती’ से यहाँ प्रकाश भरेंगे।।१४।।