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कर्मबंध के भेद

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कर्मबंध के भेद

कषाय सहित जीव जो कर्म पुद्गलों को ग्रहण करता है, वह बंध है। इसके चार भेद हैं - प्रकृतिबंध, स्थितिबंध, अनुभागबंध और प्रदेशबंध। कर्मों का ज्ञानादि के ढकने का स्वभाव होना प्रकृतिबंध है। कर्मों मे आत्मा के साथ रहने की मर्यादा स्थितिबंध है। कर्मोें में तीव्र-मंद आदि फल देने की शक्ति अनुभाग बंध है। कर्मरूप हुए पुद्गल परमाणुओं की संख्या को प्रदेश बंध कहते हैं।

विशेषार्थ - इनमें से प्रकृति और प्रदेशबंध योग से होते हैं तथा स्थिति और अनुभागबंध कषाय से होते हैं। प्रकृतिबंध के मूल आठ भेद हैं- (१) ज्ञानावरण

(२) दर्शनावरण

(३) वेदनीय

(४) मोहनीय

(५) आयु

(६) नाम

(७) गोत्र

(८) अन्तराय। इन आठ कर्मों के उत्तर भेद १४८ हैं अथवा असंख्यात लोक प्रमाण हैं। यहाँ १४८ भेदों को बतलाते हैं-ज्ञानावरण के ५, दर्शनावरण के ९, वेदनीय के २, मोहनीय के २८, आयु के ४, नाम के ९३, गोत्र के २ और अन्तराय के ५, ऐसे १४८ उत्तर भेद हैं।

ज्ञानावरण के भेद

ज्ञानावरण के ५ भेद हैं- १. मतिज्ञानावरण २. श्रुतज्ञानावरण ३. अवधिज्ञानावरण ४. मन:पर्ययज्ञानावरण ५. केवलज्ञानावरण।

१. मतिज्ञानावरण-जो मतिज्ञान को नहीं होने देता, उसे मतिज्ञानावरण कहते हैं।

२. श्रुतज्ञानावरण-जो शास्त्रज्ञान को नहीं होने देता, उसे श्रुतज्ञानावरण कहते हैं।

३. अवधिज्ञानावरण-जो अवधिज्ञान को नहीं होने देता, उसे अवधिज्ञानावरण कहते हैं।

४. मन:पर्ययज्ञानावरण-जो मन:पर्ययज्ञान को नहीं होने देता, उसे मन:पर्ययज्ञानावरण कहते हैं।

५. केवलज्ञानावरण-जो केवलज्ञान को नहीं होने देता, उसे केवलज्ञानावरण कहते हैं।

दर्शनावरण के भेद

दर्शनावरण के ९ भेद हैं- १. चक्षुदर्शनावरण

२. अचक्षुदर्शनावरण

३. अवधिदर्शनावरण

४. केवलदर्शनावरण

५. निद्रा

६. निद्रानिद्रा

७. प्रचला

८. प्रचलाप्रचला

९. स्त्यानगृद्धि।

१. चक्षुदर्शनावरण-जो कर्म चक्षु इन्द्रिय से होने वाले सामान्य अवलोकन को नहीं होने देता, उसे चक्षुदर्शनावरण कहते हैंं।

२. अचक्षुदर्शनावरण-जो चक्षु इन्द्रिय के बिना शेष चार इन्द्रिय और मन से होने वाले सामान्य अवलोकन को नहीं होने देता, उसे अचक्षुदर्शनावरण कहते हैं।

३. अवधिदर्शनावरण-जिसके उदय से अवधिदर्शन का घात होता है, उसे अवधिदर्शनावरण कहते हैं।

४. केवलदर्शनावरण-जिसके उदय से केवलदर्शन का घात होता है, उसे केवलदर्शनावरण कहते हैं।

५. निद्रा-जिस कर्म के उदय से निद्रा आती है, उसे निद्रा दर्शनावरण कहते हैं।

६. निद्रानिद्रा-जिसके उदय से नींद पर नींद आती है, उसे निद्रानिद्रा कहते हैं।

७. प्रचला-जिसके उदय से प्राणी कुछ जागता है, कुछ सोता है, उसे प्रचला कहते हैं।

८. प्रचलाप्रचला-जिसके उदय से सोते समय मुख से लार बहती है और अंगोपांग भी चलते हैं, उसे प्रचलाप्रचला कहते हैं।

९. स्त्यानगृद्धि-जिसके उदय से प्राणी सोते समय नाना प्रकार के भयंकर काम कर डालता है और जागने पर कुछ मालूम नहीं रहता कि मैंने क्या किया है, उसे स्त्यानगृद्धि कहते हैं।

वेदनीय के भेद

वेदनीय के दो भेद हैं-सातावेदनीय और असातावेदनीय। १. सातावेदनीय-जिस कर्म के उदय से शारीरिक और मानसिक अनेक प्रकार की सुख-सामग्री मिले या सुख मिले, उसे सातावेदनीय कहते हैं।

२. असातावेदनीय-जिसके उदय से दु:खदायक सामग्री या दु:ख प्राप्त हो, वह असातावेदनीय है।

मोहनीय के भेद

मोहनीय कर्म के २ भेद हैं-दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय। इसमें दर्शनमोहनीय के ३ भेद हैं तथा चारित्रमोहनीय के पहले दो भेद हैं-कषायवेदनीय और अकषायवेदनीय। कषायवेदनीय के १६ भेद हैं और अकषायवेदनीय के ९ भेद हैं। ऐसे दर्शनमोह के ३ और चारित्रमोह के २५ मिलाकर २८ भेद हुए।

दर्शनमोहनीय के भेद

जो आत्मा के सम्यक्त्व गुण का घात करता है, उसे दर्शनमोहनीय कहते हैं। उसके तीन भेद हैं-मिथ्यात्व, सम्यक्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व। १. मिथ्यात्व-जिस कर्म के उदय से तत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान नहीं होता, उसे मिथ्यात्व कहते हैं।

२. सम्यक्मिथ्यात्व-जिस कर्म के उदय से दही और गुड़ के मिश्रित स्वाद के समान तत्त्वों का श्रद्धान और अश्रद्धान दोनों रूप से मिश्रित भाव होता है, वह सम्यक्मिथ्यात्व है।

३. सम्यक्त्व-जिस कर्म के उदय से सम्यग्दर्शन में दोष उत्पन्न होता है, वह सम्यक्त्व प्रकृति है।

चारित्रमोहनीय के भेद

जिस कर्म के उदय से आत्मा के चारित्र गुण का घात होता है, उसे चारित्र मोहनीय कहते हैं। इसके दो भेद हैं-कषाय वेदनीय और अकषाय वेदनीय। जो आत्मा के गुण-शुभ या शुद्ध भाव को कषता है, नष्ट करता है, उसे कषायवेदनीय कहते हैं। इसके १६ भेद हैं-अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ। अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ। प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ और संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ। अनंतानुबंधी-जो अनंत अर्थात् मिथ्यात्व के साथ-साथ बंधती है, उसे अनंतानुबंधी कहते हैं। अथवा जिसके उदय से सम्यक्त्व का घात हो, वह अनंतानुबंधी है। उसके क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार भेद हैं।

अप्रत्याख्यानावरण-जिसके उदय से एकदेशव्रत को भी धारण नहीं कर सके, उसे अप्रत्याख्यानावरण कहते हैं। प्रत्याख्यानावरण-जिसके उदय से जीव मुनियों के चारित्र को धारण नहीं कर सके, वह प्रत्याख्यानावरण है। संज्वलन-जिसके उदय से यथाख्यातचारित्र न हो सके, उसे संज्वलन कहते हैं। जो क्रोधादि की तरह आत्मा के गुणों का घात नहीं करे किन्तु किंचित् घात करे अथवा कषाय के साथ-साथ अपना फल देवे, वह अकषाय वेदनीय है। उसके ९ भेद हैं-हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेद। १. हास्य-जिसके उदय से हंसी आवे।

२. रति-जिसके उदय से इन्द्रिय के विषयों में राग हो।

३. अरति-जिसके उदय से विषयों में द्वेष हो।

४. शोक-जिसके उदय से शोक या चिंता हो।

५. भय-जिसके उदय से डर या उद्वेग हो।

६. जुगुप्सा-जिसके उदय से दूसरे से ग्लानि हो।

७. स्त्रीवेद-जिसके उदय से पुरुष से रमने की इच्छा हो।

८. पुंवेद-जिसके उदय से स्त्री से रमने की इच्छा हो।

९. नपुंसकवेद-जिसके उदय से स्त्री-पुरुष दोनों से रमने की इच्छा हो।

आयु के भेद

आयु कर्म के चार भेद हैं-नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु। नरकायु-जिस कर्म के उदय से प्राणी नारकी के शरीर में रुका रहता है, उसे नरकायु कहते हैं। इसी तरह शेष आयु के भी लक्षण समझना चाहिए।

नामकर्म के भेद

नामकर्म के ९३ भेद हैं-गति ४, जाति ५, शरीर ५, अंगोपांग ३, निर्माण १, बंधन ५, संघात ५, संस्थान ६, संहनन ६, स्पर्श ८, रस ५, गंध २, वर्ण ५, आनुपूर्वी ४, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, अप्रशस्तविहायोगति, प्रत्येक, साधारण, त्रस, स्थावर, सुभग, दुर्भग, सुस्वर, दु:स्वर, शुभ, अशुभ, सूक्ष्म, बादर, पर्याप्ति, अपर्याप्ति, स्थिर, अस्थिर, आदेय, अनादेय, यशस्कीर्ति, अयशस्कीर्ति और तीर्थंकर ये ९३ प्रकृतियाँ हैं। गति-जिस कर्म के उदय से प्राणी दूसरे भव या पर्याय में जाता है, वह गति है। उसके ४ भेद हैं-नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति। जाति-जिस कर्म के उदय से अनेक प्राणियों में अविरोधी समान अवस्था प्राप्त होती है, उसे जाति कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं-एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रिय जाति और पंचेन्द्रिय जाति। जिस कर्म के उदय से जीव एकेन्द्रिय जाति में पैदा हो, वह एकेन्द्रिय जाति है, इत्यादि। शरीर-जिस कर्म के उदय से प्राणी की शरीर रचना होती है, वह शरीर है। इसके ५ भेद हैं-औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण।

१. औदारिक-जिस कर्म के उदय से औदारिक शरीर की रचना होती है। मनुष्य और तिर्यंच के स्थूल शरीर को औदारिक शरीर कहते हैं।

२. वैक्रियिक शरीर-जिसके उदय से शरीर में स्थूल, सूक्ष्म, हल्का, भारी आदि अनेक प्रकार से होने की योग्यता होती है।

३. आहारक शरीर-आहारक ऋद्धि वाले छठे गुणस्थानवर्ती मुनि के मस्तक से जो एक हाथ का पुतला निकलता है।

४. तैजस शरीर-जिसके उदय से शरीर में तेज होता है।

५. कार्मण शरीर-ज्ञानावरणादि आठ कर्मों के समूह को कार्मण शरीर कहते हैं।

अंगोपांग-जिस कर्म से अंग और उपांगों की रचना होती है, उसे अंगोपांग कहते हैं। इसके तीन भेद हैं-औदारिक शरीर अंगोपांग, वैक्रियिक शरीर अंगोपांग और आहारक शरीर अंगोपांग। दो हाथ, दो पांव, नितंब, पीठ, वक्षस्थल, और मस्तक ये आठ अंग हैं तथा अंगुलि, आँख, कान आदि उपांग हैं।

निर्माण-जिस कर्म के उदय से अंगोपांग की यथास्थान और यथा- प्रमाण रचना होती है, वह निर्माण नाम का कर्म है।

बंधन-शरीर नाम कर्म के उदय से ग्रहण किये गये पुद्गल स्कधों का परस्पर मिलन जिस कर्म के उदय से होता है, उसे बंधन नामकर्म कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं-औदारिक बंधन, वैक्रियिक बंधन, आहारक बंधन, तैजस बंधन और कार्मण बंधन।

संघात-जिस कर्म के उदय से औदारिक आदि शरीर के प्रदेशों का परस्पर छिद्ररहित एकमेकपना होता है, वह संघात है। उसके पाँच भेद हैं-औदारिक संघात, वैक्रियिक संघात, आहारक संघात, तैजस संघात और कार्मण संघात।

संस्थान-जिस कर्म के उदय से शरीर का आकार बनता है, वह संस्थान है। इसके छ: भेद हैं-समचतुरस्रसंस्थान, न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान, स्वातिसंस्थान, कुब्जकसंस्थान, वामनसंस्थान और हुंडकसंस्थान।

१. समचतुरस्र-जिस कर्म के उदय से शरीर की लम्बाई-चौड़ाई सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार ठीक-ठीक बनी हो, उसे समचतुरस्र संस्थान कहते हैं।

२. न्यग्रोधपरिमंडल-जिस कर्म के उदय से शरीर का आकार वटवृक्ष की तरह नाभि के नीचे पतला और ऊपर मोटा हो।

३. स्वाति-जिस कर्म के उदय से शरीर का आकार सर्प की बामी की तरह ऊपर पतला और नीचे मोटा हो।

४. कुब्जक-जिस कर्म के उदय से शरीर कुबड़ा हो।

५. वामन-जिस कर्म के उदय से शरीर बौना होवे।

. हुंडकसंस्थान-जिस कर्म के उदय से शरीर का आकार किसी खास शक्ल का न हो, प्रत्युत् बेडौल हो।

संहनन-जिस कर्म के उदय से हड्डियों में विशेषता हो, वह संहनन है। इसके छ: भेद हैं-वङ्कावृषभनाराच, वङ्कानाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलित और असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन।

१. वङ्कावृषभनाराच-जिस कर्म के उदय से वृषभ (नसों की हड्डियों का बंधन), नाराच (कील), संहनन (हड्डियाँ) वङ्का के समान अभेद्य हों।

२. वङ्कानाराच-जिस कर्म के उदय से वङ्का की हड्डियाँ और वङ्का की कीली हों परन्तु नसों में जाल वङ्का के समान नहीं हो।

३. नाराच-जिस कर्म के उदय से हड्डियों तथा संधियों में कीलें तो हों परन्तु वङ्का के समान कठोर न हों और नसाजाल भी वङ्कावत् कठोर न हो।

४. अर्धनाराच-जिस कर्म के उदय से हड्डियों की कीलियाँ अर्धकीलित हों, एक तरफ कीलें हों, दूसरी तरफ न हों।

५. कीलित-जिस कर्म के उदय से हड्डियाँ परस्पर कीलित हों।

६. असंप्राप्तसृपाटिका-जिस कर्म के उदय से हड्डियों की संधियाँ नसों से बंधी होती हैं परन्तु परस्पर में कीलित नहीं होती हैं।

स्पर्श-जिस कर्म के उदय से शरीर में स्पर्श हो। इसके ८ भेद हैं-कोमल, कठोर, गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध और रुक्ष।

रस-जिस कर्म के उदय से शरीर में रस हो। इसके पाँच भेद हैं-तिक्त (चरपरा), कटुक (कडुवा), कषाय (कषायला), आम्ल (खट्टा) और मधुर (मीठा)।

गंध-जिस कर्म के उदय से शरीर में गंध हो। उसके दो भेद हैं-सुगंध और दुर्गंध।

वर्ण-जिस कर्म के उदय से शरीर में रूप हो। उसके ५ भेद हैं-नील, शुक्ल, कृष्ण, रक्त और पीत।

आनुपूव्र्य-जिस कर्म के उदय से अन्य गति को जाते हुए प्राणी का आकार विग्रहगति में पूर्व शरीर के आकार का रहता है। इसके ४ भेद हैं-नरकगत्यानुपूव्र्य, तिर्यग्गत्यानुपूव्र्य, मनुष्यगत्यानुपूव्र्य, देवगत्यानुपूव्र्य।

नरकगत्यानुपूव्र्य-जिस समय कोई मनुष्य मरकर नरक गति की ओर जाता है, वहाँ पहुंचने तक बीच में (विग्रह गति से) उसके आत्मा के प्रदेशों का पूर्ण शरीर का आकार बना रहता है, उसे नरकगत्यानुपूव्र्य कहते हैं। ऐसे ही शेष सभी में समझना।

अगुरुलघु-जिस कर्म के उदय से जीव का शरीर लोहे के गोले की तरह भारी और आक की रुई की तरह हल्का नहीं होवे, वह अगुरुलघु है।

उपघात-जिस कर्म के उदय से अपने ही घातक अंगोपांग होते हैं।

परघात-जिस कर्म के उदय से पर के घातक अंगोपांग होते हैं।

आतप-जिस कर्म के उदय से आतपकारी शरीर होता है। इसका उदय सूर्य के विमान में स्थित बादर पृथ्वीकायिक जीवों के होता है।

उद्योत-जिस कर्म के उदय से उद्योतरूप शरीर हो। इसका उदय चन्द्रमा के विमान में स्थित पृथ्वीकायिक जीवों के तथा जुगनू आदि जीवों के होता है।

विहायोगति-जिस कर्म के उदय से आकाश में गमन होता है, इसके २ भेद हैं-प्रशस्तविहायोगति और अप्रशस्तविहायोगति।

प्रत्येक शरीर-जिस कर्म के उदय से एक शरीर का स्वामी एक ही जीव होता है।

साधारण-जिस कर्म के उदय से एक शरीर के अनेक जीव स्वामी होते हैं।

त्रस-जिस कर्म के उदय से द्वीन्द्रिय आदि जीवों में जन्म होता है।

स्थावर-जिस कर्म के उदय से एकेन्द्रिय जीवों में जन्म होता है।

सुभग-जिस कर्म के उदय से दूसरों को अपने से प्रीति होती है।

दुर्भग-जिस कर्म के उदय से रूपादि गुणों से युक्त होने पर भी दूसरे जीवों को अप्रीति होती है।

सुस्वर-जिस कर्म के उदय से अच्छा स्वर हो।

दुस्वर-जिस कर्म के उदय से खराब स्वर हो।

शुभ-जिस कर्म के उदय से मस्तक आदि अवयव सुन्दर मालूम हों।

अशुभ-जिस कर्म के उदय से शरीर के अवयव मनोहर नहीं मालूम हों।

सूक्ष्म-जिस कर्म के उदय से दूसरों को नहीं रोकने वाला और दूसरों से नहीं रुकने वाला शरीर प्राप्त हो।

बादर-जिस कर्म से दूसरों को रोकने और दूसरों से रुकने वाला शरीर प्राप्त हो।

पर्याप्ति-जिस कर्म के उदय से अपने योग्य पर्याप्तियाँ पूर्ण हो जावें।

अपर्याप्ति-जिस कर्म के उदय से पर्याप्तियों की पूर्णता न हो, बीच में ही मरण हो जावे।

स्थिर-जिस कर्म के उदय से शरीर के रस आदि धातु तथा वात- पित्तादि उपधातु अपने-अपने स्थान में ठीक रहें। अनेक व्रत-उपवास आदि से भी शिथिलता न आवे।

अस्थिर-जिस कर्म के उदय से शरीर की धातु-उपधातुएँ अपने स्थान में स्थिर नहीं रहें, किंचित् उपवास आदि से शरीर अस्वस्थ हो जावे।

आदेय-जिस कर्म के उदय से शरीर में प्रभा रहती है।

अनादेय-जिस कर्म के उदय से शरीर में कांति नहीं होती है।

यश:कीर्ति-जिस कर्म के उदय से अपना पुण्य, गुण जगत् में प्रकट हो अर्थात् संसार में अपनी तारीफ होवे।

अयश:कीर्ति-जिस कर्म के उदय से जीव की निंदा होती है।

तीर्थंकरप्रकृति नामकर्म-जिस कर्म के उदय से तीर्थंकर पद की प्राप्ति होती है।

गोत्र कर्म के भेद

गोत्र कर्म के २ भेद हैं-उच्चगोत्र और नीचगोत्र।

उच्च गोत्र-जिसके उदय से जीव लोकमान्य उच्चकुल में जन्म लेवे, वह उच्च गोत्र है।

नीच गोत्र-जिसके उदय से जीव लोकनिंद्य नीचकुल में जन्म लेवे, वह नीच गोत्र है।

अन्तराय कर्म के भेद

अन्तराय कर्म के ५ भेद हैं-दानांतराय, लाभांतराय, भोगांतराय, उपभोगांतराय और वीर्यांतराय।

१. दानांतराय-जिस कर्म के उदय से दान की इच्छा करता हुआ भी दान नहीं दे सके।

२. लाभांतराय-जिस कर्म के उदय से लाभ की इच्छा होते हुए भी लाभ की प्राप्ति न हो सके।

३. भोगांतराय-जिस कर्म के उदय से अन्नादि भोगरूप वस्तु को भोगना चाहता हुआ भी भोग न सके।

४. उपभोगांतराय-जिसके उदय से वस्त्रादि उपभोग्य वस्तु को उपभोग करने का इच्छुक भी उपभोग न कर सके।

५. वीर्यांतराय-जिस कर्म के उदय से अपनी शक्ति प्रकट करना चाहता हुआ भी प्रकट न कर सके, सामथ्र्यहीन, कायर, अनुत्साहित ही रहे। इस प्रकार १४८ प्रकृतियों का वर्णन हुआ।

पुण्य और पाप प्रकृतियाँ

पुण्य प्रकृतियाँ-सातावेदनीय, तिर्यंचायुु, मनुष्यायु, देवायु, उच्चगोत्र, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, पंचेन्द्रिय जाति, शरीर ५, बंधन ५, संघात ५, अंगोपांग ३, शुभ स्पर्श, रस गंध वर्ण के २०, समचतुरस्र संस्थान, वङ्कावृषभनाराच संहनन, अगुरुलघु, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, प्रत्येक शरीर, त्रस, सुभग, शुभ, सूक्ष्म, पर्याप्ति, स्थिर, आदेय, यश:कीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर ये ६८ पुण्य प्रकृतियाँ हैं। इनसे बची हुई शेष ८० और अशुभ स्पर्श-रस-गंध-वर्ण की २० ऐसे १०० पाप प्रकृतियाँ हैं। स्पर्शादि के २० भेद जब शुभरूप हैं, तब पुण्य में और अशुभरूप हैं, तब पाप में शामिल होते हैं। चूँकि ये दोनों रूप माने गये हैं। कर्म की बंध, उदय और सत्त्व ऐसी तीन अवस्थाएं होती हैं।

१. बंध-कर्मों का आत्मा से सम्बन्ध होना बंध है।

२. उदय-स्थिति को पूरी करके कर्म के फल देने को उदय कहते हैं।

३. सत्त्व-आत्मा से पुद्गल का कर्मरूप रहना सत्त्व है।