ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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कर्म, कषाय एवं पेज्जदोष विभक्ति

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कर्म, कषाय एवं पेज्जदोष विभक्ति

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भारत में आस्तिकता की कसौटी इस जीवन की कड़ी को परलोक के जीवन से जोड़ देना है। जो मत इस जीवन का अतीत और भाविजीवन से सम्बन्ध स्थापित कर सके हैं वे ही प्राचीन समय में इस भारतभूमि पर प्रतिष्ठित रह सके हैं। यही कारण है कि चार्वाकमत आत्यन्तिक तर्कबल पर प्रतिष्ठित होकर भी आदर का पात्र नहीं हो सका। बौद्ध और जैनदर्शनों ने वेद तथा वैदिक क्रियाकाण्डों का तात्त्विक एवं क्रियात्मक विरोध करके भी परलोक के जीवन से इस जीवन का अनुस्यूत स्रोत कायम रखने के कारण लोकप्रियता प्राप्त की थी। वे तो यहाँ तक लोक संग्रही हुए कि एक समय वैदिक क्रियाकाण्ड की जड़ें ही हिल उठीं थीं।

इस जीवन का पूर्वापर जीवनों से सम्बन्ध स्थापित करने के लिये एक माध्यम की आवश्यकता है। आज के किए गए अच्छे या बुरे कार्यों का कालान्तर में फल देना बिना माध्यम के नहीं बन सकता। इसी माध्यम को भारतीय दर्शनों में कर्म, अदृष्ट, अपूर्व, वासना, दैव, योग्यता आदि नाम दिए हैं। कर्म की सिद्धि का सबसे बड़ा प्रमाण यही दिया जाता है कि—यदि कर्म न माना जाय तो जगत् में एक सुखी, एक दु:खी, एक को अनायास लाभ, दूसरे को लाख प्रयत्न करने पर भी घाटा ही घाटा इत्यादि विचित्रता क्योंकर होती है ? साध्वी स्त्री के जुड़वा दो लड़कों में शक्ति ज्ञान आदि की विभिन्नता क्यों होती है ? उनमें क्यों एक शराबी बनता है और दूसरा योगी ? दृष्ट कारणों की समानता होने पर एक की कार्यसिद्धि होना तथा दूसरे को लाभ की तो बात क्या मूल का भी साफ हो जाना यह दृष्ट कारणों की विफलता किसी अदृष्ट कारण की ओर सज्र्त करती है। आज किसी ने यज्ञ किया या दान दिया या कोई निषिद्ध कार्य किया, पर ये सब क्रियाएँ तो यहीं नष्ट हो जाती हैं परलोक तक जाती नहीं हैं। अब यदि कर्म न माना जाय तो इनका अच्छा या बुरा फल कैसे मिलेगा ? इस तरह भारतीय आस्तिक परम्परा में इसी कर्मवाद के ऊपर धर्म का सुदृढ़ प्रासाद खड़ा हुआ है।

उस माध्यम के जिसके द्वारा अच्छे या बुरे कर्मों का फल मिलता है, विविधरूप भारतीय दर्शनों में देखे जाते हैं—प्रशस्तपादभाष्य की व्योमवती टीका (पृ. ६३९) में पूर्वपक्षरूप से एक मत यह उपलब्ध होता है कि धर्म या अदृष्ट अनाश्रित रहता है उसका कोई आधार नहीं है। न्याय—मंजरी (पृ. २७९) में इस मत को वृद्धमीमांसकों का बताया है। उसमें लिखा है कि—यागादि क्रियाओं से एक अपूर्व उत्पन्न होता है। यह स्वर्गरूप फल और याग के बीच माध्यम का कार्य करता है। पर, इस अपूर्व का आधार न तो यागकत्र्ता आत्मा ही होता है और न यागक्रिया ही, वह अनाश्रित रहता है। शबर ऋषि यागक्रिया को ही धर्म कहते हैं। इसमें ही एक ऐसी सूक्ष्मशक्ति रहती है जो परलोक में स्वर्ग आदि प्राप्त कराती है। मुक्ताबली दिनकरी (पृ. ५३५) में प्रभाकरों का यह मत दिया गया है कि यागादि क्रियाएँ समूल नष्ट नहीं होतीं, वे सूक्ष्मरूप से स्वर्गदेह के उत्पादक द्रव्यों में यागसम्बन्धिद्रव्यारम्भकों में अथवा यागकत्र्ता में स्थित होकर फल को उत्पन्न करती हैं।

कुमारिलभट्ट धर्म को द्रव्य गुण और कर्मरूप मानते हैं, अर्थात् जिन द्रव्य गुण और कर्म से वेदविहित याग किया जाता है वे धर्म हैं। उनने तन्त्रर्वाितक (२/२/२) में ‘‘आत्मैव चाश्रयस्तस्य क्रियाप्यत्रैव च स्थिता’’ लिखकर सूचित किया है कि यागादिक्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अपूर्व का आश्रय आत्मा होता है। यागादि क्रियाओं से जो अपूर्व उत्पन्न होता है वह स्वर्ग की अज्र्रावस्था है और वही परिपाककाल में स्वर्गरूप हो जाती है। व्यास का सिद्धान्त है कि याज्ञादिक्रियाओं से यज्ञाधिष्ठातृ देवता को प्रीति उत्पन्न होती है और निषिद्ध कर्मों से अप्रीति। यही प्रीति और अप्रीति इष्ट और अनिष्ट फल देती है।

सांख्य कर्म को अन्त:करणवृत्तिरूप मानते हैं। इनके मत से शुक्ल, कृष्ण, कर्म प्रकृति के विवत्र्त हैं। ऐसी प्रकृति का संसर्ग पुरुष से है अत: पुरुष उन कर्मों के फलों का भोक्ता होता है। तात्पर्य यह है कि जो अच्छा या बुरा कार्य किया जाता है उसका संस्कार प्रकृति पर पड़ता है और यह प्रकृतिगत संस्कार ही कर्मों के फल देने में माध्यम का कार्य करता है।

न्याय—वैशेषिक अदृष्ट को आत्मा का गुण मानते हैं। किसी भी अच्छे या बुरे कार्य का संस्कार आत्मा पर पड़ता है, या यों कहिए कि आत्मा में अदृष्ट नाम का गुण उत्पन्न होता है। यह तब तक आत्मा में बना रहता है जब तक उस कर्म का फल न मिल जाय। इस तरह इनके मत में अष्टगुण आत्मनिष्ठ हैं। यदि यह अदृष्ट वेदविहित क्रियाओं से उत्पन्न होता है तब वह धर्म कहलाता है तथा जब निषिद्ध कर्मों। से उत्पन्न होता है तब अधर्म कहलाता है।

बौद्धों ने इस जगत की विचित्रता को कर्मजन्य माना है। यह कर्म चित्तगत वासनारूप है। अनेक शुभ क्रियाकलाप से चित्त में ही ऐसा संस्कार पड़ता है जो क्षणविपरिणत होता हुआ भी कालान्तर में होने वाले सुख—दु:ख का हेतु होता है।

इस तरह हम इस बात में प्राय: अनेक दर्शनों को एक मत पाते हैं कि अच्छे या बुरे कार्यों से आत्मा में एक संस्कार उत्पन्न होता है। परन्तु जैन मत की यह विशेषता है कि वह अच्छे या बुरे कार्यों के प्रेरक विचारों से जहाँ आत्मा में संस्कार मानता है वहां सूक्ष्म पुद्गलों का उस आत्मा से बन्ध भी मानता है। तात्पर्य यह है कि आत्मा के शुभ अशुभ परिणामों से सूक्ष्म पुद्गल कर्मरूप से परिणत होकर आत्मा से बंध जाते हैं और समयानुसार उनके परिपाक के अनुकूल सुख—दु:ख रूप फलमिलता है। जैसे—विद्युतशक्ति विद्युद्वाहक तारों में प्रवाहित होती है और स्विच के दबाने पर बल्ब में प्रकट हो जाती है उसी तरह भावकर्मरूप संस्कारों के उद्वोधक जो द्रव्यकर्मस्कंध समस्त आत्मा के प्रदेशों में व्याप्त हैं वे ही समयानुसार बाह्य द्रव्य क्षेत्रादि सामग्री की अपेक्षा करते हुए उदय में आते हैं तो पुराने संस्कार उद्बुद्ध होकर आत्मा में विकृति उत्पन्न करते हैं। संस्कारों के उद्वोधक कर्मद्रव्य का सम्बन्ध माने बिना नियम संस्कारों का नियत समय में ही उद्बुद्ध होना नहीं बन सकता है ?

सांख्य—योगपरम्परा अवश्य प्रकृति नाम के विजातीय पदार्थ का सम्बन्ध पुरुष से मानती है। पर उसमें कर्मबन्ध पुरुषको न होकर प्रवृृति को ही होता है। प्रकृति का आद्य विकार महत्त्वत्व ही, जिसे अन्त:करण भी कहते हैं, अच्छे या बुरे विचारों से संस्कृत होता है। पर उसमें अन्य किसी बाह्य पदार्थ का सम्बन्ध नहीं होता। तात्पर्य यह है कि एक जैनपरम्परा ही ऐसी है जो प्रतिक्षण शुभाशुभ परिणामों के अनुसार बाह्य पुद्गल द्रव्य का आत्मा से सम्बन्ध स्वीकार करती है।

जीव और कर्म का सम्बन्ध अनादिकाल से बराबर चालू है। सभी दार्शनिक आत्मा की संसारदशा को अनादि ही स्वीकारते आए हैंं सांख्य प्रकृतिपुरुष के संसर्ग को अनादि मानता है, न्यायवैशेषिक का आत्ममन संयोग अनादि है, वेदान्ती ब्रह्म को अविद्याक्रान्त अनादिकाल ही मानता है, बौद्ध चित्त की अविद्यातृष्णा से विकृति को अनादि ही मानते हैं। बात यह है कि यदि आत्मा प्रारम्भ से शुद्ध हो तो उसमें मुक्त आत्मा की तरह विकृति हो ही नहीं सकती, चूँकि आज हम विकृति देख रहे हैं इसलिये यह मानना पड़ता है कि वह अनविच्छत्र काल से बराबर ऐसा ही विकारी चला आ रहा है। आत्मा में स्वपर कारणों से अनेक प्रकार के विकार होते हैं। इन सभी विकारों में अत्यन्त घातक मोह नाम का विकासर है। मोह अर्थात् विपरीताभिनिवेश या मिथ्यात्व से अन्य सभी विकार बलवान् बनते हैं मोहके हट जाने पर अन्य विकार धीरे—धीरे निष्प्राण हो जाते हैं। न्यायवैशेषिकों का मिथ्याज्ञान, सांख्य यौगों का विवेकाज्ञान, बौद्धों की अविद्या या सत्त्वदृष्टि, इसी मोह के नामान्तर हैं। बन्ध के कारणों में इसी की प्रधानता है इसके बिना अन्य बन्ध के कारण अपनी उत्कृष्ट स्थिति या तीव्रतम अनुभाग से कर्मों को नहीं बाँध सकते।

न्यायसूत्र में दोषों की वे ही तीन जातियाँ बताई हैं जो आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने प्रवचनसार (१/८४) में निर्दिष्ट की हैं। न्यायसूत्र में इन तीन राशियों में मोह को सबसे तीव्र पापबन्धक कहा है। जैन र्कािमक परम्परा में मोह का कर्मों के सेनापति रूप से वर्णन मिलता है। इस सेनानायक के बल पर ही समस्त सेना में जोश और कार्यक्षमता बनी रहती है। इसके अभाव में धीरे—धीरे अन्य कर्म निर्बल हो जाते हैं।

मोहनीय कर्म के दो भेद हैं—एक दर्शन मोहनीय और दूसरा चारित्र मोहनीय। इनमें मोहनीय का दर्शन मोहनीय भेद राग, द्वेष, मोह की त्रिपुटी में मोहशब्द का वाच्य होता है। आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने दर्शनमोही साधु से निर्मोही गृहस्थ का कल्याण मार्ग का पथिक तथा उत्कृष्ट बताया है। दूसरा चारित्रमोहनीय भेद मूलत: कषाय और नोकषायों में विभाजित होता है। ये कषायें राग द्वेष में विभाजित होकर एक मोहनीय कर्म को ‘राग, द्वेष मोह’ इस त्रिरूपता का बाना पहिना देती हैं।

कषायों का राग, द्वेष में विभाजन—कषाय पाहुड के (पृ० ३६५) में क्रोध मान माया और लोभ इन चार कषायों का नयदृष्टि से राग और द्वेष में विभाजन किया है। और इसी विभाजन की प्रेरणा के फलस्वरूप कषायपाहुड का पेज्जदोसपाहुड भी पर्यायवाची नाम रखा गया है। चाहे कषायपाहुड कहिए या पेज्जदोसपाहुड दोनों एक ही बात है। क्योंकि कषाय या तो पेज्ज रूप रागद्वेष में होती या फिर दोषरूप। । यह रागद्वेष में विभाजन प्राय: चित्त को अच्छा लगने या बुरा लगने आदि के आधार से किया गया हैं

नैगम और संग्रहनय की दृष्टि से क्रोध और मान द्वेषरूप हैं तथा माया और लोभ रागरूप हैं। व्यवहारनय माया को भी द्वेष मानता है क्योंकि लोक में मायाचारी की निन्दा गर्हा आदि होने से इसकी दृष्टि में यह द्वेषरूप है। ऋजुसूत्रनय क्रोध को द्वेषरूप तथा लोभ को रागरूप समझता है। मान और माया न तो रागरूप हैं और न द्वेषरूप ही; क्योंकि मान क्रोधोत्पत्ति के द्वारा द्वेषरूप है तथा माया लोभोत्पत्ति के द्वारा रागरूप है, स्वयं नहीं। अत: यह परम्परा व्यवहार ऋजुसूत्रनय की विषयमर्यादा में नहीं आता।

तीनों शब्दनय चारों कषायों को द्वेषरूप मानते हैं क्योंकि वे कर्मों के आस्रव में कारण होती हैं। क्रोध मान और माया को ये पेज्जरूप नहीं मानते। लोभ यदि रत्नत्रयसाधक वस्तुओं का है तो वह इनकी दृष्टि में पेज्ज हैं और यदि अन्य पापवर्धक पदार्थों का है तो वह पेज्ज नहीं है। विशेषावश्यकभाष्य (गा. ३५३६-३५४४) में ऋजुसूत्रनय तथा शब्दनयों की दृष्टि में यह विशेषता बताई है कि—चूँकि ऋजुसूत्रनय वर्तमानमात्रग्राही है अत: वह क्रोध को सर्वथा द्वेष रूप मानता है तथा मान माया और लोभ को जब ये अपने में सन्तोष उत्पन्न करें तब रागरूप तथा जब परोपघात में प्रवृत्ति करावें तब द्वेषरूप समझता है। इस तरह इन नयों की दृष्टि में मान, माया और लोभ विवक्षाभेद से रागरूप भी हैं और द्वेषरूप भी। र्चूिणसूत्र में आचार्य यतिवृषभ ने कषायों के ये आठ भेद गिनाए हैं—नामकषाय, स्थापनाकषाय, द्रव्यकषाय, भावकषाय, प्रत्ययकषाय, समुत्पत्तिककषाय आदेशकषाय और रसकषाय। ये भेद आचारांगनिर्युक्ति (गा. १९०) तथा विशेषावश्यकभाष्य में भी पाए जाते हैं। इन आठ भेदों में ऐसे सभी पदार्थों का संग्रह हो जाता है जिनमें किसी भी दृष्टि से कषाय व्यवहार किया जा सकता है। इनमें भावकषाय ही मुख्य कषाय है। इस कषायपाहुड ग्रंथ में इस भावकषाय का तथा इसको उत्पन्न करने में प्रबल कारण कषायद्रव्य कर्म अर्थात् प्रत्ययकषाय का सविस्तार वर्णन है। मुख्यत: इस कषायपाहुड में चारित्रमोहनीय और दर्शनमोहनीय कर्म का विविध अनुयोग द्वारों में प्ररूपण हैंं उसका अधिकारों के अनुसार संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है।

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२. पेज्जदोष विभक्ति—

प्रकृत कषायप्राभृत पन्द्रह अधिकारों में बटा हुआ है। उनमें से पहला अधिकार पेज्जदोष विभक्ति है। मालूम होता है यह अधिकार कषायप्राभृत के पेज्जदोषप्राभृत दूसरे नाम की मुख्यता से रखा गया है। अगले चौदह अधिकारों में जिस प्रकार कषाय की बन्ध, उदय, सत्त्व आदि विविध दशाओं के द्वारा कषायों का विस्तृत व्याख्यान किया है उस प्रकार पेज्जदोष का विविध दशाओं के द्वारा व्याख्यान न करके केवल उदय की प्रधानता से व्याख्यान किया गया है। तथा अगले चौदह अधिकारों में कषाय का व्याख्यान करते हुए यथासंभव तीन दर्शन मोहनीय को र्गिभत करके और कहीं पृथक् रूप से उनकी विविध दशाओं का भी जिस प्रकार व्याख्यान किया है उस प्रकार पेज्जदोषविभक्ति अधिकार में नहीं किया गया है किन्तु वहाँ उसके व्याख्यान को सर्वथा छोड़ दिया गया है। अगले चौदह अधिकार ये हैं—

स्थितिविभक्ति, अनुभागविभक्ति, प्रदेशविभक्ति—झीणाझीण—स्थित्यन्तिक, बन्धक, वेदक, उपयोग, चतु:स्थान, व्यञ्जन, दर्शनमोहोपशामना, दर्शनमोहक्षपणा, संयमासंयमलब्धि, संयम—लब्धि, चारित्रमोहोपशामना, और चारित्रमोहक्षपणा।

इनमें से प्रारंभ के तीन अधिकारों में सत्त्व में स्थित मोहनीय कर्म का, बन्धक में मोहनीय के बन्ध और संक्रम का, वेदक और उपयोग में मोहनीय के उदय, उदीरणा और वेदक कालका, चतु:स्थान में चार प्रकार की अनुभाग शक्ति का, व्यञ्जन में क्रोधादिक के एकार्थंक नामों का मुख्यतया कथन है। शेष सात अधिकारों का विषय उनके नामों से ही स्पष्ट हो जाता है।

संक्षेप में इन अधिकारों का बँटवारा किया जाय तो यह कहना होगा कि प्रारंभ के आठ अधिकारों में संसार के कारणभूत मोहनीय कर्म की विविध दशाओं का वर्णन है। अन्तिम सात अधिकारों में आत्म परिणामों के विकाश से शिथिल होते हुए मोहनीय कर्म की जो विविध दशाएँ होती हैं उनका वर्णन है।

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(२) स्थिति विभक्ति—

जब कोई एक विवक्षित पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ को आवृत करता है या उसकी शक्ति का घात करता है तब साधारणतया आवरण करने वाले पदार्थ में आवरण करने का स्वभाव, आवरण करने का काल, आवरण करने की शक्ति का हीनाधिकभाव और आवरण करने वाले पदार्थ का परिमाण ये चार अवस्थाएँ एक साथ प्रकट होती हैं। यह पूर्व में बता दिया गया हैं कि आत्मा आव्रियमण है और कर्म आवरण, अत: कर्म के द्वारा आत्मा के आवृत होने पर कर्म की भी उक्त चार अवस्थाएँ होती हैं जो कि आवरण करने के पहले समय में ही सुनिश्चित हो जाती हैं। आगम में इनको प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्ध कहा है। इस प्रकार कर्म की चार अवस्थाएँ हैं फिर भी श्री गुणधर भट्टारक ने प्रकृतिबन्ध को स्वतन्त्र अधिकार नहीं माना है, क्योंकि प्रकृति, स्थिति और अनुभाग का अविनाभावी है, अत: उसका उक्त अधिकारों में अन्तर्भाव कर लिया है। इस प्रकार यद्यपि दूसरे अधिकार का नाम स्थिति विभक्ति है पर उसमें प्रकृति विभक्ति और स्थिति विभक्ति दोनों का वर्णन किया है।

प्रकृति विभक्ति—प्रकृति शब्द का अर्थ ऊपर लिख ही आये हैं। विभक्ति शब्द का अर्थ विभाग है। यह विभक्ति नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल, गणना, संस्थान और भाव के भेद से अनेक प्रकार की है। पर प्रकृत में द्रव्यविभक्ति के तद्वयतिरिक्त भेद का जो कर्मविभक्ति भेद है वह लिया गया है। यद्यपि इस कषायप्राभृत में एक मोहनीय कर्म का ही विशद वर्णन है पर वह आठ कर्मों में से एक है अत: उसके साथ विभक्ति शब्द के लगाने में कोई आपत्ति नहीं है। मोहनीय का स्वभाव सम्यक्त्व और चारित्र का विनाश करना है। इस प्रकृति विभक्ति के मूलप्रकृतिविभक्ति ओर उत्तर प्रकृति विभक्ति ये दो भेद हैं।

इनमें से मूलप्रकृति विभक्ति का सादि आदि अनुयोगद्वारों के द्वारा विवेचन किया है। उत्तरप्रकृतिविभक्ति के एवैâक उत्तरप्रकृतिविभक्ति और प्रकृतिस्ािान उत्तरप्रकृतिविभक्ति ये दो भेद हैं। जहाँ मोहनीय की अट्ठाईस प्रकृतियों का पृथक्—पृथक् कथन किया है उसे एवैक उत्तरप्रकृतिविभक्ति कहते हैं। तथा जहाँ मोहनीय के अट्ठाईस, सत्ताईस आदि प्रकृति रूप सत्त्वस्थानों का कथन किया है उसे प्रकृतिस्थान उत्तरप्रकृतिविभक्ति कहते हैं। इनमें से एवैक उत्तरप्रकृतिविभक्ति का समुत्कीर्तना आदि अनुयोगद्वारों के द्वारा और प्रकृतिस्थान उत्तरप्रकृतिविभक्ति का स्थानसमुत्कीर्तना आदि के द्वारा कथन किया है।

स्थिति विभक्ति—जिसमें चौदह मार्गणाओं का आश्रय लेकर मोहनीय अट्ठाईस भेदों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति बतलाई है उसे स्थितिविभक्ति कहते हैं। इसके मूलप्रकृतिस्थितिविभक्ति और उत्तरप्रकृतिस्थितिविभक्ति इस प्रकार दो भेद हैं। एक समय में मोहनीय के जितने कर्मस्कन्ध बंधते हैं उनके समूह को मूलप्रकृति कहते हैं और इसकी स्थिति को मूलप्रकृतिस्थति कहते हैं। तथा अलग—अलग मोहनीय कर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की स्थिति को उत्तरप्रकृतिस्थिति कहते हैं। इनमें से मूलप्रकृतिस्थितिविभक्ति का सर्वविभक्ति आदि अनुयोगद्वारों के द्वारा कथन किया है और उत्तर प्रकृतिस्थिति का श्रद्धाच्छेद आदि अनुयोगद्वारों के द्वारा कथन किया है।

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(३) अनुभाग विभक्ति—

कर्मों में जो अपने कार्य के करने की शक्ति पाई जाती है उसे अनुभाग कहते हैं। इसका विस्तार से जिस अधिकार में कथन किया है उसे अनुभागविभक्ति कहते हैं। इसके भी मूलप्रकृति अनुभागविभक्ति और उत्तरप्रकृति अनुभागविभक्ति ये दो भेद हैं। सामान्य मोहनीय कर्म के अनुभाग का विस्तार से जिसमें कथन किया है उसे मूलप्रकृति अनुभागविभक्ति कहते हैं। तथा मोहनीयकर्म के उत्तर भेदों के अनुभाग का विस्तार से जिसमें कथन किया है उसे उत्तर प्रकृति अनुभागविभक्ति कहते हैं। इनमें से मूलप्रकृति अनुभागविभक्ति का संज्ञा आदि अनुयोगद्वारों के द्वारा और उत्तप्रकृतिअनुभागविभक्ति का संज्ञा आदि अधिकार में कथन किया है।

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(४) प्रदेशविभक्ति झोझाझीण—

स्थित्यन्तिक—प्रदेशविभक्ति के दो भेद हैं—मूलप्रकृति प्रदेशविभक्ति और उत्तरप्रकृतिप्रदेशविभक्ति। मूलप्रकृतिप्रदेशविभक्ति का भागाभाग आदि अधिकारों में कथन किया है। तथा उत्तर प्रकृतिप्रदेशविभक्ति का भी भागाभाग आदि अधिकारों में कथन किया है।

झीणाझीण—किस स्थिति में प्रदेश उत्कर्षण अपकर्षण संक्रमण और उदय के योग्य और अयोग्य हैं, इसका झीणाझीण अधिकार में कथन किया गया है। जो प्रदेश उत्कर्षण अपकर्षण संक्रमण और उदय के योग्य हैं उन्हें झीण तथा जो उत्कर्षण अपकर्षण संक्रमण और उदय के योग्य नहीं हैं उन्हें अभीण कहा है। इस झीणाझीण का समुत्कीर्तंना आदि चार अधिकारों में वर्णन हैं

स्थित्यन्तिक—स्थिति को प्राप्त होने वाले प्रदेश स्थितिक या स्थित्यन्तिक कहलाते हैं। अत: उत्कृष्ट स्थिति को प्राप्त, जघन्य स्थिति को प्राप्त आदि प्रदेशों का इस अधिकार में कथन है। इसका समुत्कीर्तना, स्वामित्व और अल्पबहुत्व इन तीन अधिकारों में कथन किया है। जो कर्म बन्धसमय से लेकर उस कर्म की जितनी स्थिति है उतने काल तक सत्ता में रह कर अपनी स्थिति के अनितम समय में उदय में दिखाई देता है वह उत्कष्ट स्थितिप्राप्त कर्म कहा जाता है। जो कर्म बन्ध के समय जिस स्थिति में निक्षिप्त हुआ है अनन्तर उसका उत्कर्षण या अपकर्षण होने पर भी उसी स्थिति को प्राप्त होकर जो उदयकाल में दिखाई देता है उसे निषेकस्थितिप्राप्त कर्म कहते हैं। बन्ध के समय जो कर्म जिस स्थिति में निक्षिप्त हुआ है उत्कर्षण और अपकर्षण न होकर उसी स्थिति में रहते हुए यिद वह उदय में आता है तो उसे अधानिषेकस्थिति प्राप्त कर्म कहते हैं। जो कर्म जिस किसी स्थिति को प्राप्त होकर उदय में आता है उसे उदयनिषेकस्थिति प्राप्त कर्म कहते हैं। इस प्रकार इन सबका कथन इस अधिकार में किया हैं

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(५) बन्धक—

बन्ध के बन्ध और संक्रम इस प्रकार दो भेद हैं। मिथ्यात्वादि कारणों से कर्मभाव के योग्य कार्मणा पुद्गल स्कन्धों का जीव के प्रदेशों के साथ एकक्षेत्रावगाहसंबंध को बन्ध कहते हैं। इसके प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश ये चार भेद हैं। जिस अनुयोग द्वार में इसका कथन है उसे बन्ध अनुयोगद्वार कहते हैं। इस प्रकार बंधे हुए कर्मों का यथायोग्य अपने अवान्तर भेदों में संक्रान्त होने का संक्रम कहते हैं। इसके प्रकृतिसंक्रम आदि अनेक भेद हैं। इसका जिस अनुयोगद्वार में विस्तार से कथन किया है उसे संक्रम अनुयोगद्वार कहते हैं। बन्ध अनुयोगद्वार में इन दोनों का कथन किया है। बन्ध और संक्रम दोनों का बन्ध संज्ञा होने का यह कारण है कि बन्ध के अकर्मबन्ध और कर्मबन्ध ये दो भेद हैं। नवीन बन्ध को अकर्मबन्ध और बंधे हुए कर्मों के परस्पर संक्रान्त होकर बंधने को कर्मबन्ध कहते हैं। अत: दोनों को बन्ध संज्ञा देने में कोई आपत्ति नहीं है। इस अधिकार में एक सूत्रगाथा आती है, जिसके पूर्वार्ध द्वारा प्रकृतिबन्ध आदि चार प्रकार के बन्धों की और उत्तरार्ध द्वारा प्रकृतिसंक्रम आदि चार प्रकार के संक्रमों की सूचना की है। बन्ध का वर्णन तो इस अधिकार में नहीं किया है। उसे अन्यत्र से देख लेने की प्रेरणा की गई है, किन्तु संक्रम का वर्णन खूब विस्तार से किया है। प्रारम्भ में संक्रम का निक्षेप करके प्रकृत में प्रकृति संक्रम से प्रयोजन बतलाया है। और उसका निरूपण तीन गाथाओं के द्वारा किया है। उसके पश्चात् ३२ गाथाओं से प्रकृतिस्थान संक्रम का वर्णन किया है। एक प्रकृति के दूसरी प्रकृतिरूप हो जाने को प्रकृतिसंक्रम कहते हैं, जैसे मिथ्यात्व प्रकृति का सम्यक्त्व और सम्यक्मिथ्यात्व प्रकृति में संक्रम हो जाता है। और एक प्रकृतिस्थान के अन्य प्रकृतिस्थान रूप हो जाने को प्रकृतिस्थानसंक्रम कहते हैं। जैसे, मोहनीयकर्म के सत्ताईस प्रकृतिक सत्त्वस्थान का संक्रम अट्टाईस प्रकृतियों की सत्तावाले मिथ्यादृष्टि में होता है। किस प्रकृति का किस प्रकृतिरूप संक्रम होता है और किस प्रकृतिरूप संक्रम नहीं होता, तथा किस प्रकृतिस्थान का किस प्रकृतिस्थान में संक्रम होता है और किस प्रकृतिस्थान में संक्रम नहीं होता, आदि बातों का विस्तार से विवेचन इस अध्याय में किया गया है। यह अधिकार बहुत विस्तृत हैं

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(६) वेदक—

इस अधिकार में उदय और उदीरणा का कथन है। कर्मों का अपने समयपर जो फलोदय होता है उसे उदय कहते हैंं और उपायविशेष से असमय में ही उनका जो फलोदय होता है उसे उदीरणा कहते हैं। चूँकि दोनों ही अवस्थाओं में कर्मफल का वेदन—अनुभवन करना पड़ता है इसलिये उदय और उदीरणा दोनों को ही वेदक कहा जाता है। इस अधिकार में चार गाथाएँ हैं, जिनके द्वारा ग्रंथकार ने उदय—उदीरणाविषयक अनेक प्रश्नों का समवतार किया है और सूत्रकार ने उनका आलम्बन लेकर विस्तार से विवेचन किया है। पहली गाथा के द्वारा प्रकृति उदय, प्रकृति उदीरणा और उनके कारण द्र्रव्यादि का कथन किया है। दूसरी गाथा के द्वारा स्थिति उदीरणा, अनुभाग उदीरणा, प्रदेश उदीरणा तथा उदय का कथन किया है। तीसरी गाथा के द्वारा प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश विषयक भुजाकार, अल्पतर, अवस्थित और अवक्तव्य का कथन किया है। अर्थात् यह बतलाया है कि कौन बहुत प्रकृतियों की उदीरणा करता है और कौन कम प्रकृतियों की उदीरणा करता है। तथा प्रति समय उदीरणा करने वाला जीव कितने समय तक निरन्तर उदीरणा करता है, आदि। चौथी गाथा के द्वारा प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशविषयक बंध, संक्रम, उदय, उदीरणा और सत्त्व के अल्पबहुत्व का कथन किया गया है। यह अधिकार भी विशेष विस्तृत है।

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(७) उपयोग—

इस अधिकार में क्रोधादि कषायों के उपयोग का स्वरूप बतलाया गया है। इसमें सात गाथाएँ हैं। जिनमें बतलाया गया हैं कि एक जीव के एक कषाय का उदय कितने काल तक रहता है ? किस जीव के कौन सी कषाय बार—बार उदय में आती है ? एक भव में एक कषाय का उदय कितनी बार होता है और एक कषाय का उदय कितने भवों तक रहता है ? जितने जीव वर्तमान में जिस कषाय में विद्यमान हैं क्या वे उतने ही पहले भी उसी कषाय में विद्यमान थे और क्या आगे भी विद्यमान रहेंगे ? आदि कषायविषयक बातों का विवेचन इस अधिकार में किया गया है ?

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(८) चतु:स्थान—

घातिकर्मों में शक्ति की अपेक्षा लता आदि रूप चार स्थानों का विभाग किया जाता है। उन्हें क्रमश: एक स्थान, द्विस्थान, त्रिस्थान और चतु:स्थान कहते हैं। इस अधिकार में क्रोध, मान, माया और लोभकषाय के उन चारों स्थानों का वर्णन है इसलिये इस अधिकार का नाम चतु:स्थान है। इसमें १६ गाथाएँ हैं। पहली गाथा के द्वारा क्रोध, मान, माया और लोभ के चार—चार प्रकार होने का उल्लेख किया है और दूसरी, तीसरी तथा चौथी गाथा के द्वारा वे प्रकार बतलायें हैं। पत्थर, पृथिवी, रेत और पानी में हुई लकीर के समान क्रोध चार प्रकार का होता है। पत्थर का स्तम्भ, हड्डी, लकड़ी और लता के समान चार प्रकार का मान होता है, आदि। चारों कषायों के इन सोलह स्थानों में कौन किससे अधिक होता है कौन किससे हीन होता है ? कौन स्थान सर्वघाती है और कौन स्थान देशघाती है ? क्या सभी गतियों में सभी स्थान होते हैं या कुछ अन्तर है ? किस स्थान का अनुभवन करते हुए किस स्थान का बंध होता है और किस स्थान का अनुभवन नहीं करते हुए किस स्थान का बंध नहीं होता ? आदि बातों का वर्णन इस अधिकार में है।

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(९) व्यञ्जन—

इस अधिकार में पाँच गाथाओं के द्वारा क्रोध, मान, माया और लोभ के पर्यायवाची शब्दों को बतलाया है। जैसे—क्रोध के क्रोध, रोष, द्वेष आदि, मान के मद, दर्प, स्तम्भ आदि, माया के निकृति वंचना आदि और लोभ के काम, राग, निदान आदि। इनके द्वारा ग्रंथकार ने यह बतलाया है किस—किस कषाय में कौन—कौन बातें आती हैं। इन पर्याय शब्दों से प्रत्येक कषाय का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है।

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(१०) दर्शनमोहोपशामना—

इस अधिकार में दर्शन मोहनीय कर्म की उपशमना का वर्णन है। दर्शमोहनीय की उपशमना के लिये जीव तीन करण करता है—अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण। प्रारम्भ में ग्रंथकार ने चार गाथाओं के द्वारा अध: प्रवृत्तकरण के प्रथम समय से लेकर नीचे की और ऊपर की अवस्थाओं में होने वाले कार्यों का प्रश्नरूप में निर्देश किया है। जैसे पहली गाथा में प्रश्न किया गया है कि दर्शनमोहनीय की उपशमना करने वाले जीव के परिणाम कैसे होते हैं ? उनके कौन योग, कौन कषाय, कौन उपयोग, कौन लेश्या और कौन सा वेद होता है आदि? इन सब प्रश्नों का समाधान करके सूत्रकार ने तीनों करणों का स्वरूप तथा उनमें होने वाले कार्यों का विवेचन किया है। इसके बाद पन्द्रह गाथाओं के द्वारा दर्शनमोह के उपशामक की विशेषताएँ तथा सम्यग्दृष्टि का स्वभाव आदि बतलाया है।

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(११) दर्शनमोह की क्षपणा—

इस अधिकार के प्रारम्भ में पांच गाथाओं के द्वारा बतलाया है कि दर्शनमोह की क्षपणा का प्रारम्भ कर्मभूमिया मनुष्य करता है। उसके कम से कम तेजो लेश्या अवश्य होती है, क्षपणा का काल अन्तर्मुहूर्त होता है। दर्शनमोह की क्षपणा होने पर जिस भव में क्षपणा का प्रारम्भ किया है उसके सिवाय अधिक से अधिक तीन भव धारण करके मोक्ष हो जाता है आदि। दर्शनमोह के क्षपण के लिये भी अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण का होना आवश्यक है। अत: सूत्रकार ने इन तीनों करणों का विवेचन तथा उनमें होने वाले कार्यों का दिग्दर्शन इस अधिकार में भी विस्तार से किया है। और बतलाया है कि जीव दर्शनमोह की क्षपणा का प्रस्थापक कब होता है तथा वह मरकर कहाँ—कहाँ जन्म ले सकता है ?

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(१२) देशविरत—

इस अधिकार में संयमासंयमलब्धिका वर्णन है। अप्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय के अभाव से देशचारित्र को प्राप्त करने वाले जीव के जो विशुद्ध परिणाम होते हैं उसे संयमासंयमलब्धि कहते हैं। जो उपशम सम्यक्त्व के साथ संयमासंयम को प्राप्त करता है उसके तीनों ही करण होते हैं। किन्तु उसकी विवक्षा यहाँ नहीं की है क्योंकि उसका अन्तर्भाव सम्यक्त्व की उत्पत्ति ही कर लिया गया है। अत: उसे छोड़कर जो वेदक सम्यग्दृष्टि या वेदकप्रयोग्य मिथ्यादृष्टि संयमासंयम को प्राप्त करता है उसका प्ररूपण इस अधिकार में किया है। उसके प्रारम्भ के दो ही करण होते हैं, तीसरा अनिवृत्तिकरण नहीं होता है। अत: इस अधिकार में दोनों करणों में होने वाले कार्यों का विस्तार से विवेचन किया गया है। इस अधिकार में केवल एक ही गाथा है।

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(१३) संयमलब्धि—

जो गाथा १२ वें देशविरत अधिकार में वही गाथा इस अधिकार में भी है। संयमासंयमलब्धि के ही समान विवक्षित संयमलब्धि में भी दो ही करण होते हैं, जिनका विवेचन संयमासंयमलब्धिकी ही तरह बतलाया है। अन्त में संयमलब्धि से युक्त जीवों का निरूपण आठ अनियोगद्वारों से किया है।

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(१४) चारित्र मोहनीय की उपशामना—

इस अधिकार में आठ गाथाएं हैं। पहली गाथा के द्वारा, उपशामना कितने प्रकार की है, किस—किस कर्म का उपशम होता है, आदि प्रश्नों का अवतार किया गया है। दूसरी गाथा के द्वारा, निरुद्ध चारित्रमोह प्रकृति की स्थिति के कितने भाग का उपशम करता है, कितने भाग का संक्रमण करता है कितने भाग की उदीरणा करता है आदि प्रश्नों का अवतार किया गया है। तीसरी गाथा के द्वारा, निरुद्ध चारित्रमोहनीय, प्रकृति का उपशम कितने काल में करता है, उपशम करने पर संक्रमण और उदीरणा कब करता है, आदि प्रश्नों का अवतार किया गया है। चौथी गाथा के द्वारा, आठ करणों में से उपशामक के कब किस करण की व्युच्छित्ति होती है आदि, प्रश्नों का अवतार किया गया है। जिनका समाधान सूत्रकार ने विस्तार से किया है। इस प्रकार इन चार गाथाओं के द्वारा उपशामक का निरूपण किया गया है और शेष चार गाथाओं के द्वारा उपशामक के पतन का निरूपण किया गया है, जिसमें प्रतिपात के भेद, आदि का सुन्दर विवेचन है।

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(१५) चारित्रमोह की क्षपणा—

यह अधिकार बहुत विस्तृत है। इसमें क्षपकश्रेणि का विवेचन विस्तार से किया गया है। अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण के बिना चारित्रमोह का क्षय नहीं हो सकता, अत: प्रारम्भ में कारने इन तीनों करणों में होने वाले कार्यों का विस्तार से वर्णन किया हैं नौवें गुणस्थान के अवेदभाग में पहुंचने पर जो कार्य होता है उसका विवेचन गाथा सूत्रों से प्रारम्भ होता है। इस अधिकार में मूलगाथाएँ २८ हैं और उसकी भाष्य गाथाएँ ८६ हैं। इस प्रकार इसमें कुल गाथाएँ ११४ हैं। जिसका बहुभाग मोहनीय कर्म की क्षपणा से सम्बन्ध रखता है। अन्त की कुछ गाथाओं में कषाय का क्षय हो जाने के पश्चात् जो कुछ कार्य होता है उसका विवेचन किया है। अन्त की गाथा में लिखा है कि जब तक यह जीव कषाय का क्षय हो जाने पर भी छद्मस्थ पर्याय से नहीं निकलता है तब तक ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायकर्म का नियम से वेदन करता है। उसके पश्चात् दूसरे शुक्लध्यान से समस्त घातिकर्मों को समूल नष्ट करके सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होकर विहार करता है। कषायप्राभृत यहाँ समाप्त हो जाता है। किन्तु सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हो जाने के बाद भी जीव के चार अघातिया कर्म शेष रह जाते हैं, अत: उनके क्षय का विधान सूत्रकार ने पश्चिमस्कन्ध नामक अनुयोगद्वार के द्वारा किया है। और वह द्वार चारित्रमोह की क्षपणा नामक अधिकार की समाप्ति के बाद प्रारम्भ होता है। इसमें चार अघातिकर्मों का क्षय बतलाकर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होने का कथन किया गया है।