ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

कर्म-निर्जरा :

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


कर्म-निर्जरा :

जं अण्णाणी कम्मं, खवेदि भवसयहस्स—कोडीहिं।

तं णाणी तिहिं गुत्तो, खवेदि उस्सासमेत्तेण।।

—प्रवचनसार : ३-३८

अज्ञानी साधक बाल तप के द्वारा लाखों—करोड़ों जन्मों में जितने कर्म खपाता है, उतने कर्म मन, वचन, काया को संयत रखने वाला ज्ञानी साधक एक श्वास मात्र में खपा देता है।

भवकोडी—संचियं कम्मं, तवसा निज्जरिज्जइ।
—उत्तराध्ययन : ३०-६

साधक करोड़ों भवों के संचित कर्मों को तपस्या के द्वारा क्षीण कर देता है।

अप्पाणं जो णिंदइ, गुणवंताणं करेइ बहुमाणं।
—कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ११२

जो मनुष्य अपनी निंदा करता है और गुणवन्तों की प्रशंसा करता है, उसके कर्म—निर्जरा होती है।