कर्म-मुक्ति :

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कर्म-मुक्ति :

पक्के फलम्हि पडिए, जह ण फलं बज्झए पुणो विंटे।

जीवस्स कम्मभावे, पडिए ण पुणोदयमुवेइ।।

—समयसार : १६८

जिस प्रकार पका हुआ फल गिर जाने के बाद पुन: वृन्त से नहीं लग सकता, उसी प्रकार कर्म भी आत्मा से विमुक्त होने के बाद पुन: आत्मा (वीतराग) को नहीं लग सकते।

श्रद्धां नगरं कृत्वा, तप:संवरमर्गलाम्।

क्षान्तिं निपुणप्राकारं, त्रिगुप्तं दुष्प्रधर्षकम्।।
तपोनाराचयुक्तेन, भित्त्वा कर्मकचुकम्।
मुर्नििवगतसंग्राम:, भवात् परिमुच्यते।।

—समणसुत्त : २८६-२८७

श्रद्धा को नगर, तप और संवर को अर्गला, क्षमा को (बुर्ज, खाई और शतघ्नीस्वरूप) त्रिगुप्ति (मन—वचन—काय) से सुरक्षित तथा अजेय सुदृढ़ प्राकार बनाकर तपरूप वाणी से युक्त धनुष से कर्म—कवच को भेदकर (आंतरिक) संग्राम का विजेता मुनि संसार से मुक्त होता है।