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कर्म और पुनर्जन्म की व्याख्या

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कर्म और पुनर्जन्म की व्याख्या

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संसार का प्रत्येक प्राणी सुख की इच्छा करता है और दु:ख से डरता है। इसलिए जिनेन्द्र देव ने दु:ख को दूर करने वाली और शाश्वत सुखको उत्पन्न करने वाली शिक्षा को ही अपने उपदेश का विषय बनाया है। समीचीन सुख की प्राप्ति तभी सम्भव है जब बन्ध के हेतुओं का अभाव और निर्जराद्वारा समस्त कर्मों का आत्मा से अलग होना निश्चित हो जाए।

कर्मका आत्मा के साथ संयुक्त होने से ही आत्मा विभिन्न योनियों तथ ऊँची-नीची गतियों में भ्रमण करता रहता है। प्राणी जो कुछ भी कर्म करता है, उन कर्मों का फल उसे भोगना ही पड़ता है। क्योंकि कर्मों का फल कर्म करने वाले को दिये बिना रहता, यह उसका स्वाभाविक गुण है।

कर्म सिद्धान्त के अनुसार ही शुभ कर्मों का फल शुभ दायक और अशुभ कर्मों का फल अशुभ दायक होता है। जब यह जीव राग- द्वेष से युक्त होता है तब वह नवीन कर्मों का बंध करता है और इन नवीन कर्मों के कारण ही उसे नरक , मनुष्य, तिर्यंच और देव गतियों में भ्रमण करना पड़ता है। इन गतियों में जीव के जन्म ग्रहण करने पर राग-द्वेष परिणाम होते रहते हैं और राग-द्वेष से कर्मों का बन्ध होता रहता है। जिससे प्राणी नरकादि गतियों में जन्म लेता है। इस प्रकार कर्म प्रवाह के फलस्वरूप नवीन जन्म होता रहता है। इस नवीन जन्म को ही पुनर्जन्म, पूनर्भव, जन्मांतर, भावान्तर, परलोक, पुनरुत्पत्ति आदि नामों से जाना जाता है।[१]


कर्म सिद्धान्त का यह नियम है कि प्राणी जो भी कर्म करता है उसके फल को भोगने के लिए उसे दुबारा जन्म लेना पड़ता है, क्योंकि पूर्वकृत कर्म-फल पूर्व जन्म में पूरा नहीं हो पाता है। अर्थात् कुछ कर्म इस प्रकार के होते हैं जिनका फल इस जन्म में -(वर्तमान पर्याय) में मिल जाता है और कुछ कर्म इस प्रकार के होते हैं जिनका फल इस जन्म में नहीं मिलता है, इसलिए अगला जन्म (पूनर्जन्म) लेना पड़ता है। जिन कर्मों का फल वर्तमान जन्म में फलित नहीं होता है, उसको भोगने के लिए उचित समय पर वर्तमान समय पर वर्तमान शरीर का त्याग करके नवीन शरीर धारण करना पड़ता है। यह पुनर्जन्म कहा जाता है। इस पुनर्जन्म में जो आत्मा पर्व पर्याय में रहती है वर्तमान शरीर को त्याग करने को मृत्यु और नवीन शरीर धारण करने को जन्म कहा जाता है। इस जन्म और मृत्यु के बीच आत्मा सदा एक सी रहती है।

यहाँ पर मृत्यु का मतलब स्पष्ट है कि वर्तमान शरीर जर्रर या रोगी होने पर या आयुपूर्ण होने पर उस शरीर में रहने वाला आत्मा उस शरीर को त्याग देता है। और शेष कर्मों का फल भोगने के लिए आत्मा नवीन शरीर धारण कर लेता है, इस प्रकार आत्मा का नवीन शरीर धारण करने का पुनर्भव कहा गया है। व्यावहारिक भाषा में जिस प्रकार मनुष्य फटे, पुराने वस्त्रों को छोड़कर नवीन वस्त्रों को धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा भी अपने पुराने जीर्ण-शीर्ण शरीर को छोड़कर नये शरीर को धारण कर लेता है।

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कर्म और आत्मा :

प्राणियों के पुनर्जन्म में कर्म का महत्वपूर्ण योगदान है। जैन चिन्तकों ने यद्यपि आत्मा और कर्म का अपना-अपना स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार किया है फिर भी इनका परस्पर घनिष्ठ समबन्ध है। जीव और कर्म का बीज और वृक्ष की तरह कार्य- कारण सम्बन्ध है। कर्म से कषाय और कषाय से कर्म, यह परम्परा बीज और वृक्ष की तरह अनादिकाल से प्रवाहित हो रही है और तब तक होती रहेगी जब तक संसार में जीवों का अस्तित्व है।

षटड्खण्डागम ग्रंथराज के अनुसार - ‘यत् क्रियते तत् कर्म’[२] अर्थात् किसी कार्य या व्यापार का करना कर्म कहलाता है। जैसे - पढ़ना, लिखना, सोना आदि क्रियाएँ कर्म है। जैन-साहित्य में कर्म को पुद्गल परमाणु पिण्ड माना गया है। तदनुसार यह लोक तेईस वर्गणाओं से व्याप्त है। उनमें से कुछ पुद्गल परमाणु कर्म-रूप से परिणत होते हैं, उन्हें कर्मवर्गणा कहते हैं। कर्म बनने योग्य पुद्गल परमाणु राग- द्वेष से आकृष्ट होकर आत्मा की स्वाभाविक शक्ति का घात करके उसकी स्वतंत्रता को रोक देते हैं, इसलिए ये पुद्गल परमाणु कर्म कहलाते हैं।

तत्वार्थवार्तिक के अनुसार - ‘‘निश्चयनय की दृष्टि से वीर्यान्तराय और ज्ञानावरण के क्षयोपशम की अपेक्षा रखने वाले आत्मा के द्वारा आत्म-परिणाम और पुद्गल के द्वारा पुद्गल परिणाम एवं व्यवहारनय की दृष्टि से आत्मा के द्वारा पुद्गल परिणाम और पुद्गल के द्वारा आत्म-परिणाम करना कर्म है।’’[३]

अनादि कालीन कर्म- बंध से युक्त जीव जब रागादि कषायों से संतप्त होकर मानसिक, वाचिक या कायिक क्रिया करते हैं तब वह कार्मण वर्गणा के पुद्गल- परमाणु आत्मा की ओर आकृष्ट होते हैं। जिस प्रकार लोहा चुम्बक की ओर आकर्षित होता है या जिस प्रकार अग्नि से संतप्त लोहे का गोला पानी में डालने पर चारों ओर से पानी खींचता है। ऐसे क्रियाओं के करने से आत्म, प्रदेशों में उसी प्रकार विक्षोभ या कम्पन होता है, जिस प्रकार तूफान के कारण समुद्र के पानी में चंचल तरंगें उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार आत्म प्रदेशों के परिस्पन्द होने को योग कहते हैं।[४] योग के कारण ही कर्म- योग्ग पुद्गल परमाणुओं का आत्मा की ओर आना ही आस्रव कहलाता है। अर्थात् पुण्य- पाप रूप कर्मों के आगमन को आस्रव कहते हैं। आस्रव जीव के शुभ-अशुभ कर्मों के आने का द्वार है। आस्रव के कारण परमाणु आकर आत्म- प्रदेशों में दूध और पानी की तरह मिल जाता है, तब वे कार्मण पुद्गल- परमाणु कर्म कहलाते हैं।[५] परस्पर एक क्षेत्रवगाही होकर आतमा और पुद्गल परमाणुओं को घनिष्ठ सम्बन्ध को प्राप्त होना ही कर्म है। कर्म और आत्मा के इस प्रकार के सम्बन्ध को बन्ध कहा जाता है।[६] क्योंकि कर्म आत्मा की स्वाभाविक शक्ति का घात करके इस प्रकार परतंत्र कर देते हैं कि आत्मा विभाव रूप से परिणमन करने लगती है।[७]

राग- द्वेष और मोह के कारण कर्म- रूपी रज आत्म- प्रदेशों में चिपक जाती है। अर्थात् संसारी जीव के राग- द्वेष रूप परिणाम होते हैं और रागादि परिणामों से नवीन कर्मों का बन्ध होता है जिससे नरकादि गतियों में भ्रमण करना पड़ता है। इन गतियों में जीव के जन्म ग्रहण करने पर उससे शरीर, शरीर से इन्द्रियाँ और इन्द्रियों से विषयों का ग्रहण और विषयों के ग्रहण से राग- द्वेष परिणाम होते हैं और पुन: उन राग- द्वेष से कर्मों का बन्ध होता है।[८]

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कर्म बन्ध की प्रक्रिया

संसार का प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों से बंधा हुआ है। कर्मों के उदय में इसके राग- द्वेषादि रूप भाव होते हैं तथा राग- द्वेषादि भावों के कारण पुन: कर्म बन्ध होता है इस प्रकार बीज और वृक्ष की भाँति कर्म बन्ध का क्रम अनादि काल से ही चला आ रहा है।[९]

कर्म बन्ध का हेतु आस्रव है। कर्मों के आगमन को आस्रव कहते हैं। जीव के मन, वचन और काय की प्रवृत्ति के निमित्त से कार्मण वर्गणाओं का कर्म रूप से परिणमन होना आस्रव है तथा आस्रवित कर्म-पुद्गलों का जीव के राग-द्वेष आदि विकारों के निमित्त से आत्मा के साथ एकाकार हो जाना ही बंध है। बंध आस्रव पूर्वक होता है। आस्रव और बंध दोनों युगपत होते हैं उनमें कोई समय भेद नहीं है।[१०] आस्रव और बंध का यही सम्बन्ध है। सामान्यतया आस्रव के कारणों को ही बंध का कारण (कारण का कारण होने से) कह देते है, किन्तु बंध के लिए अलग शक्तियाँ काम करती हैं।

शरीर और आत्मा दोनों के संयोग से उत्पन्न क्रियात्मक शक्ति रूप सामथ्र्य जनित कम्पन के द्वारा आत्मा और कर्म परमाणुओं का संयोग (आस्रव) होता है और आत्मा के साथ संयुक्त होकर कर्म योग्य परमाणु कर्म रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को कर्म- बंध की प्रक्रिया कहते हैं।[११]

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कर्म- बंध के कारण

जैनाचार्य ने कर्म- बंध के लिए दो प्रमुख कारकों का नाम बताया है - १. योग और २. कषाय। योग शक्ति के कारण कर्म वर्गणाएं कर्म रूप से परिणत होती हैं तथा कषायों के कारण उनका आत्मा के साथ संश्लेष रूप से एक क्षेत्रवगाह सम्बन्ध होता है।[१२]

जैनाचार्य कुन्दकुन्द ने समयसार में अज्ञान के साथ राग- द्वेष, मोह, मिथ्यात्व, अविरमण, कषाय और योग को बंध का कारण माना है।[१३] रामसेन ने तत्वानुशासन में मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र को बंध का कारण बताया है।[१४] तत्त्वार्थसूत्र में मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग इन पाँच तत्वों को बंध का कारण बताया है।[१५] विपरीत श्रद्धा या तत्त्व ज्ञान के अभाव को मिथ्यात्त्व कहते हैं। जीवादि पदार्थों का श्रद्धान न करना मिथ्यादर्शन है। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह से विरत न होना अविरति है। कुशल कार्यों के प्रति अनादर या अनास्था होना प्रमाद है। आत्मा के भीतर वे कलुष परिणाम, जो कर्मों के श्लेश के कारण होते हैं या जीव के जिन भावों के द्वारा संसार की प्राप्ति हो वे कषाय भाव हैं। क्रोध, मान, माया और लोभ के भेद से कषाय के चार भेद हैं। इनमें क्रोध और मान, द्वेष- रूप है तथा लोभ और माया, राग- रूप है। राग और द्वेष ही समस्त अनर्थों का मूल है।

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कर्म - बंध से मुक्ति का उपाय

कर्म बंधन से मुक्ति पाने के लिए दो उपायों का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। प्रथम उपाय के द्वारा नवीन कर्मबन्ध को रोका जाता है, और दूसरी विधि के द्वारा आत्मा से पूर्वबद्ध कर्मों को अपने विपाक के पूर्व ही तपादि के द्वारा अलग किया जाता है। ये क्रमश: संवर और निर्जरा के नाम से जाने जाते हैं। आचार्य उमास्वामी जी के अनुसार - ‘आस्रव निरोध: संवर:’[१६] अर्थात् कर्मों के आस्रव के निरोध को संवर कहते हैं। आचार्य अकलंक देव ने तत्वार्थ वार्तिक में लिखा है कि जिस प्रकार नगर की अच्छी तरह से घेराबंदी कर देने से शत्रु नगर के अन्दर प्रवेश नहीं पा सकता है ठीक उसी प्रकार गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषह-जय और चारित्र द्वारा इन्द्रिय कषास और योग को भली-भाँति संवृत कर देने पर आत्मा में आने वाले नवीन कर्मों का रुक जाना संवर है।[१७]

आचार्य उमास्वामी जी ने तत्त्वार्थसूत्र में नये कर्मबंध को आने से रोकने के लिए सात उपायों की चर्चा की है।[१८] वे इस प्रकार है - गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषह जय, चरित्र और तप।

निर्जरा— बंधन से छुटकारा पाने के लिए उपर्युक्त विधि द्वारा नये आने वाले कर्मों को रोकना चाहिए तथा पूर्व संचित या पुराने कर्मों के विनाश के लिए निर्जरा का अभ्यास करना चाहिए। आत्म-प्रदेशों से कर्मों का छूटना निर्जरा कहलाता है। आत्मा के साथ बंधे हुए पुराने कर्मों का क्षय करना निर्जरा का कार्य है।[१९] कर्मों की निर्जरा दो प्रकार से होती है - पद्ध सविपाक और पपद्ध अविपाक निर्जरा।[२०] यथा समय स्वयं कर्मों का उदय में आकर फल देकर अलग होते रहना सविपाक निर्जरा है।तपश्चरण के द्वारा कर्मों का आत्मा से अलग करना अविपाक निर्जरा है। अतिपाक निर्जरा ही मोक्ष का कारण है। मोक्ष स्वरूप निरुपण करते हुये आचार्य उमास्वामी जी ने कहा है कि - बंध के हेतुओं का अभाव होने से और पुराने कर्मों का निर्जरा होने से समस्त कर्मों का आत्मा से समूल अलग होने से ही मोक्ष प्राप्ति होती है। एक बार मोक्ष की प्राप्ति होने के बाद पुन: जन्म या पुनर्जन्म की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

आत्मवादी विचारकों के अनुसार पुनर्जन्म की व्याख्या

भारतीय विचारधारा में दो प्रकार के विचारों का वर्णन मिलता है। प्रथम विचारधारा के अनुसार ‘आत्मा के पुनर्जन्म सिद्धांत’ को मान्यता प्राप्त है लेकिन दूसरी विचारधारा के अनुसार पुनर्जन्म सिद्धांत को मान्यता प्राप्त नहीं है। प्रथम विचारधारा के पोषक- न्याय वैशेषिक, सांख्य, योग, बौद्ध और जैन दर्शन और दूसरी विचारधारा में चार्वाक, यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म को रखा जाता है। इनको एक जन्म वादी कहा जाता है। इनके अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा नष्ट नहीं होती है। वह न्याय के दिन तक प्रतीक्षा में रहती है और न्याय के दिन तत्सम्बन्धी देवता द्वारा उनके कर्मों के अनुसार स्वर्ग या नरक भेज देते हैं।

न्याय— दर्शन के मतानुसार शुभ-अशुभ कर्म करने से इसके संस्कार आत्मा में पड़ जाते है। वैशेषिक मतानुसार राग-द्वेष से धर्म और अधर्म की प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार की प्रवृत्ति सुख-दु:ख को उत्पन्न करती है तथा ये सुख-दुख जीव के राग-द्वेष को उत्पन्न करते हैं। जिससे जन्म-मरण का चक्र चलायमान रहता है।[२१] षड्दर्शन रहस्य में पं. रंगनाथ पाठक लिखते है कि ‘‘जब तक धर्माधर्म रूप प्रवृत्ति जन्य संस्कार बना रहेगा तब तक कर्मफल भोगने के लिए शरीर ग्रहण करना आवश्यक रहता है। शरीर ग्रहण करने पर प्रतिकूल वेदनीय होने के कारण बाधनात्मक दु:ख का होना अनिवार्य रहता है। मिथ्या ज्ञान से दु:ख जीवन पर्यन्त अविच्छेदन - निरन्तर प्रवर्तमान होता है। यही संसार शब्द का वाच्य है। यह घड़ी की तरह निरन्तर अनुवृत्त होता रहता है। प्रवृत्ति ही पुन: आवृत्ति का कारण होती है।[२२] महर्षि गौतम के अनुसार ‘‘मिथ्या ज्ञान से राग-द्वेष आदि दोष उत्पन्न होता है। इन दोषों से प्रवृत्ति होती है तथा प्रवृत्ति से जन्म और जन्म से दु:ख होता है।[२३] न्याय और वैशेषिकों का मत है कि आत्मा व्यापक है। धर्म और अधर्म प्रवृत्तिजन्य संस्कार मन में निहित होते हैं। अत: जब तक आत्मा का मन के साथ सम्बन्ध रहता है तब तक आत्मा का पुनर्जन्म होता रहता है।

सांख्य और योग दर्शन में यह मान्यता है कि ‘‘जीव अपने शुभाशुभ कर्मों के परिणाम स्वरूप अनेक योनियों में भ्रमण करता है।[२४] सांख्य- योग चिन्तकों का सिद्धांत है कि शुभ और अशुभ कर्म स्थूल शरीर के द्वारा किये जाते हैं लेकिन वह उन कर्मों के संस्कारों का अधिष्ठाता नहीं है। शुभ और अशुभ कर्मों के अधिष्ठाता के लिए स्थूल शरीर से भिन्न सूक्ष्म शरीर की कल्पना की गयी है।[२५] पांच कर्मेन्द्रिय, पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच तन्मात्रओं, बुद्धि एवं अंहकार से सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है।[२६] मृत्यु होने पर स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है किन्तु सूक्ष्म शरीर वर्तमान रहता है। इस सूक्ष्म शरीर को आत्मा का लिंग भी कहते हैं, जोप्रत्येक संसारी पुरुष के साथ रहता है। यही सूक्ष्म शरीर पुनर्जन्म का आधार है। आत्मा के मुक्त हो जाने पर वह उससे अलग हो जाता है।

मीमांसा दर्शन में न्याय— वैशेषिक की तरह मन को पुनर्जन्म का कारण मानकर पुनर्जन्म सिंद्धान्त की व्याख्या की गयी है। और वेदांत दर्शन में सांख्यों की तरह सूक्ष्म शरीर की कल्पना करके पुनर्जन्म का विश्लेषण किया गया है।

बोद्ध दर्शन के अनुसार ‘‘कुशल (शुभ) कर्म सुगति का और अकुशल- अशुभ कर्म दुर्गति का कारण है। ‘भव चक्र समबन्धी प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत के अनुसार ‘‘अविद्या और संस्कार ही हमारे पुनर्जन्म के कारण हैं। अविद्या का अर्थ है - अज्ञान। अवास्तविक को वास्तविक समझना, अनात्म को आत्म मानना अविद्या है। अविद्या- अज्ञान के कारण संस्कार होते हैं। संस्कार को मानसिक वासना भी कहते हैं। संस्कार से विज्ञान उत्पन्न होता है। विज्ञान वह चित्तधारा है जो पूर्व जन्म में कुशल- अकुशल कर्मों का कारण उत्पन्न होती है और जिसके कारण से मनुष्य को आँख, कान आदि विषयक अनुभूति होती है।[२७] विज्ञान के कारण नामरूप उत्पन्न होता है। रूप को नाम और वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान को रूप कहते हैं। मन और शरीर के समूह के लिए नाम-रूप का प्रयोग किया जाता है। नाम रूप षड़ायतन को उत्पन्न करता है। पांच इंन्द्रियां और मन षड़ायतन कहलाता है। षडायतन स्पर्श का कारण है। इन्द्रिय और विषयों का संयोग स्पर्श है। स्पर्श के कारण वेदना उत्पन्न होती है। पूर्व इन्द्रियानुभूति वेदना कहलाती है। वेदना तृष्णा को उत्पन्न करती है। विषयों को भोगने की लालसा तृष्णा कहलाती है। तृष्णा उपादान को उत्पन्न करता है। सांसारिक विषयों के प्रति आसक्त रहने की लालसा उपादान है। उपादान भव का कारण है। भव का अर्थ है- जन्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति। भव- जाति (पुनर्तन्म) का कारण है और जाति से ही जरा-मरण होता है। इस प्रकार इस पुनर्जन्म का चक्र चलता रहता है। अविद्या और तृष्णा ही पुनर्जन्म- चक्र के मुख्य चक्के हैं। बौद्ध दर्शन में पुनर्जन्म की यही प्रक्रिया है।[२८]

जैन विचारकों का मत है कि ‘‘आत्मा का पर-द्रव्य के साथ संयोग होने पर उसके विभिन्न योनियों में घूमना पड़ता है।’’[२९] हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्मचर्य और परिग्रह रूप अशुभ कर्म करने से जीव नरकादि अशुभ और निम्न योनियों में भ्रमण करता है और अहिंसादि शुभ कर्म करने से जीव मनुष्य देव आदि शुभ योनियों में जन्म लेता है।[३०] यहाँ पर यह ध्यातव्य है कि आत्मा और कर्म का अनादिकाल से सम्बन्ध है, जिसके कारण जीव अनादिकाल से आवागमन रूप पुनर्जन्म के चक्र में भ्रमण करता रहता है।

जैनाचार्य कुन्दकुन्द के अनुसार — ‘इस संसारी जीव के अनादि कर्म - बंध के कारण राग-द्वेष रूप स्निग्ध एवं अशुद्ध भाव होते हैं, उन अशुद्ध राग द्वेष रूप परिणामों के कारण ज्ञानावरणादि रूप आठ द्रव्य कर्मों का बंध होता है। इन द्रव्य कर्मों के उदय से जीव नरक, तिर्यंच मनुष्य और देव गतियों को प्राप्त करता है। इन गतियों में जन्म लेने से शरीर की उपलब्धि होती है और शरीर उपलब्ध होने पर इन्द्रियां होती है और इन्द्रियों के होने पर जीव विषय ग्रहण करता है तथा विषयों के ग्रहण करने से राग द्वेष उत्पन्न होते है। इस प्रकार संसारी जीव कुम्भकार के चक्र के समान इस संसार में भ्रमण करता रहता है।[३१] इस कथन से यह सिद्ध हो जाता है कि पुनर्जन्म का प्रमुख कारण कर्म और जीव का परिणाम है।

आचार्य अमृतचंद स्वामी के अनुसार— ‘‘ यह जीव शरीर में दूध और पानी की तरह मिल कर रहता है तो भी अपने स्वभाव को छोड़कर शरीर रूप नहीं हो जाता है। रागादि भावों सहित होने के कारण यह जीव द्रव्यकर्म रूपी मल से मलिन हो जाने पर मिथ्यात्व रागादि रूप भाव कर्मों तथा द्रव्य कर्मों से रचित अन्य शरीर में प्रविष्ट होता रहता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि जीव स्वयं शरीरांतर में जाता है।[३२]

अन्य दर्शनों में जिसे सूक्ष्म शरीर की मान्यता प्रदान की है, जैन दर्शन में उसे पांच शरीरों में से एक कार्मण शरीर कहा गया है, जो समस्त अन्य शरीरों की अपेक्षा सूक्ष्म होता है।[३३] और जो समस्त संसारी जीवों को होता है। संसारी जीवों की मृत्यु के बाद औदारिकादि समस्त शरीर नष्ट हो जाते हैं, केवल कार्मण शरीर जीव के साथ रहता है। यही कार्मण शरीर जीव को विभिन्न योनियों में ले जाता है।[३४] जब तक जीव मुक्त नहीं हो जाता है तब तक इस शरीर का विनाश नहीं होता है। कार्मण शरीर ही अन्य समस्त शरीरों का कारण होता है।[३५] इस शरीर के नष्ट होने पर ही जीव का पुनर्जन्म नहीं होता है।

कर्म सिद्धांत के अध्ययन से यह बात मालूम होता है कि एक आनुपूर्वी नामक नामकर्म होता है। यही नामकर्म जीव को अपने उत्पत्ति स्थान तक उसी प्रकार पहुँचा देता है, जिस प्रकार रज्जू (रस्सी) से बंधा हुआ बैल अभिमीँट स्थान पर ले जाया जाता है। आनुपूर्वी कर्म वक्रगति करने वाले जीव की सहायता करता है। कार्मण शरीर युक्त जीव अभिष्ट जन्म स्थान पर पहुँचकर औदारिकादि शरीर का स्वयं निर्माण करता है। जैन दर्शन में पुनर्जन्म की यही विधि है।

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पुनर्जन्म सिद्धान्त की सिद्धि

भारतीय मनीषियों ने अनेक युक्तियों एवं प्रमाण द्वारा पुनर्जन्म सिद्धान्त को सिद्ध किया है।३६

१. नवजात शिशु में हर्ष, भय, शोक, माँ का स्तनपान आदि क्रियाओं से पुनर्जन्म सिद्धांत की पुष्टि होती है। क्योंकि उसने इस जन्म में हर्षादि का अनुभव नहीं किया है, जब कि ये सब क्रियाएं पूर्वाभ्यास से ही सम्भव हैं। अनन्त वीर्य ने सिद्ध विनिश्चय टीका में इसी तर्वâ से पुनर्जन्म सिद्धांत की सिद्धि की है। जिस प्रकार एक युवक का शरीर शिशु की उत्तरवर्ती अवस्था है, इसी प्रकार शिशु का शरीर पूर्व जन्म के पश्चात् होने वाली अवस्था है। यदि ऐसा न माना जाए तो पूर्व जन्म में भोगे हुए तथा अनुभव किये हुए का स्मरण न होने से तत्काल प्राणियों में उपर्युक्त भयादि प्रवृत्तियाँ कभी नहीं होगी लेकिन उनमें उपर्युक्त प्रवृत्तियाँ होती हैं। अत: पुनर्जन्म की सत्ता स्वीकार्य योग्य है।

२. प्राय: सभी प्राणियों में सांसारिक विषयों के प्रति राग द्वेषात्मक प्रवृत्ति का होना भी पुनर्जन्म को सिद्ध करता है। न्यायदर्शन- वात्स्यायन भाष्य मे इसका विस्तृत विवेचन किया है।

३. संसार के सभी प्राणी एक समान नहीं होते है। कोई जन्म से अन्धा, बहरा, लूला होते हैं तो कोई बहुत सुन्दर रूपवान होते हैं, आदि। इस प्रकार जीवों में व्याप्त विषमता किसी अदृश्य कारण की ओर संकेत करती है। यह अदृश्य कारण पूर्वजन्म में किये गये कर्मों का फल है; जिसे भोगने के लिए दूसरा जन्म लेना पड़ता है। अत: जीवों के जीवन स्तर से भी पुनर्जन्म की सिद्धि होती है।

४. कुछ व्यक्ति अलौकिक प्रतिभा वाले होते हैं और कुछ अज्ञानी होते हैं। इसका कारण यही है कि जिस जीव ने जिस कार्य का पहले के जन्म में अभ्यास किया होता है, वह उसमें प्रवीण हो जाता है और अनभ्यस्त आत्मा मूढ़ होती है। जन्म जात विलक्षण प्रतिभा के आधार पर भी पुनर्जन्म की सिद्धि होती है।

५. प्रत्यक्ष और स्मरण के योग- रूपज्ञान- प्रत्यभिज्ञान के आधार पर भी पुनर्जन्म की सिद्धि होती है। जैन शास्त्रों में देवों के वर्णन के अन्तरगत देवों में एक व्यंतर देवों का भी वर्गीकरण किया गया है। यक्ष, राक्षस, भूतादि व्यंतर देव प्राय: यह कहते हुए सुने जाते हैं कि मैं वही हूँ जो पहले अमुक था। यदि आत्मा का पुनर्जन्म न माना जाय तो भूत, प्रेत को इस प्रकार का प्रत्यभिज्ञान नहीं होना चाहिए। अत: व्यंतरों का प्रत्यभिज्ञान पूनर्जन्म को सिद्ध करता है।

६. पूर्वभव का स्मरण पुनर्जन्म को सिद्ध करने वाला ज्वलन्त प्रमाण है। नारकी जीवों के दु:खों का वर्णन करते हुए पूज्यपाद स्वाम्ति ने कहा है कि - ‘‘पूर्वभव के स्मरण होने से उनका बैर दृढ़तर हो जाता है, जिससे वे कुत्ते- गिद्ध की तरह एक दूसरे का घात करने लगते हैं। योगसूत्र के कथन से भी सिद्ध है कि आत्मा का पूनर्जन्म होता है। यदि पुनर्जन्म न हो तो पूर्वभव स्मरण- कथन करने का कोई अर्थ नहीं होता है जब तक दूसरा जन्म न माना जाये तब तक ‘पूर्वभव’ नहीं कहा जा सकता।

पूनर्जन्म सिद्धान्त के कथन से जीव को न केवल नैतिक बनने की प्रेरणा मिलती है बल्कि वह आत्मा की अशुद्धता को क्रमश: दूरकर शुद्धात्मा की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हो जाता है, शुद्धात्मा- परमात्मा की प्राप्ति ही जीवन का अंतिम उद्देश्य है।


डॉ. बसन्त लाल जैन

काकन्दी दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र पोस्ट-खुखुन्दु, जिला देवरिया (उ.प्र.)

अनेकान्त जुलाई -सित्म. २०१३

[सम्पादन] टिप्पणी

  1. (क) प्रेत्यामुत्र भवान्तरे। अमरकोष ३/४/८ (ख) मृत्वा पुनर्भवनं प्रेत्यभाव:। अष्टसहस्री पृ. १६५ (ग) प्रेत्यभाव: परलोक: ।। अष्टसहस्री पृ. ८८ (घ) प्रत्यभावो जन्मान्तर लक्षण:।। अष्टसहस्री पृ. १८१ (ड़) पुनरुत्पत्ति: प्रेत्यभाव:। न्यायसूत्र १/१/१९
  2. षड्खंडागम भाग६/पृष्ठ १८
  3. तत्वार्थ- वार्तिक ६/१/७
  4. पपद्ध सर्वार्थसिद्धि २/२६ एवं ६/१; पपद्ध तत्तवार्थसूत्र ६/१; पपद्ध पंचाध्यायर २/४५
  5. पंचास्तिकाय गाथा ६५-६६
  6. तत्त्वार्थसूत्र ८/२. तत्वानुशासन ६
  7. सर्वार्थसिद्धि ७/२५ तत्वार्थवार्तिक १/४/१७ पृष्ठ २६
  8. पंचास्तिकाय गाथा- १२८-३०, भगवती सूत्र ९
  9. जैन तत्व विद्या, पृ. ३१७
  10. तत्वार्थसूत्र ८/२
  11. मूलाचार का समीक्षात्मक अध्ययन पृ. ४१८
  12. द्रव्य संग्रह गाथा ३३, जैन धर्म और दर्शन, पृ. १२९
  13. समयसार गाथा १०९, २३७, २४१, १७७
  14. तत्वानुशासन ८
  15. तत्वार्थ सूत्र ८/१
  16. तत्वार्थसूत्र ९/१
  17. तत्वार्थवार्तिक १.४.११. तत्वार्थ सूत्र ९/१
  18. तत्वार्थ सूत्र ९/२-३
  19. भगवती आराधना गाथा १८४७
  20. सर्वार्थसिद्धि ८/२३ पृ. ३९९
  21. वैशेषिक सूत्र ६/२/१४. भारतीय दर्शन की रूप रेखा पृ. २६२
  22. षड्दर्शन रहस्य पृ. १३५
  23. न्याय सूत्र १/१/२
  24. सांख्य सूत्र ६/४१
  25. सांख्य सूत्र ६/१६
  26. सांख्य सूत्र प्रवचन भाष्य ६/९
  27. बौद्ध दर्शन तथा अन्य भारतीय दर्शन पृ. ३९५
  28. भारतीय दर्शन की रूप रेखा पृ. १५०
  29. ज्ञानार्णव २१/२२
  30. ज्ञानार्णव, संसारभावना ८
  31. पंचास्तिकाय १२८/३०
  32. पंचास्तिकाय गाथा ३४
  33. तत्त्वार्थसूत्र २/३६-७/सर्वस्य-वही २/४२
  34. सर्वार्थसिद्धि २/२५ पृ. १८३
  35. सर्वार्थसिद्धि ३६. भारतीय दर्शन