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कर्म सिद्धान्त एवं भौतिक विज्ञान का क्वाण्टम सिद्धान्त

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कारण-कार्य सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में

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कर्म सिद्धान्त एवं भौतिक विज्ञान का क्वाण्टम सिद्धान्त

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पारसमल अग्रवालि

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१. कारण — कार्य सिद्धान्त—

यदि हम एक काँच के बरतन को जमीन पर गिराएं तो उसके बहुत प्रकार के छोटे—मोटे टुकड़े हो जाते हैं। कुछ टुकड़े हो बहुत दूर तक बिखर जाते हैं। कुछ नजदीक गिरते हैं। कुछ पूर्व में कुछ पश्चिम में.....। कुल मिलाकर हमें सब कुछ अस्तव्यस्त लगता है किन्तु भौतिक वैज्ञानिक को लगता है कि यह सब निश्चित नियमों के अनुसार व्यवस्थित ढंग से हुआ है । इस तथ्य को भौतिक विज्ञान यह कह कर भी स्वीकारता है कि प्रकृति में कारण — कार्य सिद्धान्त लागू होता है, यानी निश्चित कार्य होता है। आचार्य अमृतचन्द्र इसी भाव को समयसार कलश में निम्नानुसार व्यक्त करते है[१]:—

बहिर्लुठति यद्यपि स्फुटदनंत शक्ति: स्वयं

तथाप्यपरवस्तुनों विशति नान्यवस्त्वन्तरम्।
स्वभाव नियतं यत: सकलमेव वस्तित्वष्यते
स्वभावचलनाकुल: किमिह मोहित: क्लिश्यते।।

इस कलश में आचार्य वस्तुओं को स्वभाव में नियत बताकर हमें यह उपदेश दे रहे हैं कि जब समस्त वस्तुएं स्वभाव में नियत हैं, तब (हे जीव!) तब (तुम) स्वभाव से चलित होकर मोहित हुए क्यों क्लेश पाते हो।

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कारण—कार्य सिद्धान्त की क्वाण्टम यांत्रिकी में अस्वीकृति:—

सन् १९२५ तक कारण—कार्य सिद्वान्त भौतिक विज्ञान में स्वीकृत होता रहा। किन्तु श्रोडिंगर, हाईजेनबर्ग, बोर प्लांक, दे—ब्राग्ली,आदि पल्लवित एवं पुष्पित क्वाण्टम यांत्रिकी में कारण—कार्य सिद्धान्त को पूर्णतया स्वीकृति नहीं मिली।[२] क्वाण्टम यांत्रिकी आज विज्ञान की गहनतम श्रेष्ठ खोज मानी जाती है। क्वाण्टम यांत्रिकी में कारण—कार्य सिद्धान्त को संभावनात्मक स्वीकृति मिली। क्वाण्टम यांत्रिकी के अनुसार सभी आवश्यक कारणोें के मिलते हुए भी अभीष्ट कार्य होने की १०० प्रतिशत ग्यारण्टी नहीं है। यानी समान कारणों के होते हुए भी कार्य (फल) असमान हो सकते हैं। इतना ही नहीं। यानी समान कारणों के होते हुए भी कार्य (फल) असमान हो सकते हैं। इतना ही नहीं इस अनोखे क्वाण्टम सिद्धान्त में बड़ी शान के साथ ‘अनिश्चितता सिद्धान्त’ को स्वीकारा गया। अनिश्चितता सिद्धान्तक के अनुसार किसी भी (सूक्ष्म) कण की स्थिति एवं गति का मापन एक साथ शुद्ध रूप से न तो जाना जा सकता है और न ही बताया जा सकता है।

एक तरह से मनुष्य सामान्य विवेक बुद्धि से क्वाण्टम यांत्रिकी समझ में नहीं आती है। नोबुल पुरस्कार विजेता बोर ने तो यहां तक कहा कि यदि क्वाण्टम यांत्रिकी को पढ़कर कोई व्यक्ति चौंक न जाये तो यह मानना चाहिए कि उस व्यक्ति को क्वाण्टम यांत्रिकी समझ में नहीं आई। आइन्सटीन[३] जैसे महान वैज्ञानिक क्वाण्टम यांत्रिकी से इतने चौंक गये थे कि वे मरते दम तक क्वाण्टम—यांत्रिकी से इतने चौंक गये थे वे मरते दम तक क्वाण्टम—यांत्रिकी के प्रशंसक तो रहे किन्तु इस पर शंका भी करते रहे कि कहीं—ना—कहीं कोई चूक हो रही है जिससे कारण—कार्य सिद्धान्त पूर्णतया लागू नहीं हो पा रहा है।

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३. कर्म सिद्धान्त द्धारा कारण—कार्य सिद्धान्त की रक्षा:—

आईन्सटीन क्वाण्टम यांत्रिकी एवं कारण—कार्य सिद्धान्त की रक्षा करने हेतु यह खोजते रहे कि सूक्ष्म कणों के व्यवहार को समझने में चूक कहां हो रही है? चुक कही हो रही है ? इस प्रश्न का उत्तर शायद कर्म सिद्धान्त दे सकता है। प्रयोगशाला में जब सूक्ष्म—कणों पर प्रयोग किये जाते हैं तब वैज्ञानिक उपकरणों की पकड़ में अत्यन्त सूक्ष्म कर्म—धूलि पकड़ में नहीं आती है। एक इलेक्ट्रान का द्रव्यमान एक ग्राम के करोड़वे भाग के करोड़वे भाग का ग्यारह लाखवां भाग होता है। इतना सूक्ष्मकण वैज्ञानिकों की पकड़ में है किन्तु कर्म—धूलि तो इससे भी अत्यन्त सूक्ष्म है। आचार्य उमास्वामी[४] के अनुसार कर्म—धूलि परम सूक्ष्म होती है:— औदारिक वैक्रियकाहारकतैजस कार्मणानि शरीराणि।। २.३६ परं परं सूक्ष्मं।।२.३७

हम कर्म—धूलि को उपकरणों से पकड़ पायें या नहीं, किन्तु यदि कर्म—धूलि है तो उसका प्रभाव तो होगा ही। यानि चूक यह हो सकती है कि प्रयोगकर्ता की भावना के अनुसार कर्म—धूलि प्रयोग को प्रभावित कर रही है किन्तु वैज्ञानिक उसक कर्म—धूलि को गिनना चूक रहे हैं। आज यदा—कदा कई वैज्ञानिक यह स्वीकार करने लगे हैं कि प्रयोग कर्ता कीभावना का प्रभाव यंत्रों पर पड़ता है। इस तथ्य का विस्तार वर्णन ‘द गास्ट इन द एटम’[५] नामक पुस्तक में देखा जाता जा सकता है। इस पुस्तक में ‘कर्म—धूलि’ का जिक्र नहीं है किन्तु प्रयोगकत्र्ता की भावना का प्रभाव प्रयोग पर होता है—यह मानकर क्वाटण्टम यांत्रिकी एवं कारण—कार्य सिद्धान्त की रक्षा करने का प्रयास किया गया है। विग्नर[६], डायर[७] श्रोडिंगर[८] एवं पाउली[९] जैसे नोबुल पुरस्कार विजेता भी कारण—कार्य सिद्धान्त की रक्षा हेतु दिमागी विचारों का प्रभाव स्वीकारते हैं।

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४. कर्म—सिद्धान्त का प्रायोगिक समर्थन:—

आप कहेंगे कि ऊपर कर्म—सिद्धान्त को जिस तरह से प्रवेश कराया है वह तो तुक्का मात्र हैं। यहाँ यह भी प्रश्न हो सकता है कि किस भावना के अनुसार किस प्रकार की कर्म—धूलि होगी व उसके परिणाम किस प्रकार के होेंगे? इस प्रश्न का उत्तर जो कि मनुष्यों के जीवन में उपयोगी हो सकता है वह हमें कर्म—सिद्धान्त के विस्तृत रूप में मिलता है। किस प्रकार के विचारों से किस प्रकार का फल मिलता है यह विस्तार से कई ग्रन्थों में बताया गया है। उदाहरण के लिए हम आचार्य उमास्वामी के तत्वार्थसूत्र में वर्णित कुछ सूत्र ले सकते है। जैसे उमास्वामी ने बताया कि स्वयं को, पर को, या दोनों को एक साथ, दु:ख शोक, ताप (पश्चाताप), आव्रंदन (पश्चाताप से अश्रुपात करके रोना), वध (प्राणों का वियोग), एवं परिदेव (संक्लेश परिणामों से ऐसा रूदन करना कि सुननेवाले के हृदय में दया उत्पन्न हो जाये) उत्पन्न करने से असातावेदनीय कर्म का बंधन होता है, अर्थात् ऐसा करने से भविष्य में भी दु:ख एवं अशांति की सामग्री मिलती है। आचार्य उमास्वामी के शब्दों में

दु:ख शोकतापाव्रंदन वध परिदेवनान्यात्मपरो—

भय स्थानान्यसद्धेद्यस्य।।६—११

इसके विपरीत शुभ भावों से सातावेदनीय का बंध होता है। आचार्य४ लिखते हैं— भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोग: क्षान्ति: शौचमिति सद्धेद्यस्य।।६—१२ इस सूत्र का अभिप्राय यह है कि प्राणियों के प्रति और व्रतधारियों के प्रति अनुकम्पा (दया), दान सराग संयमादि के योग, क्षमा, शौच इत्यादि सातावेदनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं। और भी इसी तरह के कई सूत्र उमास्वामी सहित कई आचार्या[१०] ने प्राचीन ग्रन्थों मेें लिपिबद्ध किये हैं। इन सूत्रों की आंशिक पुष्टि कई प्रयोगोें से होती है। डॉ. दीपक चौपड़ा अमरीका में अपने न|िसंग होम में दवा के अतिरिक्त शुभ विचारों के प्रभाव से ऐसी—ऐसी बीमारियों ठीक करते हैं जिनका मात्र दवा से उपचार संभव नहीं हो पाता है। अपनी इस चिकित्सा पद्धति को वे क्वाण्टम चिकित्सा[११] कहते हैं। इस पद्धति की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा द्वारा लिखित पुस्तवेंâ अमरीका के छोटे—छोटे नगर के बुक स्टोर एवं पुस्तकालय में भी मिल जाती है। उनका सिद्धान्त यह है कि दवा के कण, श् वांस की वायु के कण, भोजन के कण अच्छे विचारों के अनुसार शरीर के ऐसे भागों में पहुँच सकते हैं जहां वे बीमारी घटा सकते हैं। ‘क्वाण्टम’ विश्लेषण का आधार क्वाण्टम यांत्रिकी द्वारा वर्णित सूक्ष्मकणों का संभावनात्क व्यवहार है। दूसरे शब्दों में, दवा से मरीज के ठीक होने की संभावना को बढ़ाने हेतु अतिरिक्त कारण के रूप में वे मनुष्य सद्विचारों का सहारा लेते हैंं। उमास्वामी यहां यह कहते हैं कि ये शुभ भाव ऐसी कर्म—धूलि को आमंत्रित करते हैं जिसका फल मनुष्य के लिए शुभ हो जाता है।

और भी कई उदाहरण इसके समर्थन में आज भौतिक सुखों के लिए जागरूक अमरीका में दिखाई दे सकते हैं। जैसे—

नार्मन विन्सेण्ट पील अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द पावर ऑफ पाजेटिव थिंकिग’ में अपने विस्तृत अनुभव, प्रयोग एवं अध्ययन के आधार पर लिखते हैं[१२] ‘‘डॉ. वीस का कथन है कि जोड़ो एवं मांसपेशियों के दर्द के क्राँनिक रोगी अपने किसी निकट के व्यक्के प्रति अन्दरुनि में आक्रोश भाव का पोषण करने से पीड़ित हो सकते है।’’

शुभ विचारों का उपयोग चिकित्सा में करके लुई है ने स्वयं ऐसा कैंसर का रोग ठीक किया था जिसको डॉक्टरों ने लाइलाज घोषित कर दिया था। आज यह महिला अमरीका में सैकड़ों प्रकार की बीमारियों का उपचार कर रही हैं। लुई हे की मान्यता यह भी है कि विचारों के अनुसार ही संयोग बन जाते हैं। लुई ये यहां तक लिखती है कि हमारे माता—पिता का चुनाव भी हमारे पूर्व विचारों में अनुसार ही होता है[१३]। लुई हे द्वारा अंग्रेजी भाषा में लिखित पुस्तक ‘हील योअर बाडी’ इतनी प्रसिद्ध हो रही है कि अब तक इस पुस्तक का स्पेनिश, प्रेंच, जर्मन, पोलिश, डच एवं स्वीडश भाषा में अनुवाद हो चुका है। इस पुस्तक के लेखन के उपरांत लुई हे ने पाया कि ने केवल शरीर अपितु जीवन की कई समस्याएं—आर्थिक, पारिवारिक भी विचारों से हल हो सकती है। इस अनुभव को लुई हे ने ‘यू केन हील योअर लाइफ’ नामक पुस्तक में संकलित किया है। इस पुस्तक की एक झलक के रूप में निम्नांकित अंश दृष्टव्य है

‘‘लम्बे समय तक बने रहने वाला नाराजगी भाव शरीर में कैंसर पैदा कर सकता है। आलोचना करने की स्थायी आदत बहुधा आर्थराइटिस पैदा करती है। अपराध भाव (पश्चाताप भाव) हमेशा सजा की ओर ले जाता है अत: शरीर में दर्द की बीमारी अपराध भाव से होती है। (जब कोई रोगी मेरे पास बहुत ज्यादा दर्द की शिकायत लेकर आता है तब मैं जान लेती हूूं कि इस रोगी के मन में अत्याधिक पश्चाताप है) डर एवं डर के कारण उत्पन्न तनाव से गंजापन, अल्सर एवं पांव फटने की बीमारियां होती हैं।’’

‘‘ मैंने पाया हे कि क्षमाभाव रखने एवं नाराजगी त्यागने से कैंसर भी ठीक हो सकता है। यह बहुत सरल (इलाज ल) लग सकता है किन्तु मैंने तो इसकी सफलता देखी है व अनुभव किया है।’’

इसी तरह अमरीका के वेन डायर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिअल मेजिक’ में ग्रेग एंडरसन का हवाला देते हैं जिन्हें लाइलाज कैंसर हो गया था, बाद में शुभ विचारों की अतिरिक्त मदद लेकर ग्रेग एंडरसन चंगे हुए थे व दुनिया के लाभ के लिये एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक है ‘द कैंसर कान्करर्स’। इस सन्दर्भ में वेन डायर लिखते हैं[१४]

उन्हें (ग्रे एण्डरसन को) यह अनुभव हुआ कि डर, क्रोध एवं दीन—हीन भावनाएं व्यक्ति की रोग निवारण शक्ति को बहुत कमजोर बना देती हैं। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि नि:स्वार्थ प्रेम, आंतरिक शांति, स्नेह देना, दूसरों से वापसी की चाह कम करना तथा ध्यान एवं अच्छे दृश्यों की मन में कल्पना, ये सब कैंसर को हटाने के साधन हैं।........मैं यह सलाह देता हूं कि आप इस अद्भुत पुस्तक में पढ़े एवं जिसे कैंसर हो गया है उसको इस पुस्तक के ज्ञान को वितरित करें।’’

इसी पुस्तक ‘रिअल मेजिक’ के पृ. ३४—३८ पर वेन डायर ने कई वैज्ञानिकों के हवाले से विचारों के भौतिक पदार्थों पर प्रभाव की पुष्टि की है।

उद्धरणों की यह सूची बहुत लम्बी हो सकती हैं। किन्तु इसका लाभ व्यक्ति को तभी मिलेगा जब वह स्वयं प्रयोग करे।

यहां यह ध्यान में रखना भी उचित होगा कि सच्चे अध्यात्म का स्तर दूसरों के भले—बुरे की भावना से ऊपर होता है। पं. दौलतराम जी शब्दों में[१५]

जिन पुण्य—पाप नहिं कीना, आतम अनुभव चित दीना।

तिन ही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोक।।

इसका अभिप्राय यही है कि कर्मों का आस्रव एवं बंध का अभाव आत्मा के अनुभव की शुरूआत से होता है व यही सच्चे सुख का मार्ग होगा। यह सुख पुण्य एवं पाप से परे है।

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५. अकेला जीव एवं कारण—कार्य सिद्धान्त—

अजीव—अकेला संबन्धित कारण—कार्य सिद्धान्तों के आधार पर भौतिक विज्ञान टिका हुआ है। जीव—जीव के परस्पर व्यवहार से संबन्धित प्रकृति की व्यवस्था कर्म—सिद्धान्त से मिलती है। किन्तु जब मात्र एक जीव पर चर्चा करना हो वहां कारण भी स्वयं वह जीव होता है व कार्य भी स्वयं उस जीव में होता है। इसकी चर्चा समयसार[१६] जैसे ग्रन्थ में देखी जा सकती है।

आज ध्यान (मेडिटेशन) के लाभ जगत मे नजर आ रहे हैं। जीव जब अन्य द्रव्यों से थोड़े समय के लिये भी अपने को भिन्न मानकर मन एवं इन्द्रियों को विश्राम देता है तो उसके इतने विकास एवं व्याधियां नष्ट हो जाती हो जाती है कि इसके लाभ का थोड़ा सा अन्दाज आज हमें मेडिटेशन के लाभ के रूप में नजर आने लगा है। ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, कैंसर, एस्थेमा, एलर्जी, ड्रग एवं नशे की लत आदि कई बीमारियों में ध्यान का लाभ पश्चिमी जगत में प्रायोगिक रूप से देखा गया है। डॉ. चौपड़ा११ बताते हैं कि ध्यान के प्रभाव पर जो आंकड़ों का विश्लेषण एवं अनुसन्धान कार्य हुआ है उससे यह ज्ञात होता है कि हृदय रोग जैसी समस्या की संभावना ध्यान करने वालों को ८७ ³ कम हो जाती है। अध्यात्म का द्वार भी मेडिटेशन से खुलता है। आचार्य अमृतचन्द्र के निम्नांकित समयसार कलश[१७] का मर्म भी इस संबंध में विचारणीय है। एक मुहूर्त के लिए शरीर का पड़ौसी अनुभव करने की प्रेरणा एवं प्रतीती हेतु ६ माह के अभ्यास की सीख इन श्लोकों में आचार्य ने दी है:—

अयि कथमपि मृत्वा तत्त्व कौतूहली सन्।

अनुभव भव मूत्र्ते: पावर्शवत्र्ती मुहूत्र्तम्।
पृथगथ विलसंतं स्वं समालोक्य येन
त्यजसि झगिति मूत्र्या साकमेत्वमोहम्।।२३।।

विरम किमपरेणा कार्य कोलाहलेन्
स्वयमति निभृत: सन् पश्य षण्मासमेकम्।
हृदयसरसि पुंस: पुद्गलाद्भिन्नधाम्नो
ननु किमनुपलब्धिर्भाति किं चोपलब्धि:।।३४।।

[सम्पादन] टिप्पणी

  1. आचार्य अमृतचन्द्र, समयसार कलश, व्रंâ. २१२
  2. (अ) पारसमल अग्रवाल, ‘‘ क्वाण्टम सिद्धान्त’, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर १९८३, Paras Mal Agrawal, 'Quantum Mechanice', in Horizons of Physics, Edited by A.W. Joshi (Wiley Eastern, 1989) P. 25
  3. Einstein's letter to born of Dec.4, 1926 (Einstein Estate Princeton, N. J.) English version of the Quotation:, "I look upon Quantum mechanics with admiration and suspicion".
  4. आचार्य उमास्वामी, तत्वार्थ सूत्र
  5. P.C.W. Davies and J.R Brown (Editors), The ghost in th atom' (Cambridge University Press, Cambridge, 1986)
  6. Eugene Wigner ves keâne Lee, Man may have a nonmaterial consciousness capable of infl-encing matter."इस तथ्य का उल्लेख सन्दर्भ ७ के पृष्ठ ३७ पर भी देखा जा सकता है।
  7. Wayne W. Dyer, 'Real Magic', (Harper Paperbacks, New York, 1993)
  8. Erwin Schrodinger, 'Mind $ Matter', (Cambridge,1958)
  9. C.G Jung and W. Pauli (each writing separately), 'interpretation of Nature and th Psy -che', (Bollingen, New York, 1955, pp. 208-210)
  10. उदाहरण के लिए—आचार्य, नेमिचन्द्र, ‘गोम्मटसार: कर्मकाण्ड’, (श्री परमश्रुत प्रभावक मंडल, श्रीमद् राज चन्द्र आश्रम, अगास, आणंद, १९७८)
  11. Deepak Chopra, 'Perfect Health', (Harmony Book, New York, 1991)
  12. Norman Vincent Peale, 'The Power of Positive Thinking', The original english version of the quotation is (on P. 194) as follows: "Dr Weiss stated that chronic victims of pains and aches in the muscles and joints may be suffering from nursing a smoldering Grudge against someone close to them He added that such persons usually are totally unaware that they bear a chronic rese-nment."
  13. Louise L. Hay, 'You can Heal your Life', (Hay House, 3029 Wilshire Blvd, Santa Monica, A 90404, USA) PP.12-13. The original english version of the quotation is as follows: "Resentement that is long held can eat away at the body become the disease we call cancer. Criticism as a permanent habit can often lead to arthritis in the body. Guilt always looks for punishment, and punishment creates pain. (when a client come to me with a lot of pain, I know they are holding a lot of guilt) Fear and the tension it prod-uces can create thing like baldness, ulcers, and even sore feet"."I have found that forgiving and releasing resentment will dissolve even cancer. Wh-ile this may sound simplistic, I have seen and experienced it working". Note: on Page 10 of this book, this author also writes that, we choose our parents
  14. देखिए सन्दर्भ व्रंâ ७, पृष्ठ 276 The original english version of the quotation is as follow: He discorered how powerful fear, anger and distress are in affeciting the immune system. He discoveved also that nconditional love, inner peace, giving away love, reducing expectation of other and turning into the powerful effect of meditation and isvualization were the seeds for defeating the cancer that was raging in his body...... I recommend that you read his wonderful book and share it with anyone you know who is diagnosed with cancer.
  15. पं. दौलतरामजी, छहढाला, अध्याय ५, छन्द १०
  16. आचार्य कुन्दकुन्द, समयसार
  17. देखिए, सन्दर्भ १, कलश व्रंâ, २३ एवं ३४.