ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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कर्म सिद्धान्त का वैज्ञानिक विश्षलेण

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कर्म सिद्धान्त का वैज्ञानिक विश्षलेण

विश्व शाश्वतिक अनादि—अनंत है। इस शाश्वतिक विश्व में संचरण करने वाले जीव भी अनादि से हैं। विश्व में जीव को परिभ्रमण कराने का जो कारण है वह है ‘‘कर्म’। बिना कर्म के संयोग से जीव की नित्यपूर्ण विभिन्न अवस्था, गति—विधि नहीं हो सकती। संसार अनादि होने के कारण संसार में संचरण करने वाले संसारी जीवों के कर्म भी अनादि हैं। परन्तु जो भव्य है, वह अनादि परम्परा प्[[रवाहमान कर्म को सम्पूर्ण रूप से नष्ट करके निष्कलंक सिद्ध, बुद्ध बन जाता है। इसलिए भव्य जीव की अपेक्षा कर्म अनादि होते हुए भी शान्त हैं। परन्तु जो अभव्य जीव हैं, जो कभी कर्मों के बंधन से विमुक्त होकर शाश्वतिक सुख का अनुभव नहीं कर सकते उनकी अपेक्षा कर्म अनादि अनंत है।

कर्म को प्राय: प्रत्येक दार्शनिक एवं धार्मिक परम्परा स्वीकार करती है। कोई कर्म को भाग्य कहता है, तो कोई अदृष्ट, अन्य एक पूर्वकृत। अन्यान्य दर्शन कर्म को स्वीकार करते हुए भी और उसका प्रतिपादन करते हुए भी जैन धर्म में जो सूक्ष्म वैज्ञानिक तर्कपूर्ण गाणितिक विस्तृत वर्णन पाया जाता है, वैसा वर्णन नहीं करते मेरे को अन्य किसी दार्शनिक या धार्मिक साहित्य में ऐसा वर्णन देखने को नहीं मिला। जैन दर्शन कर्म को केवल एक भावात्मक संस्कार स्वीकार नहीं करता है, अपरंच भौतिक (पौद्गलिक, जड़ात्मक, रसायनिक, जैव रासायनिक) संस्कार (संश्लेष—बन्धन, संयोग) भी मानता है। जिस समय में जीव अज्ञान, ईष्या, काम—क्रोधादि के वशीभूत होकर कुछ मन, वचन या काय से कार्य करता है, उस समय में जीव के सम्पूर्ण आत्म प्रदेश में परिस्पंदन होता है। उस परिस्पंदन से आकर्षित होकर सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त कर्म वर्गणाओं में से कुछ वर्गणायें आकर्षित होकर आती हैं। इसको कर्मास्रव कहते हैं। यह कार्माण वर्गणा भौतिक (पौद्गलिक परमाणुओं के समूह स्वरूप) होती है। रागद्वेषादि कषाय भाव से आकर्षित हुई कर्म वर्गणाएँ आत्मा के असंख्यात प्रदेश में संश्लेष रूप से मिल जाती हैं, इसको कर्मबंध कहते हैं। जैसे—धन, विद्युत एवं ऋण विद्युत से आवेशित होकर के लौह खण्ड, चुम्बक रूप जब परिणमन करता है तब स्वक्षेत्र में स्थित योग्य लौह खण्ड को आकर्षित करता है उसी प्रकार राग (धनात्मक आवेश, आसक्ति आकर्षण) द्वेष (ऋणात्मक आवेश, विद्वेष, विकर्षण) से आवेशित होकर जीव भी स्वयोग्य कार्मण—वर्गणाओं को आकर्षित करके स्वप्रदेश में संश्लेष रूप से बांधता है, और कुछ यहाँ ध्यातव्य विषय यह है कि अनेक कार्माण वर्गणाएँ शरीर के भीतर आत्म प्रदेश से स्पर्शित होकर भी रहती है, परन्तु वे कार्माण वर्गणाएँ भी जब तक जीव के योग और उपयोग से प्रभावित नहीं होती तब तक बंध रूप में परिणमन करके कर्म अवस्था को प्राप्त नहीं करती है। उनमें से कुछ वर्गणाएँ सामान्य वर्गणा हैं तो कुछ वर्गणाएँ उम्मीदवार (प्रत्याशी हैं।) जैसे—देश के सामान्य नागरिक होते हैं, उनमें से कुछ नागरिक एम. एल. ए, एम. पी.बनने के लिए प्रत्याशी होते हैं।

जब नागरिकों से मत (वोट) प्राप्त करके जय युक्त होते हैं,

तब वे एम.एल.ए.,एम. पी.,मंत्री बन जाते हैं। मंत्री आदि बनने पर सामान्य नागरिक से अधिक सत्ताधारी होकर दूसरों पर अनुशासन करते हैं। उसी प्रकार सामान्य वर्गणाएँ सामान्य नागरिक के समान होती हैं। जब राग—द्वेष रूपी मत प्राप्त कर लेती हैं तब विशेष शक्तिशाली होकर जीव के ऊपर ही अनुशासन चलाती हैं। जैसे—सामान्य नागरिक मत प्राप्त करके विभिन्न विभाग के मंत्री आदि बनते हैं, उसी प्रकार कार्मण वर्गणाएँ राग—द्बेष आदि मत प्राप्त करके ज्ञानावरणादि कर्मरूप परिणित कर लेती हैं। एक समय में, एक साथ एक दो परमाणु कर्मरूप में परिणमन नहीं करते, इतना ही नहीं करोड़ों—अरबों संख्यात—असंख्यात, अनंत परमाणु भी कर्म रूप में परिणमन नहीं करते हैं केवल अनंतानंत परमाणु कर्म रूप में एक साथ परिणमन करते हैं। जिस समय में कर्म बंधता है उस समय में आत्मा के एक—दो या करोड़—अरबों प्रदेश में एक साथ नहीं बंधते, किन्तु जब कर्म बंधँगे, तब सम्पूर्ण आत्मा में एक साथ ही कर्म बंधते है।प्रत्येक जीव के मध्य के आठ आत्मप्रदेश चलायमान नहीं होने पर भी कर्म बन्धन से सहित होते हैं क्योंकि अन्यान्य आत्म प्रदेश में जब परिस्पंदन होता है तब कर्मवर्गणाएँ आकर्षित होकर आती हैं। आत्मा के असंख्यात प्रदेश अखण्ड होने के कारण तथा आठ मध्यप्रदेश में द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्म होने के कारण आकर्षित हुई कार्माण वर्गणाएँ भी आठ मध्य प्रदेश में विभाजित होकर बंध जाती हैं। यदि आठ मध्यप्रदेश कर्म से रहित हो जायेेंगे तब प्रत्येक संसारी जीव भी अनंंतज्ञान,दर्शन—सुख—वीर्य का स्वामी बन जाएगा, परन्तु ऐसा होना सम्भव नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष विरोध है।

यहाँ प्रश्न होना स्वाभाविक है कि अनंतानंत परमाणु को छोड़कर संख्यात, असंख्यात परमाणु कर्मरूप में परिणमन क्यों नहीं करते ? इसका उत्तर देते हुए पूर्वाचार्य ने कहा है कि अनंतानंत परमाणुओं के समूह स्वरूप वर्गणा को छोड़कर अन्य वर्गणा में कर्मरूप परिणमन की योग्यता नहीं होती है। यह तो हुआ आगममोक्त उत्तर। कुछ तार्विक दृष्टि से विचार करने पर यह सत्य सिद्ध होता है। तर्क यह है जब कर्मबंध होता है तब युगपत आत्मा के असंख्यात प्रदेश में कर्मबंध होते हैं। असंख्यात प्रदेश में युगपत आत्म प्रदेश में योग (परिस्पन्दन) एवं उपयोग (कषाय भाव) होता है। यदि एक साथ असंख्यात प्रदेश में कर्मबंधते हैं। तब असंख्यात से कम परमाणु से तो कार्य ही नहीं चलेगा। दूसरा तर्क यह है कि एक आत्मा अनादि से बद्ध होने के कारण एक—एक आत्मप्रदेश में अनंतानत परमाणु हुए हैं। जो नये कर्म परमाणु बंधते हैं, वे प्राचीन कर्म परमाणु के साथ बंधते हैं। इसीलिए उन कर्म परमाणु के साथ बंधने के लिए अनंतानंत परमाणु की आवश्यकता होती है, और भी एक तर्क यह है कि प्रत्येक आत्म प्रदेश में अनंत ज्ञान, सुख, वीर्य आदि मौजूद हैं। उन अनंत शक्तियों के पराभूत करने के लिए अनंत शक्ति की भी आवश्यकता होती है। इसलिए अनंत शक्तिशाली जीव को पराभूत करके, बंधन में डालकर, संसार में परिभ्रमण कराने के लिए अनंतानंत परमाणु की आवश्यकता होती है। जैस—सामान्य पशु को बांधने के लिए सामान्य रस्सी से काम चल सकता है, परन्तु विशेष शक्तिशाली पशु, सिंह, हाथी आदि के लिए विशेष रस्सी आदि की आवश्यकता होती है। और एक तर्क यह है कि एक समय में जो कर्म वर्गणाएँ निर्जरित होती हैं; उस वर्गणा में अनंतानंत परमाणु रहते हैं। व्यय के अनुसार आय’ इस न्यायानुसार व्यय परमाणुु अनंतानंत होने के कारण आय परमाणु भी अनंतानंत होने ही चाहिए।

आश्रव एवं बंध तत्व संसार तत्व है।

इस आस्रव एवं बंध तत्व के कारण ही जीव संसार में परिभ्रमण करता है। इसलिए दोनों तत्व हेय (त्यजनीय) हैं। प्रत्येक समय में जीव योग और उपयोग से जैसे—कर्म को आकर्षित करके बांधता हैं, वैसे ही स्वाभाविक स्थिति बंध के क्षय से, कर्म की निर्जरा भी होती हैं। परन्तु यह निर्जरा नवीन कर्म—बंध के लिए कारणभूत हो जाती है क्योंकि जिस समय कर्म उदय में आकर निर्जरित होता है, उस समय जीव में उदय प्राप्त कर्म के निमित से योग और उपयोग होता है। उस योग और उपयोग से प्रेरित होकर पुन: कर्म आस्रव एवं बंध हो जाता है। इसीलिए इस प्रकार की निर्जरा को सविपाक निर्जरा, अकुशल निर्जरा, अकाम निर्जरा कहते हैं। जैस—बीज योग्य भूमि में गिरने के बाद वृक्षरूप में परिणमन कर लेता है। उसी प्रकार यह निर्जरा नये कर्म को जन्म देने के लिए कारण भी बन जाती है। यह निर्जरा विशेषत: एकेन्द्रिय से लेकर असैनी पंचेन्द्रिय तथा मिथ्यात्व गुणस्थान में होती है। सत्य प्रतीति, सद्ज्ञान, सदाचरण के माध्यम से जो कर्म आत्मा से पृथक् होता है, उसको अविपाक निर्जरा, सकाम—निर्जरा—सकुशल निर्जरा कहते हैं। यह निर्जरा परम्परा से मोक्ष तत्व के लिए कारणभूत है। आध्यात्मिक जागरण के बाद कुछ विशेष पाप कर्म का आना रूक जाता है, उसको संवरण या संवर कहते हैं। संवरपूर्वक निर्जरा मोक्ष तत्व के लिए कारणभूत है। जब सम्पूर्ण आध्यात्मिक जागरण या रत्नत्रय की पूर्णता होती है, तब सम्पूर्ण कर्म आत्मा से पृथक् हो जाते है।—गल जाते हैं—खिर जाते हैं, तब उसको मोक्ष तत्व कहते हैं।

उपरोक्त सिद्धान्त से यह सिद्ध हुआ कि

सम्पूर्ण जीव अनादिकाल से कर्म बंधन से जकड़े होते हुए भी आध्यात्मिक पुरुषार्थी जीव सम्पूर्ण बंधनों को तोड़कर, सर्वशान्तिमान, पूर्ण स्वतन्त्र शुद्ध—बुद्ध भगवान बन जाता है परन्तु जो आध्यात्मिक पुरुषार्थ से हीन होते हैं, वे कर्म—बन्ध से रहित होकर सुख आस्वादन नहीं ले पाते हैं। अर्थात् अनादि काल से कर्म बलवान होते हुए भी भव्य जीव का पुरुषार्थ कर्म से भी अधिक शक्तिशाली होने से अन्त में भव्य जीव, स्वपुरुषार्थ से सम्पूर्ण कर्म को नष्ट करके परमात्मा बन जाता है परन्तु अभव्य जीव के लिए कर्म अनादि से बलवान है एवम् अनन्त तक बलवान ही रहेगा। अन्य एक दृष्टिकोण से विचार करने पर जैसे बीज से वृक्ष की उत्पत्ति होती है, वैसे ही पुरुषार्थ से कर्म की उत्पत्ति होती है। वर्तमान का पुरुषार्थ भविष्य के लिए भाग्य बन जाता है, इसलिए भाग्य और पुरुषार्थ परस्पर में जन्य—जनकत्व, अनुपूरक, परिपूरक हैं। वर्तमान में इससे सिद्ध होता है कि वर्तमान में कोई सुखी या दु:खी है तो उस सुख—दु:ख का उत्तरदायित्व स्वोर्पािजत पूर्वकर्म है। इसलिये उस सु:ख—दुख के लिए निमित्त को ही मुख्य कारण न मानकर दूसरों पर राग द्वेष करना अज्ञानियों का काम है। प्रत्येक सुख—दु:ख के लिए स्वापार्जित पूर्व कर्म ही उपादान कारण है एवं अन्य वाह्य कारण निमित्त कारण हैं। ज्ञानियों को यथार्थ रहस्य का परिज्ञान करके मूल कारण को ही हटाना चाहिए जैसे, सिंह पर कोई लाठी प्रहार करता है तो वह लाठी नहीं पकड़ता। परन्तु प्रहार करने वाले को ही पकड़ता है। परन्तु कुत्ते को कोई लाठी से प्रहार करता है तो वह लाठी को ही पकड़ता, आदमी को नहीं। उसी प्रकार ज्ञानी सिंह के समान सुख—दु:ख का मूल कारण कर्म को जानकर उसके निर्मूलन करने का पुरुषार्थ करता है, परन्तु आदमी कुत्ते के समान कर्म को नहीं जानता हुआ अन्य बाह्य कारण, अन्य जीव या वस्तु आदि मानकर उसको ही नष्ट करने का पुरुषार्थ करता है। वर्तमान वैज्ञानिक दृष्टि—कोण से इस कर्म सिद्धान्त पर निम्न प्रकार से विचार कर सकते हैं।

प्रत्येक दृष्टव्य पदार्थ को छोटे—छोटे भागों में विभाजित किया जा सकता है,

जिन्हें अणु कहते हैं। ये अणु ही परस्पर संयुक्त होकर इतना बड़ा (स्कंध) बनाते हैं अथवा बनाते चले जाते हैं।कि दृष्टव्य हो जाते हैं। प्रश्न यह है कि ये अणु परस्पर संयुक्त क्यों होते हैं? इन सभी अणुओं में एक विशेष पास्परिक आकर्षण—बल होता है जिसके द्वारा ही ये परस्पर संयुक्त होते हैं किन्तु यह बल स्थायी नहीं होता, इसी कारण किसी बाह्य अथवा आन्तरिक (बहिरंग या अन्तरंग) बल से प्रेरित होने पर ये विभक्त (पृथक्) हो जाते हैं। इस बल को वाण्डर वाल आकर्षण बल व बंध के टूटने को कहते हैं। जैन दर्शन में एवम् कार्माण वर्गणाओं के परस्पर संश्लेष सम्बन्ध को कर्म बंध कहते हैं।

अणु सिद्वान्त के अनुसार किसी भी पुद्गल का किसी अन्य पुद्गल से सम्बन्ध संसजन बल जो समान अणुओं में कार्य करता है) व आसंजन बल जो विपरीत प्रकृति के अणुओं में कार्य करता है) के द्वारा होता है, चाहे वह एक से हो, दो से हो अथवा संख्यात या असंख्यात पुद्गलों से हो।

—उपाध्याय कनकनन्दी
-अर्हत्वचन, जन. जुलाई—१९९१ पृ. ४१-४४