ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

कर्म ही ईश्वर है

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

[सम्पादन]
कर्म ही ईश्वर है

कोई व्यक्ति अधिक मेहनत करने पर भी बड़ी मुश्किल से पेट भर पाता है और कोई बिना कुछ किये भी आनन्द लूटता है, कोई रोगी है तो कोई रोगी है तो कोई निरोगी। कुछ व्यक्ति इस भेद का कारण भाग्य तथा कर्मों को बताते हैं तो कुछ इस सारे भार को ईश्वर के ही सिर पर थोप देते हैं कि हम बेबस हैं, ईश्वर की मर्जी ऐसी ही थी । दयालु ईश्वर को हमसे ऐसी क्या दुश्मनी कि उसकी भक्ति करने पर भी वह हमें दु:ख दे और जो उसका नाम तक नहीं लेते, हिंसा तथा अन्याय करते हैं उनकी सुख दे ?
जैन धर्म ईश्वर की हस्ती से इंकार नहीं करता वह कहता है कि यदि उसको संसारी झंझटों में पड़कर कर्म तथा भाग्य को बनाने या उसका फल देने वाला स्वीकार कर लिया जाये तो उसके अनेक गुणों में दोष आ जाता है और यह संसारी जीव केवल भाग्य के भरोसे बैठकर प्रमादी हो जाये। कर्म भी अपने आप आत्मा से चिपटते नहीं फिरते। हम खुद अपने प्रमाद से कर्म—बन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं परन्तु हम तो स्त्री, पुत्र तथा धन के मोह में इतने अधिक पंâसे हुए है। कि क्षण भर के लिए भी यह विचार नहीं करते कि कर्म क्या है ? क्यों आते हैं और वैâसे इनसे मुक्त होकर अविनाशी सुख प्राप्त किया जा सकता है ?
बड़ी खोज और खुद तजुर्बा करने के बाद जैन तीर्थंकरों ने यह सिद्ध कर दिया कि राग—द्बेष के कारण हम जिस प्रकार संकल्प—विकल्प करते हैं, उस जाति की अच्छी या बुरी कार्मण—वर्गणाएँ योग शक्ति से आत्मा में खिंच कर आ जाती हैं। श्री कृष्ण जी ने भी गीता में यही बात कही है कि जब जैसा संकल्प किया जाये वैसा ही उसका सूक्ष्म व स्थूल शरीर बन जाता है और जैसा स्थूल—सूक्ष्म शरीर होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह बात सिद्ध होती है कि जैसा आत्मा संकल्प करती है वैसा ही उस संकल्प का वायुमण्डल में चित्र उतर जाता है। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने इन इन चित्रों के फोटों भी लिये है, इन चित्रों को जैन दर्शन की परिभाषा में कार्मण —वर्गणाएँ कहते हैं जो पाँच प्रकार के मिथ्यात्व, बारह प्रकार के अव्रत, २५ प्रकार के कषाय, १५ प्रकार के योग, ५९ कारणों से आत्मा की और इस तरह खिंच आता है और जिस तरह चिकनी चीज पर गर्द आसानी से चिपक जाती है उसी तरह कषायरूपी आत्मा से कर्म रूपी गर्द जल्दी से चिपट जाती है। कर्मों के इस तरह खिंच कर आने को जैन धर्म में ‘ आस्त्रव’ और चिपक जाने को ‘बन्ध’ कहते हैं। केवल किसी कार्य के करने से ही कर्मों का आस्त्रव या बन्द नहीं होता बल्कि पाप या पुण्य के जैसे विचार होते हैं उनसे उसी प्रकार का अच्छा या बुरा, आश्रव या बन्ध होता है इसलिये जैन धर्म में कर्म के, भाव कर्म व द्रव्य कर्म नामक , दो भेद हैं। वैसे तो अनेक प्रकार के द्रव्य क्रम करने के कारण द्रव्य कर्म के ८४ लाख भेद हैं। जिनके कारण यह जीव ८४ लाख योनियों में भटकता फिरता है (जिनका विस्तार ‘महाबन्ध’ व गोम्मटसार कर्मकाण्ड’ आदि व अंग्रेजी में छपे हुए अनेक जैन ग्रन्थों में देखिये) परन्तु कर्मों के आठ मुख्य भेद इस प्रकार है:
१. ज्ञानावरणी: जो दूसरों के ज्ञान में बाधा डालते हैं, पुस्तकों या गुरूओं का अपमान करते हैं, अपनी विद्य़ा का मान करते हैं, अपनी विद्या का मान करते हैं, सच्चे शास्त्रों को दोष लगाते हैं और विद्वान् होने पर भी विद्या दान नहीं देते उन्हें ज्ञानावरणी कर्मों की उत्पत्ति होती है जिससे ज्ञान ढक जाते हैं और वे अगले जन्म में मूर्ख होते हैं। जो ज्ञान—दान देते हैं, विद्वानों का सत्कार करते हैं, सर्वज्ञ भगवान् के वचनों को पढ़ते—पढ़ाते, सुनते—सुनाते हैं उनका ज्ञानावरणी कर्म ढीला पढ़कर ज्ञान बढ़ाता है।
२. दर्शनावरणी: जो किसी के देखने में रूकावट या आँखों में बाधा डालते है।, अन्धों का हास्य उड़ाते हैं। उनको दर्शनावरणी कर्म की उत्पत्ति होकर आँखों का रोगी होना पड़ता है। जो दूसरे के देखने की शक्ति बढ़ाने में सहायता देते हैं, उनका दर्शनावरणी कर्म कमजोर पड़ जाता है।
३. मोहनीय : मोह के कारण राग —द्बेष होता है जिससे क्रोध, मान, माया, लोभादि कषायों की उत्पत्ति होती है, जिसके वश हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह पाँच महापाप होते हैं इसलिये मोहनीय कर्म सब कर्मों का राजा और महादु:खदायक है। अधिक मोह वाला व्यक्ति मरकर मक्खी होता है। संसारी पदार्थों से जितना मोह कम कर किया जाये उतना ही मोहनीय कर्म ढीला पड़कर अधिक सन्तोष , सुख और शान्ति प्रदान करता है।
४. अन्तराय: जो दूसरों के लाभ देखकर जलते हैं, दान देने में रूकावट डालते हैं उनको अन्तराय कर्म की उत्पत्ति होती है जिसके कारण यह महादरिद्री और भाग्यहीन होते हैं । जो दूसरों को लाभ पहुँचाते हैं। दान करते—कराते हैं उनका अन्तराय कर्म ढ़ीला पड़ने से उनको मनोवांछित सुख—सम्पत्ति की प्राप्ति बिना इच्छा के आप से आप हो जाती है।
५. आयुकर्म: इसके कारण जीव देव , मनुष्य , पशु, नरक चारों गतियों में से किसी एक के में किसी निश्चित समय तक रूका रहता है जो सच्चे धर्मात्मा, परोपकारी और महासन्तोषी होते हैं, वह देव आयु को प्राप्त करते हैं, हिंसा नहीं करते वह मनुष्य होते हैं। जो विश्वासघाती और धोखेबाज होते हैं, पशुओं पर अधिक बोझ लादते हैं, उनको पेट भर और समय पर खाना—पानी नहीं देते, दूसरों की निन्दा और अपनी प्रशंसा करते हैं वह पशु होते हैं। जो महाक्रोधी, महालोभी, कुशल होते हैं, झूठ बोलते हैं और बुलवाते हैं, चोरी और हिंसा में आनन्द मानते हैं, हर समय अपना भला और दूसरों का बुरा चाहते हैं, वह नरक आयु का बन्ध करते हैं।
नामकर्म: इसके कारण अच्छा या बुरा शरीर प्राप्त होता है। जो निग्र्रन्थ मुनियों और त्यागियों को विनयपूर्वक शुद्ध आहार कराते हैं, विद्या , औषधि तथा अभयदान देते हैं, मुनि धर्म का पालन करते हैं, उनको शुभ नाम कर्म का बन्ध होकर चक्रवर्ती, कामदेच,इन्द्र आदि का महासुन्दर और मजबूत शरीर प्राप्त होता है। जो श्रावक धर्म पालते है। वे निरोग और प्रबल शरीर के धारी विभूति देखकर जलते हैं, कषायों और हिंसा में आनंद मानते हैं । वे खूबसूरत, अंगहीन, कमजोर और रोगी शरीर वाले होते हैं।
७. गोत्रकर्म: जो अपने रूप,धन, ज्ञान, बल, तप, जाति, कुल का अधिकार का मान करते हैं, धर्मात्माओं का मखौल उड़ाते हैं, वे नीच गोत्र पाते हैं और जो सन्तोषी, शीलवान् होते हैं अर्हंत् देव, निग्र्रन्थ मुनि तथा त्यागियों और उनके वचनों का आदर करते हैं। वे देव, क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य आदि उच्च गोत्र में जन्म लेते हैं।
८. वेदनीय कर्म: जो दूसरों को दु:ख देते हैं, अपने दु:खों को शान्त परिणामों से सहन नहीं करते, दूसरों के लाभ और अपनी हानि पर खेद करते हैं, वह असाता वेदनीय कर्म का बन्ध करके महादु:ख भोगते हैं और जो दूसरों के दु:खों को यथाशक्ति दूर करते हैं,अपने दु:खों को सरल स्वभाव से सहन करते हैं, सबका भला चाहते हैं, उन्हें साता वेदनीय कर्म का बन्ध होने के कारण अवश्य सुखों की प्राप्ति होती है।
इन आठ कर्मों में से पहले चार आत्मा के स्वभाव का घात करते हैं इसलिए ‘घातिया’ और बाकी चार से घात नहीं होता इसलिये उनको ‘अघातिया’ कर्म कहते हैं।
पाँच समिति, पाँच महाव्रत, दश धर्म , तीन गुप्ति, बारह भावना और बाईस परीषहजय के पालने से कर्मों के आस्त्रव का संवर होता है और बारह प्रकार के तप करने से पहले किए हुए चारों घातिया कर्मों की अपने पुरूषार्थ से निर्जरा (नाश) करने पर यही संसारी जीव आत्मा अनन्तानन्त ज्ञान, दर्शन, बल और सुख—शान्ति का धारी परमात्मा हो जाता है और बाकि चारों अघातिया कर्मों से भी मुक्त होने पर मोक्ष (एaत्न्aूग्दह) प्राप्त करके अविनाशी सुख शान्ति को पालने वाला सिद्ध भगवान् हो जाता है।

जैन प्रचारक मार्च २०१३