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कल्पवृक्षों की भूमि केरल

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कल्पवृक्षों की भूमि केरल

सोलहवीं सदी के एक अज्ञातनाम नंपूतिरि कवि ने रचना ‘चद्रोत्सव’ में केरल की प्रशंसा में अपने उद्गार इस प्रकार प्रकट किए हैं—

परमृतमोषि चटटु मटटु खण्डड ड लेटटु

पटविलुमधिक हृधं दक्षिणम भारताख्यम।
विलनिलमलरमातिन्न गजन्नुं त्रिलोको
चेरू नाटु कुरि पोले चेरमान् नाटु यस्मिन्।।

अर्थात् हे परभूतवाणि चारों तरफ आठ और खण्ड हैं। पर उनमें दक्षिण नामक यह खण्ड अधिक हद्य है। लक्ष्मी और सौन्दर्य देवी की जन्मभूमि के तीनों लोक के तिलकबिन्दु के समान यह हमारा चेरमान नाटु (चेर राजा का) केवल है।

उपर्युक्त कवि हमारे देश की उस भौगोलिक परम्परा की ओर संकेत कर रहा है जिसके अनुसार भरतखण्ड के इस नौवें खण्ड को कुमारी खण्ड या कुमारी द्वीप कहा जाता था। वैदिक धारा के वामनपुराण ने सागर में घिरे इस कुमारी द्वीप के दक्षिण में आंध्रों को वहां का निवासी बताया है। इस पुराण ने कुमारी द्वीप से भारत का भी आशय लिया है। यह पुराण भारत को गंगा के उद्भव स्थान से लेकर कुमारी अंतरीप तक फैला हुआ बताता है। जो भी हो, केरल का कुमारी अंतरीप से अन्यतम संबंध तो है ही।

इस पारंपरिक नाम की ओर संकेत करने के अतिरिक्त कवि ने चेर देश या केरल को लक्ष्मी और सौंन्दर्य देवी की जन्मभूमि भी कहा है। श्रीदेवी या लक्ष्मी की कृपा तो केरल पर सदा ही रही है। अत्यन्त प्राचीन काल से से ही रोम, यूनान और अरब देशों से अपने मसालों, इलायची, काजू आदि के बदले में केरल स्वर्ण मुद्रा र्अिजत करता रहा है और आज भी उसके निवासियों ने अरक आदि देशों में फैलकर धन र्अिजत करने का क्रम जारी रखा है।

प्रकृति ने केरल को अनुपम छटा भी प्रदान की है। उसके लंबे समुद्रतट हरे भरे ऊंचे पर्वत झीलें, नदियाँ और हरीतिमा लिए घाटियां उनमें लहराती नारियल, धान आदि की खेती ने उसे सचमुच ही शस्यश्यामलाया प्रकृति की अनुपम कृति बना दिया है। तभी तो मलयालम के सुप्रसिद्ध कवि वललतोल ने इस सौंदर्य के एक पक्ष का वर्णन अपनी कविता ‘मातृंवदनम’, में बहुत सुन्दर रूपक में किया है जिसका भाव इस प्रकार है—माता की वंदना करो, माता की वंदना करो, उपास्यों द्वारा भी उपास्य माता की वंदना करो। समुद्र की लहरें सदा ही सखियों की भाँति समुद्र फैन के रूपहले नूपुरों को तुम्हारे चरणों में धारण करती रहती है और बारबार इसकी पुनरावृत्ति करती रहती हैं। केरल पश्चिमी तट के साथ उसकी लगभग पूरी लम्बाई तक उसकी धरती के साथ—साथ चलने वाला नीले पानी की शोभा से युक्त अरब सागर भी तो उसे समुद्र फैन से र्नििमत विभिन्न गहने धारण कराता रहता है। यह अरब सागर उत्तरी केरल से दक्षिण केरल तक लगभग ५९० किलोमीटर लम्बाई में उसका सहयात्री है। यदि आप रेल द्वारा मंगलोर से त्रिवेंद्रम तक की यात्रा करें तो समुद्र आपके साथ—साथ चलता दिखाई देगा। केरल में अनेक आकर्षक समुद्रतट भी है जो पर्यटकों को आर्किषत करते हैं। इस प्रदेश की हरीतिमा को देखकर इसे वन—श्री की विहार–भूमि कहा जा सकता है।

समुद्र से केरल के संबंध के विषय में एक पौराणिक कथा केरल में प्रचलित है। यह कहानी मलायलम भाषा में केरलोत्पत्ति तथा संस्कृत में केरल महात्म्य में निबद्ध है। उसके अनुसार विष्णु के अवतार माने जाने वाले परशुराम इक्कीस बार क्षत्रियों का उत्तर भारत में संहार करने के बाद गोकर्णम् (गोआ प्रदेश) आए। वहां से उन्होंने अपना फरसा अरब सागर में फेका। उनके और फरसे के बीच जो दूरी थी, उतने क्षेत्र से समुद्र हट गया और गोकर्ण से लेकर कन्याकुमारी तक की भूमि प्रकट हो गई। इस मान्यता के अनुसार केरल का एक नाम भार्गवक्षेत्रम् या परशुराम क्षेत्रम् भी है। वैज्ञानिक ढंग से केरल का इतिहास लिखने वाले विद्वान इस पर विश्वास नहीं करते हैं। इसके संबंध में केरल नामक अंग्रेजी पुस्तक के लेखक श्री कृष्ण चैतन्य ने यह मत व्यक्त किया है कि यदि आप में बालसुलभ श्रद्धा है तो आप इस पर विश्वास कर लेंगे और यदि आप प्रौढ़ व्यक्ति हैं तो इसे आप काव्यमय भाषा में जातीय स्मृति मानेंगे।

केरल के प्रसिद्ध इतिहासकार श्रीधर मेनन ने इस पौराणिक कथा पर अपनी संतुलित सम्मति व्यक्त करते हुए कहा है कि १८वीं या १९वीं सदी में लिखित यह कथा कुछ निहित स्वार्थ वाले व्यक्तियों ने ब्राह्मण की श्रेष्ठता को लोकप्रिय बनाने के लिए किसी समय अपने मन में गढ़ ली है। इस बात की संभावना की जा सकती है कि परशुराम ने इस क्षेत्र को अपनी पश्चाताप—तपस्या का क्षेत्र बनाया होगा। उन्हें यहाँ का शांत, सुन्दर प्राकृतिक वातावरण अच्छा लगा होगा। उन्होंने यहां की भूमि को अपने धर्म के प्रचार के लिए उपयुक्त माना होगा। अनुश्रुति हैकि परशुराम ने ६४ ग्राभम् में ब्राह्मणों को केरल में आबाद किया था। अहिच्छत्र से आए इन ब्राह्मणों को भी यहां का सौम्य वातावरण उपयुक्त लगा होगा। कुछ इतिहासकारों का मत है कि केरल के हरित पर्वतों, जंगलों, गुफाओं और मैदानी भूभागों ने भी जैन मुनियों और साधकों को अपनी साधना के लिए केरल में आर्किषत किया होगा। जैन अनुश्रुति है कि ईसा से पूर्व की चौथी शताब्दी में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और आचार्य भद्रबाहू बारह हजार मुनियों के साथ दक्षिण में आए थे। वे दोनों तो श्रवणबेलगोल में रह गए और शेष मुनि संघ को उन्होंने सुदूर दक्षिण में धर्म प्रचार के लिए भेज दिया। इतिहास—लेखक यह मानते हैं कि तभी से केरल में जैनधर्म का प्रवेश हुआ होगा किन्तु अगले अध्याय में यह बताया गया है कि यह धर्म केरल में इससे भी पहले विद्यमान था इस बात की संभावना है। केरल ही नहीं, उसकी विद्यमानता का संकेत हमें श्रीलंका के इतिहास से भी मिलता है। आवश्यकता है निष्पक्ष विचार की।

परशुराम संबंधी परम्परा में केरल के जैन विश्वास नहीं करते हैं। वे जैनधर्म के इस सिद्धान्त में आस्था रखते हैं कि इस जगत की रचना करने वाला कोई ईश्वर या तीर्थंकर नहीं हैं वह तो अनादि और अनंत है। उसकी रचना आदि में तीन तत्व अपना काम करते रहते हैं। ये हैं—उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य। वस्तु उत्पन्न होती है, वह नष्ट होती है किन्तु परिर्वितत रूप में सदा बनी रहती है। बीज से वृक्ष बनता है, वह नष्ट होता है और फिर वृक्ष बन जाता है। जहाँ समुद्र था, वहाँ जमीन उभर आती है या पर्वत निकल आते हैंं। जगत का यह क्रम चलता रहता है। यह प्रकृति का नियम है, न कि किसी ईश्वर का लीला—क्षेत्र। केरल का कुछ भाग यदि समुद्र में प्रदान किया है, तो उसने निगल भी लिया है। केरल के इतिहासकार इस बात को जानते हैं कि कन्याकुमारी के आसपास ४० मील क्षेत्र और एक नदी समुद्र की भेंट चढ़ गयी। कन्याकुमारी घाट पर खड़े होकर यदि देखें, तो ज्ञात होगा कि कुछ पर्वत चोटियाँ समुद्र में अपनी गर्दन ऊपर निकालने का प्रयत्न कर रही है।

वैज्ञानिक यह मानते हैं कि किसी समय अरब सागर केरल के पर्वतों के मूल तक बहता था किन्तु कोई ऐसी भौगोलिक उथल—पुथल हुई कि अरब सागर ने बहुत–सी धरती प्रदान कर दी और वह आगे चला गया। यही समुद्र दत्त भूमि केरल है। भौगोलिक परिवर्तन की ओर भी अनेक घटनाएं केरल के इतिहास में विख्यात हैं। इसी प्रकार का एक स्थान श्रीमूलवासम् था जिसे समुद्र निगल गया। यह स्थान जैनधर्म से संबंधित था किन्तु उसे गलत साक्ष्य के आधार पर बौद्ध मान लिया गया है। इसलिए केरल के जैनेतर विचारशील जनों की भाँति वहां के जैन परशुराम कथा में विश्वास नहीं करते हैं। वैज्ञानिक मत भी जैन सिद्धान्त का समर्थन करता है।

केरल में समुद्र केवल अपने तट तक ही सीमित नहीं है अपितु वह उसके भूभाग तक घुस आया है और इस प्रकार उसने अनेक विशाल और सुन्दर झीलों का निर्माण किया है। मलयालम में इन्हें कयल कहा जाता है। समुद्र से सीधा संबंध जोड़ने वाली झीलों को अजि कहते हैं। इस प्रकार की एक अजि का एक स्थान कोंडगल्लूर भी है जिसकी चर्चा यथास्थान की जाएगी। उसका संबंध जैनधर्म से है। कोचीन से आलप्पी नामक सुन्दर नगर को जोड़ने वाली झील ५२ मील लंबी है। इसमें मोटरबोट द्वारा यात्रा का आनन्द ही निराला है। इसके पानी का रंग नीला है और इसी के किनारे शैवों का प्रसिद्ध तीर्थ वैक्कम है। प्राचीन काल में तो व्यापारिक माल लाने—ले जाने के लिए इनका बहुत महत्त्व था। इन झीलों के किनारे नारियल आदि के पेड़ इन झीलों के तटों को आकर्षक स्वरूप प्रदान करते हैं।

सावन के महीने में केरल की लगभग सभी जातियों के लोगों द्वारा हर्ष और उल्लास के साथ मनया जाने वाला त्यौहार ओणम् विशेष महत्व रखता है। इस अवसर पर नौका—दौड़ (वल्लम—कील) दृश्य बड़ा मनोहारी होता है। ये नौकाएँ ३० मीटर तक लंबी होती हैं और इनका एक छोर सांप की फण की तरह ऊँचा उठा हुआ होता है। इन नावों को झूमते गाते लगभग सौ लोग खेते दिखाई देते हैं। किनारों पर रंग बिरंगे परिधानों में हजारों दर्शक होते हैं और राजसी ढंग से सजे हाथी भी खड़े किए जाते हैं। इस उत्सव का संबंध राजा महाबलि से जोड़ा जाता है। वे यहाँ के लोकप्रिय शासक थे। इस दिन वे यह देखने आते हैं कि उनकी प्रजा सुखी है या नहीं। आज की प्रजा भी उन्हें यह विश्वास दिलाती है कि वह सुखी और समृद्ध है। इस संबंध में अगला अध्याय देखिए। राजा महाबलि जैन थे ऐसा लगता है।

भारत के दक्षिण—पश्चिम छोर पर राजनीतिक नक्शों में एक अनपढ़ नोका जैसा दिखने वाला यह केरल राज्य है तो भारतभूमि का ही एक भाग किन्तु उसके पश्चिम में फैली सह्याद्रि पर्वतमाला ने उसे पूर्वी भाग से मानों विभाजित ही कर दिया है। यह पर्वत श्रेणी पश्चिमी घाट कहलाती है। ये पर्वत ३००० फीट से लेकर ८८४१ फीट तक ऊँचे हैं और एक ठोस दीवार जैसा कार्य करते हैं। वे शुष्क या वृक्षहीन नहीं है, किन्तु इमारती लकड़ी आदि के वनों में सदा हरे—भरे रहते हैं। इनके अनेक शिखरों पर बने मन्दिरों, गुफाओं आदि का बड़ा महत्व है। इनकी चर्चा यथास्थान की जाएगी। यह पर्वतमाला अखंड नहीं है। उसका सबसे बड़ा दर्रा पालघाट दर्रा या पालक्काड दर्रा कहलाता है। यह लगभग २० मील चौड़ा है और तमिलनाडु के कोयम्बटूर जिले को केरल से रेल और सड़क मार्ग द्वारा जोड़ता है। इस दर्रे के अतिरिक्त कर्नाटक के कुर्ग और मैसूर को जोड़ने वाले दर्रें तथा तिग्जेलवेल्ली को त्रिवेंन्द्रम अन्य दर्रे भी केरल में जैनधर्म की दृष्टि से महत्व रखते हैं विशेषकर केरल के वानाड़ जिले को मैसूर से जोड़ने वाला दर्रा। पर्वतमाला के कारण केरल का एक नाम मलयनाटु या मलनाडु अर्थात् पर्वतों का देश भी रहा है। मलय या मला का अर्थ है पर्वत और नाडु यानी देश। ब्रिटिश सरकार और अरब लोग भी इसे मलाबार कहते थे। अरबी फारसी के शब्द बार से भी देश या प्राय:द्वीप का अर्थ लिया जाता है। केरल शब्द का प्रयोग संस्कृत—अपभ्रंश ग्रंथों में भी पाया जाता है। दसवीं सदी के एक जैन महाकवि पुष्पदंत ने अपने अपभ्रंश महापुराण में भी केरल शब्द का प्रयोग किया है। स्वतन्त्रता—प्राप्ति से पहले यह प्रदेश, मलाबार, त्रावणकोर और कोचीन राज्यों में बंटा हुआ था। राज्यों के पुनर्गठन के अवसर पर इसके प्राचीन नाम केरल की पुन: प्रतिष्ठा हुई।

केरल किसी समय चेरनाडु या चेर राजाओं का देश भी कहलाता था। ईसा की दूसरी सदी में चेर राजधानी वंजि थी जो कि आधुनिक कोडंगल्लूर के रूप में पहिचानी जाती है। उस समय के युवराजपाद इलंगो अडिगल ने तमिल में कोवलन और कण्णगी नामक जैन श्रावक और श्राविका की अमर कहानी एक महाकाव्य के रूप में मिलती है। इलंगो जैन थे। उन्होंने अपने राज्य को चेर कहा है। उनकी कृति से यह भी ज्ञात होता है कि किसी समय केरल तमिलगम या तमिलनाडु का एक भाग रहा है। जिसके तीन प्रमुख शासक चेर, चोल और पांड्य थे। आठवीं—नौवीं सदी के सुप्रसिद्ध जैन महाकवि जिनसेनाचार्य ने अपने विशालकाय संस्कृत महापुराण में ऋषभदेव द्वारा विभाजित देवों में चेर नाम ही गिनाया है। सम्राट अशोक के एक शिलालेख में भी चेरलपुत्र नाम आया है। यह लेख ईसा से लगभग २०० वर्ष प्राचीन है। इतिहासकारों ने इससे चेर शासक का अर्थ लिया है। इससे भी इसके कुछ भाग का चरनाडु नाम सिद्ध होता है। मलयालम भाषा के प्रसिद्ध कोशकार डॉ. गुण्डर्ट इसे चेरम के कानडी उच्चारण से व्युत्पन्न मानते हैं। जो भी हो, केरल का एक नाम चेरम या चेरल या चेरनाडु था और वह जैनधर्म से संबंधित था।

यह भी एक मान्यता है कि केरल नाम केर या नारियल के कारण व्यवहार में आया अर्थात् वह प्रदेश जहां नारियल की बहुतायत हो। इसमें जो जरा भी संदेह नहीं कि केरल की मुख्य उपज नारियल ही मानी जा सकती है। वहाँ मानों इसके जंगल ही हैं। शायद ही कोई ऐसा घर मिलेगा जिसके आस पास नारियल के पेड़ न लगे हों। नारियल के पेड़ को केरलवासी कल्पवृक्ष भी कहते हैं। बच्चों को इस वृक्ष के दो नाम बताए जाते हैं—कल्पवृक्ष और तेड़ ड़। किन्तु कुछ शुद्धिवादी लोग सांस्कृतिक महत्व के इस शब्द को कोश में स्थान ही नहीं देते हैं। इस कल्पवृक्ष का हर भाग काम में आता है, यह पूरे वर्ष फल देता है और लगीाग सौ वर्ष की इसकी आयु होती है। इस शब्द को सुनकर उस समाज व्यवस्था का स्मरण हो आता है जब वैदिक धारा में भी आदर प्राप्त एवं जैनों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से पहले की र्पूित दस प्रकार के कल्पवृक्षों से हुआ करती थी। एक कल्पवृक्ष यदि उन्हें वस्त्र प्रदान करता था, तो दूसरा औषधि, तो तीसरा खाद्य पदार्थ और चौथा प्रकाश इत्यादि। किसी को आश्चर्य हो सकता है कि वृक्ष प्रकाश कैसे दे सकता है तो उसका उत्तर यह है कि आज साधकों ने हिमालय में ऐसी जड़ी—बूटी ढूंढ निकाली है जो रात्रि के समय रेडियम की तरह पर्यापत प्रकाश देती है। इस बूटी की खोज और प्रकाश आदि के संबंध में विस्तृत विवेचन प्रसिद्ध ज्योतिषी डॉ. श्रीमाली ने अपनी पुस्तक ‘‘तंत्र गोपनीय रहस्यमय सिद्धियां’’ के पृष्ठ ३७ से ४२ पर दिया है। अत: कल्पवृक्ष संबंधी जैन मान्यता पर अविश्वास का कोई कारण नहीं जान पड़ता। जैन पुराणों में इन कल्पवृक्षों का विवेचन अनिवार्य रूप में पाया जाता है। जब इनसे मनुष्यों की आवश्यकताओं की र्पूित में कमी हुई, तब प्रथम राजा ऋषभदेव ने प्रजा को गन्ने आदि की खेती करना सिखाया। ऋषभदेव का स्मरण केवल जैन ही नहीं करते हैं अपितु वैदिक धारा के महत्वपूर्ण चौदह पुराण उनका और उनके पुत्र भरत की चर्चा आदरपूर्वक करते हैं। उन्हीं के पुत्र भरत के नाम पर यह देश इन पुराणों के अनुसार भी भारत कहलाता है। ऋषभदेव को तो विष्णु और शिव का अवतार भी मान लिया गया है। वैसे शंकुतला—पुत्र के नाम पर भारत जैसी गलत धारणाएँ फैलाने वालों की इस देश में कोई कमी नहीं है। प्रश्न उठ सकता है कि क्या कल्पवृक्ष केरल में जैनमतम् के प्रसार की कोई सूचना देता है ? भाषा वैज्ञानिक जानते हैं कि ऐसे शब्दों में भी जो कि अब अलग—थलक पड़ गए हैं बहुत—सा इतिहास छिपा होता है। मलयालम भाषा में आजकल प्रचलित पललीक्कूडम् शब्द जिसका अर्थ स्कूल होता है, केरल में जैन प्रभाव की सूचना देता है। इस तथ्य को केरल के ही निष्पक्ष विद्वानों ने स्वीकार किया है। मलयालम भाषा और प्राकृत अध्याय में इसकी चर्चा की गई है। समिति और सभा जैसे गिनती के शब्दों के आधार पर ही तो वैदिक युग में भी गणतन्त्र की कल्पना कर ली गई है। पितृ, दुहितृ मातृ जैसे शब्दों के उच्चारण—भेद के कारण ही यूरोप और भारत की भाषाएं आर्य—भाषा परिवार में आ गई हैं और भाषा विज्ञान नामक एक विज्ञान ही उद्भूत हुआ है। इसलिए यह मानना अनुचित नहीं होगा कि जैन परम्परा में बहुर्चिचत शब्द कल्पवृक्ष भी केरल में किसी समय जैनमतम् के लोकप्रिय होने का संकेत दे रहा है विशेष रूप से उस समय जब कि केरल तमिलगम् का एक भाग था। यहां यह उल्लेख करना भी उचित होगा कि नारियल आज भी जैन पूजा और विधि—विधान का एक अनिवार्य अंग है। उसके बिना जैन मन्दिर में पूजन की कल्पना नहीं की जा सकती। जैनों में नारियल की एक प्रतीकात्मक व्याख्या भी की गई है। उसके बाहर जटाओं का जो घेरा है, वह सांसारिक जंजाल का प्रतीक है जो कि क्रोध, मान, माया, लोभ िंहसा आदि दुर्गुणों से भरा पड़ा है। उसको हटाने या प्रतीक रूप में नारियल को फोड़ने पर ही तो आत्मा अपने शुद्ध निर्मल स्वभाव को प्राप्त कर सकता है। नारियल की श्वेत गरी इस शुद्ध आत्मा का प्रतीक है। इस फल के ऊपर आवरण में तीन आँखे होती हैं जो कि जैन मत के अनुसार समयग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र की प्रतीक हैं। ये तीनों ही तो मोक्ष पाने के मार्ग या उपाय हैं। संभवत: यही कारण है कि इस प्रतीकात्मक फल नारियल को संपूर्ण भारत में जैन पूजा, विधि—विधान में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। केरल में सबरीमला की व्रतपूर्ण, अिंहसाव्रती यात्रा पर जाने वाले यात्री भी नारियल चढ़ाते हैं और नारियल फोड़कर प्रसाद ग्रहण करते हैं। अतएव केरल में नारियल को कल्पवृक्ष कहा जाए तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। उसके विभिन्न भाग केरलवासियों को मुद्रा कमाकर देते ही हैं।

पर्यटन की दृष्टि में भी केरल विशेष महत्व रखता है। कन्याकुमारी, कोल्लम समुद्रतट, पूरब कावेनिस आलप्पी, वायनाड़ के सुन्दर, सुगंधपूर्व हरे—भरे पर्वत, वहां पार्श्वनाथ का जैन दर्पण मन्दिर और अन्य अनेक जिन मंदिरन, चितराल गांव के पास की पहाड़ी पर चट्टानों में खुदी हुई प्राचीन जिनेन्द्र मूर्तियों ओर नागरकोविल का विशाल मंदिर जिसमें पार्श्वनाथ और महावीर उत्कीर्ण हैं विशेषकर जैन पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण के स्थान है। केरल में आज भी जैनधर्म के अनुयायी हैं और जिनमंदिर हैं। बहुसंख्य जैन वायनाड़ जिलें में और कालीकट, कोचीन जैसे बड़े शहरों में निवास करते हैं।

केरल जैसे छोटे राज्य में नदियों की भी बहुतायत है। वहाँ इकतालीस नदियां पश्चिमी घाट से निकलकर अरबसागर में मिलती हैं जब कि तीन नदियाँ पूर्व की ओर बहती हुई कावेरी नदी में विलीन हो जाती हैं। सबसे बड़ी नदी भारतपूजा है जो कि २३४ कि. मी. लंबी है। केरल के ही कासरगोड़ जिले में जो कि कर्नाटक को छूता है, एक नदी है जिसका नाम है चंद्रगिरि। यह १०४ कि.मी. लंबी है और कर्नाटक के पट्टी वनों से निकलती है। इसी नदी के किनारे केरल की ही सीमा में एक पहाड़ी चंद्रगिरी नाम की भी है। इन दोनों का नाम जैन सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की स्मृति में रखा गया है जोकि मुनि हो गए थे।

केरल की राजधानी त्रिंवेद्रम एक पहाड़ी पर बसी हुई है और मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है। कालीकट से वायनाड़ तक की यात्रा का आनंद ही निराला है। वैसे सारा केरल ही आकर्षक दृश्य प्रस्तुत करता है। उसके समुद्रतट, हरी भरी पर्वत—श्रेणियां, उन पर काजू नारियल कालीमिर्च, इलायची आदि के वृक्ष उसे एक अनोखी हरीतिमा प्रदान करते हैं। किसी पर्यटक ने ठीक ही लिखा है कि जिस ईश्वर के हाथों ने केरल की रचना की, उसके साथ ही हरे थे।

केरल में केवल प्रकृति ने ही विविधता की सृष्टि नहीं की है, अपितु वहां मानव वंश की इतनी अधिक नस्लें पाई जाती है कि केरल को मानव वंश का एक संग्रहालय कहा जाता है। सबसे प्राचीन समझी जाने वाली नेग्रीटो नस्ल के लोग भी वहां है जो जंगलों में अपना आदिम जीवन व्यतीत कर रहे हैं। काडर, काणिक्कार, मलप्पंडारम, मुतुवर, उल्लाटन तथा ऊरालि आदि इसी प्रकार की जातियाँ हैं। नेग्रिटो लोगों के बाद आद्य—ऑस्ट्रोलाइड नसल के जन केरल में आए। इस प्रकार की जातियाँ हैं—इसलन, करिम्पालन, केरिच्चियन मलय रयन और मल वेटन आदि। उनके बाद भूमध्यसागरीय जातियों ने भारत सहित केरल में प्रवेश किया। दक्षिण भारत में ये द्रविड कहलाते हैं। केरल के नायर, ईजवन और वेललाल जाति के लोग इसी परिवार के हैंं इन जातियों के संबंध में योरपीय विद्वानों के अतिरिक्त श्री एल. के. अय्यर और ए. के. अय्यर नामक पिता—पुत्र ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया है। केरल के विभिन्न जातियों के संबंध में लगभग आठ हजार पृष्ठों की सामग्री का अध्ययन करते करते प्रस्तुत लेखक को ऐसा लगा कि केरल की जातियों विशेषकर आदिवासी और अस्पृष्य करार दी गई जातियों में जैन चिन्ह या जैन स्मृतियाँ शेष हैं। संभवत: राजनीतिक या धार्मिक कष्टों के दिनों में वे पर्वतों और घने जंगलों में भाग गए। इसकी चर्चा एक अलग अध्याय में की गई है। सबसे बाद में आर्यों अथवा ब्राह्मण सभ्यता का केरल में प्रवेश हुआ यानी ईसा से दो—तीन सौ वर्ष पूर्व। कुछ विद्वानों का मत है कि जैनों और बौद्धों का आगमन केरल या दक्षिण भारत में आर्यों से भी पहले हो चुका था।

केरल में जैनमत् का इतिहास जानने के लिए प्राचीन और आधुनिक केरल का सीमाओं का ज्ञान कर लेना आवश्यक है। आठवीं शताब्दी केरल तमिलगम् या तमिल देश का एक भाग था। उसकी भाषा भी तमिल थी—मलयालम उससे अलग नहीं हुई थी। तमिलगम् की सीमा इस प्रकार थी—उत्तर में तिरूपति पर्वत, दक्षिण में कन्याकुमारी और पूर्व तथा पश्चिम में समुद्र। आधुनिक केरल के पूर्व में तमिलनाडु के नीलगिरि, कोयम्बतूर, मदुरै, रामनाथपुरम् और तिरूजेलवेली जिले हैं। पश्चिम में अरब सागर है जो लगभग ५५० कि. मी. लंबा है। उत्तर में कर्नाटक का दक्षिण कन्नड़ जिला तथा उत्तर पूर्व में कुडगु और मैसूर जिले हैं। दक्षिण में तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले का अंतिम स्थान परस्साला है जो कि कन्याकुमारी से ५६ कि.मी. हैं इस पुस्तक में कन्याकुमारी को अन्य अनेक लेखकों की भाँति केरल का ही एक भाग मानकर विवरण लिखा गया है यह विवरण जिलों के अनुसार दिया गया है। जो कि चौदह हैं। इनके नाम हैं— १. तिरूअनन्तपुरम् या त्रिवेंद्रम

२. कोल्लम् या Qulilon

३. पत्तनंतिट्टा Pathanamthitha

४. इडुक्की Idukki

५. कोट्टायम Kottayam

६. एर्णाकुलम् Trichur

७. त्रिश्शुर, Trichur

८. आलप्पी Alleppy

९. मलप्पुरम् Malappuram

१०. कोझिक्कोड़ Kozhikode

११. पालक्काड़ Palghat

१२. वयनाड Wynad

१३. कण्णूर Cannanore तथा

१४. कासरगोड़ Dasargod कुछ प्रचलित नाम इस प्रकार हैं एर्णाकुलम और कोचीन या कोच्ची एक ही शहर माने जाते हैं, कोझिक्कोड़ कालीकट का नाम है, पालक्काड़ पालघाट है, त्रिरशूर त्रिचूर ही है।

सामान्य तौर पर यह विश्वास किया जाता है कि केरल में जैन समाज नहीं होगा। किन्तु यह तथ्य नहीं है। इतना अवश्य है कि जनगणना संबंधी आंकड़ों में जैनों की संख्या बहुत ही कम होती है। सन् १९८१ की गणना में, केरल में जैनों की कुल आबादी ३५०० के लगभग आकलित की गई थी। इस संख्या को वास्तविक नहीं माना जा सकता। इस कथन के दो कारण हैं। पहला तो यह कि भारत के अन्य भागों की भाँति केरल में भी जैनधर्म के अनुयायियों को भी हिन्दू लिख लिया गया होगा इस बात की पूरी संभावना है। गणना करने वाले बहुत कम लोग यह जानते हैं कि जैनधर्म और हिन्दू धर्म (वास्तव में वैदिक धर्म) दो अलग—अलग धर्म हैं। दूसरा कारण यह है कि स्वयं जैन लोग भी इस और जागरूक नहीं रहते कि वे वैदिक धर्म के अनुयायी नहीं हैं। यह बात भारत के अन्य भागों पर भी लागू होती है।

केरल में जैन धर्मावलंबियों की संख्या का कुछ अनुमान उन भौगोलिक क्षेत्रों पर विचार करके लगाया जा सकता है जिनमें आजकल जैन जन निवास करते हैं। इस राज्य के मध्य पूर्वी भाग में जैनियों का विस्तार सबसे अधिक है। वे इस प्रदेश में दूर—दूर तक गांवों, छोटे—बड़े शहरों में और अंदरूनी भागों में भी फैले हुए हैं। यह भाग अधिकतर पहाड़ी है। ये लोग खेती करते हैं। काफी, चाय, कालीमिर्च, इलायची आदि की खेती विशेष रूप से की जाती है नारियल और काजू भी प्रमुख उपज हैं। कुछ समतल भागों में चावल की भी खेती होती है किन्तु जैन जन इसमें कम ही संलग्न है। कुछ कृषक छोटे खेतों के मालिक हैं तो कुछ बड़े फार्मों के। कुछ खेतों के स्वामी जैन मन्दिर भी हैं। यह क्षेत्र काफी विशाल हैं इसमें निवास करने वाले जैन मुख्य रूप से दिगम्बर जैन आम्नाय के हैं। इनके अनेक जैन मन्दिर और चैत्यालय है किन्तु खेद की बात है कि इस भाग के जैनों ने जीर्ण—शीर्ण जैन मंदिरों को गिराकर उनके स्थान पर नए मन्दिरों का निर्माण कर लिया है। इससे प्राचीनता संबंधी बहुत—सा साक्ष्य नष्ट हो गया है। ग्रामों आदि में बंटी इस क्षेत्र की ही आबादी पर विचार किया जाए तो यह स्पष्ट भासित होगा कि केवल इसी क्षेत्र में ही जैनों की संख्या जनगणना के आंकड़ों से अधिक है। इस भूभाग का दर्पण मन्दिर, डपततवत जमउचसमद्ध तो केरल में इतना प्रसिद्ध है कि उसे पिछले तीस—पैंतीस वर्षों में हजारों जैन—अजैन लोग कुछ ऊंची पहाड़ी पर होने पर भी देख चुके हैं। केरल का यह प्रदेश अपने नए नाम वायनाड के रूप में ही जाना जाता है। एक और क्षेत्र दिगम्बर जैन आम्नाय से मुख्य रूप से संबंधित है। वह है कण्णूर और कासरगोड हिलामें के अन्तर्गत प्रदेश। इस भूभाग में जैनधर्म और जैन जनसंख्या को जैन मन्दिरों को सबसे अधिक हानि हिन्दू धर्म के साथ ही साथ टीपू सुलतान ने पहुँचाई। उसके अत्याचारों के कारण जैन जनता पर्वतों की ओर भाग गई। दूसरी क्षति पुर्तगालियों में पहुँचाई। उन्होंने गोआ में अनेक जैन मन्दिरों को नष्ट किया, कर्नाटक में गेरसोप्पा आदि के कलात्मक मन्दिरों को तो क्षति पहुँचाई ही, केरल में भी जैन मन्दिर नष्ट किए। फिर भी जैनधर्म जीवित रहा। इस प्रदेश में एक अत्यन्त प्राचीन चतुमुचा मौजूद है। इन अत्याचारों का परिणाम यह हुआ कि जैन आबादी विरल हो गई। कम संख्या में होने पर भी इस भूभाग में गोविन्द पे जैसे जैन राष्ट्र कवि को जन्म दिया। गोमटेश धुदि के इस महाकवि ने केरल और कर्नाटक दोनों का मस्तक ऊँचा किया। केरल के इस भाग में जैनों की जनसंख्या बहुत कम है यह सच है।

जैनों का श्वेताम्बर समाज मुख्य रूप से केरल के शहरी क्षेत्र में निवास करता है। यह जैन समाज मूलरूप से गुजराती है। इसके पूर्वज लगभग पाँच सौ वर्ष घोड़ों पर गुजरात से केरल व्यापार के लिए आने प्रारम्भ हुए थे किन्तु अप्रवासियों की भाँति गुजरात से उनका नाता नहीं टूटा है। वह एक ही मुहल्ले या गुजराती स्ट्रीट में रहते हैं। इनके व्यवसाय के प्रमुख केन्द्र केरल के बड़े शहर हैं। एर्णाकुलम, कोच्ची, मट्टानचेरी, कोभिक्कोड़, आलप्पी इस प्रकार के नगरों में मुख्य हैं। यहाँ के जैन नारियल, नारियल का तेल, काफी, कालीमिर्च, अदरक आदि का व्यापार मुख्य रूप से करते हैं। कुछ बड़े उद्योग भी चलाते हैं जैसे नागजी पुरुषोत्तमजी जो कि साहू या डालमिया की भाँति प्रसिद्ध हैंं टाइम्स ऑफ इंडिया की ही तरह विख्यात मलयालम दैनिक मातृभूमि के स्वामी भी जैन ही हैं। दिगम्बरों में काफी के प्रमुख उत्पादक के रूप में श्री शांतिवर्मा, श्री धर्मपाल और श्री सन्तकुमार जाने—पहचाने नाम हैंं केरल के श्वेताम्बर समाज विशाल और सुन्दर मन्दिर भी हैं। आलप्पी में पच्चीस लाख की लागत से एक सुन्दर देरासर का निर्माण किया जा रहा है। यह समाज कल्लिल के गुहा मन्दिर को तीर्थस्थान मानता है कि हालांकि वह अब नंपूतिरि के अधिकार में है। उपर्युक्त शहरों में यद्यपि श्वेताम्बरों की ही संख्या सबसे अधिक है फिर भी श्वेताम्बर अपने उत्सवों आदि की दिगम्बरों के साथ सहयोग कर मनाते हैं। इस का एक उदाहरण प्रस्तुत लेखक को पर्युषण पर्य का दिया गया। ऐसा लगता है कि केरल के इन शहरों में श्वेताम्बर और दिगम्बर का भेद मिट गया है वैसे अपवाद तो हर स्थान पर होते हैं। विशेषकर मन्दिरों और अतिथिगृहों के कर्मचारियों के व्यवहार में भेदभाव की भावना का कहीं—कहीं अनुभव होता है। यह समाज वैष्णवों के उत्सवों में भी सहयोग करता है। अकेले कोझिक्कोड़ में ही १५० से अधिक श्वेताम्बर परिवार निवास करते हैं। इसी प्रकार यदि अन्य शहरों के श्वेताम्बरों की संख्या जोड़ी जाएं तो यह परिणाम सामने आएगा कि केरल में केवल श्वेताम्बरों की संख्या ही जनगणना में जैनों की संख्या से अधिक होगी।

केरल के मलयालमभाषी और राज्य के मूल निवासी दिगम्बर जैनों और श्वेताम्बर जैनों की संख्या जनगणना के आंकड़ों से कम से कम दो गुनी तो अवश्य होगी ऐसा अनुमान सहज ही किया जा सकता है। यदि केरल के जैन भी अपने कुलनामों यथा वर्मा या वर्मन या शाह अथवा मेहाताआदि के स्थान पर जैन शब्द का प्रयोग करें तो भी जनगणना के आंकड़े वास्तविकता की झलक दे सकते हैं।

केरल में कुछ जातियाँ और जनजातियाँ ऐसी भी हैं जिनमें जैनत्व के संकेत पाए जाते हैं। इस प्रकार के वर्ग में सबसे प्रथम हम नायर जाति का उल्लेख कर सकते हैं। यह सामान्यत: विश्वास किया जाता है कि यह जाति मूल रूप से नाग जाति थी जिसके उपास्य देव सर्प फणावली मंडित पार्श्वनाथ थे और उनकी शासन देवी पदमावती की भी उनमें बड़ी मान्यता थी। केरल में सामाजिक क्रांति के सूत्रधार चटटीम्प स्वामी ने यह मत व्यक्त किया है कि नायर जाति अिंहसा के सिद्धान्त को मानने वाली थी, उसकी अपनी सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था थी और वह वर्णव्यवस्था से अपरिचित थी। ऐसा लगता है कि यह जाति पार्श्वनाथ को तो भूल गई और नागपूजक हो गई। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दू मन्दिरों के रूप में परिर्वितत अनेक जैन मन्दिरों का प्रबंध नायर लोगों के हाथ में था। इसी प्रकार पद्मावती देवी भी भगवती कही जाने लगी और उनके मन्दिर भगवती मन्दिर कहलाने लगे। केरल में एक जनजाति ऐसी भी है जो अपने संस्कार जैनों से करवाती है। प्रस्तुत लेखक को अष्टसहस्री ब्राह्मण जाति के एक सदस्य ने बताया कि उसकी जाति पहिले जैन थी और जिसके आठ हजार सदस्यों को किसी समय ब्राह्मण बनाया गया था। यह एक रोचक बात है कि दक्षिण भारत की जातियों संबंधी एक अत्यन्त प्रामाणिक ग्रंथ में ब्राह्मण जाति के विभिन्न भेदों का उत्पत्ति आदि का विवरण तो उपलब्ध है किन्तु अष्टसहस्री ब्राह्मणों की उत्पत्ति के संबंध में यह ग्रंथ मौन है। इस लेखक ने विभिन्न जातियों और जनजातियों की उत्पत्ति संबंधी ब्रिटिश कालीन विवरणों को पढ़कर अनेक जातियों में जैनत्व के संकेत पाए हैं जिसका उल्लेख उसने अपनी पुस्तक ‘केरल में जैनमतम्’ में एक स्वतन्त्र अध्याय में किया है। पुरातत्त्व की दृष्टि से देखें तो लघु क्षेत्रफल वाले केरल में वर्तमान में भी लगभग पचास जैन पूरावशेष मिलते हैं ऐसा कुछ अध्ययनों से ज्ञात होता है। यह तथ्य किसी समय केरल में जैनों की बहुत बड़ी संख्या की ओर संकेत करता है।


श्री राजमल जैन
बी १/३२४, जनकपुरी नई दिल्ली—५८
अनेकान्त, अप्रैल—सितम्बर १९९५ पृ. २३ से ३४ तक