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गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल पदार्पण जन्मभूमि टिकैतनगर में १५ नवंबर को

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कल्याणमंदिर विधान : एक समीक्षा

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कल्याणमंदिर विधान : एक समीक्षा

समीक्षक—पं. शीतलचन्द जैन (पूर्व प्राचार्य), ललितपुर उ. प्र.
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पूज्य प्रज्ञाश्रमणी चन्दनामती माताजी द्वारा रचित ‘‘कल्याणमन्दिर विधान’’ सरल हिन्दी भाषा में है। इस विधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि श्रावक इसे पढ़कर स्वयं इस विधान को सम्पन्न कर सकता है। सम्पूर्ण विधि विधान की रूपरेखा इस कृति में है। विधान शैली का अनुपम उदाहरण है।

सर्वप्रथम कल्याणमन्दिर विधान का मण्डल इस रचना के प्रारम्भिक सोलहवें पृष्ठ पर है। सामान्यजन भी जो पूजन करना जानता है, इस मण्डल को तैयार कर सकता है।

पृष्ठ क्रमांक १ एवं २ पर माताजी ने भव्य जीवों के कल्याण के लिये मंगलाचरण की प्रस्तुति दी है। पूज्य माताजी ने इस विधान की रचना मुनि प्रवर कुमुदचन्द्र जी की रचना के आधार पर तथा इस युग की सर्वश्रेष्ठ साध्वी पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से की है। मंगलाचरण में माताजी ने अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठियों, चौबीस तीर्थंकरों एवं ऋद्धि सिद्धि प्रदाता १००८ भगवान पाश्र्वनाथ की वन्दना की है। वे प्रभु सुख समृद्धि के प्रदाता तथा विघ्नों का नाश करने वाले हैं। यह विधान पाश्र्वनाथ स्तोत्र के आधार पर है। श्रद्धापूर्वक इस विधान को सम्पन्न करने वाले श्रद्धालु लौकिक सुख की प्राप्ति भी कर सकते हैं तथा श्रेयस्कर मुक्ति मार्ग को भी प्राप्त कर सकते हैं। इन चार पंक्तियों से यह बात स्पष्ट परिलक्षित होती है—

ऋद्धि मंत्रयुत इस स्तुति में, कार्य सिद्धि की शक्ति है।

लौकिक सुख की प्राप्ति हेतु भी, करो पाश्र्व प्रभु भक्ति है।।
भुक्ति मुक्ति को देने वाला, यह विधान अतिशयकारी।
पाश्र्वनाथ स्तोत्र के ऊपर, ही इसकी रचना सारी।।

विधि-विधान पूर्वक पूर्ण भक्तिभाव से जो भी श्रावक इस विधान की पूजन सम्पन्न करेगा वह निश्चितरूप से कालसर्प योग के निवारण, अकाल मृत्यु निवारण, केतु ग्रह के योग से होने वाले अनिष्ट का निवारण, जन्म लग्न के कालसर्प का निवारण करने में सक्षम होगा तथा सांसारिक सुख भी प्राप्त कर सकता है। मंगलाचरण के अन्तिम पद से माताजी ने अपने कल्याण के साथ-साथ लोक कल्याण की भावना भायी है—

यही भावना करे चन्दना-मती आर्यिका प्रभुपद में।

मेरा हो कल्याण जगत का, भी कल्याण करो क्षण में।।
सार्थक हो स्तोत्र नाम, कल्याण का मन्दिर मुझ मन में।
परमातम की प्रतिमा सुन्दर, स्वयं विराजे इस तन में।।

मुनिवर कुमुदचन्द्र आचार्य रचित स्तोत्र पाठ के आधार पर पारस प्रभु का गुणानुवाद आह्वानन, स्थापना तथा सन्निहितो भव भव वषट् आदि काव्य रचना शंभू-छन्द में की गई है। जल के पद में माताजी ने दर्शाया है कि जन्म जन्मान्तरों में मैंने बहुत अधिक जल पी डाला है फिर भी मेरी तृषा शान्त नहीं हुई। अतः हे प्रभु! संसार भव भवान्तरों के कारण जन्म, जरा, मृत्यु नष्ट करने हेतु आपके चरणों में मैं जल सर्मिपत कर रहा हूँ।

चन्दन के पद में वर्णन है कि हे प्रभु आपने क्रोधाग्नि शान्त करके, केवलज्ञान की प्राप्ति की, वीतरागी बन समताभाव धारण किया। किन्तु मुझमें अभी भी क्रोधाग्नि जल रही है अतः हम इस संसार के आतप को नष्ट करने के लिये तथा शाश्वत शान्ति, चन्दन सी शीतलता प्राप्ति हेतु आपके समक्ष चन्दन सर्मिपत करते हैं।

अक्षय पद प्राप्ति हेतु भगवान का गुणानुवाद करते हुए माताजी ने स्पष्ट किया है। हे प्रभु! आपकी आत्मनिधि देखकर, आपकी भक्ति से क्षत-विक्षत मेरा जीवन भी अक्षयनिधि को प्राप्त कर आत्म कल्याण के मार्ग पर चलता रहे इसी पवित्र भावना के साथ अखण्डित पुञ्जों से अक्षत चढ़ाने आया हूँ।

पुष्प के पद के माध्यम से प्रभु के प्रति भक्ति दर्शायी गई है। आप चैतन्य आत्मा रूपी बगीचे में ज्ञानरूपी पुष्पान्जलि भरते हो। आत्मसुरभि में आप पुष्पान्जलि सर्मिपत करते हो। हमने जन्म जन्मान्तरों में अनेक पुष्पों की सुंगन्धि प्राप्त की, की सुगन्धि प्राप्त की, से कभी स्वयं को, कभी अपने घर को सजाया संवारा है पर आज तक आत्म पुष्प को सुसज्जित नहीं किया है। अतः सर्वसिद्धि हेतु, कामबाण विनाशन हेतु पुष्प सर्मिपत करता हूँ।

हे आत्मोपासक प्रभु! आपने वेदनीय कर्म को नष्ट कर क्षुधा रोग का निवारण कर लिया है। परमौदारिक कान्ति युक्त प्रभु के शरीर की छवि को देखने, आपकी भक्ति से सर्वसिद्धि प्राप्ति हेतु आपके पास आया हूँ। अनेक भवों में क्षुधा शान्ति हेतु हमने विविध मिष्ठान्न खाये, पर अपने क्षुधा रोग का निवारण नहीं कर पाये हैं। अतः क्षुधा रोग निवारण के लिये नैवेद्य थाल सर्मिपत करने आए हैं। अज्ञानान्धकार को नष्ट कर आपने केवलज्ञान प्राप्त किया एवं समस्त संसार को ज्ञानलोक से प्रकाशित किया है। हे वीतरागी प्रभु अज्ञान अन्धकार को नष्ट करने हेतु हम भी दीप सर्मिपत कर रहे हैं। आपने घातिया और अघातिया कर्मों को नष्ट कर तथा नोकर्मों को भी समाप्त कर परमात्मारूपी परमपद को प्राप्त किया है। आपको देखकर हम भी अपने कर्मों को नष्ट करने के लिये धूप जलाने आए हैं।

आपने सोलहकारण भावनाओं का चिन्तवन कर अत्यधिक पुण्य के फलस्वरूप तीर्थंकर पद को प्राप्त कर संसार से मुक्ति पायी है। मैं तो सांसारिक फलों के रसास्वादन में ही उलझा रहा। अब आपके समान उत्तम फल की प्राप्ति हेतु आपके चरणों में फल सर्मिपत करने आया हूँ।

हे प्रभु! आपके ज्ञानामृत से प्रभावित होकर मैं भी सिद्धशिला पर विराजमान होने हेतु अष्टद्रव्य मिश्रित यह अघ्र्य आपके चरणों में सर्मिपत कर रहा हूँ। जन्म, जरा और मृत्यु से छुटकारा पाने के लिये मैं भी कंचनझारी से उस परम शान्ति प्रदान करने वाले इष्ट स्थान की प्राप्ति हेतु त्रय शान्तिधारा कर रहा हूँ। इस लोक में आपकी र्कीित पताका फहराती रहेगी।

माताजी ने प्रभु पारसनाथ पंचकल्याणक अघ्र्यों के माध्यम से गर्भ, जन्म, दीक्षा, ज्ञान तथा निर्वाण कल्याणक की तिथि, स्थान एवं महत्ता का वर्णन किया है।

इस विधान में आचार्य श्री कुमुदचंद्र द्वारा रचित संस्कृत पद्य वसंततिलका छंद में हैं तथा उन पद्यों का हिन्दी में पद्यानुवाद पूज्य चंदनामती माताजी ने सरस-सरल शब्दों में कुसुमलता छंद में किया है।

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प्रथम वलय के आठ अघ्र्यों में प्रभु के अनन्तानंत गुणों का गुणानुवाद करते हुए पूज्य माताजी ने प्रथम अघ्र्य संसार समुद्र पार करने के लिये, द्वितीय अघ्र्य में धीर, वीर, गम्भीर, समताधारी प्रभु की भक्तिपरक पंक्तियों के माध्यम से कमठ के मान खण्डित करने वाले अघ्र्य का समर्पण किया गया है। तृतीय अघ्र्य में त्रैलोक्याधिपति भगवान की अनुपम सुन्दरता का वर्णन करते हुए त्रैलोक्याधीश पाश्र्व जिनेन्द्र के चरणों में अघ्र्य सर्मिपत किया गया है। पारस प्रभु के चरणों में सर्व पीड़ा निवारण हेतु अघ्र्य सर्मिपत किया जाता है। हे प्रभु! आप गुणों के रत्नाकर हैं। पाँचवें पद में पारस प्रभु के अनन्तानंत गुणों का वर्णन करते हुए सुख प्राप्ति हेतु अघ्र्य चढ़ाया गया है। महान तपस्वी भी जिनके प्रकट न होने वाले गुणों का वर्णन करने में सक्षम नहीं है। अबोध बालकवत् अपनी अल्पवाणी से पुण्यार्जन करते हुए प्रभु के अव्यक्त गुणों का अघ्र्य सर्मिपत किया गया है। सातवें अघ्र्य में प्रभु नाम का स्मरण ही संसार में हमारा सहारा है इस हेतु भवाटवी निवारण के लिये अघ्र्य। आठवें अघ्र्य में जो मनुष्य अपने हृदय में पारस प्रभु का निवास कराते हैं, उनके कर्म बंधन शिथिल हो जाते हैं। जैसे मोर की वाणी सुनते ही चन्दन से लिपटे सर्प भयभीत हो जाते हैं। संसारी प्राणी के कर्म बंधन ही समाप्त हो जाते हैं।

द्वितीय वलय के १६ अघ्र्य

प्रथम अघ्र्य में सभी पापों के निवारण के लिये पाश्र्वनाथ भगवान को अघ्र्य सर्मिपत किया गया है। दूसरे अघ्र्य में संसार समुद्र पार करने हेतु, तीसरे अघ्र्य में हे प्रभु वीतरागी होने के कारण कामदेव भी आप पर विजय प्राप्त नहीं कर सका। दावानल अग्नि के लिये जल के समान आप इन्द्रिय विजयी हैं अतः अग्नि भय निवारण के लिये अघ्र्य सर्मिपत किया गया है। चौथे अघ्र्य में भक्तजनों के तारक पाश्र्वप्रभु के चरणों में भव्यगणों के पार करने के लिय अघ्र्य सर्मिपत किया गया है। इस वलय के क्रमांक ५ से १६ तक के अघ्र्यों में सांसारिक बाधाओं के निवारण, जन्म, जरा, रोग निवारण, विग्रह निवारण आत्मस्वरूप के ध्येय की प्राप्ति परवादिस्वरूपध्येयाय, आप अशोक प्रातिहार्य, अजरामर, दिव्यध्वनि प्रातिहार्य, चामर प्रातिहार्य, िंसहासन प्रातिहार्य एवं भामण्डल प्रातिहार्य से सुशोभित हैं।

तृतीय वलय

तृतीय वलय में पूज्य माताजी ने सरल, सरस, गेय पद्यों द्वारा पाश्र्वप्रभु के महान गुणों का वर्णन करते हुए स्वयं के कल्याण के साथ समस्त संसारी प्राणियों के जन्म, जरा, मृत्यु विनाश की कामना के साथ अक्षय सुख की प्राप्ति की कामना की है। इस वलय में दुन्दुभि प्रातिहार्य एवं छत्रत्रय प्रातिहार्य का वर्णन कर उनकी महिमा पाश्र्वप्रभु की भक्ति के प्रसंग में दर्शायी है। अन्य पद्यों में प्रभु पाश्र्व की भक्ति से परिपूर्ण अघ्र्य समर्पण कर इस विधान की ऐतिहासिक महिमा का सांगोपांग वर्णन किया है। कमठ द्वारा प्रभु पाश्र्व पर उपसर्ग के प्रसंग को माताजी ने पूर्वोर्पािजत कर्मों की सत्ता बतलाकर प्रभु भक्ति से न डरने की सलाह दी है माताजी के अनुसार—

हे बलशाली तुम पर मूसल-धारा दैत्य ने बरसाई।

भीम भयंकर बिजली की, गर्जना उसी ने करवाई।।
खोटे कर्म बंधे उसके पर, जिनवर तो निश्चल तन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अघ्र्य चढ़ाकर वंदन है।।

जयमाला के आशीर्वाद दोहे में भक्ति की पराकाष्ठा का वर्णन माताजी ने गागर में सागर भर देने की शैली में व्यक्त किया है। जैसा कहा है—

पाश्र्वनाथ की भक्ति में, जो होते लवलीन।

ऋद्धि सिद्धि सुख पूर्ण कर, हों निज के आधीन।

वास्तव में हमारी भक्ति में पवित्र भाव होना चाहिए जैसा कि कुमुदचन्द्र आचार्य ने कल्याणमन्दिर स्तोत्र के ३८ वें पद्य में कहा है।

आर्किणतोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि। नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या।।

जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दु:खपात्रं। यस्मात्क्रिया: प्रतिफलन्ति न भावशून्या:।।

समापन संक्षेप

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प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी अपनी दीक्षागुरु पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रतिच्छाया के रूप में हम सब को जो उपदेशामृत का पान करा रही हैं वह उनकी विशेष प्रभावना का परिचायक है। कल्याणमन्दिर स्तोत्र में जिन सरस, गेय पद्यों का सृजन किया गया है वह नई पीढ़ी के लिये संस्कार देने वाला आगमरूपी दर्पण है। यह विधान जहाँ एक ओर पाश्र्वप्रभु की भक्ति की प्रेरणा देता है वहीं दूसरी ओर पूर्व जैनाचार्यों के महान उपकार के कारण जैन शासन की प्रभावना करने वाला है। पूज्य माताजी न केवल कवि वरन् कुशल लेखिका, आदर्श आर्यिका तथा आर्ष-मार्ग पर चलाने वाली मार्गर्दिशका हैं। आपने शताधिक ग्रन्थों की रचना कर अपनी दीक्षा गुरु आर्यिकारत्न पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी का नाम रोशन किया है। कुल २८ पृष्ठों में लिखित इस विधान में अन्तिम पृष्ठ पर जिस प्रशस्ति की रचना की है वह उनकी भक्ति की पराकाष्ठा का परिचायक है। चौबीस तीर्थंकरों की भक्ति, आचार्य श्री शान्तिसागर जी एवं आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज तथा पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी का महान उपकार विधान रचना में बतलाया है। संक्षेप में यह विधान आधि, व्याधि, उपाधि से रहित भक्ति सागर में अवगाहन करने की प्रेरणा देने वाला है। अन्य प्रासंगिक भजन, कल्याणमन्दिर विधान की पूजा, पाश्र्वनाथ भगवान का स्तवन आदि इस विधान की महत्त्वपूर्ण खूबियाँ हैं। मैं पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी तथा प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चन्दनामती माताजी के महान लोकोपकारी एवं आत्मकल्याणपरक जीवन की वन्दना करता हूँ। वे हम संसारी प्राणियों को इसी प्रकार जैन शासन सम्मत कार्य करने का आशीर्वाद प्रदान करती रहें। ऐसी कामना कर उनके रजत दीक्षा महोत्सव पर पुनः विनत भावपूर्ण वन्दामि करता हूँ। ‘‘जैनम् जयतु शासनम्’’