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गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल पदार्पण जन्मभूमि टिकैतनगर में १५ नवंबर को

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कल्याण मंदिर विधान

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कल्याण मंदिर विधान

मंगलाचरण

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-कुसुमलता छंद-
सिद्धशिला के अधिनायक, प्रभु सिद्ध अनंतानंत नमूूँ।
सिद्धिप्रिया को सुखदायक, चौबीसों तीर्थंकर प्रणमूँ।।
रिद्धि सिद्धि के दाता चिन्तामणि पारस प्रभु को वंदन।
सुख समृद्धि के कर्ता विघ्नों, के हर्ता जिनवर को नमन।।१।।


पंचकल्याणक प्राप्त जिनेश्वर, निज आतम कल्याण करें।
सचमुच जो कल्याण के मंदिर, बन जन-जन कल्याण करें।।
कुमुदचंद्र आचार्य प्रवर ने, इसीलिए शुभ भाव रखा।
पाश्र्वनाथ प्रभु की भक्ती में, पाश्र्वनाथ स्तोत्र रचा।।२।।


ऋद्धि मंत्रयुत इस स्तुति में, कार्यसिद्धि की शक्ती है।
लौकिक सुख की प्राप्ति हेतु भी, करो पाश्र्वप्रभु भक्ती है।।
भुक्ति-मुक्ति को देने वाला, यह विधान अतिशयकारी।
पाश्र्वनाथ स्तोत्र के ऊपर, ही इसकी रचना सारी।।३।।


चौवालिस काव्यों में प्रभु के, सभी गुणों का वर्णन है।
कालसर्प का योग निवारण, करने में यह सक्षम है।।
कालजयी व्यक्तित्व है जिनका, काल भी जिनसे हार गया।
काल भी यदि आया अकाल में, भक्ति से वह भी भाग गया।।४।।


जिनभक्ती से ही अकाल-मृत्यू का संकट टलता है।
पाश्र्वनाथ के जाप्य मंत्र से, केतू ग्रह भी टलता है।।
जन्मलग्न के कालसर्प का, योग सभी नश जाता है।
इस विधान के करने से, सांसारिक सुख मिल जाता है।।५।।


मंडल पर प्रभु को पधराकर, विधिवत् पूजा पाठ करो।
मंगल कलश करो स्थापन, फिर भक्ती का ठाठ करो।।
पंचसूत्र से मंडल वेष्टित, कर आराधन विधि कर लो।
दिक्पालादिक का आह्वानन, कर मंडलशुद्धी कर लो।।६।।


जैसे पारस प्रभु ने संकट, सहकर शिवपद पाया है।
दश भव तक कमठासुर के प्रति, क्षमाभाव अपनाया है।।
वैसे ही मुझको भी कष्ट, सहन करने की शक्ति मिले।
जब तक मुक्ति मिले नहिं तब तक, भव-भव में प्रभु भक्ति मिले।।७।।


कुमुदचंद्र मुनिवर की कृति को, श्रद्धापुष्प समर्पित हैं।
उनके पद मोती की माला, उनके पद में अर्पित है।।
गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी की संप्रेरणा मिली।
इस विधान की रचना हेतू, उनकी ही देशना मिली।।८।।


यही भावना करे चन्दनामती आर्यिका प्रभुपद में।
मेरा हो कल्याण जगत का, भी कल्याण करो क्षण में।।
सार्थक हो स्तोत्र नाम, कल्याण का मंदिर मुझ मन में।
परमातम की प्रतिमा सुन्दर, स्वयं विराजे इस तन में।।९।।

विधियज्ञ प्रतिज्ञापनाय कल्याणमंदिर विधान मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।


कल्याणमंदिर विधान पूजा

स्थापना-शंभु छंद
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हे प्रभुवर पारस नाथ! तुम्हीं, कल्याण के मंदिर कहलाते।
सब कार्यों की सिद्धी हेतु, सब भव्य तुम्हारे गुण गाते।।
श्री कुमुदचन्द्र आचार्य रचित, स्तोत्र पाठ का अर्चन है।
सबसे पहले निज हृदय महल में, आह्वानन स्थापन है।।१।।
दोहा
निज आतम का ध्यान कर, किया स्व पर कल्याण।
बने पंचकल्याणपति, पाश्र्वनाथ भगवान।।२।।
हम भी निज कल्याण हित, करें स्तोत्र विधान।
पाश्र्वनाथ को नमन कर, हम भी बनें महान।।३।।
ॐ ह्रीं कल्याणमंदिर अधिनायक सर्वसिद्धिकारक! श्री पाश्र्वनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं कल्याणमंदिर अधिनायक सर्वसिद्धिकारक! श्री पाश्र्वनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं कल्याणमंदिर अधिनायक सर्वसिद्धिकारक! श्री पाश्र्वनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

अथ अष्टक
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तर्ज-ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी......
प्रभु पाश्र्व तुम्हारी पूजा से, सब संकट हरने आये हैं।
भगवान......भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।टेक.।।
प्रभु ने तो जन्म लिया, पर बने अजन्मा हैं।
निज कर्मों से ही वे, बन गये अकर्मा हैं।।
प्रभु की इस मनहर मूरत को, हम आज निरखने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।१।।
भव भव में प्रभु हमने, कितना जल पी डाला।
पर शान्त न हो पाई, मेरे मन की ज्वाला।।
भव भव के ताप मिटाने को, जलधारा करने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।२।।

ॐ ह्रीं कल्याणमंदिरअधिनायकसर्वसिद्धिकारक श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
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प्रभु पाश्र्व तुम्हारी पूजा से, सब संकट हरने आये हैं।
भगवान......भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।टेक.।।
तुमने निज आतम का, क्रोधानल शान्त किया।
अज्ञान अमावस्या में, वैâवल्य प्रकाश दिया।।
तेरा पावन आलोक प्रभो, हम मन में बसाने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।१।।
मेरे चैतन्य सदन में, क्रोधाग्नी जलती है।
अज्ञान के अँचल में, छिप-छिप वह पलती है।।
हम इसीलिए चंदन लेकर, भवताप मिटाने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।२।।

ॐ ह्रीं कल्याणमंदिरअधिनायकसर्वसिद्धिकारक श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
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प्रभु पाश्र्व तुम्हारी पूजा से, सब संकट हरने आये हैं।
भगवान...भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।टेक.।।
अधिपति तुम धवल भवन के, है धवल तेरा दर्शन।
क्षत भी विक्षत होते हैं, सौंदर्य तेरा लखकर।।
तेरी सुन्दर आतमनिधि का, अवलोकन करने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।१।।
मेरा जीवन खंडित है, मद मोह व माया में।
अब करना अखंडित है, तव शीतल छाया में।।
अतएव अखण्डित पुँजों से, अक्षयपद पाने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।२।।

ॐ ह्रीं कल्याणमंदिरअधिनायकसर्वसिद्धिकारक श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
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प्रभु पाश्र्व तुम्हारी पूजा से, सब संकट हरने आये है।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।टेक.।।
चैतन्य वाटिका में तुम, ज्ञानांजलि भरते हो।
आत्मा की सुरभि में तुम, पुष्पांजलि करते हो।।
निष्काम तुम्हारे यौवन को, हम वंदन करने आए हैं।।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।१।।
कितने उद्यानों में जा, पुष्पों की गंध लिया।
कभी घर को सजाया मैंने, कभी निज शृँगार किया।
अब तेरे पावन चरणों में, हम पुष्प चढ़ाने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।२।।

ॐ ह्रीं कल्याणमंदिरअधिनायकसर्वसिद्धिकारक श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
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प्रभु पाश्र्व तुम्हारी पूजा से, सब संकट हरने आये हैं।
भगवान......भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।टेक.।।
वेदनी कर्म पर प्रभु जी, तुमने आक्रमण किया।
भग गई क्षुधा तव तन की, आत्मा में रमण किया।।
परमौदारिक तन युक्त प्रभो की, कान्ति निरखने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।१।।
हमने कितने भव-भव में, पकवान बहुत खाए।
लेकिन इस नश्वर तन की, नहिं भूख मिटा पाए।।
क्षुध रोग निवारण हेतु प्रभो! नैवेद्य थाल भर लाए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।२।।

ॐ ह्रीं कल्याणमंदिरअधिनायकसर्वसिद्धिकारक श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
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प्रभु पाश्र्व तुम्हारी पूजा से, सब संकट हरने आये हैं।
भगवान....भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।टेक.।।

विज्ञान नगर में तुमने, निज ज्ञानालोक किया।
वैâवल्य कला के द्वारा, जग को आलोक दिया।।
तेरी उस ज्ञान प्रभा को हम, शत वंदन करने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।१।।
अज्ञान नगर में मेरा, चिरकाल से है रमना।
नृप मोह के बंधन में, नहिं पूर्ण हुआ सपना।।
अज्ञान अंधेर मिटाने को, हम दीप जलाकर लाए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।२।।

ॐ ह्रीं कल्याणमंदिरअधिनायकसर्वसिद्धिकारक श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
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प्रभु पाश्र्व तुम्हारी पूजा से, सब संकट हरने आये हैं।
भगवान......भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।टेक.।।
कर्मों की धूप जलाकर, सुरभित निज महल किया।
नोकर्मों को भी गलाकर, विकसित गुणमहल किया।।
तेरा गुणमहल निरखने को, हम द्वार तिहारे आये हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।१।।
हमने कर्मों में निज को, आनन्दित माना है।
अतएव निजातम सुख को, िंकचित् नहिं जाना है।।
कर्मों के ज्वालन हेतु प्रभो, हम धूप जलाने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।२।।

ॐ ह्रीं कल्याणमंदिरअधिनायकसर्वसिद्धिकारक श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
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प्रभु पाश्र्व तुम्हारी पूजा से, सब संकट हरने आये हैं।
भगवान.......भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।
भव भव की पुण्य प्रकृतियाँ, तीर्थंकर फल लार्इं।।
तेरी अर्चा के बहाने, तव शरण प्रभो आर्इं।।
तेरे वैभव अवलोकन को, हम समवसरण में आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।१।।
मैं क्षणिक विनश्वर फल के, स्वादों में पँâसा रहा।
जिव्हा की लोलुपता में, उत्तम फल को न लहा।।
तुम सम फल की प्राप्ती हेतू, फल थाल सजाकर लाए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।२।।

ॐ ह्रीं कल्याणमंदिरअधिनायकसर्वसिद्धिकारक श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
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प्रभु पाश्र्व तुम्हारी पूजा से, सब संकट हरने आये हैं।
भगवान........भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।टेक.।।
सब दोष रहित प्रभु पारस, जग पारस करते हो।
तुम निज में रम करके, ज्ञानामृत भरते हो।।
तेरा ज्ञानामृत चखने को, हम भक्ती करने आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।१।। मैं अष्टद्रव्य लेकर के, तव सन्निध आया हूँ।
अष्टम वसुधा पाने को, मैं भी ललचाया हूँ।।
प्रभु सिद्धशिला की प्राप्ति हेतु, कुछ भक्त तेरे दर आए हैं।
भगवान तुम्हारी भक्ती से, सब सिद्धी करने आये हैं।।२।।
ॐ ह्रीं कल्याणमंदिरअधिनायकसर्वसिद्धिकारक श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अनघ्र्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

तर्ज-करती हूँ तुम्हारी भक्ति........
जब तक गंगा यमुना में, जलधार बहेगी।
पारस प्रभुवर के ज्ञान गंग की, धार रहेगी।।
हे पाश्र्व प्रभू जी, हे पाश्र्वप्रभू जी ।।टेक.।।
वंâचनझारी से चरणों में, त्रयधारा करनी है।
सांसारिक जन्म जरा मृत्यू की बाधा हरनी है।।
मेरे आतम मंदिर में सुख का, सार भरेगी।
पारस प्रभुवर के ज्ञानगंग की, धार बहेगी।।हे पाश्र्व.।।१।।
शांतये शांतिधारा।

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जब तक स्वर्गों में कल्पवृक्ष का, वास रहेगा।
पारसप्रभु के गुणपुष्पों का, इतिहास रहेगा।।
जय पारस देवा, जय पारस देवा........
चंपा चमेली पुष्पों से, पुष्पांजलि करना है।
आध्यात्मिक गुण से अन्तर्मन को, सुरभित करना है।।
उस क्षमा पुष्प का जीवन में, संवास रहेगा।
पारस प्रभु के गुणपुष्पों का, इतिहास रहेगा।।
जय पारस देवा, जय पारस देवा।।२।।

दिव्य पुष्पांजलि:।


पंचकल्याणक अर्घ्य

तर्ज-आए महावीर भगवान, माता त्रिशला के आँगन में........

कर के पारस प्रभू का ध्यान, हम पारस बन जाएंगे।
हम पारस बन जाएंगे, मुक्तिश्री पा जाएंगे।।कर के.....।।
वैशाख कृष्ण दुतिया को, माता के गर्भ पधारे।
माता वामा ने सोलह, सुपने देखे थे प्यारे।।
कर के भक्ति गर्भकल्याण, हम पारस बन जाएंगे।।१।।
ॐ ह्रीं वैशाखकृष्णाद्वितीयायां गर्भकल्याणकप्राप्ताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ पौष कृष्ण ग्यारस को, तीर्थंकर बालक जन्मे।
शचि गई प्रभू को लेने, माता के प्रसूति गृह में।।
पूजा करके जन्मकल्याण, हम पारस बन जाएंगे।।२।।कर के.....।।
ॐ ह्रीं पौषकृष्णाएकादश्यां जन्मकल्याणकप्राप्ताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पौषी कृष्णा एकम को, दीक्षाधारी जा वन में।
लौकान्तिक सुरगण आए, प्रभु की संस्तुति भी करने।।
जज के दीक्षा शुभकल्याण, हम पारस बन जाएंगे।।३।।कर के....।।
ॐ ह्रीं पौषकृष्णाएकादश्यां दीक्षाकल्याणकप्राप्ताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ चैत्र चतुर्थी के दिन, प्रभु केवलज्ञान हुआ था।
सबने प्रभु समवसरण में, दिव्यध्वनि पान किया था।।
भज लें प्रभु का केवलज्ञान, हम पारस बन जाएंगे।।४।। कर के....।।
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णा चतुथ्र्यां केवलज्ञानकल्याणकप्राप्ताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
श्रावण शुक्ला सप्तमि को, प्रभु का निर्वाण हुआ था।
सम्मेदशिखर पर्वत पर, इन्द्रों ने हवन किया था।।
पूजन करें मोक्षकल्याण, हम पारस बन जाएंगे।।५।।कर के.....।।

ॐ ह्रीं श्रावणशुक्लासप्तम्यां मोक्षकल्याणकप्राप्ताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।


अथ प्रत्येक अर्घ्य

दोहा— कुमुदचंद्र आचार्य ने, रचा स्तोत्र महान।

   मैं भी पूजन के निमित्त, करूँ पाश्र्व गुणगान।।
अथ प्रथमवलये अष्टकोष्ठोपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
—वसंततिलका छंद—
(१)
कल्याणमन्दिरमुदारमवद्य - भेदि -
भीताभय - प्रदमनिन्दितमङ्घ्रिपद्मम्।
संसारसागर - निमज्जदशेष-जन्तु-
पोतायमानमभिनम्य जिनेश्वरस्य।।१।।
—कुसुमलता छंद—
पारस प्रभु कल्याण के मंदिर, निज-पर पाप विनाशक हैं।
अति उदार हैं भयाकुलित, मानव के लिए अभयप्रद हैं।।
भवसमुद्र में पतितजनों के, लिए एक अवलम्बन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।१।।
ॐ ह्रीं भवसमुद्रतरणे पोतायमानकल्याणमंदिरस्वरूपाय श्रीपाश्र्वनाथ-जिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(२)
यस्य स्वयं सुरगुरु र्गरिमाम्बुराशे:,
स्तोत्रं सुविस्तृतमति र्न विभुर्विधातुम्।
तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतो-
स्तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये।।२।।
सागर सम गंभीर गुणों से, अनुपम हैं जो तीर्थंकर।
सुरगुरु भी जिनकी महिमा को, कह न सके वे क्षेमंकर।।
महाप्रतापी कमठासुर का, मान किया प्रभु खण्डन है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।२।।
ॐ ह्रीं कमठस्य धूमकेतूपमाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(३)
सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप-
मस्मादृश: कथमधीश! भवन्त्यधीशा:।।१।।
धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो,
रूपं प्ररूपयति विंâ किल घर्मरश्मे:?।।३।।
दिवाअन्ध ज्यों कौशिक शिशु नहिं, सूर्य का वर्णन कर सकता।
वैसे ही मुझ सम अज्ञानी, वैâसे प्रभु गुण कह सकता।।
सूर्य बिम्ब सम जगमग-जगमग, जिनवर का मुखमंडल है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।३।।
ॐ ह्रीं त्रैलोक्याधीशाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(४)
मोह-क्षयादनुभवन्नपि नाथ! मत्र्यो,
नूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत।
कल्पान्त-वान्त-पयस: प्रकटोऽपि यस्मा-
न्मीयेत केन जलधे-र्ननु रत्नराशि:?।।४।।
प्रलय अनंतर स्वच्छ सिन्धु में, भी ज्यों रत्न न गिन सकते।
वैसे ही तव क्षीणमोह के, गुण अनंत नहिं गिन सकते।।
उनके क्षायिक गुण कहने में, पुद्गल शब्द न सक्षम हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।४।।
ॐ ह्रीं सर्वपीड़ानिवारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(५)
अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ! जडाशयोऽपि,
कर्तुं स्तवं लसदसंख्य-गुणाकरस्य।
बालोऽपि िंक न निजबाहु-युगं वितत्य,
विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशे:।।५।।
शिशु निज कर पैâलाकर जैसे, बतलाता सागर का माप।
वैसे ही हम शक्तिहीन नर, कर लेते हैं व्यर्थ प्रलाप।।
सच तो प्रभु गुणरत्नखान अरु, अतिशायी सुन्दर तन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।५।।
ॐ ह्रीं सुखविधायकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(६)
ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश!
वत्तुंâ कथं भवति तेषु ममावकाश:।
जाता तदेव-मसमीक्षित-कारितेयं,
जल्पन्ति वा निज-गिरा ननु पक्षिणोऽपि।।६।।
बड़े-बड़े योगी भी जिनके, गुणवर्णन में नहिं सक्षम।
तब अबोध बालक सम मैं, वैâसे कर सकता भला कथन।।
फिर भी पक्षीसम वाणी से, करूँ पुण्य का अर्जन मैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।६।।
ॐ ह्रीं अव्यक्तगुणाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(७)
आस्तामचिन्त्य-महिमा जिन! संस्तवस्ते,
नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति।
तीव्राऽऽतपोपहत-पान्थ-जनान्निदाघे,
प्रीणाति पद्म-सरस: स-रसोऽनिलोऽपि।।७।।
जलाशयों की जलकणयुत, वायू भी जैसे सुखकारी।
ग्रीष्मवायु से थके पथिक के, लिए वही है श्रमहारी।।
वैसे ही प्रभुनाम मंत्र भी, मात्र हमारा संबल है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।७।।
ॐ ह्रीं भवाटवीनिवारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(८)
हृद्वर्तिनि त्वयि विभो! शिथिलीभवन्ति,
जन्तो: क्षणेन निबिडा अपि कर्मबन्धा।
सद्यो भुजङ्गम-मया इव मध्य-भाग-
मभ्यागते वन-शिखण्डिनि चन्दनस्य।।८।।
जो नर मनमंदिर में अपने, प्रभु का वास कराते हैं।
उनके कर्मों के दृढ़तर, बंधन ढीले पड़ जाते हैं।।
चंदन तरु लिपटे भुजंग के, लिए मयूर वचन सम हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।८।।
ॐ ह्रीं कर्माहिबन्धमोचनाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अथ द्वितीयवलये षोडशकोष्ठोपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
(१)
मुच्यन्त एव मनुजा: सहसा जिनेन्द्र!
रौद्रै-रुपद्रव-शतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि।
गो-स्वामिनि स्पुâरित-तेजसि दृष्टमात्रे,
चौरैरिवाऽऽशु पशव: प्रपलायमानै:।।९।।
ग्वाले के दिखते ही जैसे, चोर पशूधन तज जाते।
वैसे ही तव मुद्रा लखकर, पाप शीघ्र ही भग जाते।।
वैâसा हो संकट समक्ष प्रभु, ही हरने में सक्षम हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।९।।
ॐ ह्रीं सर्वोपद्रवहरणाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(२)
त्वंं तारको जिन! कथं भविनां त एव,
त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्त:।
यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून-
मन्तर्गतस्य मरुत: स किलानुभाव:।।१०।।
भवपयोधितारक हे जिनवर! तुम्हें हृदय में धारण कर।
तिर सकते हैं जैसे पवन, सहित तिरती है चर्ममसक।।
इसीलिए भवसागर तिरने, में कारण प्रभु चिन्तन है।
ऐेसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।१०।।
ॐ ह्रीं भवोदधितारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(३)
यस्मिन्हर-प्रभृतयोऽपि हत-प्रभावा:,
सोऽपि त्वया रति-पति: क्षपित: क्षणेन।
विध्यापिता हुतभुज: पयसाथ येन,
पीतं न विंâ तदपि दुर्धर-वाडवेन?।।११।।
हे अनङ्गविजयिन्! हरिहर, आदिक भी जिससे हार गये।
कामदेव के वे प्रहार भी, तुम सम्मुख आ हार गये।।
दावानल शांती में जल सम, प्रभु इन्द्रियजित् सक्षम हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।११।।
ॐ ह्रीं हुतभुग्भयनिवारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(४)
स्वा१मिन्ननल्प-गरिमाणमपि प्रपन्ना-
स्त्वां जन्तव: कथमहो हृदये दधाना:।।
जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेन,
चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभाव:।।१२।।
है त्रैलोक्यतिलक! जिसकी, तुलना न किसी से हो सकती।
उन अनंत गुणभार को मन में, धर जनता वैâसे तिरती।।
किन्तु यही आश्चर्य हुआ, तिरते जिनवर भाक्तिकजन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।१२।।
ॐ ह्रीं हृदयधार्यमाणभव्यगणतारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(५)
क्रोधस्त्वया यदि विभो! प्रथमं निरस्तो,
ध्वस्तास्तदा १वद कथं किल कर्म-चौरा:।
प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके,
नील-द्रुमाणि विपिनानि न िंक हिमानी।।१३।।
प्रभो! क्रोध को प्रथम जीतकर, कर्मचोर वैâसे जीता।
प्रश्न उठा मन में बस केवल, इसीलिए तुमसे पूछा।।
उत्तर आया हिम तुषार ज्यों, जला सके वन-उपवन है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।१३।।
ॐ ह्रीं कर्मचौरविध्वंसकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(६)
त्वां योगिनो जिन! सदा परमात्मरूप,
मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुज-कोष-देशे।
पूतस्य निर्मल-रुचेर्यदि वा किमन्य-
दक्षस्य सम्भव-पदं ननु कर्णिकाया:।।१४।।
हे जिनवर! योगीजन तुमको, हृदयकोष के मध्य रखें।
वैसे ही ज्यों कमल कर्णिका, कमलबीज को संग रखे।।
शुद्धात्मा के अन्वेषण में, हृदय कमल ही माध्यम है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।१४।।
ॐ हीं हृदयाम्बुजान्वेषिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(७)
ध्यानाज्जिनेश! भवतो भविन: क्षणेन,
देहं विहाय परमात्म-दशां व्रजन्ति।
तीव्रानलादुपल-भावमपास्य लोेके,
चामीकरत्वमचिरादिव धातु-भेदा:।।१५।।
हे जिनेश! तव ध्यानमात्र से, परमातम पद पाते जीव।
अग्निनिमित पा करके जैसे, सोना बनता शुद्ध सदैव।।
ऐसी शक्ती देने में निज, ज्ञानपुञ्ज ही सक्षम है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।१५।।
ॐ ह्रीं जन्ममरणरोगहराय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(८)
अन्त: सदैव जिन! यस्य विभाव्यसे त्वं,
भव्यै: कथं तदपि नाशयसे शरीरम्।
एतत्स्वरूपमथ मध्य-विवर्तिनो हि,
यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावा:।।१६।।
जिस काया के मध्य भव्यजन, सदा आपका ध्यान करें।
उस काया का ही विनाश, क्यों करते हो भगवान्! अरे।।
अथवा उचित यही जो विग्रह-तन तजते बन भगवन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।१६।।
ॐ ह्रीं विग्रहनिवारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(९)
आत्मा मनीषिभिरयं त्वदभेद-बुद्ध्या,
ध्यातो जिनेन्द्र! भवतीह भवत्प्रभाव:।
पानीयमप्यमृतमित्यनुचिन्त्यमानं,
विंâ नाम नो विष-विकारमपाकरोति।।१७।।
हे जिनेन्द्र! मंत्रादिक से, जैसे जल अमृत बन जाता।
विषविकार हरने में सक्षम, वह परमौषधि कहलाता।।
इसी तरह तुमको ध्याकर, तुम सम बनते योगीजन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।१७।।
ॐ ह्रीं आत्मस्वरूपध्येयाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१०)
त्वामेव वीत-तमसं परवादिनोऽपि,
नूनं विभो! हरि-हरादि-धिया प्रपन्ना:।
िंक काच-कामलिभिरीश! सितोऽपि शङ्खो,
नो गृह्यते विविध-वर्ण-विपर्ययेण?।।१८।।
जैसे कामलरोगी को, दिखती पीली वस्तू सब हैं।
वैसे ही अज्ञानी को, प्रभुवर दिखते हरिहर सम हैं।।
हे त्रिभुवनपति! फिर भी वे, करते तेरी ही पूजन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।१८।।
ॐ ह्रीं परवादिदेवस्वरूपध्येयाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(११)
धर्मोपदेश-समये सविधानुभावा-
दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोक:।
अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि,
िंक वा विबोधमुपयाति न जीव-लोक:।।१९।।
हे प्रभु पुण्य गुणों के आकर! तव महिमा का क्या कहना।
तरु भी शोकरहित तुम ढिग हों, फिर मानव का क्या कहना।।
रवि प्रगटित होते ही जैसे, कमल आदि खिलते सब हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।१९।।
ॐ ह्रीं अशोकप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१२)
चित्रं विभो! कथमवाङ्मुख-वृन्तमेव,
विष्वक्पतत्यfिवरला सुर-पुष्प-वृष्टि:।
त्वद्गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश!,
गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि।।२०।।
हे मुनीश! सुरपुष्पवृष्टि, जो तेरे ऊपर होती है।
उनकी डंठल नीचे अरु, ऊपर पंखुरियाँ होती हैं।।
यही सूचना है कि भव्य के, प्रभु ढिग खुलते बन्धन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।२०।।
ॐ ह्रीं पुष्पवृष्टिप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१३)
स्थाने गभीर-हृदयोदधि-सम्भवाया:,
पीयूषतां तव गिर: समुदीरयन्ति।
पीत्वा यत: परम-सम्मद-सङ्ग-भाजो,
भव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरामरत्वम्।।२१।।
तव गंभीर हृदय उदधी से, समुत्पन्न जो दिव्यध्वनी।
अमृततुल्य समझकर भविजन, पीकर बनते अतुलगुणी।।
सबकी भव बाधा हरने में, जिनवर गुण ही साधन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वंदन है।।२१।।
ॐ ह्रीं अजरामरदिव्यध्वनिप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१४)
स्वामिन्सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो,
मन्ये वदन्ति शुचय: सुर-चामरौघा:।
येऽस्मै नतिं विदधते मुनि-पुङ्गवाय,
ते नूनमूध्र्व-गतय: खलु शुद्ध-भावा:।।२२।।
देवों द्वारा ढुरते चामर, जब नीचे-ऊपर जाते।
विनयभाव वे भव्यजनों को, मानो करना सिखलाते।।
प्रातिहार्य यह प्रगटित कर, बन गये नाथ अब भगवन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।२२।।
ॐ ह्रीं चामरप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१५)
श्यामं गभीर-गिरमुज्ज्वल-हेम-रत्न
िंसहासनस्थमिह भव्य-शिखण्डिनस्त्वाम्।
आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चै-
श्चामीकराद्रि-शिरसीव नवाम्बुवाहम्।।२३।
स्वर्ण-रत्नमय सिंहासन पर, श्यामवर्ण प्रभु जब राजें।
स्वर्ण मेरु पर कृष्ण मेघ लख, मानों मोर स्वयं नाचें।।
इसी तरह जिनवर सम्मुख, आल्हादित होते भविजन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।२३।।
ॐ ह्रीं सिंहासनप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१६)
उद्गच्छता तव शिति-द्युति-मण्डलेन,
लुप्त-च्छद-च्छविरशोक-तरुर्बभूव।
सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग!
नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि।।२४।।
तव भामण्डल प्रभ से जब, तरुवर अशोक भी कान्तिविहीन।
हो जाता है तब बोलो क्यों?, भव्यराग नहिं होगा क्षीण।।
वीतरागता के इस अतिशय, से लाभान्वित भविजन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।२४।।
ॐ ह्रीं भामण्डलप्रातिहार्यप्रभास्वते श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अथ तृतीयवलये िंवशतिकोष्ठोपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
(१)
भो भो: प्रमादमवधूय भजध्वमेन-
मागत्य निर्वृति-पुरीं प्रति सार्थवाहम्।
एतन्निवेदयति देव! जगत्त्रयाय,
मन्ये नदन्नभिनभ: सुरदुन्दुभिस्ते।।२५।।
हे प्रभु! देवदुन्दुभी बाजे, जब त्रिलोक में बजते हैं।
तब असंख्य देवों-मनुजों को, वे आमंत्रित करते हैं।।
तज प्रमाद शिवपुर यात्रा, करना चाहें तब भविजन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।२५।।
ॐ ह्रीं दुन्दुभिप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(२)
उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!,
तारान्वितो विधुरयं विहताधिकार:।
मुक्ता-कलाप-कलितोरु-सितातपत्र-
व्याजात्त्रिधा धृत-तनुध्र्रुवमभ्युपेत:।।२६।।
तीन छत्र हे नाथ! चन्द्रमा, मानो स्वयं बना आकर।
निज अधिकार पुन: लेने को, सेवा में वह है तत्पर।।
छत्रों के मोती बन मानो, ग्रह भी करते वंदन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।२६।।
ॐ ह्रीं छत्रत्रयप्रातिहार्यविराजिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(३)
स्वेन प्रपूरित-जगत्त्रय-पिण्डितेन,
कान्ति-प्रताप-यशसामिव संचयेन।
माणिक्य-हेम-रजत-प्रविनिर्मितेन,
१सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि।।२७।।
समवसरण में माणिक-सोने-चांदी के त्रय कोट बने।
माना नाथ! तुम्हारी कांती-कीर्ती और प्रताप इन्हें।।
जन्मजात वैरी के भी, हो जाते मैत्रीयुत मन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।२७।।
ॐ ह्रीं वप्रत्रयविराजिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(४)
ाqदव्य-स्रजो जिन! नमत्त्रिदशाधिपाना-
मुत्सृज्य रत्न-रचितानपि मौलि-बन्धान्।
पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वा परत्र२,
त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव।।२८।।
प्रभु! इन्द्रों के नत मुकुटों की, पुष्पमालिका कहती हैं।
तव पद का सामीप्य प्राप्त कर, प्रगट हुई जो भक्ती है।।
इसका अर्थ समझिये प्रभु से, जुड़े सभी अन्तर्मन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।२८।।
ॐ ह्रीं पुष्पमाला-निषेवितचरणाम्बुजाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(५)
त्वं नाथ! जन्मजलधेर्विपराङ् मुखोऽपि,
यत्तारयस्यसुमतो निज-पृष्ठ-लग्नान्१।
युत्तंâ हि पार्थिव-निपस्य सतस्तवैव,
चित्रं विभो! यदसि कर्म-विपाक-शून्य:।।२९।।
हे कृपालु! जिस तरह अधोमुखि, पका घड़ा करता नदि पार।
कर्मपाक से रहित प्रभो! त्यों ही तुम करते भवि भवपार।।
इस उपकारमयी प्रकृति का, जिनमें अति आकर्षण है।।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।२९।।
ॐ ह्रीं संसारसागरतारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(६)
विश्वेश्वरोऽपि जन-पालक! दुर्गतस्त्वं,
िंक वाऽक्षर-प्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश!
अज्ञानवत्यपि सदैव कथंचिदेव,
ज्ञानं त्वयि स्पुâरति विश्व-विकास-हेतु:।।३०।।
हे जगपालक! तुम त्रिलोकपति, हो फिर भी निर्धन दिखते।
अक्षरयुत हो लेखरहित, अज्ञानी हो ज्ञानी दिखते।।
शब्द विरोधी अलंकार हैं, प्रभु तो गुण के उपवन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३०।।
ॐ ह्रीं अद्भुतगुणविराजितरूपाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(७)
प्राग्भार-सम्भृत-नभांसि रजांसि रोषा-
दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि।
छायापि तैस्तव न नाथ! हता हताशो,
ग्रस्तस्त्वमीभिरयमेव परं दुरात्मा।।३१।।
हे जितशत्रु! कमठ वैरी ने, तुम पर बहु उपसर्ग किया।
किन्तु विफल हो कर्म रजों से, कमठ स्वयं ही जकड़ गया।।
कर न सका कुछ अहित चूँकि, ध्यानस्थ हुए जब भगवन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३१।।
ॐ ह्रीं रजोवृष्ट्यक्षोभ्याय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(८)
यद्गर्जदूर्जित-घनौघमदभ्र-भीम
भ्रश्यत्तडिन्-मुसल-मांसल-घोरधारम्।
दैत्येन मुक्तमथ दुस्तर-वारि दध्रे,
तेनैव तस्य जिन! दुस्तर-वारिकृत्यम्।।३२।।
हे बलशाली! तुम पर मूसल-धारा दैत्य ने बरसाई।
भीम भयंकर बिजली की, गर्जना उसी ने करवाई।।
खोटे कर्म बंधे उसके पर, जिनवर तो निश्चल तन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३२।।
ॐ ह्रीं कमठदैत्यमुक्तवारिधाराक्षोभ्याय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(९)
ध्वस्तोध्र्व-केश-विकृताकृति-मत्र्य-मुण्ड-
प्रालम्बभृद्भयदवक्त्र-विनिर्यदग्नि:।
पे्रतव्रज: प्रति भवन्तमपीरितो य:,
सोऽस्याभवत्प्रतिभवं भव-दु:ख-हेतु:।।३३।।
केशविकृत मृतमुंडमाल धर, वंâठ रूप विकराल किया।
अग्नीज्वाला पेंâक-पेंâककर, विषधर सम मुख लाल किया।।
व्रूâर दैत्यकृत इन कष्टों से, भी नहिं प्रभु विचलित मन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३३।।
ॐ ह्रीं कमठदैत्यप्रेषितभूतपिशाचाद्यक्षोभ्याय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१०)
धन्यास्त एव भुवनाधिप! ये त्रिसंध्य-
माराधयन्ति विधिवद्विधुतान्य-कृत्या:।
भक्त्योल्लसत्पुलक-पक्ष्मल-देह-देशा:,
पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाज:।।३४।।
हे प्रभु! अन्यकार्य तज जो जन, तव पद आराधन करते।
भक्ति भरित पुलकित मन से, त्रय संध्या में तुमको यजते।।
धन्य-धन्य वे ही इस जग में, धन्य तुम्हारा दर्शन है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३४।।
ॐ ह्रीं त्रिकालपूजनीयाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(११)
अस्मिन्नपार-भव-वारि-निधौ मुनीश!
मन्ये न मे श्रवण-गोचरतां गतोऽसि।
आकर्णिते तु तव गोत्र-पवित्र-मन्त्रे,
िंक वा विपद्विषधरी सविधं समेति।।३५।।
इस भव सागर में प्रभु! तेरा, पुण्यनाम नहिं सुन पाये।
इसीलिए संसार जलधि में, बहुत दु:ख हमने पाये।।
जिनका नाम मंत्र जपने से, खुल जाते भवबंधन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३५।।
ॐ ह्रीं आपन्निवारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१२)
जन्मान्तरेऽपि तव पाद-युगं न देव!
मन्ये मया महितमीहित-दान-दक्षम्।
तेनेह जन्मनि मुनीश! पराभवानां,
जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम्।।३६।।
हे जिन! पूर्व भवों में शायद, चरणयुगल तव नहिं अर्चे।
तभी आज पर के निन्दायुत, वचनों से मन दुखित हुए।।
अब देकर आधार मुझे, कर दो मेरा मन पावन है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३६।।
ॐ ह्रीं सर्वपराभवहरणाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१३)
नूनं न मोह-तिमिरावृतलोचनेन,
पूर्वं विभो! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि।
मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनर्था:,
प्रोद्यत्प्रबन्ध-गतय: कथमन्यथैते।।३७।।
मोहतिमिरयुत नैनों ने, प्रभु का अवलोकन नहीं किया।
इसीलिए क्षायिक सम्यग्दर्शन आत्मा में नहीं हुआ।।
जिनके दर्शन से भूतादिक, के कट जाते संकट हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३७।।
ॐ ह्रीं सर्वमनर्थमथनाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१४)
आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि,
नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या।
जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दु:खपात्रं,
यस्मात्क्रिया: प्रतिफलन्ति न भाव-शून्या:।।३८।।
देखा सुना और पूजा भी, पर न प्रभो! तव ध्यान दिया।
भक्तिभाव से हृदय कमल में, नहिं उनको स्थान दिया।।
इसीलिए दुखपात्र बना, अब मिला भक्ति का साधन है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३८।।
ॐ ह्रीं सर्वदु:खहराय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१५)
त्वं नाथ! दु:खि-जन-वत्सल! हे शरण्य!
कारुण्य-पुण्य-वसते! वशिनां वरेण्य।
भक्त्या नते मयि महेश! दयां विधाय,
दुखांकुरोद्दलन-तत्परतां विधेहि।।३९।।
हे दयालु! शरणागत रक्षक, तुम दु:खितजनवत्सल हो।
पुण्यप्रभाकर इन्द्रियजेता, मुझ पर भी अब दया करो।।
जग के दु:खांकुर क्षय में, जिनकी भक्ती ही माध्यम है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।३९।।
ॐ ह्रीं जगज्जीवदयालवे श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१६)
नि:संख्य-सार-शरणं शरणं शरण्य-
मासाद्य सादित-रिपु-प्रथितावदानम्।
त्वत्पाद-पंकजमपि प्रणिधान-वन्ध्यो,
बन्ध्योऽस्मि चेद् भुवन-पावन! हा हतोऽस्मि।।४०।।
हे त्रिभुवन पावन जिनवर! अशरण के भी तुम शरण कहे।
कर न सवेंâ यदि भक्ति तुम्हारी, समझो पुण्यहीन हम हैं।
जिनका पुण्य नाम जपने से, होता नष्ट विषम ज्वर है।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।४०।।
ॐ ह्रीं सर्वशांतिकराय श्रीजिनचरणाम्बुजाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१७)
देवेन्द्रवन्द्य! विदिताखिल-वस्तु-सार!
संसार-तारक! विभो! भुवनाधिनाथ!।
त्रायस्व देव! करुणा-हृद! मां पुनीहि,
सीदन्तमद्य भयद-व्यसनाम्बु-राशे:।।४१।।
हे देवेन्द्रवंद्य! सब जग का, सार तुम्हीं ने समझ लिया।
हे भुवनाधिप नाथ! तुम्हीं ने, जग को सच्चा मार्ग दिया।।
जनमानस की रक्षा करते, दयासरोवर भगवन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।४१।।
ॐ ह्रीं जगन्नायकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१८)
यद्यस्ति नाथ! भवदङ्घ्रि-सरोरुहाणां,
भत्तेâ: फलं किमपि सन्ततसञ्चिताया:।
तन्मे त्वदेक-शरणस्य शरण्य! भूया:,
स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि।।४२।।
नाथ! तुम्हारे चरणों की, स्तुति में यह अभिलाषा है।
भव-भव में तुम मेरे स्वामी, रहो यही आकांक्षा है।।
जिन पद के आराधन से, मिटते सब रोग विघन घन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।४२।।
ॐ ह्रीं अशरणशरणाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(१९)
इत्थं समाहित-धियो विधिवज्जिनेन्द्र!
सान्द्रोल्लसत्पुलक-कञ्चुकिताङ्गभागा:।
त्वद्विम्ब-निर्मल-मुखाम्बुज-बद्ध-लक्ष्या,
ये संस्तवं तव विभो! रचयन्ति भव्या:।।४३।।
हे जिनेन्द्र! तव रूप एकटक, देख-देख नहिं मन भरता।
रोम-रोम पुलकित हो जाता, जो विधिवत् सुमिरन करता।।
दिव्य विभव को देने वाले, रहते सदा अविंâचन हैं।
ऐसे पारस प्रभु के पद में, अर्घ्य चढ़ाकर वन्दन है।।४३।।
ॐ ह्रीं चित्तसमाधिसुसेविताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
(२०)
(आर्याछंद)
जननयन ‘कुमुदचन्द्र’! प्रभास्वरा: स्वर्ग-सम्पदो भुक्त्वा।
ते विगलित-मल-निचया, अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते।।४४।।
जो जन नेत्र ‘कुमुद’ शशि की, किरणों का दिव्य प्रकाश भरें।
स्वर्गों के सुख भोग-भोग, कर्मों का शीघ्र विनाश करें।।
मोक्षधाम का द्वार खोलकर, सिद्धिप्रिया का वरण करें।
ऐसे पारस प्रभु को हम सब, अर्घ्य चढ़ाकर नमन करें।।४४।।
दोहा- इस स्तोत्र सुपाठ का, भाषामय अनुवाद ।
       किया ‘‘चन्दनामति’’ सुखद, ले ज्ञानामृत स्वाद।।

ॐ ह्रीं परमशांतिविधायकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।


-पूर्णाघ्र्य-

कुमुदचन्द्र आचार्य प्रवर ने, पाश्र्वनाथ गुणगान किया।

इस कल्याण के मंदिर में, प्रभु भक्ती को स्थान दिया।।
सर्वसिद्धिकारी यह रचना, सबके लिए सुखास्पद है।
भाव सहित ‘‘चन्दनामती’’, पूर्णाघ्र्य समर्पित प्रभु पद है।।
ॐ ह्रीं सर्वसिद्धिकरायकल्याणमंदिरस्तोत्र अधिपतिश्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।
Jaap.JPG
Jaap.JPG

जाप्य मंत्र—ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं व्रूâरकमठोपद्रवजिताय श्रीपाश्र्वनाथाय नम:
अथवा

ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपाश्र्वनाथाय नम:।


जयमाला

तर्ज-तुमसे लागी लगन........

जय जय पारस प्रभो, भवदधितारक विभो, द्वार आया।
अर्घ्य का थाल मैंने सजाया।।टेक.।।
गर्भ से मास छह पूर्व नगरी।
रत्नमय वह बनारसपुरी थी।।
इन्द्रगण आ गए, चक्रधर पा गए, तेरी छाया,
अर्घ्य का थाल मैंने सजाया।।१।।

जन्म होते ही वंâपित मुकुट थे।
दिव्य बाजे स्वयं बज उठे थे।।
जग चकित हो गया, मोह तम खो गया, प्रभु की माया,
अर्घ्य का थाल मैंने सजाया।।२।।

वामानन्दन हो पारस प्रभो तुम।
अश्वसेन के प्रिय लाल हो तुम।।
धर्मामृत जो बहा, ज्ञानामृत को लहा, जो भी आया,
अर्घ्य का थाल मैंने सजाया।।३।।

प्रभु तुम पंचकल्याणक के स्वामी।
हो गये तीनों लोकों में नामी।।
मोक्ष में रम गए, सिद्धिपति बन गये, नहिं है काया,
अर्घ्य का थाल मैंने सजाया।।४।।

श्री कुमुदचंद्र ने तुमको ध्याया।
एक स्तोत्र सुंदर बनाया।।
संकटमोचन बने, खुद करम सब हने, छोड़ी माया,
अर्घ्य का थाल मैंने सजाया।।५।।

नाथ कल्याणमंदिर हो तुम ही।
जग का कल्याण करते हो प्रभु जी।।
विघ्नविजयी बने, मृत्युविजयी बने, सिद्धि पाया,
अर्घ्य का थाल मैंने सजाया।।६।।

तेरी भक्ती का फल मैं ये चाहूँ।
भावना आत्म पद की ही भाऊँ।।
‘‘चन्दनामति’’ प्रभो, मांगते सब विभो, तेरी छाया,
अर्घ्य का थाल मैंने सजाया।।७।।

ॐ ह्रीं कल्याणमंदिर अधिनायक सर्वसिद्धिकारक श्री पाश्र्वनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

—दोहा—
पाश्र्वनाथ की भक्ति में, जो होते लवलीन।
ऋद्धि सिद्धि सुख पूर्ण कर, हों निज के आधीन।।८।।

।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलि:।।


प्रशस्ति

श्री वीरप्रभू निर्वाण वर्ष, पच्चिस सौ तेंतिस सुखकारी।

आश्विन शुक्ला१ दशमी की तिथि है, जग में अति मंगलकारी।।
उस दिन विधान यह पूर्ण किया, निजगुरु की छत्रच्छाया में।
शुभ तीर्थ हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप की शीतल छाया में।।१।।

बीसवीं सदी के प्रथम सूरि, आचार्य शांतिसागर जी थे।
उन प्रथम शिष्य अरु पट्टसूरि, आचार्य वीरसागर जी थे।।
उनकी शिष्या गणिनी माता, श्री ज्ञानमती जी कहलार्इं।
इस युग की पहली बालब्रह्मचारिणी मात वे बन आर्इं।।२।।

इनकी शिष्या आर्यिका चन्दनामती नाम मैंने पाया।
गुरुचरणों की रज पाकर मेरी, सफल हुई नश्वर काया।।
इनके ही आशीषों से मैंने, इस विधान को रच डाला।
कल्याण का मंदिर इसे कहें, या सर्वसिद्धि करने वाला।।३।।

यूँ तो गणिनी श्री ज्ञानमती, माता ने कई विधान दिये।
ढाई सौ से भी अधिक ग्रंथ, लिखकर निज-पर उपकार किये।।
उनसे प्रेरित होकर मैंने भी, भक्ती के कुछ क्षण पाये।
भक्तामर अरु नवग्रहशांति के, लघु विधान तब रच पाये।।४।।

तीर्थंकर जन्मभूमि एवं, है मनोकामनासिद्धि पाठ।
षट्खण्डागम सिद्धान्त सुचिंतामणि टीका का अनुवाद।।
हे प्रभु! ऐसी ही ज्ञानसाधना, की मुझमें वृद्धी होवे।

बस यही ज्ञान हो पूर्ण ज्ञान, जिससे आतमसिद्धी होवे।।५।।